अक्टूबर 2019

इतिहास-पुराण में व्यक्तिगत सिविल नाफरमानी

रविवार डेस्क

प्रहलाद प्रहलाद पुराण की परम्परा का पहला ज्ञान सत्याग्रही है। सम्भव है कि दूसरे देशों की पौराणिक कथाओं में कोई ऐसा निकल आए, जो कालक्रम के हिसाब से प्रहलाद के पहले का साबित हो। अगर ऐसा हो तो हमें अचरज नहीं होगा, बल्कि खुशी होगी। लेकिन इसकी सम्भावना कम है। नहीं के बारबर, क्योंकि हिन्दुस्तान की पौराणिक कथाएँ दुनिया में बेजोड़ तो हैं ही, शायद सबसे पुरानी भी हैं या कम से कम सबसे पुरानी कथाओं में से तो हैं ही। दरअसल, इसमें कालक्रम का सवाल ही नहीं उठना चाहिए। दूसरे देशों और सभ्यताओं की पौराणिक और निजंधरी कथाओं में ऐसे अनेकों ज्ञात-अज्ञात सत्याग्रही हैं। लेकिन सत्याग्रह का पहला सुन्दर और चन्दन सा पवित्र प्रतीक तो प्रहलाद ही बन सका है। पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि दैत्यों के राजा हिरण्यकश्यपु के चार बेटों में प्रहलाद सबसे छोटा था। भागवत के अनुसार वह वैसे सबसे छोटा था, लेकिन गुणों में सबसे बड़ा था। संत सेवा में, सौम्य स्वभाव, सत्यप्रतिज्ञ वगैरह होने के अलावा, कहा जाता है कि प्रहलाद समस्त प्राणियों के साथ अपने ही समान समता का व्यवहार करता था। दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य राजमहल में ही अपने बच्चों के साथ प्रहलाद को राजनीतिक, अर्थनीति आदि पढ़ाया करते थे। प्रहलाद का मन उस दिशा में न लगता था। गुरु का पाठ सुन लेता था और जस का तस सुना देता था। उसकी अपनी श्रद्धा और भक्ति भगवान के चरणों में थी। एक दिन जब हिरण्यकश्यपु ने उसको गोद में लेकर बड़े प्रेम से पूछा कि उसे सबसे अच्छी कौन सी बात लगती है तो उसने कहा कि अपने-पराये के झूठे आग्रह को छोड़कर भगवान श्री हरि की शरण में जाना सबसे अच्छा है। अपने शत्रु पक्ष की तारीफ सुनकर हिरण्यकश्यपु ठठा कर हंस पड़ा। उसने समझा कि दूसरों के बहकावे में आ कर प्रहलाद ऐसा कहता है। अब बहकने न पावे, इसकी ताकीद कर वह चला गया। फिर उसके गुरु ने लाख समझाया, प्रहलाद अपनी श्रद्धा से डिगा नहीं। गुरु जी ने ‘दैत्यों के कुल में कलंक लगाने वाला इस कुलांगार’ को बेतों से पीटकर दुरुस्त करना चाहा। प्रहलाद अपनी भक्ति से हिला नहीं। हिरण्यकश्यपु ने क्रोध में आ कर उसे उठा कर पटक दिया, बड़े-बड़े मतवाले हाथियों से कुचलवाया, विषधर सांपों से डंसवाया, पहाड़ की चोटी से नीचे डलवा दिया, शाम्बरासुर से अनेकों प्रकार की माया का प्रयोग करवाया, अंधेरी काल कोठरी में बंद करवाया, विष पिलाया और खाना बन्द करा दिया। लेकिन प्रहलाद जिसे वह सत्य मानता था, उससे विचलित न हुआ। हिरण्यकश्यपु की अपनी विवशता पर चिंता हुई। तब फिर उसने उसे गरम लोहे के खम्भे से बांधा। वहां भी प्रहलाद ने और बातों के अलावा हिरण्यकश्यपु से यह कहा कि आप अपना यह आसुर भाव छोड़ दीजिए। अपने मन को सबके प्रति समान बनाइए। फिर कहा जाता है कि विष्णु का नृसिंह अवतार हुआ और उसने हिरण्यकश्यपु का वध किया और भक्त प्रहलाद की रक्षा की। अब इस प्रसंग में यह सवाल जरूरी नहीं कि इस पुराण की कहानी को पूरा सच मानते हैं या पूरी गप या कुछ सच कुछ गप। क्योंकि अगर प्रहलाद जैसा कोई सजीव, ऐतिहासिक व्यक्ति न भी हुआ हो तो भी यह सब हिन्दुस्तान के उन करोड़ों लोगों के लिए सच है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी इन किस्सों को सुनते रहे हैं और उन पर अपने जीवन में ज्ञात-अज्ञात रूप से अमल करते रहे हैं। यह तो उनके जातीय व्यक्तित्व या जिसे मनोवैज्ञानिक जातीय अचेतन मन कहते हैं, उसका हिस्सा बन गया है। अब उसके सच से या उसके असर से कौन इनकार कर सकता है? यहां दो बातों का जिक्र कर देना अच्छा होगा - (1) प्रहलाद सत्याग्रही है, क्योंकि उसने जिसे सच या न्याय समझा, उस पर वह डटा रहा। उसने उसकी खातिर कष्ट झेले। फिर भी वह अपनी श्रद्धा से डिगा नहीं। प्रहलाद ने अपने पिता के खिलाफ जो अन्यायी था, जिसके अत्याचार से तीनों, लोक के लोकपाल थर्राते थे, अकेले सत्याग्रह किया। लेकिन पिता के प्रति उस जमाने के जो शिष्टाचार थे, उनको वह निभाता रहा। वह खुद निर्विकार रहा। और अहिंसक और अजेय भी। इसलिए प्रहलाद आदर्श बालक भी है और आदर्श सत्याग्रही भी। (2) इसी से जुड़ी दूसरी बात है। यह प्रश्न भागवत के अनुसार युधिष्ठिर ने नारद से पूछा था कि हिरण्यकश्यपु ने पिता होकर भी ऐसे शुद्ध हृदय बेटे से द्रोह क्यों किया। पिता तो स्वभाव से ही अपने बेटे से प्रेम करते हैं, यदि बेटा कोई उलटा काम करता है तो वे उसे शिक्षा देने के लिए ही डांटते हैं। शत्रु की तरह वेविरोध नहीं करते। फिर प्रहलाद जैसे बेटे से कोई पिता कैसे द्वेष कर सकता है। यह प्रश्न जो पुराना भी है और नया भी, सत्य, अंहिसा और सत्याग्रह का एक बुनियादी प्रश्न है। अहिंसक कर्म, अकर्म के साथ जुड़ा हुआ है। कहा जा रहा है कि सत्याग्रह सौम्य, सौम्यतर, सौम्यतम हो, सत्याग्रह से बैर विरोध न उपजे, हिंसा न हो, बगैरह। गनीमत है कि यह लजीली छुई-मुई वाला बांझ प्रज्ञावाद प्रहलाद को या उसके बाद के सत्याग्रहियों को नहीं सूझ सकता नहीं, हालांकि प्रहलाद सौम्य था, सौम्यतर, तम, उच्चारने वालों से कहीं अधिक सौम्य। लेकिन अपने ही पिता ने जबर्दस्त बैर-विरोध पैदा किया। फिर भी अपना काम करता रहा। निष्ठा और भक्ति के कर्म से हिला नहीं और इस तरह इतिहास पुराण में प्रसिद्ध पहला सत्याग्रही हुआ। सुकरात (लगभग 470 ईसा पूर्व - 399 ईसा पूर्व) दुनिया की पुरानी सभ्यताओं के एक दूसरे केन्द्र ग्रीस के एथेंस शहर का बूढ़ा सूकरात इतिहास का पहला मशहूर सत्याग्रही है। लगभग 70 बरस की उम्र में 399 ई. पू. उसने इत्‍मीनान से जहर का प्याला पीकर जान दे दी, लेकिन सड़कों पर, गली-कूचों और चौराहों पर, हाट-बाजार में, व्यायामशाला और हर कहीं अपने ढंग से लोगों से सवाल-जवाब करने की आजादी के हक पर पाबन्दी न मानी। वह अपनी सहनशीलता के लिए मशहूर और बड़ा संतोषी था। कम से कम अपना काम मजे में चला लेता था। लेकिन वह त्याग काटो नहीं करता था। शानदार दावत में वह बहुत जिंदादिल रहा करता था। उसका आम तरीका यह था कि वह घर से बाहर निकल जाया करता था और जो कोई भी उससे मिलता, उससे किसी चीज के बारे में पूछता। आमतौर पर जो लोग बुद्धिमान समझे जाते थे, उनसे तो खास तौर पर। वह शब्दों के निश्चित अर्थ और ठीक इस्तेमाल पर बहुत जोर देता था। सवाल-जवाब की झड़ी में विद्वान लोग निपट मूर्ख साबित हो जाते और पता चल जाता कि वह बड़े-बड़े शब्दों के जाल में छिपाए रहते हैं, ऐसे शब्दों में उनका ठीक-ठीक अर्थ भी वह नहीं जानते। ऐसे संवाद प्लेटो ने लिखे हैं। युवक सुकरात से बहुत प्रभावित रहते और हमेशा उसे घेरे रहते हैं। हालांकि वह कभी अपने को बुद्धिमान नहीं मानता था, लेकिन उसे अपने से अधिक बुद्धिमान भी कोई नहीं मिला। प्लेटो ने उसकी सफाई की बहस लिखी है। उसमें उसने कहा है कि वह हर किसी के पास जाता जो बुद्धिमान माने जाते थे। लेकिन थोड़े से सवाल-जवाब के बाद उसे पता चलता कि वह तो उससे भी अधिक अज्ञानी है। लेकिन इस तरह वह अपने दुश्मन पैदा करता रहा। सुकरात को उसके जमाने का सबसे बुद्धिमान माना गया है। उसकी यह बात तो बहुत मशहूर है अपने अज्ञान को जानो। उसके शिष्य बहुत से थे। जेनाफानऔर प्लेटो, और फिर प्लेटो का शिष्य अरस्तु तो न केवल ग्रीक दर्शन में ही, बल्कि विश्व दर्शन और नीति में मशहूर है। सुकरात कभी किसी पद पर नहीं रहा। क्योंकि जैसा उसने अपने जजों से कहा, पद पर आने से उसे अपने सिद्धांतों में समझौता करना पड़ता। एक बार जब 406.5 में वह 500 लोगों वाली काउंसिल में था तो उसने आर्गिन्यूस के विजेताओं के मुकदमे में पहले अपने साथियों की मदद से ठीक अकेले ही जर्नलओं के खिलाफ सामूहिक असंवैधानिक फैसले का विरोध किया था। 404 ईसवी पूर्व में भी उसने इसी साहस का परिचय दिया। उसने 30 लोगों के आतंक के दिनों में, जबकि वे लोग प्रतिष्ठित लोगों को मुकदमे में फंसाना चाहते थे, उनके आदेश पर लियोन को गिरफ्तार करने से इंकार कर दिया। अपनी बहस के दौरान वह कहता है कि इस अवज्ञा के लिए उसकी जान जा सकती थी, अगर एक बरस के अंदर ही प्रति क्रांति ना हो गई होती। अमन के 4 बरस बाद 399 ईस्वी पूर्व मैं उस पर अधर्मशीलता या अश्रद्धा के लिए मुकदमा चलाया गया। इसके पीछे असली आदमी एनिटस था, जो पुनर्स्थापित डेमोक्रेटिक से था। लेकिन नाम के लिए मुद्दई अप्रसिद्ध मेलेटस था। उसके अभियोग में दो बातें मुख्य थीं (1) युवकों को गुमराह करता है। (2) शहर के देवताओं की उपेक्षा करता है और धर्म की नयी-नयी बातों पर अमल करता है। सुकरात ने अपने प्रतिवाद में इन दोनों पर इल्‍जामों की खिल्ली उड़ाई। उसने अपने को जनता का असली मददगार बताया और अपनी अनन्य देशभक्ति की भी चर्चा की। लेकिन अपने लिए या अपने बाल-बच्चों के लिए दया की कोई भीख नहीं मांगी। एथेंस के लोगों से उसने कहा कि वह उनका बहुत आदर करता है, उनसे बहुत प्यार करता है लेकिन वह उसके मुकाबले ईश्वर की आज्ञा मानना पसन्द करता है और इसलिए जब तक जिन्दा है, दर्शन की शिक्षा और उसके अनुसार आचरण करने से बाज नहीं आएगा। प्लेटों द्वारा लिखित इस सफाई में सुकरात ने अपनी निष्ठा दोहराई है और किसी दूसरे किस्म की सफाई नहीं दी है। सफाई की इस बहस के बाद शायद 200 के मुकाबले 280 वोट से उसे मौत की सजा सुनाई गयी। अब वह अपने लिए देश निकाले की सजा या जुर्माने की सजा मांग सकता था। सुकरात ने कहा कि सजा या जुर्माने की सजा मांग सकता था। सुकरात ने कहा कि उसके साथ तो समाज के हित-साधक जैसा व्यवहार होना चाहिए। जुर्माना देने के लिए उसके पास पैसा नहीं। और इस उम्र में वह किस देश जाएगा और किस मुंह से ? उसने जुर्माने में एक मीना देना मंजूर किया और दोस्त के बहुत आग्रह करने पर तीस मीना तक बढ़ा। इन सबसे एथेंसवासियों का रोष बढ़ गया। और इस बार और बड़े बहुमत से उसे मौत की सजा का फैसला हुआ। आमतौर पर सजा के बाद 24 घंटे के अन्दर ही जहर का प्याला पीकर आत्महत्या करने की सजा होती थी। लेकिन उन दिनों जहाज डेलास में देवता की पूजा के लिए गया था और ग्रीस के रिवाज के मुताबिक जहाज के लौटने तक सजा नहीं दी जा सकती थी। इसलिए सुकरात जेल में रहकर जहाज के लौटने का और जहर के प्याला पीने का इंतजार करता रहा। जेल में वह अपने मित्रों से बराबर मिलता रहा और वैसे ही उनसे बातें करता रहा। प्लेटो ने फिडास नामक संवाद में सुकरात के अंतिम दिनों की बात-चीत का अच्छा वर्णन किया है। सुकरात के दोस्त और प्रशंसक क्रिटो ने उसे जेल से भाग निकलने के लिए बहुत मनाना चाहा। सुकरात ने सवाल-जवाब के अपने ढंग से न केवल क्रिटो को निरुत्तर ही कर दिया, बल्कि हमेशा के लिए सविनय कानून भंग और फौजदारी कानून भंग की मर्यादा की लक्ष्मण रेखा खींच दी। क्योंकि उस तरह जेल से भाग निकलना तो सिविल नाफरमानी न होती। उसने यह भी कहा कि लोग कहेंगे कि इस उम्र तें सुकरात ने अपनी जान बचाने के लिए उन एकरारों को, नियमों को तोड़ दिया, जिन्हें वह स्वेच्छया मानता रहा है। थोड़ा-सा और जी लेने के लिए क्या यह अच्छा होगा? सुकरात ने जहर का प्याला पीया । लेकिन अपनी जीभ का निरादर न होने दिया । अपनी वाणी स्वतन्त्रता पर कोई पाबंदी न मानी। और इस तरह मर कर वह इतिहास में अमर हो गया। ग्रीस का वह बूढ़ा सुकरात दुनिया के इतिहास का पहला ज्ञात सत्याग्रही है। ईसा मसीह फिर ईसा मसीह की क्रॉस पर टँगी आकृति सामने आती है। ईसा के क्रॉस के संदेश और पहाड़ के उपदेश का स्थान मनुष्य जाति की हमेशा की शिक्षाओं में है। हालांकि इस महान् एशियाई के संदेश को ईसाई मतावलम्बियों ने पिछले 1,500 से अधिक वर्षों में बहुत विकृत कर डाला है। ईसा के जन्म के बारे में और उसके प्रायः 30 बरस तक के जीवन के बारे में बहुत कम जानकारी है। हिसाब लगाया गया है कि कुल 50 दिनों का जीवन ऐसा है, जिसके बारे में कुछ पक्की जानकारी है। शायद जब ईसा 30 बरस के बाद आम जानकारी में आये, लगभग 18 महीने ही उनको जीने को मिले। जन्म नजारेथ के बढ़ई के घर हुआ। माता मेरी की मंगनी तो हो गयी थी, लेकिन पैदा हुए कुवांरी माता के ही गर्भ से। लगभग 20 बरस की उम्र में जान ने उन्हें दीक्षित किया। फिर ईसा की प्रसिद्धि एक शिक्षक और लोगों के दु:खों को हरने वाले के रूप में हुई। सड़क पर, मन्दिरों में, घर-बाहर, हर कहीं वह अपने लोगों को उपदेश दिया करते । लोग बड़े उत्साह और चाव से उनकी बात सुनते। यहूदियों का केन्द्र जरुशलम था। जरुशलम का मन्दिर ‘ठगों की खोह’ बना हुआ था। वहाँ के पुजारी रुपया बनाने, सीधे-सादे बहूदियों को ठगने और हर प्रकार की हिंसा और व्यभिचार में लिप्त थे । ईसा ने उन्हें फटकारा और कहते हैं कि उनके क्रोध से, तेजस्विता से पुजारी उनके सामने से हट गये । लेकिन वे ईसा के जानी दुश्मन बन गये। फिर भी ईसा की लोकप्रियता के कारण वे खुले आम कुछ करने से घबराते थे। ईसा के चुने हुए बारह शिष्यों में एक जुडास पुजारियों से मिल गया; अपने मसीहा से घात किया। एक रात को एकांत में पुजारी ईसा को पकड़ ले गये । मुकदमा चला या मुकदमे का नाटक हुआ, इसका वर्णन में भिन्न-भिन्न है। ईसा पर अभियोग लगाया गया मुकदमा चला, या मुकदमे का नाटक हुआ, इसका ब्योरा हर वर्णन में भिन्न-भिन्न है। ईसा पर अभियोग लगाया गया कि यह अपने को मसीहा कहता है, यहूदियों का राजा वगैरह कहता है। यहूदी पुजारियों ने उसे दोषी ठहराया । फिर रोम के गवर्नर को मामला सुपुर्द किया। उसने अगल-बगल में दो चोरों के साथ ईसा को क्रास में जकड़ दिया। अपने ही एक खास शिष्य ने घात किया, एक शिष्य ने भरी सभा में उससे अपना कोई लगाव न बताया, सिपाहियों ने पीटा, लोगों ने थुका और अन्त में अपमान और आपत्तिजनक तरीके से क्रॉस पर कीलों से जकड़ा। लेकिन ईसा का संदेश, क्रॉस का संदेश फैला। ईसा का उपदेश और उसका जीवन-मरण बुद्ध, कन्फ्युसियस, जरथुस्त्र, महम्मद आदि धर्म-प्रवर्तकों की तरह मनुष्य जाति के लिए हर समय ताजा रहता है और जिन्दगी को ऊँचा उठाता है। "बुराई का प्रतिकार मत कर । जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उस की ओर दूसरा गाल भी फेर दे।" पहाड़ पर का उसका यह उपदेश तो बहुत मशहूर है। लेकिन ईसा का अप्रतिकार का यह उपदेश अपने असल रूप में बुराई का सब से बड़े प्रतिकार का उपदेश है। और इसकी सही व्याख्या ईसा के जीवन और कर्म से जोड़ कर करनी चाहिए । जो तुझ पर नालिश कर के तेरा कुरता लेना चाहे, उसे दोहर भी लेने दे । जो कोई तुझे कोस भर बेगार ले जाए उसके साथ दो कोस चला जा।" अन्यायी से इस प्रकार सहयोग करना सबसे बड़ा असहयोग है। और सत्याग्रही असहयोग में तो यह बराबर होता है। उदाहरण के लिए, जब सरकार जुर्माने की सजा देती है, न देने पर जेल की; तो सत्याग्रही जुर्माना न दे कर खुद अपनी जिन्दगी जेल के हवाले कर देता है। अहिंसक कर्म का दर्शन तो इसकी ऐसी ही व्याख्या करेगा और खुद ईसा का जीवन इसी व्याख्या की साक्षी देगा । इसलिए असल बात यही है। मीरा भला कौन हिन्दुस्तानी होगा, जिसने मीरा के भजन न सुने होंगे। उसकी गिरधर नागर से प्रीति जग जाहिर है। लेकिन मीरा ने एक और मानी में बहुत बड़ा काम किया है। सत्याग्रह तब एक सार्वभौम रूप लेगा, जब कि घर-घर में पिता-पुत्र के बीच, पति-पत्नी के बीच और पड़ोसियों और समुदायों और राष्ट्रों के बीच भी सत्य और न्याय के लिए एक-दूसरे से एक किस्म का असहयोग शुरू हो जाएगा । स्त्री को पुरुष की आज्ञा का अपनी अन्तरात्मा की आवाज के खिलाफ पालन नहीं करना चाहिए। और उसे अपने पति से या दूसरे सज्जनों से भी नहीं करने के लिए तैयार रहना चाहिए। यह उसका अधिकार और कर्तव्य है। राजस्थान की मीरा ने अपने जमाने में ऐसा किया और इसकी खातिर कष्ट झेले, अपमान सहा, जहर का प्याला पीया, दर-दर मारी फिरी, क्या कुछ नहीं सहा ? और इस तरह हर देश काल की औरतों के लिए एक जीता जागता आदर्श रखा। गिरधर गोपाल के ऊपर उसने जब किसी को कुछ न माना तो राणा की आज्ञा के खिलाफ भी साधु-संग, भजन-कीर्तन वगैरह में लगी रही। इससे हटाने के लिए कहा जाता है कि चम्पा और चमेली नाम की दो दासियां उनके साथ रखी गयीं । मीरा तो अपनी श्रद्धा से डिगी नहीं, उल्टे उन दोनों का मन मीरा जैसा हो गया। राणा ने अपनी बहन ऊदा को साथ लगाया। परन्तु मीरा अपने प्रण से टली नहीं। उल्टे ऊदा का मन मीरा के प्रेम में ओत- प्रोत हो गया। वह मीरा की चेली हो गयी। तब मीरा को विष का प्याला भेजा। कहते हैं कि प्रेम-दीवानी मीरा हंसते-हंसते उसे पी गयी और उसका उस पर कुछ असर न पड़ा। मीरा के एक प्रसिद्ध भजन 'मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई' में यह प्रसंग निम्नलिखित रूप में आया है : थोरो अब तक पुरानी दुनिया के सत्याग्रहियों में से कुछ प्रसिद्ध प्रतीकों का जिक्र किया गया। अब इस पुरानी दुनिया से अमरीका की नयी दुनिया के थोरो तक देश काल पात्र की लम्बी छलांग हम लगाएं। अन्य बातों के अलावा, थोरो अपनी सिविल नाफरमानी के लिए सारी दुनिया में मशहूर है । मेक्सिको में संयुक्त राष्ट्र अमरीका लड़ाई लड़ रहा था। थोरो ने उस अमरीकी सरकार को पोल टैक्स देने से इनकार किया जो गुलामी कायम रखती है और लड़ाई करती है। और इसके लिए प्रेम से एक रात जेल में काटी। इस अनुभव के बाद उसने अपना लेख लिखा जो 1849 में छपा । यह लेख आज भी वैसा ही ताजा है, जैसा कि आज से 160 बरस पहले। थोरो का एक सवाल-जबाब तो बहुत मशहूर हो गया है । इमर्सन ने पूछा : “तुम जेल में क्यों हो ?" थोरो ने जवाब में पूछा : “तुम जेल से बाहर क्यों हो ?" "जिस राज में एक भी आदमी अन्यायपूर्वक जेल में बंद हो, उस राज में न्यायपूर्ण आदमी की न्यायसंगत जगह जेल में है।" इस लेख को गांधी जी ने दक्षिणी अफ्रीका के सत्याग्रह के दिनों में पढ़ा और बार-बार उद्धृत कर मशहूर कर दिया। उसी प्रसिद्ध लेख के कुछ अंश दे कर इतिहास-पुराण में व्यक्तिगत सिविल नाफरमानी का प्रकरण समाप्त करना अच्छा होगा : ‘‘यह हो ही नहीं सकता कि इनसान अपनी आत्मा को कानून के हवाले कर दे। अगर ऐसा होता तो फिर हर आदमी के लिए आत्मा की जरूरत ही क्या थी। मैं समझता हूँ हमको इनसान पहले और प्रजा बाद में होना चाहिए । कानून की इज्जत करनी चाहिए, लेकिन इतनी नहीं, जितनी सचाई की। मुझे पूरा-पूरा हक है कि सचाई के रास्ते पर चलूं । कानून ने किसी को इन्साफ पसन्द नहीं बनाया । अकसर अच्छे लोग भी कानून की जरूरत से ज्यादा इज्जत करने की वजह से नाइन्साफी के हथियार बन जाते हैं। मिसाल के तौर पर उन सिपाहियों को लीजिए जो अपनी इच्छा और आत्मा के खिलाफ भी जंग में हिस्सा लेते हैं। "इस तरह एक तरफ तो ऐसे लोग हैं, जो मुल्क और हुकूमत के हथियार का काम करते हैं, जैसे सिपाही, पुलिस, कानूनदां, वजीर, राजनीतिज्ञ वगैरह। और दूसरी तरफ है, देश-भक्त, शहीद, समाज-सुधारक वगैरह । सिपाही तो सोचते भी नहीं, दिमाग से काम लेते ही नहीं, इसलिए वे तकरीबन बेजान और बेहिस हो जाते हैं। कानूनसाज और वजीर दिमाग का काम तो करते हैं। मगर आत्मा की परवाह नहीं करते। इनके खिलाफ वे हैं जो हमेशा आत्मा की आवाज पर अमल करते हैं। और वक्त पड़ने पर अपनी जान की बाजी भी लगा देते हैं। चूंकि वे मुल्क की खिदमत आत्मा से करते हैं, इसलिए उनको हुकूमत का दुश्मन करार दिया जाता है। ‘‘यह मेरा पक्का विश्वास है कि आज जो अमरीकी हुकूमत है, उसका समर्थन करना अपनी बेगैरती और आत्मा से धोखा करना है। मैं हरगिज-हरगिज उस हुकूमत को अपनी हुकुमत नहीं बोल सकता जो गुलामों की हूकूमत भी है।’’ ‘‘हर इनसान को इस बात का हक है कि वह उस हुकूमत की मुखालिफत करें जो जुल्म और बेइन्साफी पर कायम हो। इसलिए में मांग करता हूं कि यह लोग दूसरों को गलाम न बनाएं और मैक्सिको के खिलाफ लड़ाई न करें।’’ लोग कहते हैं कि स्थिति धीरे-धीरे सुधरती है और यह भी कि चन्द लोग बाकी इन्सानों से ज्यादा अच्छे और अक्लमन्द नहीं हो सकते । हजारों ऐसे हैं, जो गुलामी और लड़ाई से नफरत करते हैं। मगर वे यह कहते हैं कि क्या किया जाए। ये लोग आजादी के सवाल को तिजारत के सवाल से भी कम महत्व देते हैं। और अखबारों में चीजों की कीमतें पढ़ते हैं। उनको अफसोस होता है और बाज वक्त वे दरख्वास्तें भी पेश करते हैं, मगर उससे ज्यादा वे कुछ नहीं करते । वे चाहते हैं कि दूसरे बुराई के खिलाफ आन्दोलन करें ताकि उनको अफसोस करने की जरूरत न रहे। इस तरह अगर 999 अच्छाई का समर्थन करने वाले होते हैं तो एक असली अच्छा आदमी होता है।