अक्टूबर 2019

विचार

रविवार डेस्क

"मैं अपने को सनातनी हिंदू कहता हूं क्योंकि मैं वेद, उपनिषद, पुराण और धर्म-सुधारकों के लिखे पर विश्वास करता हूं। इस विश्वास के लिए जरूरी नहीं कि 'शास्त्र' मानी जाने वाली हर चीज को मैं प्रमाणिक मानूं। मुझे पंडितों की व्याख्या अथवा तदुक्तियों को मानने की जरूरत नहीं। सनातन धर्म को मानने वाला सनातनी है। महाभारत के अनुसार सनातन धर्म का अर्थ है अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह का पालन। जब तक मैं यथाशक्ति इनका पालन करता हूं तब तक मुझे अपने को सनातनी कहने में तनिक भी हिचक नहीं।

उन्नीसवीं सदी की एक तारीख (27अक्टूबर, 1869) 21वीं सदी के प्रभाती दशक के इस साल एक बार फिर याद की जाएगी। 20वीं सदी के एक विराट जीवन को हमने चलन के हिसाब से इस तारीख पर टांग दिया है। तारीखें वक्त के साथ खूटियों में तब्दील हो जाती हैं और हम अपनी सुविधा से उन पर कोई-न-कोई तस्वीर टांगते जाते हैं। हम अक्सर भूल जाते हैं कि कुछ व्यक्तित्व एक कौंध की तरह होते हैं। उनकी एक तस्वीर नहीं हो सकती इसलिए उनके नाम से कोई एक तारीख भी नहीं हो सकती। गाँधी प्रक. शपुंज थे - आत्मदीप्त 'ज्योति' थे। और ठेठ इसी कारण से अपने मनपसंद फ्रेम में हम-आप गाँधी की कोई सच्ची तस्वीर नहीं आँक सकते। गाँधी जी से पहले सार्वजनिक जीवन का विरला ही कोई व्यक्तित्व होगा जिसके एक-एक पल का हिसाब रखा गया हो - लिया गया हो। दिलचस्प यह भी है कि एक पूरी सदी के नाजायज पर अपनी सत्य-अहिंसा से अंगुली उठाने वाली और सत्याग्रह की बेआवाज मगर अटूट लाठी से जायज की राह टटोलने वाली यह आत्मा खुद अपने एक-एक पल का हिसाब रखती थी। हिसाब अब भी बाकी है - गाँधी के जीवन की टोह लेने के क्रम में लगातार छपाई का संसार बढ़ रहा है। शायद वह जीवन ही इतना विराट है कि लाखों-लाख पन्नों में भी न समा सके। पहले गाँधी के पास रहकर और बाद में उनकी पार्थिव देह से दूर होकर हमेशा उनको आँकने की कोशिश की गई। महात्मा, कर्मयोगी, प्रेमी, ब्रह्मचारी, आत्मा का अन्वेषी, अध्यात्म का विज्ञानी से लेकर अधनंगा फकीर, गुजराती बनिया, कामी और कूटनीति का महारथी, सवर्ण हिंदू और ईसाइयत का एजेंट जैसे अनेक चौखटे हैं जिसमें इस विराट जीवन की मनचाही तस्वीर बनाने की कोशिश की गई है लेकिन गाँधी ऐसे किसी भी फ्रेम में अँटने से इंकार करते हैं। गाँधी की परस्पर विरोधी छवियां चौंकाती हैं तो उन्हें उतना ही आकर्षक भी बनाती हैं। गाँधी की एक ऐसी ही सरकारी छवि है। इसमें गाँधी बुजुर्ग हैं, उनका मुंह पोपला है और हाथ की लाठी बुढ़ापे को टेक देने के लिए है - एक गाँधी जो न देखता-सुनता हो और न बोलता हो; जो अपनी लाचारी में आगामी पीढ़ियों को सिर्फ आशीर्वाद देने के लिए हो! गाँधी की एक छवि देवता की है - रामधुन, रामनामी, कर्मकांडी खादी में लपेटकर रखा जाने वाला एक 'देव' जिसके आगे प्रायोजित पदयात्राओं की धूल का प्रक्षालन किया जा सके। गाँधी की इस निठल्ली छवि से अलग कुछ लोग गाँधी को 'सनातनी हिंदू' और 'परम वैष्णव' मानते हैं जो शायद आज होता तो उनका 'राममंदिर' बनवाने के लिए 'कारसेवा' को तत्पर होता और 'रामसेतु का ध्वंस' रोकने के लिए सत्याग्रही उपवास पर बैठता। ऐसे तमाम लोग भूल जाते हैं कि गाँधी मरते दम तक युवा थे, उनके मुंह में सच्चाई के लिए गरजने और बरजने वाली आवाज थी और एक लाठी थी जो लाठी से ज्यादा कबीर वाली 'लुकाठी' थी। ऐसे लोग भूल जाते हैं कि गाँधी के 'रामराज्य' में शायद ही कोई 'रामसेतु' या 'राममंदिर' ईंट-पत्थर का होता, क्योंकि उनके शब्दकोश में राम का मतलब सत्य और अहिंसा से परे कुछ और न था। यह गाँधी बेखटके कह सकता था - "हिंदू स्वराज चाहते हैं हिंदू-राज नहीं' (यंग इंडिया, 18 सितंबर 1924) गाँधी अपने को सनातनी हिंदू कहते थे, लेकिन उनका 'सनातन' और 'हिंदू' किसी शास्त्र का 'सनातन' और 'हिंदू' न था क्योंकि उनका धर्म भी किसी चर्च-मठ और छाप-तिलक वाला धर्म न था। वह 'निज' का 'गोपन' से सम्भाषण था। वहां मन की हालत होती है - 'सब रग तंत-रबाब तन, विरह बजावै नित' और सवाल होता है कि 'पराई पीर' जानी या नहीं। गाँधी ने धर्म को शास्त्रों से मुक्त किया : "मैं अपने को सनातनी हिंदू कहता हूं क्योंकि मैं वेद, उपनिषद, पुराण और धर्म-सुधारकों के लिखे पर विश्वास करता हूं। इस विश्वास के लिए जरूरी नहीं कि 'शास्त्र' मानी जाने वाली हर चीज को मैं प्रमाणिक मानूं। मुझे पंडितों की व्याख्या अथवा तदुक्तियों को मानने की जरूरत नहीं। सनातन धर्म को मानने वाला सनातनी है। महाभारत के अनुसार सनातन धर्म का अर्थ है अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह का पालन। जब तक मैं यथाशक्ति इनका पालन करता हूं तब तक मुझे अपने को सनातनी कहने में तनिक भी हिचक नहीं। यह था गाँधी का धर्म जिसमें उन्होंने खुद धर्म को भी. एक कसौटी प्रदान की। अगर लोकप्रचलित सनातनी का अर्थ था लीक पर चलने वाला तो गाँधी ने सनातनी की परिभाषा उलट दी और सनातनी को समाज के आलोचक के रूप में देखा। गाँधी का निज धर्म सांगठनिक और शास्त्रबद्ध धर्म से अलग था। इस बात की अनदेखी करके ही गाँधी को परंपरागत 'हिंदू' और 'सनातनी' कहा जा सकता है। उनकी जयंती पर गाँधी के धर्म को इंगित करते और राज्यसत्ता से उसके रिश्ते को रेखांकित करते कुछ उद्धरण यहां इस आशा से दिए जा रहे हैं ताकि गाँधी का पुनर्पाठ हमें अपने-अपने धर्म की पड़ताल करने के लिए प्रेरित करे : धर्म और राष्ट्रीयता अपने धर्म और देश के सच्चे हित के बीच कभी कोई वैर हो ही नहीं सकता। दोनों के बीच कोई वैर जान पड़े तो मानिए कि अपने धर्म यानी नैतिक बोध में ही कोई खोट है। सच्चे धर्म का मतलब है नेक आचार-विचार। सच्ची देशभक्ति का भी मतलब नेक आचार- विचार ही होता है। दो समानार्थक चीजों के बीच ऊँच-नीच बैठाना गलत है। (यंग इंडिया, 9 जनवरी 1930) मुझे उम्मीद है कि भारत संघ के लोग अपने धर्म-विश्वास के सच्चे होंगे और कानून की नजर में पूरी बराबरी का दर्जा पाते हुए अपने को भारत भूमि की संतान कहने में गर्व महसूस करेंगे। धर्म राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं बल्कि मनुष्य का अपने ईश्वर से एक व्यक्तिगत रिश्ता है। राष्ट्रीयता के अर्थ में वे शरु से लेकर आखिर तक भारतीय ही हैं चाहे वे किसी धर्म को मानते हों। (हरिजन, 29 जून, 1947) अक्सर सुनने में आता है कि राष्ट्रीयता और धर्म में पहली (राष्ट्रीयता) दूसरे (धर्म) से श्रेष्ठतर है। मेरे एक मित्र ने पिछले दिनों पूछा कि क्या मेरा भी ऐसा ही मानना है। मैंने कहा कि दोनों एकरस नहीं हैं और दो विरस चीजों के बीच तुलना नहीं हो सकती। दोनों अपनी-अपनी जगह एक-दूसरे के बराबर हैं। जो आदमी अपने धर्म की कदर करता है और राष्ट्रीयता की भी वह इसमें से एक की खातिर दूसरे से दगा नहीं कर सकता। दोनों उसे समान रूप से प्यारे होते हैं। जो सीजर (राज्यसत्ता) का होता है उसे वह सीजर को देता है और जो ईश्वर का होता है उसे वह ईश्वर को देता है और अगर सीजर अपनी सीमा को भूलकर उसको लांघे तो अपने ईश्वर में आस्थावान मनुष्य अपनी निष्ठा किसी दूसरे सीजर के हाथों नहीं सौंप देता बल्कि उसे पता होता है कि इस अतिक्रमण से कैसे निपटना है। मैं राजकीय धर्म में विश्वास नहीं करता भले ही पूरे राज्य समुदाय के लोग एक धर्म को मानते हों राज्य का हस्तक्षेप (धर्म में) संभवतया हमेशा अवांछित ही कहलाएगा। धर्म शुद्ध रूप से एक निजी मामला है। दरअसल धर्म उतने ही हैं जितने मानव-मस्तिष्क। हर दिमाग में ईश्वर की एक संकल्पना होती है जो दूसरे दिमाग की ईश्वरीय संकल्पना से अलग होती है। (हरिजन, 23 मार्च, 1947) एक अखबार में छपी एक ईसाई की चिट्ठी में कहा गया है कि सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार राजकोष के पैसे से नहीं किया जाना चाहिए। मुझे यह आपत्ति सही जान पड़ती है। सरदार (पटेल) मेरे साथ ही थे। उन्हें यह कतरन दिखाई गई और उन्होंने कहा कि जूनागढ़ राजकोष अथवा केंद्रीय राजकोष से ही ऐसे कामों के लिए एक फूटी कौड़ी भी नहीं खर्च की जाएगी। सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार हिंदुओं तथा जीर्णोद्धार में दिलचस्पी लेने वाले लोगों के चंदे से किया जा सकता है। भारत संघ धर्मनिरपेक्ष राज्य है - धर्माधारित राज्य नहीं। (हरिजन, 7दिसंबर 1947) उम्मीदों का भारत क्या कायदे-आजम ने यह नहीं कहा कि पाकिस्तान धार्मिक राज्य नहीं है और यह पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष राज्य है? क्या संघ (भारत) धार्मिक राज्य बने और हिंदुओं के सिद्धांत गैर-हिंदुओं पर लाद दिए जाएं? मुझे उम्मीद है कि ऐसा नहीं होगा। अगर ऐसा होता है तो भारत भूमि आशाओं और स्वप्नों की भूमि न रहेगी - वह भूमि न रहेगी जिसकी तरफ सभी एशियाई और अफ्रीकी नस्लें या समूची दुनिया विश्वासपूर्वक देख रही होगी। दुनिया को भारत से क्षुद्रता और धर्मान्धता की अपेक्षा नहीं। दुनिया को भारत से महानता और ऐसी अच्छाई की उम्मीद है जिससे पूरा विश्व एक सबक ले सके और जो दुनिया को उसके अंधेरे में प्रकाश दिखा सके। (हरिजन, 16 नवंबर 1947) ...जिस भारत की रचना के लिए मैंने आजीवन काम किया, उसमें सभी की हैसियत बराबर होगी, चाहे उसका धर्म कोई भी हो। राज्य को पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष होना होगा..... सभी जन कानून की नजर में समान होंगे लेकिन हर एक व्यक्ति बिना किसी बाधा के अपने धर्म का पालन करने के लिए आजाद होगा, जब तक वह सर्व-सामान्य कानून का उल्लंघन नहीं करता। 'अल्पसंख्यकों की सुरक्षा' की बात मुझे पर्याप्त अच्छी नहीं जान पड़ती। इस बात में यह स्वीकार करके चलना पड़ता है कि एक ही राज्य के भीतर विभिन्न नागरिकों के बीच धर्म के आधार पर समूह होंगे। मैं चाहता हूँ कि भारत में हरेक व्यक्ति को अपना धर्म मानने की आजादी हो। भारत तब ही महान बन सकता है क्योंकि शायद भारत प्राचीन विश्व का एकमात्र ऐसा देश है जिसने सांस्कृतिक लोकतंत्र को माना हैजहां यह मानकर चला गया कि ईश्वर तक जाने के. मार्ग अनेक लेकिन लक्ष्य एक है क्योंकि ईश्वर एक और समान है। दरअसल, रास्ते उतने ही हैं जितने दुनिया में व्यक्ति। (हरिजन, 31 अगस्त 1947)