अक्टूबर 2019

बापू की स्मृतियां

साने गुरुजी

गाँधी कहा करते थे कि धर्म उतने हैं और हो सकते हैं जितने मनुष्य। हर दिमाग में ईश्वर की एक संकल्पना होती है, जो दूसरे दिमाग की ईश्वर की संकल्पना से अलग होती है। आश्चर्यजनक तौर पर गाँधी के बारे में भी कमोबेश यही बात कही जा सकती है। गाँधी की अनेक और परस्पर विरोधी छवियाँ हैं। जितने मुँह-गाँधी के बारे में उतनी ही बातें। अराजकता का आलम यह कि सबके अपने-अपने 'गाँधी' हैं। ऐसे में गाँधी का धर्म और मर्म एक पहेली नज़र आने लगता है। क्या ये बेहतर हो कि हम पुराने पन्नों को पलटें और गाँधी को उन्हीं के शब्दों की मदद से समझने की कोशिश करें।

बापू की सम्राट से भेंट ! बापू उस समय लन्दन में थे, वे वहाँ दरिद्रनारायण के प्रतिनिधि के नाते गये थे । ब्रिटिश सरकार के निमन्त्रण से गये थे । वे अपने को ब्रिटिशों का मेहमान मानते थे । बकिंघम पैलेस से राजा और रानी से मिलने के लिए निमंत्रण आया। बापू के सामने प्रश्न खड़ा हुआ कि जायें या नहीं, उधर हिन्दुस्तान की जनता पर सरकार ने हथियार तान रखे हैं मैं क्या इधर सम्राट का निमन्त्रण स्वीकार करता रहूँ । परन्तु मैं ब्रिटिशों का अतिथि हूँ, मैं व्यक्तिगत तौर पर आया होता तो सम्राट के निमंत्रण को ठुकरा सकता था । परन्तु आज तो मैं उनके अतिथि के रूप में हूँ, मुझे जाना चाहिए। अंत में बापू ने जाने का निर्णय किया । लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों से कहाः मैं अपनी पोशाक नहीं बदलूँगा। मैं अपनी नित्य की पोशाक में ही आऊँगा । हर्ज न हो तो बताइये ।" उत्तर मिला कि कोई हर्ज नहीं है। ब्रिटिश-सम्राट से मिलने के लिए भारतीय जनता का हृदय-सम्राट घुटने तक का कच्छा पहनकर गया । साम्राज्य का अभिमानी चर्चिल इससे लाल-पीला हो गया था, परन्तु उस कच्छे के अपार वैभव की महिमा चर्चिल भला क्या जाने ! लोक सत्याग्रह सन् 1930 में महात्माजी सत्याग्रह शुरू करने वाले थे । अभी यह निश्चित नहीं हुआ था कि कौन-सा सत्याग्रह करने वाले हैं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर सन् 30 के प्रारम्भ में साबरमती-आश्रम आये हुए थे। उन्होंन पूछाः ‘‘महात्माजी, सत्याग्रह का स्वरूप क्या रहेगा ?’’ "मैं दिन-रात सोच रहा हूँ। अभी प्रकाश नहीं मिला है" बापू बोले । आगे चलकर बापूजी को नमक दिखाई दिया । दादाभाई नौरोजी ने 50 वर्ष पूर्व लिख रखा था कि नमक के बारे में जो अन्याय हो रहा है, वह जिस दिन जनता के ध्यान में आयेगा, उसी दिन वह विद्रोह कर उठेगी । नमक तैयार करने में जो खर्च आता है, उससे सैकड़ों गुना अधिक उस पर सरकारी कर लगा है। बंगाल के बाजार में विलायती नमक बिकता है । मद्रास के इलाके में जो नमक के आगर थे, वे सब नष्ट हो गये । मद्रास-राज्य में तो गरीबी अत्यधिक है । समुन्दर के किनारे पर बसे लोगों के पास नमक खरीदने के लिए भी पैसा नहीं है। लेकिन पेट में नमक न जाये तो कैसे चलेगा ? जानवरों की खुराक में भी हम नमक मिलाते हैं । मद्रास के पास हमारे गरीब भाई रात के समय समुद्र-तट पर जाते हैं और वहाँ की जमीन चाटते हैं, ताकि पेट में कुछ तो नमक का अंश पहुँचे । समुद्रतट पर अपने-आप बनने वाले नमक को मिट्टी में मिलाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने कर्मचारी तैनात कर रखे थे । नमक में या खाद्य पदार्थ में मिट्टी मिलाना कितना बड़ा पाप है ! ऐसे नमक की ओर राष्ट्रपिता का ध्यान गया । 'नमक का सत्याग्रह' शब्द भारतभर में फैला । सत्याग्रह का यह नया शब्द, कानून भंग का शब्द रसोई-घर तक पहुँचा । माँ-बहनें भी सत्याग्रह करने निकल पड़ीं। सन् 1930 की वह अपूर्ण लड़ाई ! नमक का सत्याग्रह, जंगल का सत्याग्रह, करबन्दी-इस तरह लड़ाई का स्वरूप व्यापक होता गया, परन्तु सबसे चार चाँद लगा दिये वानर-सेना ने । भारतभर के बच्चे-बच्चियाँ राष्ट्रीय संग्राम में शामिल हुईं। सुबह-शाम राष्ट्रीय गीत गाते हुए भारतभर में बालक-बालिकाओं की सेनाएँ घूमने लगीं । जैसे राम के वानर थे, शिवाजी के मावले थे, वैसे बापूजी के ये बालक थे । सारे राष्ट्र को इन तेजस्वी बालकों ने देश-भक्ति की दीक्षा दी ! छोटे बालकों ने लाठियाँ सहीं। कल्याण में आठ साल की एक बच्ची लाठी की मार से बेहोश होकर गिर पड़ी। बापू जेल से छूटे, सत्याग्रह रुका वे गदगद होकर बोलेः ईश्वर पर भरोसा रखकर मैंने आन्दोलन शुरू किया था, परन्तु छोटे बच्चे उठेंगे, देशभर में वानर-सेनाएँ खड़ी होंगी, इस बात की मुझे कल्पना भी नहीं थी । छोटे बच्चों की निष्पाप साधना में असीम सामर्थ होती है । प्रभु की कृपा है ! उसी के हाथ में यह आन्दोलन था । उसने ही सबको प्रेरणा दी। गांधीजी और लोकमान्य तिलक लोकमान्य तिलक के प्रति महात्माजी के मन में बड़ा आदर था । परन्तु उन्हें भी नम्रतापूर्वक, लेकिन निर्भय होकर सुनाने से महात्माजी कभी हिचकिचाते नहीं थे । सन् 1917 की बात है। कलकत्ता में कांग्रेस का अधिवेशन था, डा. एनी बेसेण्ट उस वर्ष कांग्रेस की अध्यक्षा थीं । अधिवेशन के निमित्त से दूसरी भी सार्वजनिक सभाएँ होती थीं, नेताओं के भाषण होते थे । वह देखो, एक विराट सभा हो रही है । हजारों लोग इकट्ठा हुए हैं । वहाँ लोकमान्य तिलक, गांधीजी आदि महापुरुष बैठे हैं। लोकमान्य का भाषण हुआ । वे अंग्रेजी में बोले । उनके बाद गांधीजी उठकर बोलेः "लोकमान्य क' सुन्दर, स्फूर्ति-दायक भाषण हिन्दी में हुआ होता तो अधिकांश लोग समझ पाते । यह अंग्रेजी भाषण बहुत ही कम लोग समझ सके होंगे । भाषण जिनकी समझ में न आया हो, वे हाथ ऊपर उठायें ।" हजारों हाथ उठे गांधीजी ने लोकमान्य से कहाः भाषण जनता की समझ में आना चाहिए न ?" लोकमान्य फिर से भाषण के लिए खड़े हुए । जनता उनकी भी भगवान् थी । लोकमान्य को हिन्दी में बोलने का अभ्यास नहीं था । फिर भी टूटी-फूटी हिन्दी में वे बोले । लोगों के चेहरे खिल उठे । महात्माजी को अपार आनन्द हुआ । सही अर्थ में राष्ट्रीयता और राष्ट्रैक्य का उदय हो रहा था । इच्छा-शक्ति का वह चमत्कार आज एक करुण और गंभीर संस्मरण सुना रहा हूँ । सन् 1943 के दिन थे । उन दिनों को कौन भूल सकता है ? 'भारत छोड़ो' -आन्दोलन का जोर कम हो गया था। जयप्रकाशजी जेल से भागकर फिर से संगठन मजबूत बनाने में लगे थे । आजाद दस्ते जगह-जगह कायम कर रहे थे । इतने में आगा खाँ महल में गांधीजी का उपवास प्रारम्भ हुआ । सबके मुँह सूख गये । लार्ड लिनलिथगो राष्ट्रपिता को छोड़ने को तैयार नहीं थे । उधर चर्चिल जैसे जिद्दी साम्राज्यवादी व्यक्ति प्रधानमन्त्री था । गांधीजी की उसको क्या कद्र थी ? बम्बई से कुछ व्यक्ति गांधीजी से मिलने जा सकते थे । उनके द्वारा कुछ समाचार मिल जाता था। गांधीजी का स्वास्थ्य उस दिन चिन्ताजनक था । नाड़ी ठीक नहीं चल रही थी। डॉक्टर असहाय-से हो गये थे । कहते हैं कि उन्होंने सरकार को बता दिया था कि हम महापुरुष को जबरदस्ती नली से अन्न कभी नहीं देंगे, ऐसी विडम्बना वे नहीं करेंगे, लेकिन कहीं गांधीजी का देहान्त हो जाये तो ? सरकार ने निश्चय कर रखा था कि तीन दिन तक इस समाचार का देश को पता नहीं लगने दिया जायेगा ! खास-खास जगहों पर सेना तैनात कर दी गयी थी। यह भी सुना था कि जरूरत पड़ने पर चन्दन की लकड़ी भी सरकार ने तैयार रखी थी। उस दिन बम्बई में जयप्रकाशजी, अच्युतराव आदि कुछ साथी चिंता कर रहे थे । कार्यकर्ता सोच रहे थे कि भले सरकार यह समाचार दबाने की कोशिश करे, लेकिन लाखों की तादाद में पर्चे छापकर जनता को वे जरूर . जानकारी कर, देंगे कब क्या समाचार आये, क्या ठिकाना ? जयप्रकाश आप पर्चा लिखिये। सभी भाषाओं में उसका अनुवाद कराना होगा । इस समय आँसू पोछ लीजिये और लिखिये-अच्युतराव ने कहा । साथी गदगद हो रहे थे । गांधीजी अपने बीच में से उठ गये । हैं, यह कल्पना करके लिखना था । हम चालीस करोड़ लोग होते हुए उन्हें जेल से छुड़ा नहीं सके ! कितनी शर्मनाक बात है। जयप्रकाशजी ने लिखने के लिए कलम-कागज उठाया । एक शब्द लिखते थे तो आँसू की बूंद से वह मिट जाता था । इस प्रकार आँसुओं से भीगा हुआ पत्रक तैयार हुआ। उसका मराठी में अनुवाद करने के लिए एक प्रति मेरे पास आयी । इतने में समाचार आया कि नाड़ी ठीक हो गयी । संकट टला, राष्ट्रपिता अब नहीं जायेगा। महात्मा की संकल्प शक्ति की तो वह विजय नहीं ? वह एक चमत्कार ही था। स्वराज्य अपनी आँख से देखे बिना महापुरुष जाता कैसे ? उस रात का स्मरण होता है, तो आज भी हृदय अनेक स्मृतियों से भर आता है । प्रयत्नशील बापू गांधीजी से जो गुण सीखने जैसे हैं, उनमें से एक है उनकी काटकसर (मितव्ययिता) । गांधीजी अपने नित्यजीवन में इसका बड़ा ध्यान रखते थे कि कोई भी चीज जरूरत से ज्यादा काम में न ली जाये । वैसे करना वे गुनाह मानते थे और चोरी करने जैसा समझते थे । हमें जितने की आवश्यकता है, उससे अधिक किसी भी वस्तु का उपयोग करने का अर्थ है, दूसरे को उसका उपयोग करने से वंचित रखना, इसी का नाम है चोरी । गांधीजी सेवाग्राम में थे, तब की बात है । उनके आश्रम में अनेक अतिथि आते थे-कोई मिलने आता, कोई बात करने आता, कोई चर्चा करने आता। गांधीजी को कुछ लिखकर देना होता या किसीके पास कोई चिट भेजनी होती, उसके लिए उन्हें छोटी-छोटी कागज की परचियों की जरूरत पड़ती । तब वे कोरा कागज उपयोग किये हुए कागजों के टुकड़े काम में लेते थे । सरकारी पत्रक आते थे । उनके चारों ओर किनारे पर भरपूर जगह खाली छूटी रहती थी। बाजू के उस कोरे कागज की पट्टी काटकर गांधीजी उनका उपयोग कर लेते थे । एक बार आश्रमवासी लोग इकट्ठा बैठे थे। गांधीजी ने सामने पड़ी हुई कैंची उठायी और कागज के कोरे हिस्से की पट्टी काटना शुरू किया । उन्हें ठीक से जम नहीं रहा था । पास में बैठे एक आश्रमवासी ने कहाः बापू, कैंची मुझे दीजिये, आप ठीक से नहीं काट सकेंगे । मुझे आदत है ।" गांधीजी बोलेः "नही काट सकूँगा तो क्या हुआ ? कोशिश करना तो मेरे हाथ में है ।" इतना कहकर गांधीजी ने काटने का अपना काम जारी रखा लाख कोशिश करने पर भी उनसे वह ठीक नहीं कट रहा था, परन्तु उन्होंने जैसे-तैसे काम पूरा करके ही छोड़ा। काम ठीक नही बना, फिर भी तो पूरा तो हुआ ही। बापूजी कुछ बातों में बड़े जिद्दी थे । कोई कहे कि फलानी चीज मैं नहीं कर सकता, यह उनको बिलकुल पसन्द 'न था । वे मानते थे कि हर काम उत्तम रीति से करने का प्रयत्न प्रामाणिकता के साथ करना हर एक का कर्तव्य है। सफाई श्रेष्ठ कार्य दिल्ली की बात है गांधीजी बिरला-भवन में ठहरे थे । वे स्नान घर में गये । थोड़ी ही देर पहले सेठ बिरला स्नान करके गये थे । उनकी भीगी धोती वहीं पड़ी थी । बापूजी ने वह धोती साफ धो दी । फिर नहाकर अपना अंगोछा सूखने के लिए फैलाया और बाद में सेठजी की धोती भी झटककर फैला रहे थे । इतने में सेठजी आये। उन्होंने बापू के हाथ से झट धोती छीन ली और बोलेः ‘‘बापू, यह क्या किया ?" वहीं पड़ी थी । साफ धोती पर किसीका पैर पड़ जाता, इसलिए धो दिया । इसमें क्या बुरा हुआ ? सफाई के काम से बढ़कर महान् काम और कौन-सा है ?" आगा खाँ महल में बापू की दिनचर्या 'भारत छोड़ो आन्दोलन चल रहा था बापूजी, कस्तूरबा, महादेवभाई, प्यारेलालजी, डा. गिल्डर, डॉ. सुशीला नैयर, सरोजिनीदेवी' वगैरह लोग पूना में, आगाखाँ-महल में नजरबन्द थे । श्री महादेवभाई तो 15 अगस्त को ही स्वर्ग सिधार गये । जेल गये सप्ताहभर भी नहीं बीता था । बा और बापू के मन पर बड़ा क्रूर आघात था। वह ! सब लोग सारा दुःख पीकर रह गये । जेल में समय कैसे काटें ? रात में कभी-कभी कस्तूरबा, डॉ. गिल्डर और अन्य लोग कैरम खेलते थे । बा को कैरम बड़ा प्रिय था । वे अच्छा खेलती भी थीं । बापू भी तरह-तरह के खेल खेलते थे। बैडमिंटन, पिंगपांग वगैरह खेलते थे । बापू पहली बार पिंगपांग खेलने आये, उस दिन वे छोटे बल्ले से गेंद लौटाने को ही थे कि इतने में वह उनके माथे से टकराकर लौट गयी। सब हँस पड़े। एक बार सबने मजे की पोशाक पहनने का निश्चय किया । डॉ. गिल्डर ने बलूची पठान की पोशाक पहनी । बापू की हँसी रोके न रुकती थी । डॉ. गिल्डर का जन्म-दिन आया, तो बापू ने अपने हाथ से रूमाल पर उनका नाम अंकित कर उन्हें रूमाल भेंट किया। राष्ट्र को मुक्त करने वाला महात्मा आगा खाँ-महल में सिलाई-कढ़ाई का भी काम करता था। परन्तु एक बात ने मुझे गदगद कर दिया। बा की अवस्था 70 के लगभग थी। बापूजी ने 70 पूरे कर लिये थे । समय कारने के लिए बापू कस्तूरबा को भूगोल सिखाते थे । पूज्य विनोबाजी कहते थेः भूगोल जैसा सरस विषय दूसरा नहीं है ।" भारत का पिता वृद्ध कस्तूरबा को जेल में भूगोल सिखा रहा है-यह दृश्य आँख के सामने आते ही मेरा हृदय उमड़ आता है । कैसा मधुर, मंगल, सहृदय दृश्य था ! सर्वत्र आत्मदर्शन का पाठ गांधीजी बड़े दृढ़ व्रती थे। जो भी व्रत उन्होंने लिया, उसे कभी तोड़ा नहीं। वे रोज सूत काता करते थे । उनकी नित्य कताई कभी खंडित नहीं हुई । कभी-कभी खुद ही अपनी पूनी भी बना लेते थे । एक दिन उनकी कताई नहीं हो पायी थी पूनी समाप्त हो गयी थी । आज अपनी पूनी मैं ही बनाता हूँ । लाइये, धुनकी (युद्ध पिंजन) । अच्छी तरह धुन लेता हूँ ।" यह कहकर राष्ट्र का पिता रूई धुनने बैठा । रात का समय था । महात्माजी तुंई-तुंई करते धुनते रहे, परन्तु हवा में नमी थी । धुनकी की तॉत नम हो जाती थी । उसमें रूई चिपक जाती थी । धुनाई अच्छी नहीं हो रही थी। पास ही मीरा बहन बैठी थीं । वह तो साक्षात् सेवामूर्ति थीं । पंचक्रोशी में दवा लेकर घूमती रहती थीं । झोपड़ी झोपड़ी में जाती थीं। "बापू, क्या ठीक से धुनाई नहीं हो रही है ?" "रूई चिपकती है। लेकिन एक उपाय है ।' "क्या ? "नीम की पत्ती मसलकर उसका रस ताँत पर लगायें, तो रूई चिपकती नहीं। पत्ती मैं ले आऊ हाँ, लाओ। मीरा बहन बाहर गयी । वह नीम के पेड़ से खासी-भली टहनी ही तोड़ लायीं। यह लीजिये पत्ती । टहनी ही ले आयी हूँ । पत्तियाँ खूब हैं । मुट्ठीभर पत्ती के लिए इतनी बड़ी टहनी क्यों तोड़ लायी ? और इधर आओ यह देखो, ये पत्ते कैसे सोये हुए-से दिखते हैं। व्यर्थ ही तुम टहनी ले आयीं । जरूरत थी, इसलिए सिर्फ मुट्ठीभर पत्तियाँ ही लाना ठीक था न ? महात्माजी बोलते रहे । मीराबहन की आँखें आँसुओं से भर आयीं । पेड़-पौधों पर महात्माजी का यह प्रेम देखकर मीराबहन को एक नया ही दर्शन हुआ । भारतीयों की आध्यात्मिक वृत्ति का भाष्य ही था वह प्रवचन । सर्वत्र आत्मा के दर्शन करना सीखें, इसका मूक प्रवचन । ऐसे थे महात्माजी 'प्रेम-सिन्धु'। सबका ख्याल रखने वाले बापू एक बार कांग्रेस की कार्यकारिणी की बैठक हो रही थी। काफी देर तक बैठक चलती रही । लोग ऊबने लगे। बात गांधीजी के ध्यान में आ गयी। वे बोलेः आप सब अब चाय पीकर आइये। आपके चाय पीने का समय हुआ होगा । वैसी खास आवश्यकता नहीं है। और कुछ समय बैठेंगे और बाद में चाय पियेंगे। सब समय पर होना चाहिए । बाद में क्यों ? आप परेशान तो दिखाई दे रहे हैं। जाइये, चाय पीकर आइये । चाय के लिए क्‍या आग्रह की जरूरत है? गांधीजी हँसते हुए बोले सब लोग हँस पड़े। ऐसा था राष्ट्र का पिता, सबका ख्याल रखने वाला । एक बार महादेवभाई को रात में देर तक काम करना पड़ा, तो बापूजी ने उनके लिए चाय तैयार करवा दी ! सरदार चाय पीते थे । परन्तु सन् 1932 में यरवदा जेल में गांधीजी के साथ थे, तब चूँकि गाँधीजी चाय नहीं पीते थे, इसलिए वे भी नहीं पीते थे । महान् व्यक्तियों की महान् बातें !! मैं बेसहारा हो गया गांधीजी संग्राम में थे। जमनालालजी अन्य सारे काम छोड़कर गो-सेवा के लिए जीवन समर्पित करने का विचार कर रहे थे। उस विचार ने उन्हें पागल बना रखा था। परन्तु जमनालालजी बीमार हुए । डॉक्टर दौड़े आये। सेवाग्राम से महात्माजी आये। जमनालालजी ठीक नहीं हुए । ईश्वर के पास चले गये। विनोबाजी ने कहाः उनके मन में जो विचार उफन रहा था, वह देह में समा नहीं सका । देह तोड़कर वे बाहर निकल गये। गांधीजी बहुत दुखी हुए। वास्तव में वे थे स्थितप्रज्ञ, परन्तु गांधीजी के जीवन में करूण मानवता थी। दिन बीत गया। लेकिन उस रात गांधीजी को नींद नहीं आ रही थी । बोले: मैं अब बेसहारा हो गया, मेरा भार कौन संभालेगा ?" भगवान भरोसे सन् 1919-20 आन्दोलन के दिन थे। गांधीजी देशभर में बिजली की तरह संचार कर रहे थे असम का प्रवास। असम में आवागमन की बहुत असुविधा थी। सर्वत्र प्रचंड नदियाँ हैं । ऊँचे पर्वत, गहरी कन्दराएँ ! गाड़ियां विशेष हैं नहीं । एक बार एक गाड़ी गयी, तो दूसरी कब मिलेगी, इसका कोई ठिकाना नहीं । एक बार मालगाड़ी के डिब्बे में ही बैठकर जाना पड़ा । रात का समय था। गांधीजी को एक डिब्बे में बैठाया गया था । उस छोटे डिब्बे में वे अकेले थे । अपेक्षा यह थी कि रातभर उन्हें आराम मिले । परन्तु गाड़ी आगे चली गयी। गार्ड बीच में था । काफी दूर निकल जाने के बाद उसके ध्यान में आया कि पीछे के कुछ डिब्बे छूट गये हैं । गाड़ी रुकी । गांधीजी का डिब्बा कहाँ है ? वह तो पीछे छूट गया ! कार्यकर्ता चिन्ता के मारे परेशान हुए । पीछे से कोई गाड़ी आ जाये तो ? गाड़ी को धीरे-धीरे पीछे लाया गया। कार्यकर्ता डिब्बे के फाटक पर खड़े थे । काफी सावधानी रखी गयी कि गाड़ी जाकर गांधीजी के डिब्बे को जोर से धक्का न दे। गांधीजी का डिब्बा दीख पड़ा। गांधीजी जाग गये थे और अपनी मधुर मुस्‍कान में बैठे थे। मित्रों ने कहा बापू, आज कितनी बड़ी आफत आ गयी थी ! बापू ने हँसकर कहाः अगर पीछे से कोई गाड़ी आती तो शायद प्रकृतिमाता की गोद में चला जाता बड़ा मजा आता। हस्ताक्षर की फीस महात्माजी अपने हस्ताक्षर की फीस कम-से-कम पाँच रुपये लेते थे, लेकिन कभी-कभी बड़ा मजा करते थे। एक बार अमरीकी सज्जन हस्ताक्षर लेने महात्माजी के पास आये । गांधीजी ने पूछा: आपके पास कितने पैसे हैं ? उन्होंने जेब से अपना बटुआ निकाला। पैसे गिने 310 रुपये निकले गाधीजी ने उनका बटुआ हाथ में लिया और उसमें से सारे पैसे लेकर खाली बटुआ लौटाया। हस्ताक्षर दे दिये । परंतु वह अमेरिकी सज्जन परेशान दिखाई दिया । महात्माजी हँसकर बोलेः क्या हुआ ? गांधीजी, मुझे जहाज तक जाने के लिए रेल का किराया चाहिए । अब मेरे पास कुछ नहीं है ।" ठीक, हम हिसाब लगा लें-गांधीजी बोले । किराया, होटल में रहने का खर्च वगैरह सब मिलाकर हिसाब किया तो पूरे 310 रुपये का जोड़ आया । तब गांधीजी ने सारे पैसे वापस लौटा दिये । लेने के बदले दो मीराबहन इन दिनों हिमालय की तलहटी पर एक गाँव में गोशाला चला रही हैं। गाय-बैलों के मल-मूत्र का कृषि के लिए व्यवस्थित उपयोग करती हैं। जल-सेना के अधिकारी की वह पुत्री हैं । भारतीय जनता की सेवा में जीवन समर्पित करने के निश्चय से वह भारत आयीं और महात्माजी के जीवन-दर्शन को निःसीम उपासिका बनीं । साधक वृत्ति की महिला हैं । स्वामी विवेकानन्द की जैसे भगिनी निवेदिता, वैसे महात्मा गांधी की मीराबहन । सेवाग्राम आने के बाद मीराबहन भिक्षुणी की तरह व्रती बन गयीं। आसपास की पंचकोशी में दवा लेकर घूमती थीं । सेवा उनका धर्म बन गया। मीराबहन अच्छी पढ़ी-लिखी हैं । फ्रेंच अच्छा जानती हैं। महादेवभाई (गांधीजी के सचिव) को फ्रेंच सीखने की इच्छा हुई। थोड़ा समय निकालकर मीराबहन के पास वे फ्रेंच सीखने लगे। आगे चलकर यह बात गांधीजी को मालूम हुई । एक दिन बापू और महादेवभाई बात कर रहे थे, तब महात्माजी ने कहा। “महादेव, मैंने सूना कि तुम आजकल फ्रेंच सीख रहे हो ? कौन सिखाता है ?" “मीरा बहन सिखाती है " “सीखने के लिए तुमने समय कहाँ से निकाला ? मेरे काम में ढिलाई करते होगे? और देखो, मीराबहन स्वदेश और स्वगृह छोड़कर इस देश में आयी हैं । उसे तुम हिन्दी सिखाओ । उसके पास से कुछ लेने के बजाय, उसे कुछ नया दो। ठीक हैं न ?” “हाँ, बापू-महादेवभाई ने कहा । बापू का आशीर्वाद जीवन-परिवर्तनकारी तब महात्‍मा सेवाग्राम आ गये थे । वे रोज सुबह-शाम घूमने जाते थे। एक बार एक धनी मारवाड़ी गांधीजी से मिलने आये। उनके पुत्र का हाल में ही विवाह हुआ था । पुत्र और पुत्र-वधू से बापूजी के चरणों में प्रणाम कराने की उनठी इच्छा थी । उस पिता की बड़ी उत्कष्ठा थी कि वर-वधू को बापूजी का मंगल आशीर्वाद मिले । उनसे कहा गया आप सुबह आइये। बापू जब घूमने जाते हैं, तब रास्ते में मिलिये । पुत्र और पुत्रवधू को लेते आइये ।” “रास्ते में निश्चित ही मिलेंगे न ? आप लोग नाराज तो नहीं होंगे ?' “हम नाराज हो तो भी, बापूजी थोड़े ही नाराज होने वाले हैं ? सुबह रास्ते में मिलिये ।' वह श्रद्धालु भारवाड़ गया और सुबह होने की प्रतीक्षा करता रहा । सब लोग जल्दी उठे । वधू, वर, वर के माता-पिता निकल पड़े, जिस रास्ते से महात्माजी घूमने निकलते थे, उसी रास्ते पर राह देखते सब लोग खड़े थे । पक्षी चहचहाने लगे। सृष्टि प्रसन्न थी और उधर से महात्माजी के मुक्त हास्य की शुभ ध्वनि सुनायी दी । आ गये, महात्मा जी 'आ गये । भारत के भाग्यविधाता चले आ रहे थे । मारवाड़ी ने कहा चरण छुओ । महात्माजी के चरण छुओ ' वधू-वर ने इन पवित्र चरणों पर मस्तक रखा । महात्माजी ने प्रेम से उन्हें उठाया । एक क्षण बापू गम्भीर बनकर खड़े रहे। लेकिन क्यों ? उस वधू के चेहरे पर घूंघट था, पर्दा था । यह गुलामी बापू कैसे सहन कर सकते थे ? आँख के रहते अन्धे बनकर रहना पवित्रता तो मुक्तता में ही खिलती है। बापूजी ने उस लड़की का चूँघट चेहरे पर से हटाया । उसके सुसर बोले - “मैंने यह पर्दा हटाया है। इस लड़की के मुखमण्डल को इसी तरह हमेशा खुला रखो। फिर से यह घूंघट चेहरे पर आने पाये। “जैसी आपकी आज्ञा के विरुद्ध हम नहीं हैं, आपका आशीर्वाद चाहिए। ससुर बोले। “जो भला है उसे प्रभु का आशीर्वाद सदा रहता ही है ।" इतना कहा और उन वर-वधू के मस्तक पर मंगलमय हाथ रखकर महात्मा जी तेजी से आगे बढ़ गये। भारत को मुक्त करने वाला महात्मा भारत के सब लोगों के जीवन में सच्ची आजादी लाना चाहता था। कितने ही लोगों के दिल में बापूजी ने ऐसी क्रांति लायी होगी ! वह सारा इतिहास संसार को कौन सुनायेगा ? बापू के जैसा क्रांतिकारी दूसरा हुआ नहीं। नसीहत देने वाले बापू एक बार बंगाल के सफर में गांधीजी एक जमींनदार के घर ठहरे थे । यह जमींदार अपनी आदत के अनुसार हर काम के लिए नौकरों का उपयोग करता था । नौकरों की सारी भागदौड़ इस जमींदार का काम करने के लिए थी। एक दिन बंगले बरामदे में सदा की भाँति गांधीजी प्रार्थना के लिए उच्च आसन पर बैठे। उनकी प्रार्थना और बाद का विचार सुनने के लिए बहुत सारे लोग सामने बैठे थे। उन दिनों गांधीजी बत्ती बुझाकर प्रार्थना किया करते थे । प्रार्थना के समय जमींदार गांधीजी के पास आकर बैठा। प्रार्थना शुरू होने से पहले गांधीजी ने जमींदार को बत्ती बुझा देने को कहा । बत्ती का बटन जमींदार के सिर पर ही था । परन्तु अपनी आदत के अनुसार उन्होंने नौकर को बुलाया। इतने में बत्तियाँ एकाएक बुझ गयीं और अंधेरे में प्रार्थना का आरम्भ हुआ गांधीजी ने स्वयं उठकर चट से बटन दवा दिया था । ... प्रार्थना के बाद गांधीजी ने प्रसंगवशात् कहाः “आजकल के पढ़े-लिखे और धनी लोगों को शरीर-श्रम करने में लज्जा आती है, उसे वे हीन काम मानते हैं, लेकिन यह गलत है । गीता में तो कहा है कि जो शरीर करके खाता है, वह चोर है ।” जमींदार को अपनी भूल मालूम हुई । उस पर किया गया व्यंग्य वह भांप गया और बाद में... बाद में एक मजेदार बात हुई । भीड़ के कारण पास की एक टेबुल लुढ़क गयी और उस पर रखा चीनी मिट्टी का गमला नीचे गिरकर चूर-चूर हो गया। फौरन जमींदार उच्च आसन से कूट पड़ा और फूटे गमले के टुकड़े समेटने लगा। थोड़ी ही देर में गमले के टुकड़ो को बटोरने के लिए नौकर दौड़े आये, परन्तु मालिक ही घुटने के बल बैठकर टुकड़ें बटोर रहा था। यह दृश्य गांधीजी ने नहीं देखा परन्तु उनके शब्दों ने तो अनजाने ही अपना काम कर दिया था। बापूजी का दैनिक जीवन नसीहतों से भरा हुआ था। उनके जीवन का प्रत्येक क्षण संसार को सन्देश देता था। अमेरिकी पत्रकारों को मौन का पाठ सन् 1931 में जब गांधी जी इग्लैंड में थे, तब अमेरिकी संवाददाताओं ने गांधीजी को एक दिन भोजन और भाषण के लिए आमंत्रित किया। गांधीजी ने आमन्त्रण स्वीकार कर लिया । मीराबहन साथ थीं । गांधीजी के लिए "शुद्ध शाकाहार का प्रबंध था। गांधीजी बोलने के लिए खड़े हुए । बोलेः “संवाददाताओं को संयम सीखना जरूरी है । मैं आपसे जो भी कहूँगा, वह न निजी बात है, न नयी। परन्तु मैं आपको संयम सिखाना चाहता हूँ । आज के दिन आप लें। यानी मैं यहाँ जो भी बोलूँगा, उसे लिखकर कहीं न भेजें ।" सारे संवाददाता लिख लेने के इरादे से जमा हुए थे । सब विभिन्न पत्रों में भाषण की रिपोर्ट प्रकाशित कराने के लिए कलम खोलकर तैयार थे, परन्तु गांधीजी के निवेदन को उन लोगों ने मान लिया और उन अमेरिकी संवाददाता ने तो कुछ नोट किया, न ही कुछ प्रकाशित किया। इंग्लैण्ड आने के लिए तीन शर्तें गांधीजी सन् 1931 में लन्दन गये थे, तब मिस म्युरिल लिस्टर की गरीब बस्ती में ठहरे थे । म्युरियल बहन उससे पहले एक बार भारत आयी थीं । तब बापू साबरमती आश्रम में रहते थे । बहन ने कहाः “आप इंग्लैंड आइये न !" "किसलिए आऊं ? आप लोगों को सिखाने लायक मेरे पास अभी कुछ नहीं है। हमारा सत्याग्रह का प्रयोग सफल होने दीजिये। फिर देखा जायेगा।" बापू, मेरा मतलब यह नहीं था कि आप हमें सिखाने आइये ।" “फिर क्यों आऊँ ?" हमसे सीखने आइये।" गांधीजी के चेहरे पर खुशी खिल उठी बोलेः “सच, वहाँ कइयों से मिलना होगा । जार्ज डेविस वगैरह के अनुभव जानने को मिलेंगे। आना तो चाहिए मैं आऊँगा।" - अच्छी बात है। कब आयेंगे ?” "मेरी शर्त कबूल कीजिए।" “बताइये तो सही" “मैनचेस्ट के मिल-मालिकों से कहिये कि यहाँ वे कपड़ा न भेजें । पार्लियामेंट के सदस्यों और मन्त्रिमण्डल से कहिये कि भारत को स्वराज्य दे दिया जाये। तीसरी बात यह कि ब्रिटिश सत्ता के कारण हमारे यहाँ जहाँ-तहाँ शराब फैल रही है। शराब की आमदनी से यहाँ शिक्षण दिया जाता है । यह पाप है। अफीम का भी व्यापार भारत में इन्होंने चला रखा है। अफीम तो बुरी है ही, शराब उससे भी बुरी है। अफीम तो खानेवाले को ही नुकसान पहुंचाती है, शराब सारे घर को उजाड़ती है । स्त्रियों पर जो बीतती है, वह पूछो ही मत इसलिए वहाँ जाकर यह बात कीजिए कि भारत में शराब और अफीम बन्द होनी चाहिए। आप ये तीन काम कीजिये । फिर मैं एक करोड़ भारतीयों के हस्ताक्षर लेकर, अपने खर्च से विलायत आऊँगा और कहूँगा कि भारत के विचार को मान्य करो। जो भी कर सकूँगी, मैं करूगी।"-म्युरियल बहन ने कहा । बापू के देहावसान के बाद वह बहन भारती आई थीं। सेवाग्राम में गांधीजी की कुटिया में खड़ी रहीं। बोली: “बापू के बिना बापू की कुटी ।" उनकी आंख भर गयी। फिर बोलीः “यहाँ छोटे बच्चों को आर्यनायकम् और आशादेवी पढ़ाते हैं । बापू की आत्मा यहां सर्वत्र है।" एक मंगल प्रसंग दो मित्र आपस में मिलते हैं, तो कितना आनन्द आता है। लम्बे अरसे के बाद मिलते हैं तो आनन्द सौगुना बढ़ जाता है। दो मित्रों के मिलन में मिठास होती है । क्योंकि उसमें निर्मल प्रेम होता है । परन्तु जब दो महापुरुष एक-दूसरे से मिलते हैं, तब तो उसमें अपूर्व माधुर्य होता है, वह गंगा-यमुना का मिलन है, सूर्यचन्द्र का मिलन है, हरि-हर का मिलन है । एक बार समर्थ रामदास और सन्त तुकाराम ऐसे ही मिले थे। एक नदी के किनारे इन दो सन्तों के बीच क्या बातचीत होती है, यह देखने के लिए कौतूहल से हजारों लोग एकत्र हुए थे । एक ने पानी में पत्थर फेंका, दूसरे ने आकाश की ओर उँगली उठायी। दोनों निकल गये। इसका अर्थ क्या है ? एक ने कहाः जैसे पत्थर पानी में डूबता है, वैसे ये लोग संसार में डूबे रहे हैं ।" दूसरे ने कहाः क्या करें ? प्रभु की इच्छा !" लेकिन आज मैं तुम्हे बापूजी की एक मीठी बात सुनाने वाला हूँ यरवदा जेल में महात्माजी ने सन् 1932 में अनशन शुरू किया था। अंग्रेजों ने हरिजनों को हिन्दू- समाज से हमेशा के लिए अलग कर देने की योजना बनायी थी। महात्माजी के लिए यह बात असह्य हो गयी। शरीर का एक अंग काटकर अलग कर देना किसे सह्य होगा ? और हिन्द-समाज के लिए वह स्थायी कलंक रूप बन गया होला। इसलिए महात्माजी ने उपवास शुरू किया। इग्लैंड के उस समय के बड़े वजीर मैक्डोनाल्ड ने जो फैसला जाहिर किया था, उसे रद्द कराने के लिए वह उपवास था ! भागदौड़ शुरू हुई। यरवदा-जेल भारत का राजनैतिक चर्चा का क्षेत्र बना। पं. मदनमोहन मालवीय आये। राजाजी और डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर आये । अंत में पूना-करार स्वीकृत हुआ, जो अम्बेडकर को मंजूर था। सबको आनंद हुआ। उपवास समाधि के समय वहाँ कौन-कौन थे ? देशबन्धु दास की पत्नी वासंतीदेवी आयी थीं। सरोजिनीदेवी थीं । मदनमोहन मालवीय थे और थे गुरुदेव रवीन्द्रनाथ। वे महात्माजी के पास आये। आम्रवृक्ष के नीचे महात्मा जी की खटिया थी। राष्ट्रपिता लेटा हुआ था । उपवास समाप्त होने को था । रवीन्द्रनाथ महात्माजी के पास गये। महाकवि भाव विभोर हो गए। वे झुके और महात्माजी के वक्षः- स्थल पर सिर रखकर वह महान् कवीन्द्र, गुरुदेव नन्हे बच्चों की तरह रो पड़े ! वह दृश्य आँखों के सामने आते ही में कई बार गदगद् हो उठा हूँ ! भारत का सारा सत्य, शिव व सुन्दर उस समय यरवदा में इकट्ठा हुआ था। महान प्रसंग ! को प्रणाम !