अक्टूबर 2019

गाँधी जी का दोष

राममनोहर लोहिया

मैं गाँधीजी पर इल्जाम लगाने वालों में नहीं हूँ। देश बँटवारे के लिए जिस तरह श्री जिन्ना, श्री नेहरू और सरदार पटेल, मुख्य रूप से दोषी थे, उस तरह का दोषी मैं उन्हें नहीं मानता, लेकिन दूसरे नम्बर के दोषी वे भी थे, इसे कोई भी देख सकता है। मुख्य दोषियों में इतिहास की विशाल निर्वेयक्तिक शक्तियाँ, कन्नौज के विघटन के बाद हिन्दुओं का पतन, हिन्दुस्तान के इस्लाम की अंधी आत्मघाती, कट्टरता, ब्रितानी साम्राज्यवाद की आखिरी साजिश और सबसे अधिक समर्पण और समझौते की वह दीन भावना भी थी, जिसे समन्वय और सहिष्णुता कहा जाता है और जो मुख्य रूप से जाति-व्यवस्था के कारण है।

चूंकि आज मेरा इरादा गाँधीजी के बारे में कुछ कड़वी बात कहने का है, इसलिए मैं सबसे पहले पृष्ठ भूमि को साफ कर दूँ। मैं आज भी समझता हूँ कि वे राम और कृष्ण की तरह उस कोटि के व्यक्ति थे, जिनको लेकर कथा-पुराण बन जाते हैं, और गौतम बुद्ध के बाद उसके जैसा आदमी कोई और नहीं हुआ। लेकिन इस राय के बारे में भी मुझे शक है 1947 में हिन्दुस्तान के बँटवारे के दोष से गाँधी जी मुक्त नहीं किये जा सकते। गाँधी ने कहा था कि बँटवारा उनकी लाश पर ही होगा। उनकी मौत बँटवारे के बाद ही हुई। वे बँटवारे से लड़ते हुए नहीं मरे। बँटवारे और उनकी मौत के बीच छह महीने से भी कम वक्त गुजरा, लेकिन ये छह महीने देश के इतिहास में निर्णायक महत्व के हैं। इल्‍जाम और सफाई के दो पाटों के बीच सचाई पिस जाती है। गाँधी जी की ओर से सफाई देने वाले उनके भाषणों और लेखों से ढेरों उद्धरण दे सकते हैं कि वे बँटवारे के पक्ष में नहीं थे, कि वास्वत में उन्होंने बँटवारे का विरोध करने की कोशिश की, और यह कि बँटवारा उनकी इच्छा के विरुद्ध हुआ। लेकिन असली सवाल है कि अंग्रेजों के भारत से हटने के आखिरी चरणों में यह इच्छा सक्रिय थी या निष्क्रिय। गाँधी की ओर से दी जाने वाली सारी सफाई इस एक सवाल के सामने बेमतलब हो जाती है कि फैसले का वक्त आने पर उनकी यह इच्छा निष्क्रिय क्यों हो गई, और जब बँटवारा होने लगा, तो उसका उन्होंने सक्रिय विरोध क्यों नहीं किया। मैं गाँधीजी पर इल्जाम लगाने वालों में नहीं हूँ। देश बँटवारे के लिए जिस तरह श्री जिन्ना, श्री नेहरू और सरदार पटेल, मुख्य रूप से दोषी थे, उस तरह का दोषी मैं उन्हें नहीं मानता, लेकिन दूसरे नम्बर के दोषी वे भी थे, इसे कोई भी देख सकता है। मुख्य दोषियों में इतिहास की विशाल निर्वेयक्तिक शक्तियाँ, कन्नौज के विघटन के बाद हिन्दुओं का पतन, हिन्दुस्तान के इस्लाम की अंधी आत्मघाती, कट्टरता, ब्रितानी साम्राज्यवाद की आखिरी साजिश और सबसे अधिक समर्पण और समझौते की वह दीन भावना भी थी, जिसे समन्वय और सहिष्णुता कहा जाता है और जो मुख्य रूप से जाति-व्यवस्था के कारण है। श्री नेहरू और श्री जिन्ना को किसी हद तक समझा जा सकता है। सत्ता के भूखे होने के अलावा, उसमें ज्ञान और दूरदर्शिता नहीं थी। वे पहले से बँटवारे के परिणामों को नहीं देख सकते थे कि लगभग दस लाख पुरुष, स्त्रियाँ और बच्चे हथियारी मुठभेड़ों में नहीं, बल्कि जानवरों की तरह मारे जाएँगे, और करीब दो करोड़ लोग अपने घरों से उजड़ जाएँगे। ऐसे हत्याकांड का दसवाँ हिस्सा भी न हो, यही बँटवारे के हक में सबसे बड़ा तर्क था, जिसके कारण देश की विशाल आबादी ने उसे स्वीकार कर लिया। गाँधी ज्ञानी और दूरदर्शी थे, इसलिए भी कि उनमें संकीर्ण स्वार्थ नहीं था। उस समय इस दूरदर्शिता ने उनका साथ क्यों नहीं दिया। दंगे होंगे, ऐसा तो उन्होंने समझ लिया था, लेकिन जिस जबर्दस्त पैमाने पर दंगे वास्तव में हुए, उसका अनुमान उन्हें था, इसमें मुझे शक है। अगर ऐसा था, तब तो उसका दोष अक्षम्य होगा। दरअसल, उनका दोष तो अभी भी अक्षम्य है। अगर बँटवारे के फलस्वरुप हुए हत्याकांड के विशाल पैमाने का अन्दाज उन्हें सचमुच था, तब तो उनके आचरण के लिए कुछ अन्य शब्दों को इस्तेमाल करना पड़ेगा। उस हत्याकांड और उजड़ने का असर अब भी सीमा के दोनों ओर के लोगों की तबीयत में, भारत और पाकिस्तान दोनों के इतिहास में प्रकट हो रहा है। नेता के लिए आगे का अनुमान लगाना जरूरी होता है। गाँधीजी बँटवारे के खिलाफ क्यों नहीं लड़े ? यह तर्क बेमतलब है कि उन्हें ऐसे लोगों से लड़ना पड़ता तो सारी जिन्दगी उनके सहयोगी रहे थे। देश का विभाजन ऐसा मौका नहीं था। जब साथियों या अपने पूरे संगठन की भी राय निर्णायक हो । यह सच है कि बँटवारा होने के पहले रोज अपने प्रार्थना-प्रवचन के बावजूद वे जनता में बँटवारे के खिलाफ जोश नहीं पैदा कर सके। लेकिन उनके भाषणों में भी दुविधा का स्वर था। जब किसी सवाल पर नेता के विचारों और बोली में दुविधा हो तो जनता नहीं उठती। मैं यह मानने को तैयार हूँ कि कांग्रेस पार्टी के युवा नेतृत्व वर्ग में कुछ कमी थी। गांधीजी ने अपने ढंग से बार-बार हमें टटोला और हमें लायक नहीं पाया। लेकिन असली सवाल फिर कुछ और है। अगर गांधी बँटवारे का सक्रिय विरोध करते तो क्या होता ? श्री नेहरू भारत में या श्री जिन्ना पाकिस्तान में क्या गाँधी को मारकर जेल में रखकर हुकूमत कर सकते थे? हत्या वास्तव में हुई, लेकिन उनका समय कितना दु:ख को बढ़ाने वाला था। हत्या की पीड़ा के अलावा, उस हिंसा ने अहिंसा के पैगम्बर के जीवन का अन्त कर दिया। कुसमय के परिणाम शायद और भी दुखद हैं। पन्द्रह सदियों के इतिहास के जरिए राष्ट्र ने समर्पण और समझौते की दीन भावना प्राप्त की है, जिसे समन्वय की संस्कृति का गलत नाम दिया जाता है, बँटवारे की वेदी पर बलिदान के उस एक क्षण में राष्ट्र उसे उतार फेंकता। और सचमुच कौन जानता है कि अगर गांधीजी जेल में होते या जेल जाने की धमकी भी देते, तो बँटवारे से बचा जा सकता था। किसी प्रकार का कमीशन गाँधीजी की मौत की जिम्मेदारी और दोष तय करने की कोशिश कर रहा है। देश का विभाजन और गाँधीजी की हत्या एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक पहलू की जाँच किये बिना दूसरे की जाँच करना समय की मूर्खतापूर्ण बरबादी है। इंगलिस्तान में पौर्वात्य और अफ्रीकी अध्ययन स्कूल ने विभाजन की, और शायद सबसे अधिक उसके दोष की जांच करने के लिए किसी प्रकार का कमीशन नियुक्त किया है। ऐसा ख्याल है कि इस कमीशन को अपने काम के लिए लाखों पौण्ड दिए गए हैं। अंग्रेजों को अपनी प्रतिष्ठा का बड़ा ख्याल रहता है। वे अच्छी तरह जानते हैं कि इतिहास दोबारा लिखा जा सकता है और भारत का इतिहास बिना किसी दिक्कत के दोबारा लिखा जा सकता है। खून के धब्बों को धोने के लिए सागरों या सुगन्धियों की जरूरत नहीं। ब्रितानी सरकार ने भारत से अपने हटने से सम्बन्धित सभी दस्तावेज प्रकाशित कर देने का फैसला किया है। कुछ समितियाँ और प्रमुख ब्रितानी इतिहासकार प्रकाशन की देख-रेख करेंगे, और जहाँ आवश्यक होगा कुछ सम्पादन भी करेंगे। अंग्रेजों को सचमुच अपनी प्रतिष्ठा बड़ी प्यारी है। इस बीच हो सकता है कि भारत सरकार या उसके कुछ हिस्से इस मूर्खतापूर्ण लालच में कुछ कागज नष्ट कर रहे हों कि इस तरह अपराध के दाग और सबूत खत्‍म हो जाएँगे। कम से कम देशी विद्यार्थी और इतिहासकार से ये दस्तावेज बिलकुल गुप्त रखे गये हैं। गाँधी जी ने बँटवारे का प्रतिरोध क्यों नहीं किया ? मैं एक कारण का अनुमान लगाने की कोशिश करूँगा, जो हिन्दुस्तान के इतिहास में विशाल पुरानी शक्तियों और गांधीजी के बूढ़े होने के जैसी तात्कालिक छोटी-छोटी बातों के बीच में है। हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई लगभग पूरी तरह आजाद होने की लोगों की बिखरी हुई इच्छा के अलावा चतुर वाक्यों, बढ़िया सूत्रों, बुद्धिपूर्ण या आडम्बर भरे तर्कों पर निर्भर थी। गांधीजी आजादी की इच्छा को कायम और जारी रखने में और बुद्धिपूर्ण तर्क में बेमिसाल थे। लेकिन इस इच्छा को उन्होंने संगठित नहीं किया। ऐसा करने वाले सहायक उनके पास नहीं थे। उनका अपना तरीका और पद्धति शायद इस इच्छा को संगठित करने की दृष्टि से बहुत उपयुक्त नहीं थी। छिछली नजर से देखने पर यह बात बिल्कुल गलत लगती है। गांधीजी ने आखिरकार एक के बाद एक कितने ही संगठन बनाये थे। उन्होंने चरखा संघ बनाया, ग्रामोद्योग संघ, तालीमी संघ, हरिजन संघ, आदिम जाति संघ, और ऐसे ही अन्य सुधार संगठन बनाये। इनमें से किसी भी संगठन ने आजादी की इस इच्छा को मजबूत नहीं किया। ये अधिक से अधिक लोगों को काम में लगाये रखने वाले संगठन थे और आलस तथा निराशा के विरुद्ध कवच का काम देते थे। इन संगठनों ने आजादी की इच्छा को मजबूत नहीं किया, इसका यह मतलब नहीं कि अन्य रूपों में ये महत्वपूर्ण नहीं थे। कांग्रेस भी लड़ने वालों का संगठन बहुत अधिक नहीं थी। वह एक जन-संगठन जरूर थी। उसे किसी हद तक किसानों का वर्ग-संगठन भी कहा जा सकता था। लेकिन उसके संगठन की पद्धति और आधार ऐसे थे कि उसकी शक्ति लोगों में आजादी की अस्पष्ट इच्छा के अलावा वकील के चतुर सूत्र पर भी निर्भर थी। वह कभी बुराई से असहयोग करने के आदर्श तक नहीं पहुँच सकी। वह सिविल नाफरमानी तक ही और वह भी अपेक्षतया कुछ थोड़े-से लोगों की सिविल नाफरमानी तक सीमित रही। उसके ऊंचे नेताओं का चरित्र शायद इसका एक मुख्य कारण रहा हो। ये ऊंची जाति और मध्यम वर्ग के लोग थे, अधिकांश मामूली खाते-पीते लोग, जो अपने भविष्य के बारे में कुछ चिन्तित और परेशान रहते थे। अहिंसा और असहयोग शायद इसकी जड़ में रहे हों। छोटी लड़ाई और शीघ्र विजय के लिए ये उपयुक्त नहीं। न इनमें ऐसा ही सम्भव है कि अपना सिर चाहे, जितनी बार फूटे, बीच-बीच में कभी दुश्मन का सिर फोड़ने का मजा भी मिल जाए। किसान, मजदूर, विद्यार्थी और अन्य ऐसे समूह अपने वर्ग चलाने के लिए संगठित होने पर, उग्र परिवर्तन के सिद्धान्त को लेकर अनूकुल परिस्थितियाँ होने पर तेजी से दुश्मन पर हमला कर सकते हैं। गांधीजी मामूली नेता नहीं थे। लोग उनकी मुट्ठी में थे। इतिहास में कोई और नेता ऐसा नहीं हुआ, बिना सत्तारूढ़ हुए जिसका जनता पर इतना अधिकार रहा हो। सोवियत प्रेसीडियम के अध्यक्ष के रूप में लेनिन निश्चय ही गांधीजी से अधिक शक्तिशाली थे, लेकिन रूसी क्रान्ति की सफलता के पहले, जनता में अपनी ताकत की दृष्टि से वे गांधीजी से बहुत पीछे थे। जनता में जिस नेता की इतनी ताकत हो, वह किसी बड़ी गलती पर समझ या माफी की माँग नहीं कर सकता। अगर अहिंसा और असहयोग की प्रकृति में ही यह निहित है कि उसकी असलियत उसके आदर्श से बहुत पीछे रह जाए, तो हिन्दुस्तान की इन दुखभरी घटनाओं को किसी हद तक समझा जा सकता है। हिन्दुस्तान सारी दुनिया के लिए किसी प्रकार का बलि का बकरा था, लेकिन ऐसी सूरत में हमको यह मान लेना होगा कि अणुबम और पुरानी बन्दूक के विरुद्ध गांधीजी की जीत होगी। जो भी हो, असहयोग की सम्भावनाओं और रूपों के बारे में सोच-विचार चलते रहना चाहिए। कौन जानता है, शायद गांधीजी खुद अपने तरीकों और हथियारों को संगठित करने की दृष्टि से नाकाफी रहे हों। लेकिन हम यह मान लें कि अहिंसा और असहयोग का संगठन जैसा था, उससे बेहतर नहीं हो सकता था। हम यह मान लें कि 1942 का खुला विद्रोह अगली बार लड़ाई होने पर जनता की ओर आने का ब्रितानी वायुसेना के भारतीय हिस्से का वादा, आजाद हिन्द फौज, युद्ध के बाद नौसेना में विद्रोह, प्रतिबन्धों के खिलाफ लाखों व्यक्तियों का दिन-रात धरना देना और अन्य ऐसी घटनाएँ और भावनाएँ आजाद हिन्दुस्तान के लिए जनता के सफल विद्रोह में परिणत नहीं हो सकती थीं। अन्त में, यह भी मान लें कि देश के बँटवारे के खिलाफ अपनी लड़ाई में गाँधी जी अकेले ही रहते। लेकिन यह हो सकता था कि आस्था और संकल्प का यह एक कार्य ही लोगों को सामूहिक आचरण का एक नया धर्म प्रदान करता । आज तक भी हिन्दू लोग सीता को वनवास देने में राम के दोष की सफाइयाँ देते हैं। लोकतंत्र के नाम पर एक क्रूर और बेमतलब काम को, एक कल्पित अपराध के लिए दोहरी सजा देने के दोष को उचित ठहराने की कोशिश की जाती है। उस लोकतंत्र में कोई सार नहीं रह गया था और यह केवल ओझा का मन्त्र रह गया था। गाँधी जी को राम की तरह ईश्वर का अवतार बना दिया जायेगा, इसकी कोई आशंका नहीं हैं। बँटवारे के सम्बन्ध में उनके दोष का अधिक विस्तार में अध्ययन होना चाहिए। अगर और सब कुछ असफल रहा था, तो भी उनके संकल्प को असफल नहीं होना चाहिए था। उनका संकल्प क्यों असफल रहा, इसके कुछ पहलुओं पर यहाँ विचार किया गया है। अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर यह असफल न होता तो लोगों पर, राष्ट्र पर, देश और दुनिया पर उनका ऐसा असर पड़ता, जैसा ईसा के सूली पर चढ़ने के बाद किसी और काम का नहीं हुआ। गाँधीवादियों को गाँधीजी से अधिक सक्रिय संकल्प वाला बनना सीखना पड़ेगा। आस्था और संकल्प के उनके काम अलग-अलग भले ही कोई चमत्कार न करें, क्योंकि वे गांधी जी की तरह लोगों के नेता नहीं हैं। किन्तु आगे चलकर और सामूहिक रूप में समता और सम्पन्नता के लिए संकल्प के यह काम परिवर्तन करने में सफल होंगे।