अक्टूबर 2019

गाँधीजी ने हमें क्या दिया

चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य

गांधीजी ने जो अहिंसात्मक मार्ग दिखाया था, वह केवल हिंसा से हटना और भौतिक हथियारों का इस्तेमाल न करना ही नहीं था। लेकिन यह बात आमतौर पर विदित नहीं है कि हृदय में अगर घृणा और जहर हो, तो शारीरिक हिंसा का इस्तेमाल करना घातक है। यह दूसरे पक्ष की गतिविधि को रोकने के लिए अपने शरीर का इस्तेमाल नहीं है, बल्कि शारीरिक हिंसा सहन करने के लिए अपने शरीर को प्रस्तुत करना है।

हर साल पहली अक्टूबर आने पर दो महान जन्म तिथियाँ आती हैं। दोनों को ही हिन्दुस्तानी लोग अधिक से अधिक आदर देते हैं। एक एनी बीसेन्ट का जन्म दिन है और दूसरा महात्मा गांधी का। अब हम यह नहीं मानते कि ये जन्मदिन मनाकर हम इन मुक्त आत्माओं को प्रसन्न करते हैं। आधुनिक विज्ञान ने इसके लिए हमें बहुत अधिक प्रबुद्ध बना दिया है। लेकिन जन्मदिन हमें प्रेरित करते हैं कि हम सोचें, अपनी कमजोरियों पर विचार करें और देखें कि कहाँ और कैसे हम अपने को सुधार सकते हैं। पंजाब में 1916 के दमन ने गांधीजी की आत्मा में कटुता भर दी। अन्यथा हम अब आजाद तो होते, लेकिन कनाडा की तरह और विदेशी आक्रमणों तथा अन्तरराष्ट्रीय हिंसा की धमकियों के विरुद्ध इंगलिस्तान के व्यापक संरक्षण क्षेत्र में। लेकिन उस महत्वपूर्ण वर्ष में अंग्रेज अधिकारियों के अत्याचार ने गांधीजी को ब्रितानी ‘डामिनियनो’ की स्वतंत्रता से हटाकर उस पूर्ण स्वतंत्रता की ओर मोड़ दिया, जो कि भारत के उग्र राष्ट्रवादी उस वक्त चाहते थे। आखिरकार, बीस बरस बाद शुरू हुए युद्ध के सन्दर्भ में गांधीजी की नैतिक शक्ति के इस्तेमाल से यह लक्ष्य प्राप्त हुआ। विदेशों में जननेताओं ने गांधीजी की प्रशंसा की है कि उन्होंने अन्याय से लड़ने की अहिंसा पर आधारित एक प्रभावकारी पद्धति का विकास किया। इस धारणा के फलस्वरूप कि गांधीजी ने एक पद्धति सिखाई, काफी विकृति और गलती और स्वभावत: निराशा हुई है। गांधी-पूर्व काल में जो कुछ हिंसा द्वारा प्राप्त किया जाता था, अहिंसा उसे पाने का कोई आसान औजार नहीं है। अगर हमें पद्धति शब्द का इस्तेमाल करना ही हो, तो गांधीजी की पद्धति बुराई का प्रतिरोध करने में प्रेम और सत्य का इस्तेमाल करने की थी। यह केवल यांत्रिकता नहीं है। यह बुराई का प्रतिरोध है, जो ईश्वर और उसकी सर्वोच्च प्रभुसत्ता में विश्‍वास पर आधारित है। हम पशु शक्ति से भाप, भाप से तेल और तेल से बिजली पर आ गए हैं। ऊर्जा के वे सभी परिवर्तन महात्मा गांधी की पद्धति को समझने का आधार नहीं प्रदान करते। आत्मा की ऊर्जा विश्वास से, और सच्ची धार्मिक भक्ति से आती है, अपनी हत्या होने तक गांधीजी ने ऊर्जा के इस स्त्रोत पर जो दिया, और हिंसा के विभिन्न रूपों से इसकी भिन्नता बताई। गांधीजी ने जो कुछ सिखाया, उस पर चलने की कोशिश करने वाले बहुतेरे श्रद्धालु भक्तों की अहिंसा में केवल हिंसा के ही विभिन्न रूप होते हैं। अहिंसा का मतलब केवल इतना ही नहीं है कि लाठी या छुरे या पिस्तौल का इस्तेमाल न किया जाए। अंहिसा के सकारात्मक पक्ष को समझाना है, और वह है ईश्वर की प्रभुसत्ता में दृढ़ विश्वास। इसके अभाव में, पुराने ढंग की हिंसा के समान अहिंसा भी असफल होगी। यह आम तौर पर विदित है कि गांधीजी ने जो अहिंसात्मक मार्ग दिखाया था, वह केवल हिंसा से हटना और भौतिक हथियारों का इस्तेमाल न करना ही नहीं थी। लेकिन यह बात आमतौर पर विदित नहीं है कि हृदय में अगर घृणा और जहर हो, तो शारीरिक हिंसा का इस्तेमाल करना चाहता है। यह दूसरे पक्ष की गतिविधि को रोकने के लिए अपने शरीर का इस्तेमाल नहीं है, बल्कि शारीरिक हिंसा सहन करने के लिए अपने शरीर को प्रस्तुत करना है। यह कहना आसान है कि गांधीजी ने दिखाया कि घृणा, झूठ और हिंसा का सबल उत्तर प्रेम और सत्य से दिया जा सकता है। यह कहना भी आसान है कि प्रेम और सत्य की ये शक्तियाँ जातीय, आर्थिक और राजनीतिक संघर्षों को हल कर सकती हैं, और उनके हल का यही एक तरीका है। लेकिन व्यवहार में इससे हम जरा भी आगे नहीं बढ़ते। जिससे घृणा करने के इतने कारण हों, उसके लिए आप अपने अन्दर प्रेम कर सकते हैं ? पाकिस्तानी देशभक्त भारतीयों से या भारतीय देशभक्त पाकिस्तानियों से कैसे प्रेम कर सकते हैं? ये जो असम्भव बाते हैं। गांधीजी का मार्ग एक खोखला सिद्धान्त या निराशाजनक पद्धति न रह जाए, इसके लिए प्रेम और सत्य का शक्तियों को ईश्वर में एक दृढ़ विश्वास से विकसित होना चाहिए। शेक्सपियर के वर्णन के अनुसार एनोबारबस के शत्रु से मिल जाने पर मिस्त्र में पार्क ऐन्टोनी ने जब उसका खजाना उसके पास भिजवा दिया या, जब विक्टर ह्यूगो के उपन्यास में विशप ने चांदी का एक दीपदान चुराने वाले जाँ वाल जाँ को दूसरा भी भिजवा दिया, तो ये मत परिवर्तन देवी नियम की शक्ति से हुए। यह किसी नई पद्धति की सफलता नहीं। ईश्वर सर्वभूतानां ह्रद्देशेर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥ (गीता, 18, 61) यह प्राचीन आध्यात्मिक शिक्षा का प्रयोग था। सत्याग्रह उसके लिए नहीं है जिसमें आस्था न हो, उसके लिए नहीं है, जो भौतिक जगत से और जगत में जो कुछ दिखाई पड़ता है, उसके वर्गीकरण से ही संतुष्ट हो। कोई अच्छी, बढ़िया कलम हो सकती है, लेकिन अगर उसमें स्याही न हो, या उसमें आप पानी भर दें, तो यह लिख नहीं सकती। गांधीजी का जन्मदिन मनाते समय हम सोचें, और उनकी शिक्षा तथा उनके कार्य के सच्चे सबक को समझें और उन्हें केवल आविष्कार न मानें। वे आविष्कार नहीं थे, ईश्वर भक्त थे।