अक्टूबर 2019

गांधी पर पुनर्विचार

आचार्य रजनीश

विचार करने में भय क्या हो सकता है ? विचार करने से इतना डरने की, इतना कंपने की बात क्या है ? गांधी वर्ष-शताब्दी चलती है| मैंने पिछले दो अक्टूबर को कुछ मित्रों को यह कहा कि यह वर्ष बड़े मौके का है| इस पूरे वर्ष गांधी पर विचार किया जाए तो अच्छा है, क्योंकि गांधी से बड़ा व्यक्ति संभवत: भारत के इतिहास में खोजना मुश्किल है|

डॉ राममनोहर लोहिया मृत्युशैया पर पड़े थे| मृत्यु और जीवन के बीच झूलती उनकी चेतना जब भी होश में आती तो वे बार-बार एक ही बात दोहराते | बेहोशी में, मरते क्षणों में बार-बार यह कहते सुने गए| मेरा देश सड़ गया है, मेरे देश की आत्मा सड़ गई है| यह कहते हुए उनकी मृत्यु हुई| पता नहीं उस मरते हुए अद्भुत आदमी की बात आप तक पहुंची या नहीं| लेकिन राममनोहर लोहिया जैसे विचारशील व्यक्ति को यह कहते हुए मरना पड़े कि मेरा देश सड़ गया, मेरे देश की आत्मा सड़ गई है, तो कुछ विचारणीय है | क्यों सड़ गई देश की आत्मा ? किसी देश की आत्मा सड़ कैसे जाती है? जिस देश में विचार बंद हो जाता है, उस देश की आत्मा सड़ जाती है, जीवन का प्रवाह है, विचार का प्रवाह है| जीवन का प्रवाह जब रुक जाता है, विचार का प्रवाह जब रुक जाता है, तो जैसे कोई सरिता रुक जाए और डबरा बन जाए, फिर वह सागर तक तो नहीं आती, डबरा बनकर सड़ती है, गंदी होती है, सूखती है| कीचड़ और दलदल पैदा होता है| इस देश में विचार की सरिता रुककर डबरा बन गई है| हमने विचार करना बंद कर दिया है| हम तो विचार से भयभीत हो गए हैं, ऐसा प्रतीत होता है| लगता है कि विचार से हमारे भीतर कोई डर पैदा हो गया है| हम विश्वास की बात करते हैं, विचार की जरा भी बात नहीं करते| विचार करने में भय क्या हो सकता है ? विचार करने से इतना डरने की, इतना कंपने की बात क्या है ? गांधी वर्ष-शताब्दी चलती है| मैंने पिछले दो अक्टूबर को कुछ मित्रों को यह कहा कि यह वर्ष बड़े मौके का है| इस पूरे वर्ष गांधी पर विचार किया जाए तो अच्छा है, क्योंकि गांधी से बड़ा व्यक्ति संभवत: भारत के इतिहास में खोजना मुश्किल है| संन्यासी हुए हैं बहुत बड़े, त्यागी हुए हैं बहुत बड़े, धर्मात्मा हुए हैं बहुत बड़े, लेकिन धार्मिक और आध्यात्मिक व्यक्ति जीवन के बीच खड़े रहे हों, जीवन के संघर्ष में लड़े हों, राजनीति से भाग न गए हों, ऐसे गांधी अकेले आदमी हैं| ऐसे महत्वपूर्ण व्यक्ति पर क्या हम विचार नहीं करेंगे ? मेरे मित्रों ने कहा, विचार तो बहुत होगा - सभाएं होंगी, प्रवचन होंगे, पुस्तकें छपेंगी, करोड़ों रुपया खर्च किया जाएगा| मैंने उनसे कहा, उनमें विचार जरा भी नहीं होगा, सिवाय प्रशंसा के| प्रशंसा विचार नहीं है, न ही निंदा विचार है, मित्र और भक्त प्रशंसा करते हैं, शत्रु और दुश्मन निंदा करते हैं| लेकिन न शत्रु विचार करते हैं, न मित्र आलोचना, विचार है सृजनात्मक आलोचना, विचार है क्रिएटिव क्रिटीसिज्म| निंदा का तो कोई सवाल ही नहीं है| प्रशंसा चलेगी वर्षभर| प्रशंसा से क्या हित होगा ? हमारा या गांधी का, किसका ? गांधी की कितनी ही हम प्रशंसा करें, उन्हें और बड़ा नहीं बना सकते| गांधी की हम कितनी ही निंदा करें, उन्हें हम छोटा नहीं बना सकते| गांधी की निंदा से हम बड़े नहीं हो जाएंगे और न गांधी की प्रशंसा से हमारी आत्मा को कोई लाभ होने वाला है| और मैंने कहा क्या था ? मैंने यह कहा था कि जो समाज में महापुरुष की आलोचना नहीं करता, वह समाज शायद डरता है| उसके महापुरुष बहुत छोटे हैं| आलोचना में पिघल जाएंगे, बह जाएंगे| इतनी घबराहट एक ही बात का सबूत है| अगर हम एक मिट्टी का पुतला पानी में बनाकर खड़ा कर दें तो वर्षा से डरेंगे, क्योंकि उसके रंग-रोगन के बह जाने का डर है| लेकिन प्रस्तर की, संगमरमर की प्रतिमाएं तो वर्षा में खड़ी रहती हैं| उनका कुछ बहता नहीं| वर्षा आती है तो उनकी धूल बह जाती है, प्रतिमाएं और स्वच्छ होकर निखर जाती हैं| मेरी दृष्टि में महापुरुष पर जब भी आलोचना की वर्षा होती है तो ( वह और निखरकर प्रकट होता है, लेकिन छोटे लोग जरूर बह जाते हैं, उनके पास ऐसा कुछ नहीं है जो आलोचना की वर्षा में टिक सके| गांधी को तो कोई भय नहीं हो सकता आलोचना से, लेकिन गांधीवादी को बहुत भय है| गांधीवादी छोटा आदमी है, जो बड़े आदमी की आड़ में बड़े होने की कोशिश में लगा है| उसे डर है वह अपने ही ढंग से सोचता है| उसे यह भय है कि जैसा छोटा मैं आदमी हं, गांधी की आलोचना गांधी को कोई नुकसान न पहुंचा दे| कराची में एक कॉन्फ्रेंस में गांधी थे| कुछ लोगों ने काले झंडे दिखाए| और नारा लगाया, 'गांधीवाद मुर्दाबाद'| गांधी ने माइक से बोलते हुए कहा, गांधी मर जाएगा लेकिन गांधीवाद जिएगा| मैं गांधी से कहना चाहता हं| थोडी भूल हो गई शब्दों में, उनसे कहना चाहता है, गांधीवाद मर सकता है, गांधी जिएगा| गांधी नहीं मर सकता| गांधी का व्यक्तित्व अनूठा है| वह सब चला जाएगा लेकिन गांधी की सच्चाई, गांधी की करुणा, गांधी की अहिंसा, गांधी का प्रेम, गांधी की ईमानदारी, गांधी की सरलता, वह जिएगी| गांधीवाद में कोई मूल्य नहीं है, लेकिन गांधी में बहुत मूल्य है| और यह मैं उदाहरण के लिए कहना चाहता हूं| जैसे मार्क्स को अगर हम उठाकर देखें तो उसके व्यक्तित्व में कुछ भी नहीं है, दो कौड़ी का व्यक्तित्व है, लेकिन विचार बहत कीमती हैं| मार्क्स के व्यक्तित्व में कुछ भी नहीं है| कोई कीमत की बात नहीं है, लेकिन विचार उसका अनूठा है| मार्क्स का विचार जिएगा| मैं जिस समाज की कल्पना करता हं, उस समाज में गांधी जैसे व्यक्ति चाहता हूं और मार्क्स जैसा समाज चाहता हूं| अब यह मेरी मजबूरी है कि गांधी के विचार से मैं राजी नहीं है, लेकिन इससे मैं यह भी नहीं कहता हूं कि आप मुझसे राजी हो जाएं| मैं सिर्फ इतना कहता हूं कि मेरी जो गैर राजी होने की स्थिति है, उसे आप समझें, सोचें, विचार करें| हो सकता है, मैं गलत सिद्ध हो जाऊं तो मेरी बातों को फेंक दें कचरे में| लेकिन यह भी हो सकता है कि मेरी कोई बात सही सिद्ध हो सकती है| और अगर कोई बात सही सिद्ध हो सकती है तो सिर्फ इस भय से कि कहीं गांधी की आलोचना ना हो जाए उसको न कहना, सारे मुल्क को गड्ढे में ले जाना होगा|