अक्टूबर 2019

सिविल नाफरमानी : सिद्धान्त और अमल

दादा धर्माधिकारी

धर्मयुद्ध, सामाजिक शासन, दंड तथा शिष्टसम्मत बलप्रयोग के पर्याय के रूप में सत्याग्रह का आविर्भाव हुआ है। उसमें केवल सहनशीलता और क्षमाशीलता नहीं है । तितिक्षा बोर क्षमा मनुष्य के लिए आत्मशुद्धि के या उसके व्यक्तिगत तपोबल को बढ़ाने के हो सकते हैं, परन्तु यह आवश्यक नहीं कि वे किसी समाज या व्यक्ति को दुष्प्रवृत्ति या दुष्कर्म के प्रतिकार के भावरूप साधन भी बनें।

सत्याग्रह शब्द संसार को गांधी ने दिया। उसमें तीन निष्ठाओं का समावेश है, सत्य निष्ठा, मानव निष्ठा, समाज निष्ठा। मनुष्य, मनुष्य के पारस्परिक व्यवहार में ईमान और सच्चाई की मात्रा उत्तरोत्तर बढ़ती जाए, यह सत्यनिष्ठा का सामाजिक प्रयोजन है। इसके लिए पहले हर व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत जीवन में प्रामाणिकता का प्रयोग करना चाहिए। यह आचरण केवल इस अर्थ में सापेक्ष है कि व्यवहार के लिए दो व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। अन्यथा सत्यनिष्ठ व्यक्ति का सदाचरण निरपेक्ष होता है। वह दूसरे व्यक्ति के सदाचार या दुराचार पर निर्भर नहीं होता। अर्थात् सत्याग्रह का आरम्भ निरपेक्ष से होता है। सत्याग्रह को प्राय: लोगों ने प्रतिकार की एक पद्धति माना है। प्रतिकार हमेशा सापेक्ष होता है। जब तक कोई ऐसी परिस्थिति, वस्तु या व्यक्ति उपस्थित न हो, जिसका कि प्रतिकार आवश्यक है, तब तक प्रतिकार के लिए न तो कोई प्रयोजन होता है और न कोई अवसर। इसलिए जो लोग सत्याग्रह को केवल प्रतिकार की एक पद्धति या साधन मानते हैं. वे उसे जीवनव्यापी निरपेक्ष सदाचार का तत्व नहीं मानते । इसीलिए जब कभी कोई सत्याग्रह की घोषणा करता है, तो हम यही मानते हैं कि वह किसी न किसी प्रकार के प्रतिकारात्मक उपाय की योजना अहिंसा की मर्यादा में करने के लिए प्रस्तुत है। गांधी के सत्याग्रह की विशेषता उसकी प्रतिकारात्मक भूमिका में अवश्य है, परन्तु उसका समग्र या यथार्थ स्वरूप इतना ही नहीं है। अहिंसात्मक प्रतिकार सहयोग की प्रक्रिया का ही एक आवश्यक पहलू है। अत: सत्याग्रही का नित्यधर्म सहयोग है और प्रतिकार उसका नैमित्तिक कर्तव्य। इसका यह अर्थ हुआ कि जहाँ-जहाँ किसी व्यक्ति, परिस्थितिगत या समाजगत दोष को दूर करने के लिए सत्याग्रह से काम लिया जाएगा, वहीं इस बात का निरन्तर ध्यान रहेगा कि हमारे सामने जो खड़े हैं, उनके साथ यथार्थ रूप से सहयोग करने के उद्देश्य से हम उनकी कृतियों का विरोध कर रहे हैं। यह मानव-निष्ठा का एक पहलू है। सत्याग्रही जिसके विरुद्ध प्रतिकारात्मक उपायों का प्रयोग करता है, उसके लिए उपके मन में केवल सहानुभूति और सद्भाव ही नहीं, भावरूप आस्था और आत्मीयता होती है । अगर ऐसा न हो, तो सत्याग्रह कभी विश्व-व्यापी और मानव-व्यापी सदाचार नहीं बन सकेगा। उस अवस्था में उसका प्रयोग केवल उन्हीं के लिए किया जा सकेसा, जिन्हें हम आत्मीयता मानते हो प्रतिपक्षी और पराये मानते हों। जिसको हम अपने स्वजन, आत्म और आत्मीयता मानते हों, उनके लिए उसका प्रयोग विहित नहीं माना जाएगा । अर्थात् सत्याग्रह प्रतिकारात्मक होते हुए भी पक्षपरायण और संकुचित हो जाएगा। अतएव सत्याग्रही प्रतिकार की पहली शर्त यह है कि हमारे मन में अपने प्रसंगोपात्त प्रतिपक्षी के लिए भावरूप सहानुभूति हो और उसके कल्याणी की विधायक प्रेरणा हो। जहाँ प्रतिकार शस्त्रात्मक होता है, वहाँ योद्धा के हृदय में जितनी उत्कट जिजीवीषा हो, जितनी दुर्धर्ष युयुत्सा हो और जितना आवेश का आवेग हो, उतनी तीव्रता उसके संघर्ष में आती है। सत्याग्रह में ये भावनाएँ दोषरूप साबित होती हैं। वे सत्याग्रह की प्रभावशीलता को बढ़ाने के बदले उसे कम करती हैं । तात्पर्य यह कि सत्याग्रह के साधन को अधिक अमोष और कल्याणकारी बनाने की दृष्टि से भी मानवनिष्ठा की आवश्यकता है। मानव-निष्ठा का इससे अधिक मूलभूत और श्रेयस्कर एक दूसरा पहलू भी है। मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह दूसरे मनुष्य के या दूसरे मनुष्य के या दूसरे जीवधारी के दु:ख को देख कर द्रवित होता है । यह केवल भावात्मक अवस्था नहीं है। यह मनष्य के स्वभाव का अपादान है। यह वह द्रव्य है, जिससे उसका व्यक्तित्व उत्पन्न और विकसित हुआ है। क्रूर से क्रूर मनुष्य भी उन दूसरे व्यक्तियों या प्राणियों के दुःख से द्रवित होता है, जिन्हें वह अपना प्रतिपक्षी या पराया मानता है, उनको कष्ट देने में या उनके क्लेश देखने में उसे एक प्रकार का आसुरी आनन्द अवश्य होता है। परन्तु मानवीय जीवन का यह स्वयंसिद्ध तत्त्व है कि बगैर किसी कारण के कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को अपना नैसर्गिक प्रतिपक्षी नहीं मानता । द्वेष और शत्रुता के लिए निमित्त या कारण की आवश्यकता होती है, वह मनुष्य का स्वभाव नहीं है । दूसरे के दुख से दुखित होना सदाचार का निर्णय नहीं है, सामाजिक शिष्टाचार का संकेत नहीं है, समष्टि नीति का अनुशासन नहीं है। वह हर मनुष्य का प्रत्यक्ष प्रत्यय है। इसलिए उसके समर्थन और प्रतिपादन में किसी युक्तिवाद या तर्क की आवश्यकता नहीं है। हमारे जीवन का वह एक अयाधित प्रत्यय है। अतएव सत्याग्रह का यह आधारभूत सिद्धान्त है कि हमारा प्रतिपक्षी भी स्वभाव से सत्प्रवृत्त और स्नेहशील है। धर्मयुद्ध, सामाजिक शासन, दंड तथा शिष्टसम्मत बलप्रयोग के पर्याय के रूप में सत्याग्रह का आविर्भाव हुआ है। उसमें केवल सहनशीलता और क्षमाशीलता नहीं है । तितिक्षा बोर क्षमा मनुष्य के लिए आत्मशुद्धि के या उसके व्यक्तिगत तपोबल को बढ़ाने के हो सकते हैं, परन्तु यह आवश्यक नहीं कि वे किसी समाज या व्यक्ति को दुष्प्रवृत्ति या दुष्कर्म के प्रतिकार के भावरूप साधन भी बने । सत्याग्रह एक क्रियात्मक और विधायक पुरुषार्थ का साधन है। सत्याग्रही अपने साथ होने वाला अन्याय सह ले, दूसरे का दिया हुआ क्लेश या यंत्रणाएँ भी क्षमावृत्ति से बरदाश्त कर ले, तो उतने से उसके साधुत्व और सौजन्य का संरक्षण होगा । परन्तु किसी सामाजिक या वैयक्तिक दोष के प्रतिकार के लिए उसकी यह वृत्ति और वर्तन प्राप्त नहीं है। दूसरे के क्लेश एवं दुःख के निवारण की उत्कट भावरूप प्रेरणा जिस प्रकार उसके हृदय में मानवीय सहानुभूति के कारण प्रबल हो उठती है, और वह उसे दुखितों के दुःख दूर करने के लिए हठात प्रेरित करती है, उसी प्रकार अन्यायी व्यक्ति के अन्याय को देख कर और दुराचारी व्यक्ति के दुष्कृत्य को देख कर उस व्यक्ति के लिए दुर्दम्य सहानभूति सत्याग्रही के हृदय में जाग्रत होती है और उस सहानुभूति तथा कल्याण-कामना से उसके प्रतिकार में अधिक सात्विक तेज और अभाव क्षमता पैदा होती है। प्रतिकार का उद्देश्य और प्रयोजन दूसरे व्यक्ति को अपमानित करना, परास्त करना या कष्ट देना नहीं होता, बल्कि उसके लिए सत्याग्रही के मन में इतनी आस्था और मैत्री होती है कि वह उसे कम-से-कम कष्ट पहुँचा कर स्क्यं अधिक-से-अधिक क्लेश सहन के लिए तत्पर रहता है । अर्थात् वह अपने स्वार्थ या मतलब के लिए प्रतिकार नहीं करता, बल्कि अपने प्रतिपक्षी के हित के लिए और समाज कल्याण के लिए उसकी तितिक्षा का स्रोत क्षमा या संयम नहीं है, बल्कि स्नेहशीलता और सहानुभूति है। इस प्रकार सत्याग्रह का साधन विधाधन्य है। वह सत्याग्रही का कल्याण करता है । उस व्यक्ति का भी कल्याण करता है, जिसके विरोध में सत्याग्रह किया गया हो और साथ-साथ समाज में सांस्कृतिक मर्यादाओं के परिपोषण द्वारा समाज कल्याण भी करता है। सभ्य समाज का प्रधान लक्षण यह है कि उस समाज के सदस्य सामाजिक मर्यादाओं का तथा अनुशासन का पालन स्वयंस्फूति से तथा सहज भाव से करते हैं। कानून के दबाव से, दंड के भय से या पारितोषिक के लोभ से नहीं करते। कानून और सामाजिक मर्यादाओं का पालन करने की सहज प्रेरणा नागरिकों में जाग्रत करना सत्याग्रही का नित्यधर्म है। इसलिए जब कभी वह अपनी आत्म मर्यादा के रक्षण के लिए अपने स्वत्व के संवर्धन के लिए या सामाजिक मूल्धों की स्थापना के लिए किसी विधान, नियम, विधि या सामाजिक मर्यादा का विवेकपूर्वक उल्लंघन करता है, तो उसकी उस अवज्ञा से या कानून-भंग से अन्य नागरिकों में नियम पालन की प्रवृत्ति का हृास होने के बदले उसका विकास होता है। इसलिए उसकी अवज्ञा के साथ सविनय या सभ्य विशेषण जुड़ा हुआ है। सिविल, नागर, सभ्य या शिष्ट कानून-भंग वह कानून है, जिससे नागरिकों की समाजशीलता, शक्ति-परायणता और ह्रास होने के बदले विकास होता हो। जहाँ ऐसे परिणाम निष्पन्न व होते हों, वहाँ सत्याग्रही को नियमपूर्वक समझ लेना चाहिए कि उसका प्रतिकार निशस्त्र होते हुए भी अहिंसात्मक नहीं है। वह शान्तिमय प्रतिकार हो सकता है, वैध संघर्ष हो सकता है, परन्तु आलिमय सत्याग्रह की संज्ञा के लिए वह पात्र नहीं है। गांधी का एक वाक्य अकसर अद्धृत किया जाता है : ‘‘कायरता से हिंसा बेहतर है।’’ यह सिद्धान्त निरपवाद है, परन्तु उस वाक्य के तात्पर्य के विषय में एक विपर्यस्त धारणा रही है। यह वाक्य हिंसा की स्तुति के लिए नहीं है, भीरुता की निन्दा के लिए है। उससे यह प्रतिपादित किया है कि हिंसा प्रशस्त है या श्रेयस्कर प्रत्यक्ष यह कहा गया है कि कायरता त्याज्य है, तिरस्करणीय है, अनर्थकारी है । आशय यह है कि हिंसा तो बुरी है ही, लेकिन कायरता उससे भी बुरी है। वाक्य के किस अंश पर जोर दिया जाता है, यह बहुत महत्व की बात है, क्योंकि उससे वाक्य का तात्पर्य कुछ का कुछ हो जाता है। हिंसक साधनों का स्वीकार अभिप्रेत नहीं है, भीरुता का तिरस्कार अभिप्रेत है। यदि हम अश्वमेघ को नरमेध से कम बुरा बतलाएँ तो उसमें हमारा अभिप्राय अश्वमेध के प्रतिपादन का नहीं है, नरमेध का निषेध का है। सत्याग्रह के व्यक्तिगत या सामुदायिक प्रयोग में विवशता के कारण, अविवेक के कारण या जनवधान के कारण जो हिंसक आचरण होता है, उसे सत्याग्रही प्रमाद मानता है। वह स्वाभाविक हो सकता है, परन्तु प्रशस्त किसी भी अर्थ में नहीं हो सकता। सत्याग्रह के प्रयोग में विकासशीलता, प्रगतिशीलता और प्रयत्नशीलता होती है। देश जब परतंत्र था, लोगों के पास अपना सैन्य और अपने शस्त्र नहीं थे, तब परिस्थिति प्राप्त कार्यक्षम नीति के रूप में लोगों ने सत्याग्रह के साधन का विवेकपूर्वक अंगीकार किया। राष्ट्र की वह बुद्धिपूर्वक अंगीकृत नीति थी। परन्तु उसे परिस्थितिवश ही उपादेय माना गया। उसके पीछे जो तत्वज्ञान और दर्शन था, उसका विचारपूर्वक व्यापक रूप से स्वीकार राष्ट्र से नहीं किया, इसलिए उसके प्रयोग में त्रुटियाँ रह गयीं । प्रमाद हुए और दोष भी पैदा हुए । आज देश में औपचारिक पद्धति से विधिवत स्थापित लोक निर्वाचित राज्य है। उस राज्य के अनेक विभागों में से दंड-प्रयोग और शस्त्र-प्रयोग का विहित अधिकार पुलिस, सेना, कारागार और न्यायालयों के विभागों को दिया गया है । राष्ट्र के नागरिक इसे अपनी सम्मति भी देते हैं और उसके लिए धन का उपयोग करने की स्वीकृति देते हैं। सर्वसाधारण नागरिक यह चाहता है कि उसके अधिकारों के संरक्षण के लिए दंड तथा शस्त्र का प्रयोग विधिवत् रूप से किया जाए। जहां दंड और शस्त्र का प्रयोग उसकी इच्छा, स्वार्थ या विवेक बुद्धि के प्रतिकूल होता हो, वहाँ कानून और सामाजिक अनुशासन का प्रतिकार करना वह अपना कर्तव्य मानता है। सारांश यह कि स्वराज्य के पूर्व जो सामाजिक संदर्भ और परिस्थिति थी, उसमें और स्वातंत्र्योत्तर कालीन और स्वराज्योत्तर कालीन सामाजिक परिस्थिति और संदर्भ में बहुत बड़ा अन्तर पड़ गया है। इस दृष्टि से सब परिस्थिति और संदर्भ के अनुरूप सत्याग्रह के प्रयोग और प्रक्रिया में भी परिवर्तन होना आवश्यक है। लोकराज्य की परिस्थिति में भी व्यक्ति स्वातन्त्र्य और अल्पमत की प्रतिष्ठा का अन्तिम तथा मुख्य आधार सत्याग्रही शक्ति ही है। जिस समाज-व्यवस्था में सत्ता और सम्पत्ति के आधार पर अल्पसंख्यकों के स्वार्थ सुप्रतिष्ठित हो गये हों, उस समाज-रचना में सत्ता-सम्पत्तिविरहित बहुसंख्य सामान्य लोगों के लिए सत्याग्रह ही सबसे प्रभावशाली साधन रह जाता है। परतु उसके प्रयोग की पद्धति और स्वरूप नयी परिस्थिति और नये वातावरण के अनुकूल होने चाहिए। सत्याग्रही प्रतिकार बहुसंख्या या बहुमत की इच्छा तथा स्वार्थ की प्रस्थापना के लिए कदापि नहीं हो सकता । मानवीय व्यवहार में मानवता की प्रस्थापना और विकास के लिए ही वह हो सकता है। इसलिए सत्याग्रह के हर प्रयोग के परिणामस्वरूप सत्याग्रही समुदाय, पक्ष या वर्ग के हृदय में तथा उसके प्रत्यक्ष आचरण में शान्तिपरायणता, शिष्टता तथा व्यापक सहानुभूति का विकास होना चाहिए। यह सत्याग्रह की शुद्धता और कार्यक्षमता की परीक्षा है। सहानुभूति और स्नेह निष्ठुर का भी निसर्गसिद्ध गुण है। वह अपने लिए उसका विकास भी करना चाहता है। इसलिए हम उस गुण को मनुष्य का स्वभाव कहते हैं। क्रूर मनुष्य जिनको अपना मानता है, उन्हीं तक अपनी सहानुभूति और स्नेह शीलता सीमित रखता है । इस अपनेपन का या आत्मीयता का दायरा बढ़ाते जाना सभ्यता की प्रगति का लक्षण है। परन्तु आज यह केवल एक भावनात्मक संस्कार नहीं रह गया है, अपितु विज्ञान युग की व्यावहारिक आवश्यकता है। विज्ञान की प्रगति ने देशों की नैसर्गिक सीमाओं और राज्य सीमाओं को एक प्रकार से व्यर्थ सिद्ध कर दिया है। विचारवान तथा विश्वभावना से प्रेरित लोक नेता मनीषी तथा राज्य नेता भी अब कहने लगे हैं कि एक देश से दूसरे देश में प्रवास करने के लिए प्रमाण-पत्र और प्रवेश-पत्र की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। ऐसी परिस्थिति में यह क्रम प्राप्त है कि मनुष्य की वैज्ञानिकता के साथ-साथ उसकी व्यापकता की कक्षा भी बढ़ती चली जाएगी। अतः यह कहना संयुक्तिक और सुसंगत ही है कि सत्याग्रह ही एकमात्र विश्वव्यापी वैज्ञानिक व्यवहार नीति है।