जनवरी 2017

फूलों के रंग से...

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

मैं अपने अजीज के यहां बैठा हूँ, वे फूल मंडी से आएं हैं बता रहे हैं कोई फूल 2 रुपए किलों में भी कोई खरीद नहीं रहा है, माली को तोड़ने का और बाजार तक लाने का खर्चा भी नहीं मिल रहा है। उन्होंने फूल प्रभू के चरणों में चढ़ा दिये हैं। फूल का काम ही है प्रभू चरणों में, किसी के सम्मान में, प्यार में समर्पित होना। खिलकर खुशबू और मिटकर इत्र बन खुशबू बिखेरना।

मैं अपने अजीज के यहां बैठा हूँ, वे फूल मंडी से आएं हैं बता रहे हैं कोई फूल 2 रुपए किलों में भी कोई खरीद नहीं रहा है, माली को तोड़ने का और बाजार तक लाने का खर्चा भी नहीं मिल रहा है। उन्होंने फूल प्रभू के चरणों में चढ़ा दिये हैं। फूल का काम ही है प्रभू चरणों में, किसी के सम्मान में, प्यार में समर्पित होना। खिलकर खुशबू और मिटकर इत्र बन खुशबू बिखेरना। हमारे मुल्क में अनेकों तरह के फूल हैं, उनके कई रंग है, उनकी अलग-अलग खुशबू है। उन फूलों पर, उनके रंगों पर, उनकी खुशबू पर कई दिनों से प्रश्न उठ रहे थे। नोट बंदी ने फूलों की दुनियां बदल दी है, आज वे फूल मूरझा रहे हैं। यह सब कोई और नहीं बाग का माली ही कर रहा है। कभी यहीं माली प्रेम का पूजारी बन अपने मुल्क के बाग के फूलों को घूम घूम कर कहता था - ‘फूलों के रंग से, दिल की कलम से तुझको लिखी रोज पाती, कैसे बताऊं किस-किस तरह से पल-पल मुझे तू सताती’। तब उसे जनता के वोट का प्यार चाहिए था। वो उसे मिल गया और वो मुल्क का मालिक बन गया। सन् 1970 में आई फिल्म ‘प्रेम पुजारी’ का यह गीत आजकल बज तो रहा है, लेकिन बदला-बदला सा लगता है। शब्द वहीं है लेकिन अर्थ बदल गए है। 8 नवंबर 2016 को यह फिल्म नए कलर और कलेवर में पुन: बनना शुरू हुई है। इसका मुहूर्त शाट इस घोषणा के साथ लिया गया है कि आज रात 12 बजे से 1000-500 के नोट बंद किए जाते हैं। ये अब महज कागज के टुकड़े माने जाएंगे। इस नई फिल्म के निर्माता-निर्देशक, गीतकार, संगीतकार, कहानीकार सबकुछ नरेन्द्र मोदी हैं। नेपथ्य में उनके मंत्री, पार्टी, ब्यूरोकेट और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया है। फिल्म इतनी शानदार है कि इसे बगैर कहानी के बनाना शुरु किया गया, इसीलिए बनते-बनते ही 52 दिनों में 62 बार से अधिक कट और रीटेक किए गए हैं। फिल्म ढाई वर्ष पुराने बैक ग्राउंड से शुरू हो रही है। गाना बज रहा है -तेरे ही सपने लेकर के सोया, तेरी ही यादों में जागा, तेरे ख्यालों में उलझा रहा यूं, जैसे की माला में धागा। अच्छे दिनों की उम्मीद में देश मोदी के ही सपने लेकर सोया है और मोदी की ही यादों में जागा है। वो उसके ही ख्यालों में उलझा रहा है। वो 15 लाख का काला धन अपने खाते में जमा होने के सपने देखकर सोया है। वो भ्रष्टाचार मुक्त भारत देख रहा है। वो करोड़ों नौकरी देख रहा है, वो कश्मीर को मुस्कराता और पाकिस्तान को हाथ जोड़े देख रहा है। ढाई वर्ष बाद उसकी नींद खुलती है, उसके सपने टूट रहे हैं, गाना बज रहा है- सांसों की सरगम धड़कन की वीणा, सपनों की गीतांजलि तू, मन की गली में महके जो हर दम, ऐसी जूही की कली तू। देश में नोट बंदी लागू हो गई, कालाधन जब्त होने वाला है, पूरे 52 दिन निकल गए है, खेतों में पड़ी फसल को उठाने के लिए और बोने वाले बीज को लगाने के लिए। अस्पताल में भर्ती बीमार के इलाज के लिए और बैंक के बाहर अपने ही रुपयों के लिए जिसके लिए भारत सरकार ने लिखकर दिया था। ‘मैं धारक को अदा करने वचन देता हूं’ उसको निभाने के लिए सांसों की सरगम धक्के खाते हुए चढ़-उतर रही है। शादी ब्याह थम गए हैं। गीत-संगीत की वीणा के तार ढीले हैं। सपनों की गीता की अंजुली बगैर कर्म के खाली है। प्रेम पुजारी इससे बेखबर हैं। वे मन की बात कह रहे हैं। उनका कहना है कि राष्ट्र प्रेम में त्याग करना पड़ता है, मरना भी पड़ता है। इसलिए आज उसके बाग की वो ही जूही की कली उदास है। ‘पूरब हो, पश्चिम, उत्तर या दक्षिण तू हर जगह मुस्कराए / जीतना ही जाऊं में दूर तुझसे, उतने ही तू पास आए।’ गाना बज रहा है। अमेरिका हो, चीन हो, जापान हो, पाकिस्तान या सारा जहान हो, सभी ओर मोदी के कदमों की थाप है, सभी दिशाओं में एक ही मुस्कान है, आवाज है- मोदी... मोदी..., अचानक मध्यां तर होता है, परिदृश्य, बदलता है। नोट बंदी लागू हो गई। हर कहीं, हर जगह सभी ओर नोटबंदी की बात है। उसी का प्रभाव है। उद्योगपति-व्यापारी, मजदूर--किसान, पूरा देश परेशान है। प्रेम पूजारी का फूल और चमन पर पहरा है, सन्नाटा बढ़ा गहरा है। सब ओर अंधेरा है, नेपथ्य से आवाज आ रही है तुम्हारी आंखों में खराबी है, तुम्हे सीमा पर शहीद होता सैनिक नहीं दिखता है। देश में चारों ओर चोरी ही चोरी है, कालाधन है, जो पाकिस्तान के रास्ते आता है। तुम्हें यह सब नहीं दिख रहा है, परेशानी की बात करना पाकिस्तान को मदद पहुंचा रहा है। प्रधानमंत्री का यही संदेश पूरे देश में जा रहा है। बहुमूल्य मानव जीवन... तीस नवम्बर को शाम 6 बजे मेरे मामा अपनी एक वर्ष की पोती को लेकर सड़क पार कर रहे थे। तेजी से आते ऑटो रिक्शे ने उन्हें टक्कर मार दी। उनके जेहन में एक ही ख्याल था कि बच्ची को टक्कर नहीं लग जाए। उन्होंने हाथ नहीं खोले, इसलिए वे सिर के बल गिर गए। बच्ची को खरोंच तक नहीं आई, लेकिन उन्हें ब्रेन हेमरेज हो गया। 3 दिसम्बर को वे दुनिया को अलविदा कह गए। मामा और मामी की सुन्दर जोड़ी टूट गई है। रिश्तेक नातों से भरपूर परिवार के सपने चूर-चूर हो गए। मामा की उम्र 65 वर्ष थी, उन्हें कोई रोग नहीं था। उनकी चुस्ती-स्फूर्ति 50 वर्ष वाले की तरह थी। वे सबके काम आते थे, सभी को प्रेम से खिलाते थे, बहुत अच्छा गाते थे। सभी ओर एक स्वर है विधि को यही मंजूर था, काल को कोई टाल नहीं सकता, एक-एक सांस तय है। दिल को समझाने के लिए यह ख्याल ठीक हो सकता है, लेकिन हकीकत यही है कि एक वर्ष की पोती को मामा की तीव्र इच्छा शक्ति ने बचाया है और उन्हें हमारी घटिया सोच ने मारा है। भारत में एक वर्ष में सड़क हादसों से हर साल एक लाख साठ हजार लोग जान गंवाते हैं। अगर एक दिन की बात करें तो ये आंकड़ा 461 है। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि हर वर्ष आइसलैंड-मालदीव जैसे देशों की कुल आबादी की आधी के बराबर जनसंख्या सड़क हादसों की बलि चढ़ जाती है। हमारे देश में यातायात नियंत्रण व्यवस्था आज भी अधूरी है, चीन में एक वर्ष में सड़क हादसों में मरने वाले लोगों की संख्या प्रति वर्ष महज 97,551 है। जबकि जनसंख्या 50 करोड़ ज्यादा है। यानी चीन का आंकड़ा भारत में हुए सड़क हादसों से हुई मौतों से लगभग 62 हजार कम है। अमेरिका में एक वर्ष में रोड एक्सीडेंट में मरने वाले लोगों की संख्या महज 41,292 है। रूस में यह आंकड़ा एक वर्ष में महज 37,349 है, और जापान में एक वर्ष में 4,373 लोगों की मौत होती है, जबकि इन मुल्कों में गाड़ियों की संख्याे और गति दोनों ही हमसे ज्यादा है। हमारे नौ दिन में मौत के आंकड़े जापान के 365 दिन के बराबर हैं। जब रेल की पटरी टूटती है, एक रेल दूसरी से टकराती है, उसमें आग लग जाती है, तब इन सब में गलती मानवीय ही होती है। इंदौर-पटना ट्रेन हादसे में हाल ही में 149 लोगों ने जान गंवाई है। यात्री ट्रेन शुरू होते ही शिकायत कर रहे थे कि डिब्बे तीव्र गति से हिल रहे है, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं था। ट्रेन चलती गई, आधी रात को भी कह दिया कि और चलाओ, परिणाम दुखद दुर्घटना थी। जब कोई ट्रक-कार या अन्य वाहन किसी को टक्कर मारता है तो उसमें भी गलती मानवीय होती है। म.प्र. में बस ड्राईवर शराब पीकर अंध गति से बस दौड़ाता है। यात्री चीखते है रोते है वह नही सुनता है और बस को पुलिया से नदी में गिरा देता है। उसमें बैठे सभी यात्रियों की मौत हो जाती है। उसके बाद भी स्थिति बद से बदतर हो रही है। शराब पीकर वाहन चलाने और तेज रफ्तार के साथ हादसों के बढ़ने का दौर जारी है। हमारे देश का कोई ऐसा घर नहीं होगा, जिसका सदस्य सड़क दुर्घटना में घायल नहीं हुआ होगा। पहले हमारे देश में लोग पोलियो के कारण विकलांग होते थे। विज्ञान ने पोलियो को समाप्त कर दिया है। अब सड़क हादसों में विकलांग हुए मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसे हड्डी के डॉक्टर और अस्पतालों में इनकी बढ़ती संख्या से या मोच और मालिश करके देशी पद्धति से इलाज करने वालों के यहां लगी लम्बी कतार से समझा जा सकता है। हम प्राकृतिक आपदा के आगे आज भी बेबस हैं, वर्षा न होने पर सूखे से और ज्यादा होने पर बाढ़ से डूबने को अभिशप्त हैं। उत्तराखंड की केदारनाथ त्रासदी भी मानवीय भूल थी। उसमें एक बड़ा कारण प्रकृति एवं पर्यावरण से खिलवाड़ था तो दूसरी बड़ी गलती तूफान की पूर्व सूचना देने वाले यंत्र का नहीं लगा होना था। इसके बाद हमने इन घटनाओं से कोई सबक नहीं लिया है। जापान जैसे देश तो भूकंप के ऊपर और न्यूजीलैंड जैसे देश ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठे हैं। इन्होंने इनमें से जिंदगी तलाशी है और उन्नत बने हैं। हर बार इन प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर दोगुना ताकत से उठ खड़े हुए हैं। आजादी के पहले हमारे देश की औसत आयु 36 वर्ष थी, जो आज 56 वर्ष हो गई है। हमारे देश में मलेरिया, पेचिश, टीबी, हैजा, पीलिया, डेंगू, चिकनगुनिया, मस्तिष्क ज्वर, स्वाइन फ्लु आदि संक्रामक बीमारियों से लोग मर रहे हैं। विकसित मुल्कों में ये बीमारियां नहीं होती हैं। इन मौत का कारण गंदगी और उससे उत्पन्न मच्छर, प्रदूषित पानी और खाद्यान्न है। ये मुल्क इन सबसे दूर हैं। हमारे देश में शायद ही कोई ऐसा घर होगा, जो इन संक्रमित बीमारियों का शिकार न हुआ होगा। इस तरह की मौत को हम घटना मान रहे हैं, विकसित मुल्कों के लिए यह सब दुर्घटना है। हमारे यहां दुर्घटना मुख्यदत: सड़क हादसों में हुई मौत को कहा जाता है। विकसित मुल्कों की औसत आयु 80 वर्ष के करीब है। जापान जैसे देश में सौ वर्ष से अधिक उम्र वालों की जनसंख्याु बढ़ रही है। उनमें से बहुत से लोग स्मृति दोष के शिकार हो रहे हैं, वे उसे भी ठीक कर लेंगे, क्योंकि वे इंसान की जिंदगी बेहतर कर उसकी उम्र बढ़ाने के लिए नित नई शोध और खोज करते हैं। हमारा स्मृति दोष उनसे भिन्न है, हम ब्लड प्रेशर की गोली खाकर अपना रक्त ठीक तरह से दौड़ा रहे हैं। शुगर की गोली खाकर जिन्दगी बचा रहे हैं, घुटने बदलाकर चल रहे है। रीढ़ की हड्डी का ऑपरेशन करवाकर सीधे खड़े हैं। मोतीयाबिंद का ऑपरेशन करवा कर सबको देख रहे हैं, लेकिन जानकर भी अनजान है। हमने हजार वर्षों में सूई भी ईजाद नहीं की। सर्जरी भी विदेश से आई है। महिला की प्रसूति मं सर्जरी से जब जच्चा-बच्चा की जान बचती है और हार्ट सर्जरी से जब इंसान को नई जिंदगी मिलती है, हमें डॉक्टर और वैज्ञानिक का सर्वप्रथम शुक्रिया अदा करना चाहिए, यदि डॉक्टर अपनी सफलता का श्रेय भगवान को देता है तो यह उसकी आस्था और महानता है, लेकिन हमारी गलती से हो रही मौत का कारण भगवान को बताना अज्ञानता है। जो हजारों वर्षों में नहीं हुआ, वो पिछले 100-200 वर्षों में हुआ है। उसके बाद 25, 50 वर्षों में जो हुआ और उसके बाद जो इन 5-10 वर्षों में हुआ है वे मानव इतिहास की चमत्कारिक घटनाएं हैं, जिनकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी। इंसान का जन्म, विवाह और मृत्यु उसकी जिंदगी से जुड़ी तीन महत्वपूर्ण घटनाएं हैं। उनमें से जन्म को परिवार नियोजन से, विवाह को नहीं कर टाला जा सकता है, लेकिन मृत्यु अटल है। दुनिया में यूरोप, अमेरिका, जापान आदि उन्नत मुल्क इस घटना को भी टालने में लगे है। अगले 50-100 वर्षों में हो सकता है मृत्यु रुक जाए। हमारी संस्कृति में शतायु भव: सौ साल निरोगी रहने का आशीर्वाद दिया जाता है। अमरत्व की कामना की जाती है, वह पूरी हो जाए। सभ्यता के विकास के साथ ही मानव जीवन क्या है? जन्म-मृत्यु क्या है? पुनर्जन्म क्या है? ग्रह-नक्षत्र ज्योतिष क्या है? इनकी खोज में लगा रहता आया है। हम पूरब हैं, हमारा अध्यात्म पूरी दुनिया को हमारी देन है। कृष्ण का प्रेम, पतंजली का योग, बुद्ध-महावीर का ध्याान,नानक, कबीर और गौरक्ष की वाणी हमारी धरोहर है, हमने शून्य सबसे पहले खोजा, बगैर विज्ञान के ग्रह नक्षत्र पढ़े, ज्योतिष एक द्वेत-अद्वेत विज्ञान को जन्म दिया। आज हमने इन धरोहरों को अधंविश्वास और पाखंड बनाकर छोड़ दिया है, जबकि दुनिया ने शून्य से पूरा विज्ञान खड़ा कर लिया है। वो शून्य से सौ पर पहुंच रहे हैं। हम उलटी गिनती गिन रहे हैं।