अक्टूबर 2019

सिविल नाफरमानी

राममनोहर लोहिया

आदमी को अन्याय और अत्याचारपूर्ण रुतबे से लड़ने के लिए हमेशा तैयार रहना होगा। दरअसल, अन्याय का विरोध करने की आदत बन जानी चाहिए। आज ऐसा नहीं है। आदमी लम्बे अरसे तक गद्दी की गुलामी और थोड़े अरसे के लिए उससे नाराजगी के बीच एकान्तर करता रहता है । गद्दी के लिए स्वार्थ साधना की जगह लगातार अन्याय से लड़ने की आदती डालने के लिए आदमी को इतिहास से मुंह मोड़ना होगा। ऐसे नये लोग आएं जो आदतन गलत अधिकार का विरोध करें। अवज्ञा की आदत सम्भव है, हिंसा की आदत असम्भव । हिंसात्मक क्रान्ति आदतन सम्भव नहीं है, क्योंकि इसके लिए किसी भी समह में इतनी आध्यात्मिक और भौतिक सामर्थ्य नहीं होगी। गलत अधिकार और अत्याचारी शासन के खिलाफ आदतन अवज्ञा सम्भव है, क्योंकि इसके लिए चौड़ी छाती के अलावा और किसी हथियार की जरूरत नहीं । सिविल नाफरमानी करने वालों की रिले-रेस ऐसी हो ताकि एक के थकने पर दूसरा उसकी जगह ले ले । इतिहास के हाली एजेंडा पर एक बड़ा सवाल खड़ा है कि क्या मनुष्य जाति समर्थ होगी ऐसे आदमी पैदा करने में जो आदतन सिविल नाफरमानी करे। षड्यन्त्र और हथियार से निरन्तर क्रान्ति असंगत बात है। सिविल नाफरमानी के जरिए निरन्तर क्रान्ति की सम्भावना निश्चित है। सत्ता के दूसरे पहल, ऐेयाशी और रुतबे की भूख की यह एक मात्र दवा है। सत्ताधारी हर समय पतन के रास्ते पर जा सकते हैं। मनुष्य जाति को काफी तादाद में सिविल नाफरमानी करने वालों को तैयार करना होगा जो सत्ताधारियों को सहारा देंगे और उन्हें सिविल नाफरमानी कर-कर या सम्भावित सिविल नाफरमानी के जरिए गिरने से बचाएंगे। कोई राजनैतिक दल गद्दी के अधिकार को सीमित करने और उसकी ज्यादतियों को दूर करने के आधार पर नही टिक सकता। न्याय करने की इच्छा के बिना शायद कोई आदमी अन्याय से लड़ने के लिए स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित नहीं कर सकता । जो सत्ता- बारियों के लिए लागू होती है, वही बात लगभग अन्याय का विरोध करने वालों पर लागू होती है। अगर गद्दी इस धरती पर बहुत लुभावनी है तो उसका विरोध करना भी उतना ही लुभावना है। सत्ता से लड़ाई में जीवट और कार्यशक्ति आती है, जिससे व्यक्ति- गत और व्यक्ति निर्पेक्ष मनोभावों का विस्फोटक मिश्रण पैदा होता है। इसका उद्देश्य केवल सत्ता का नियंत्रण नहीं होता। गद्दी का इस्तेमाल कर के कानून बदलना और भला करना इसका उद्देश्य होता है । अन्याय का विरोध करने वाले मन में भविष्य में न्याय और भला करने की बात सोचते हैं। ये चेतन या अचेतन अवस्था में यदि आराम नहीं तो रुतबा प्राप्त करने के इच्छुक होते हैं और उनकी रुतबे के लिए भूख प्रायः भला करने की तबीयत के बराबर होती है। आदमी का भला करने की व्यक्ति निरपेक्ष तबीयत रुतबा प्राप्त करने की व्यक्तिगत तबीयत से मिल जाती है, जो सिविल नाफरमानी करने वालों और सत्ताधारी, दोनों की विशेषता है। इसके बिना सिविल नाफरमानी में दम नहीं रहेगा, उसका तारतम्य टूट जाएगा और वह खत्म भी हो सकती है। इसलिए सिविल नाफरमानी की निरन्तर क्रान्ति के साथ आम चुनाव के मौकों पर लोगों की इच्छा से अभिव्यक्त प्रसंगिक क्रान्ति जुड़े जो सिविल नाफरमानी करने वालों को सत्ता भी दे सकें। यह प्रसंगिक क्रान्ति सिविल नाफरमानी करने वालों के मन पर वैसा ही असर करती है जैसा निरन्तर क्रान्ति। उसकी तबीयत न्याय करने की उतनी ही होती है जितनी अन्याय से लड़ने की। इसलिए हमेशा क्रान्ति करने वाले या सिविल नाफरमानी करने वाले से पूरा परोपकारी बनने की उम्मीद करना बेतुका है। चाहे तनहाई में क्यों न हो, वह रुतबे और आराम के सपनों को पालेगा। उसकी स्वार्थी और घटिया उद्भावनाएँ सिविल नाफरमानी करने के साथ लाजमी तौर से अपने आप खत्म हो जाएंगी। इस पहलू से आंख मूंदना उतना ही अनर्थकारी होगा जितना इसके कारण सिविल नाफरमानी त्याग देना। सिविल नाफरमानी के कमजोर पहलुओं का खुले तौर पर विश्लेषण और समाधान करना होगा। यह मान लेना चाहिए कि निरन्तर क्रान्ति करने वालों की इच्छाशक्ति में दम, मजबूती तभी तक बनी रहती है जब तक प्रासंगिक क्रान्ति द्वारा लोगों का भला करने के लिए सत्ता हासिल करने की उम्मीद दिखायी पड़ती है। एक सिद्धान्त बतलाया गया है कि सिविल नाफरमानी करने वाले क्रान्तिकारी को सत्ता कभी स्वीकार न करने के लिए दृढ प्रतिज्ञ हो कर सलाहकार के रूप में रहना चाहिए। यह सिद्धान्त या तो निरर्थक है या पाखंड । गलत अधिकार के खिलाफ सिविल नाफरमानी की आदत बनना धरती पर सम्भव होगा, अगर कभी-कभी अन्याय और भला करने की गुंजाइश दिखायी पड़े। नहीं तो, यह मजा हो जाएगी। मजेदारी हमेशा थोड़ी बहुत व्यक्ति चीज है। बिना मौज के राजनीति शुद्ध लग सकती है लेकिन वह बेदम और मुर्दा होगी। सत्ता के स्वयं प्रचारित सलाहकार बहुधा अर्द्ध मुर्त लोग होते हैं। फिर भी यह सम्भव है कि सत्ता मिलने पर कुछ सिविल नाफरमानी करने वाले अलग रहने का निश्चय करें और अपने सहयोगियों के सलाहकार के रूप में काम करें। इस किस्म के फैसले में भी बहुत खतरा है। इसमें शासकों और उनके सलाहकारों में कुछ ऐसा तनाव पैदा हो सकता है जिसका नतीजा दोनों के लिए खराब निकले । इस तरह के सलाहकार काफी अनुभवी हों, तब की ओर पूरी तफसील के साथ भला करने की इच्छा पर आत्म-नियंत्रण कर चुके हों तथा आमतौर से होने वाले भले के साथ थोड़ी बहुत बुराई भी हो तो वे निर्पेक्ष भाव से तटस्थ रहें। इस हालत में ऐसी व्यवस्था बन सकती है कि सत्ता पर थोड़ा बहुत नियंत्रण रख सकें। राजनीति में किसी और तरह का संतवाद झूठ है। राजनीति में संत वही है, जिसे सत्ता में परोपकारिता और व्यक्तिगत पहलुओं की पूरी जानकारी हो और जो यह जानता हो कि इन दोनों को साथ चलना चाहिए, और यह कि आदमी अधिक से अधिक इतना कर सकता है कि व्यक्तिवाद अनुशासित हो कर कम हो जाए। राजनीति में और किसी तरह का संत केवल धोखेबाज होता है, जो त्याग की चिकनी-चुपड़ी बातें करता है लेकिन जिसके दिल में यदि आराम की नहीं तो रुतबे की भट्टी धधकती रहती है। अतः अगर एक तरफ भला और न्याय करने के ठोस आचरण के ब्लूप्रिंट पर अमल किया जाए, जिसकी जानकारी लाखों करोड़ों लोगों को हो, और दूसरों तरफ सैकड़ों और हजारों बरस की अन्याय से लड़ने की योजना और सच पर अमल करने की बात कागज के बजाय मन में हो। इस किसम की सौ वर्षीय योजना उस मन में होनी जरूरी है, जो राजनीति के भला करने और रूतबा हासिल करने के दोनों पहलओं को समझें। अत्याचार और ऐयाशी के खिलाफ सिविल नाफरमानी की सौ वर्षीय योजना के जरिए आदमी अब भी रुतबे को अत्याचार और आराम को ऐयाशी का विकराल रूप लेने से बचा सकता है । अपने विशुद्ध रूप में अच्छाई की खोज करना सिविल नाफरमानी है। सिद्धान्त में, व्यक्तिगत प्रतिष्ठा या पद का असर इसे दूषित नहीं करता। अगर ऐसा मुमकिन हो कि सिविल नाफरमानी करने वालों के झुंड के झुंड तैयार हों और वे बढ़ते रहें, जिन्हें अन्याय की अवज्ञा के सिवा और कोई महत्वाकांक्षा न हो और न्याय का अमल वे दूसरों पर छोड़ दें, तो बहत अच्छा । इन सिविल नाफरमानी करने वालों का स्वरूप अनुपम और शुद्ध होगा। जब तक बड़े पैमाने पर ऐसा चमत्कार नहीं हो जाता, राजनीतिक क्रिया में न्याय पर अमल करने के साथ रुतबा हासिल करने के लिए गद्दी की चाह जरूरी होगी। अत्याचार की अवज्ञा, न्याय पर अमल और रुतबे की खोज, ये तीन स्थायी तत्व मिल कर राजनीति में आदमी को अच्छे काम के लिए प्रेरित करते रहेंगे । सत्ता प्राप्त करने की सात वर्षीय योजना अच्छी है अगर, कम से कम मन में अन्याय से लखने और सम का निर्माण करने की सौ वर्षीय योजना से वह पुष्ट हो जाए। लड़ना हथियार से नहीं, बिना हथियारों के होना चाहिए। इतनी बात अगर है तो फिर सोशलिस्ट पार्टी के सत्याग्रह या सिविल नाफरमानी की बात समझ में आ जाती है। ऐसा न समझ लेना कि सिविल नाफरमानी हंसी खेल है। बहुत से लोग तो सिविल नाफरमानी पर इस तरह बोल और लिख दिया करते हैं, जैसे जेल में रहना तो लोगों को भाया करता है। जेल में रहने में कोई शरीर का मजा नहीं आता। अगर मजा आता होगा तो थोड़ा बहुत आत्मा को आता होगा। जितने लिखने-बोलने वाले हैं उनको थोड़ा तो सोचना चाहिए कि आखिर गर्मी के दिनों में लोग हजारों की तादाद में जेल की तकलीफ उठाते हैं तो ऐसा नहीं ससझना चाहिए कि उन्हें कोई शरीर का मजा मिलता है। कुछ अपने सोच और विचार के कारण इस काम को कर रहे हैं। उनका सोचना-विचारना गलत तरीके का हो, यह बात दूसरी है। और वह कैसा सोचना-विचारना है, यह दुश्मन का भी फर्ज है कि उसे अच्छी तरह से समझे। सवाल उठता है कि आखिर सिविल नाफरमानी क्या होती है और इससे फायदा क्या ? सिविल नाफरमानी अथवा अन्याय से शान्तिपूर्वक लड़ना अपने आप में एक कर्तव्य है। कर्तव्य में आगापीछा या नफा-नुकसान नहीं देखा जाता । सच पूछो तो सिविल नाफरमानी के सम्बन्ध में हिसाब लगाना गैर जरूरी है। सिविल नाफरमानी अपने आप में एक नतीजा है। श्री विनोबा भावे का एक मजमून छपा है, जिसमें उन्होंने साबित करने की कोशिश की है, जब मुल्क आजाद हो जाए और वोट द्वारा सरकार चुनी जाए और चले तो इस तरह का नकारात्मक सत्याग्रह मतलब नहीं रखता । एक अच्छी बात है कि अपनी बात को साबित करने के लिए यह जरूरी दिखायी पड़ा कि वे महात्मा गांधी के कुछ कामों में भी गलतियाँ निकालें । मुझे खुशी हो रही है कि हिन्दुस्तान में महात्मा गांधी का जो सब से बड़ा चेला माना जाता है उसे जरूरत पड़ गयी है कि वह महात्मा गाँधी की गलतियों को बतावे कि उन्होंने लोगों पर किस तरह से दबाव डालना चाहा । वे पूरे सत्याग्रही नहीं थे, उनमें कुछ गुस्सा ज्यादा था, वे दबाव डाल दिया करते थे या उनमें प्रेम नहीं था। एक मानी में यह अच्छी बात हुई। क्योंकि जितना हिन्दुस्तान में साफ होता चला जाएगा कि आखिर कई पहलुओं के आदमी थे और उनके चेले उनके किसी एक पहल को पकड़ कर बैठ जाते हैं। और समझते हैं कि वे गांवी जी का रास्ता चला रहे हैं, उतना ही अच्छा है । भावे साहब ने कहा है कि सत्याग्रह का खास मतलब है। दुश्मन के या विरोधी के दिल को बदलना, उसके गुस्से को दर करना या उसमें जो अविचार हैं उसको हटाना। अगर सिविल नाफरमानी का नतीजा यह होता है कि विरोधी का गुस्सा बढ़ जाए और उसका अविचार बढ़ जाए तो वह सिविल नाफरमानी खराब होती है। लेकिन सिविल नाफरमानी की सब से बड़ी कसौटी विरोधी का दिमाग नहीं है, बल्कि सिविल नाफरमानी करने वालों का दिमाग और उनके दोस्त, जान-पहचानी, पड़ौसी और आसपास के रहने वाले लोगों का दिमाग । क्योंकि जनता पूरी तरह से बहादुर नहीं होती है, सच्ची भी नहीं होती और उसको परख भी नहीं होती और लोगों के दिल में कमजोरी रहती है इसलिए सिविल नाफरमानी का एक मतलब यह होता है कि विरोधी के दिल से गुस्सा दूर करे, तो दूसरा और बड़ा मतलब होता है कि जनता के दिल की कमजोरी को दूर करे। इस मतलब को हिन्दुस्तान के आज के जो बड़े लोग हैं, यानी जो बड़े कहलाते हैं, बिलकुल भुला देना चाहते हैं कि जनता की कमजोरी को दूर करना भी सिविल नाफरमानी का मतलब होता है। "हृदय परिवर्तन" गाँधी जी का, केवल बड़े लोगों के लिए नहीं था, बल्कि ज्यादा या कमजोर लोगों के लिए, करोड़ों लोगों के लिए जिससे उनके दिल को कमजोरी दूर हो और वे जुल्म करने वाले के खिलाफ तन कर के खड़े हो सकें। उनमें इतनी हकीकत आ जाए कि वे कह सकें, "मारो अगर मार सकते हो लेकिन हम तो अपने हक पर अड़े रहेंगे ।" यह है सिविल नाफरमानी का मतलब। काँग्रेसी सरकार सिविल नाफरमानी करने वालों के खिलाफ नाराज हो जाती है तो कोई परवाह नहीं । अगर सिविल नाफरमानी करने वालों के काम के नतीजे से हिन्दुस्तार के करोड़ों लोगों के दिल से कमजोरी और डरपोकपन दूर हो जाता है तो सिविल नाफरमानी कामयाब समझी जाएगी। इस चीज को बिलकुल साफ तरीके से समझना चाहिए। इसी तरह से एक दूसरा मतलब भावे साहब ने बतलाया है कि जब बोलने की आजादी हो गयी, घर-घर जाने की आजादी हो गयो तो फिर सत्याग्रह क्यों किया जाए? अंग्रेजों के जमाने में बोलने की आजादी नहीं थी, इसलिए सत्याग्रह करना पड़ा था। भावे साहब को पिछले चार-पांच बरसों में गांधी निधि' से, काँग्रेसी सरकारों से और अमीर लोगों से कम से कम पांच-सात करोड़ रुपये घर-घर जाने के लिए मिले होंगे; शायद ज्यादा ही । काँग्रेस पार्टी को भी पिछले दस वर्षों में अपना प्रचार करने के लिए दस-पन्द्रह करोड़ रुपये मिले ही होंगे। सोशलिस्ट पार्टी जैसी पार्टी को पिछले दो वर्ष में शायद दो-चार लाख रुपये ही मिले हों तो बहुत है। क्योंकि अगर सदर दफ्तर को देखा जाए तो यहाँ मुश्किल से चालीस-पचास हजार रुपया खर्च हुआ होगा। अखबार, रेडियो प्रचार, मास्टर, प्रोफेसर, विश्वविद्यालय, किताबें ये सब उनकी मातहतों में रहती हैं. जिसके हाथ में शक्ति रहती है। ये उसकी पूजा करते हैं। आम तौर से तो सब जगह लेकिन हिन्दुस्तान में इतना बुरा हाल हो गया है कि सभी नाटककार, नाचने वाले, गाने वाले जितने भी हैं, कई तरह की अकादमियों में फंसे हैं, और जितने लेखक हैं, वे पैसे के प्रलोभन और दूसरी चीजों में फंसे हैं। ऐसी हालत में यह कहना कि आजादी है, तो क्या ठीक है ? मुझे बोलने की आजादी है। हिन्दुस्तान में चालीस करोड़ लोग बसते हैं। अगर कोई काँग्रेसी बोलता है या भावे साहब बोलते हैं, तो उनकी आवाज को पहुँचाने के लिए रेडियो, अखबार और सरकारी विभाग कम से कम अगर चालीस करोड़ के लिए नहीं तो करोड़ तक के लिए है। हम लोगों का क्या हाल है कि अगर कोई बात कहते हैं तो उसमें से ज्यादातर हिस्सा तोड़ व काट दिया जाता है। थोड़ा बहुत मुमकिन है जब सोशलिस्ट पार्टी की ताकत बढ़ने लगे तब अखबार बाले इतना नहीं काटेंगे। जिसके हाथ में रेडियो है, अखबार है, और प्रचार के यन्त्र हैं, वह घर-घर पहुंच सकेंगे, पैसे के जरिए और यन्त्र के जरिए । ऐसी सूरत में जरूरी हो जाता है कि सब को प्रचार के अलावा शक्ति से कोई दूसरे साधन ढूंढ़ना पड़ेगा। झूठ घर-घर पहुंच रहा है । झूठ सरकार की तरफ से चारों तरफ फैलाया जाता है। ऐसी सूरत में सच के लिए जरूरी हो जाता है कि वह तकलीफ उठा कर लोगों के सामने सारी चीजें साफ करें। क्योंकि जब लोग तकलीफ उठाते हैं, तब करोड़ों का ध्यान उनकी तरफ खिंचता है। अगर सोशलिस्ट पार्टी के लोग प्रचार करते ही बैठे रहें तो दस-बीस-पच्चीस वर्ष में उनकी बात अधिक से अधिक हजारों-लाखों लोगों के पास पहुँच पायेगी, लेकिन अगर सोशलिस्ट पार्टी के लोग और उनकी देखादेखी दूसरे लोग भी तकलीफ उठाते हैं, जेल जाते हैं, मार खाते हैं, बड़ी-बड़ी सजाएं भुगतते हैं, जान से भी हाथ धो बैठते हैं तब फिर करोड़ों लोगों का ध्यान उनकी तरफ जाता है कि आखिर यह क्या मामला है ? क्यों इतने लोग पकड़े गये? तब उनके दिमाग में ये सारे सवाल उठते हैं । तब ये सोचना शुरू करते हैं। जब शत्रु के पास रुपया हो, यन्त्र हो, और सारे साधन हों तो सच को लाजमी तौर पर सहारा लेना पड़ता है, त्याग और तपस्या और तकलीफ का। उनके बिना कोई ताकतवर हो नहीं सकता। यह याद रखना कमजोर सच-सच नहीं है। सच तभी सच बनता है, जब वह ताकतवर हो जाता है । मैं बार-बार अपने लोगों को और हिन्दुस्तान के लोगों को कहना चाहता हूँ कि वह सच झूठा है कि जिसमें ताकत नहीं है कि वह अपने प्रभुत्व को न जमा सके। क्या फायदा अगर हम अपने कमरे में बैठ कर खुश हो ले कि हमने तो सच कह दिया या लिख दिया, अगर उसके खिलाफ सारी कार्यवाही होती रहती है। फायदा तो तब होता है जब सच के मुताबिक सरकार और समाज की कार्यवाही होती रहती है। इसलिए ताकत वर सच को ही सच कहा जाता है । यह सही है कि ताकतवर बनने के लिए सम्भव है काफी अरसे को मेहनत हो, तकलीफ उठाएँ और तपस्या करनी पड़े। सिविल नाफरमानी की सबसे बुनियादी बात यह है कि सच्चाई करोड़ों लोगों के अन्दर बैठने के लिए तपस्या और तकलीफ का सहारा ले। भावे साहब अभी जानते नहीं कि जनतन्त्र किसे कहते हैं। और न उन्होंने सत्याग्रह का मतलब सीखा है। न उन्होंने प्रह्लाद को जाना, न उन्होंने सुकरात को जाना, न उन्होंने गाँधीजी को जाना। इनको तो छो दीजिए जो अगला इनसान आने वाला है उसको भी वे नहीं समझते । ये गांधी जी के एक पहल को ले कर बैठे हुए हैं। वह पहल है प्रेम । गाँधी जी की जो दूसरी पहल थी, तेजस्विता का, गुस्से का, गरीबों, बेईमानी, बदमाशी और जुल्म से गुस्सा करो और उससे लड़ो, उस पहलू को भावे साहब अभी तक नहीं समझ पाये । और अब अगर कोशिश नहीं की तो आगे भी ये समझ नहीं पाएंग। आज गांधीजी के ये चेले तो गांधीजी को खत्म कर देना चाहते हैं। अकसर यह हुआ है। यह पहली दफे नहीं है। इतिहास में हमेशा यह आया है कि आदमी के बहुत बड़े सिद्धान्त को उसके चेले ही खत्म कर देना चाहते हैं। गाँधी जी के दो-चार बड़े चेले माने जाते हैं। एक राजनैतिक चेला माना जाता है, वे मुहब्बत प्रेम की बात करते हैं। दूसरे लोग भी प्रेम करना जानते हैं। ऐसा न समझ लेना कि दूसरे प्रेम करना नहीं जानते । वह दिल जो दुनिया में कमजोरी को हटाने के लिए हमेशा तैयार है, उसमें जरूर प्रेम का एक बहुत बड़ा बीज होगा। अगर प्रेम का बीज उस दिल में न होता तो दुनिया की कमजोरी हटाने के लिए क्यों वह तकलीफ उठाता। जो लोग 5 बरस तक किसी भी जनता को वोट के चक्कर में हमेशा फाँसे रखना चाहते हैं और अकर्मण्यता का पाठ पढ़ाते हैं से जनता के दिमाग को या तो कुचल डालना चाहते हैं और या पाजी बना देना चाहते हैं। जब जनता 5 बरस तक लगातार अन्याय को सह लिया करती है तो उसका दिमाग भी अन्याय सहने का आदी बन जाया करता है। उस दिमाग में परख करने की शक्ति नहीं रह जाती। आज हमारी बातों पर लोग ध्यान ज्यादा क्यों नहीं दे रहे हैं ? क्योंकि उनके दिमाग में परख की शाक्ति नहीं रही है और यह बात धंस गयी है कि गद्दी पर बैठने वाले ऐसा किया हो करते हैं। आप याद रखना कि हिन्दुस्तान और दुनिया में बुराई तब तक दूर नहीं होगी, जब तक बुरे को बुरा मानने वाले लोग पैदा नहीं हो जाते हैं। आज बुराई को बुराई मानने वाले लोग नहीं रह गये या कम हो गये हैं। अगर किसी भी व्यापारी की कोई चोरी या बदमाशी पकड़ी गयी तो बाकी लोग कहते हैं कि व्यापारी तो ऐसा करता ही है। किसी मन्त्री की चोरी या बदमाशी बताओ तो कहेंगे कि आखिर मन्त्री तो ऐसा किया ही करता है। अभी कुछ दिनों पहले मुझे मालूम हुआ कि हिन्दुस्तान का जो सब से बड़ा ग्रंथ है ।'ऋग्वेद", उसमें लिखा हुआ है कि जब कोई आदमी राजनीति की ऊँची जगह पर पहुँच पाये तो उसे अपने दोस्त, अपने रिश्तेदार और स्वजनों का फायदा करना चाहिए, इससे बढ़ कर क्या हो सकता है। फिर भले और बुरे की परख नहीं रह जाती। दिमाग में कुछ ऐसे विचार धंस जाते है कि इन्सान तैयार हो जाता है, नाइन्साफी, जुल्म और अत्याचार को माफ करने के लिए। आज जैसे हम लोग माफ कर दिया करते हैं, यह कह कर कि व्यापारी, अफसर तो यह किया ही करते हैं। सबसे पहले तो यह जरूरी है कि लोगों के मन में विचार धसाएँ कि नहीं, मंत्री यह नहीं किया करता, अफसर को यह नहीं करना चाहिए और जो मंत्री या व्यापारी या अफसर ऐसा काम करते हैं, वे बदमाश हैं और उनको हटाना चाहिए । ऐसा विचार लोगों के मन में पैदा करना चाहिए। यह विचार, यह भरोसा क्यों नहीं पैदा होता। कहते हैं कि जनतन्त्र में पांच वर्ष के बाद इसको बदलना। तब तक यह सिलसिला चलता ही रहे । जब किसी चीज को बार-बार सहते चले जाते हो, तब न आत्मा की और न शरीर की ताकत रह जाती है, उसके बारे में सोचने, बोलने या करने की । यह हो सकता है कि पाँच वर्ष लोग सहते रहें, और चुनाव के अवसर पर दो-चार महीने के प्रचार से यह पता लगा लें कि ठीक कौन है, और किसको वोट देंवें ? ऐसे मौकों पर जिस पार्टी के पास प्रचार के साधन और आदमी होते हैं, उसकी बन आती है। जो तरीका भावे साहब ने बतलाया है, उस तरीके से तो हमेशा वह पार्टी जीतेगी, जिस पार्टी के पास ज्यादा पैसा है । लेकिन जो तरीका मैंने आपको बतलाया है, उससे वह पार्टी भी जीत सकती है, जिसके पास पैसा नहीं है लेकिन पास लोग हैं, जो सच के लिए तकलीफ उठा कर करोड़ों का मन बदल देती है, और अपनी तरफ खीच लेते हैं। यह एक मोटी-सी बात है। मुझसे कई दफे यह पूछा जाता है कि सिविल नाफरमानी कब तक चलेगी? इसका जवाब देना मुश्किल है कि अगले दो-चार छ: महीनों में कामयाबी मिलेगी या नहीं मिलेगी। और यह जवाब कुछ गैरजरूरी भी है, क्योंकि असली बात यह नहीं है कि अब जो सिविल नाफरमानी का खातमा किस तरह होगा; वह सफल होती है या असफल होती है। असली बात यह है कि करोड़ों लोगों पर इस सिविल नाफरमानी का क्या असर पड़ता है। उनके दिलोदिमाग किस तरह बदलते हैं, और क्या वे ऐसा बदलते हैं कि कम-से-कम दो-चार वर्ष के बाद वह सच्चाई का साथ दे सकें। जिसकी वजह से मौजूदा सरकार की ताकत कमजोर पड़े, और झक मार कर अपने रास्ते को बदले, नहीं तो यह करोड़ों लोग इस सरकार को बदलें। असली कसौटी तात्कालिक सफलता नहीं है। असली कसौटी है, करोड़ों लोगों के मन-परिवर्तन की। अगर किसी सिविल नाफरमानी के साथ लाखों लोगों की मदद हो गयी, तो फिर तात्कालिक सफलता भी मिल सकती है। अच्छा तो यह हो कि हिन्दुस्तान में सिविल नाफरमानी ऐसे ढंग की हो कि सिर्फ 100-50 आदमी सिविल नाफरमानी नहीं करें, बल्कि उनके साथ हजारों लोग, 10-20-50 हजार लोग चलें । और समय आने पर सबके साथ सत्याग्रही बन जमीन पर बैठ जाएं। सब-के-सब पुलिस से कहना शुरू कर दें कि या तो हमारी मांगें सरकार स्वीकार करे या हम सबको गिरफ्तार करे या मारे। ऐसी हालत जिस दिन हो जाएगी, उस दिन तो आखिरी फतह है ही। वह हालत आज नहीं है। इसीलिए तो जगह-जगह पर सिविल नाफरमानी करनी पड़ती है। लोग अक्सर मुझसे यह पूछा करते हैं कि इस सिविल नाफरमानी का तो जनता पर कोई असर नहीं पड़ता। सोशलिस्ट पार्टी के तो आदमी गिरफ्तार होते हैं, लेकिन जनता में से तो दस-बीस हजार आदमी नहीं निकलते जो भीड़ बना कर, बड़ी-बड़ी सभाएँ कर के और जुलूस निकाल कर उस सिविल नाफरमानी का साथ दें। मेरा जवाब बिलकुल साफ है कि अगर यही हो जाता, तो इतनी तकलीफ उठाने की क्या जरूरत है। तकलीफ उठाने की जरूरत तो इसीलिए है कि कभी यह हालत पैदा हो । लाखों की तादाद में जगह-जगह पत्थरबाजी करने या भगदड़ करने के लिए तो जनता तैयार हो गयी है। भगदड़ करने वाली जनता को पहले से यह फैसला नहीं करना पड़ता है कि उसे साल-छह महीने की तकलीफ उठानी है। सिविल नाफरमानी में आदमी को फैसला करना पड़ता है कि साल छह महीने की तरह बात उठानी है। भगदड़ वाली तैयारी से कभी मन की कमजोरी नहीं खत्म होती। अगर 4 लाख आदमियों ने भी सिविल नाफरमानी की, यानी जेल की, लाठी की तकलीफ उठाने को तैयार हो गये, तो बिलकुल तय बात है कि हिन्दुस्तान में ऐसी सरकार का रहना नामुमकिन हो जाएगा, जो अनाचार और अत्याचार करे, जिसका प्रधान मंत्री अपने ऊपर तो रोज बीस हजार रुपया खर्च करे, और गरीबों के लिए चीनी और कपड़े पर बढ़ते हुए और असह्य टैक्स लगाये। यह नामुमकिन हो जाएगा। सिविल नाफरमानी के इस सिद्धान्त को हिन्दुस्तान की जनता को समझना है। मैं तो खुश होता अगर सोशलिल्टों में इतनी ताकत रही होती कि वे हमेशा का सत्याग्राह चलाते; सत्याग्रह निरन्तर चलता रहता। एक तरफ जिस तरह सरकार अपनी बेईमानी अत्याचार और फिजलखर्ची चलाती रहती है दूसरी तरफ जनता की ओर से चाहे 10-15 आदमी ही क्यों न हों। रोज कानून तोड़ते रहते और जल जाते रहते। में बड़ा खुश होऊँगा अगर कोई ऐसा दिन आ गया हिन्दुस्तान में । शायद आएगा भी और वह बहुत अच्छा दिन होगा। आज अभी उतनी ताकत नहीं है इसीलिए जरूरी हो जाता है कि छोटे अरसे के यह सत्याग्रह चलें। आखिर हिन्दुस्तान बहुत बड़ा 'मुल्क है। 15 सूबे हैं। जिस तरह कोई दौड़ में पुरानी दुनिया और नयी दुनिया की दौड़ में एक दौड़ाक थकता है तो दूसरा आता है और फिर तीसरा आता है, कुछ रिले रेस जैसी होती हैं। तो अगर हिन्दुस्तान में सत्याग्रह और सिविल नाफरमानी की रिले होने लग जाए; जैसे उत्तर प्रदेश जब थका या उसके रुकने के पहले तमिलनाडु ने शुरू कर दिया। तमिलनाडु में सिविल नाफरमानी चलती रही और जब उसके रुकने का वक्त आया तब तक आन्ध्र प्रदेश में शुरू कर दिया और ऐसा ही क्रम चलता रहे। चलते-चलते शायद...हिन्दुस्तान में ऐसी हालत पैदा हो कि हिन्दुस्तान के करोड़ों लोग एक साथ ही एक मर्तबा उठें। तकलीफ तो आज भी उठा रहे हैं, घर चूल्हा तक भी ठीक नहीं जल पाता; बच्चों की तालीम अच्छी नहीं हो पाती; इससे बढ़ कर क्या तकलीफ हो सकती है। लेकिन यह तकलीफ आदमी की खुद बुलायी हुई नहीं है। इस तकलीफ को सरकार ने और दूसरे लोगों ने उन पर थोपा है। दोनों में बड़ा फर्क होता है। एक तकलीफ तो वह है जिसे हमें सरकार और समाज की बदमाशियों के खिलाफ लड़ने से हमें खुद अपनी इच्छा से उठानी पड़ती है। जब हिन्दुस्तान की जनता लाखों की तादाद में इस दूसरी किस्म को तकलीफ को उठाने के लिए तैयार हो जाएगी, तब सफलता होगी।