अक्टूबर 2019

गांधी : एक महान मानवतावादी

सी.बी. रमण

(गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बाद सी.बी. रमण दूसरे और विज्ञान के क्षेत्र के पहले ऐसे भारतीय थे, जिन्हें अपने भौतिकी के अन्वेषण पर नोबेल पुरस्कार मिला था। आइन्स्टीन की परम्परा के एक महान वैज्ञानिक ने गांधी पर जो सोचा, वह यहां है)

तनाव के दिनों में मानवीय व्यवहार मौसम-विज्ञान के कई दृष्टांत उपस्थित करता है। सचेत प्रत्यवलोक खाड़ी में बनते अवनमन को देखकर यह चेतावनी दे देता है कि तूफान उठ रहा है और किनारे की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन स्थान और समय के बारे में प्रत्यवलोकक की चेतावनी चाहे कितनी ही सही क्यों न हो, उत्पाद को रोकने या टालने और उससे होने वाली हानि को कम करने के लिए विशेष कुछ नहीं किया जा सकता। पिछले कतिपय महीनों में घटने वाली घटनाएं भी वास्थर में हमारे देश की छाती पर चलने वाले अंधड़ की तरह हैं, जो अपने पीछे इन्सानी जिन्दगी और बर्बाद खुशहाली के खंडहर छोड़ गए हैं। इस खेदजनक दौर की चरम सीमा हमारे बीच से कुछ दिन पहले एक ऐसे व्यक्ति का चला जाना है, जिसने अपने महान मानवीय गुणों से और मानव-कल्याण के निमित्त अपनी अपूर्व निष्ठा से अपने समकालीनों की दृष्टि में अपने लिए एक अनुपम स्थान बना लिया था। मेरी समझ में इतिहास के फैसले की पूर्व कल्पना करने और महात्मा गांधी के जीवन तथा शिक्षाओं का स्वयं हमारे देश या एशिया या विश्व के भविष्य पर प्रभाव आंकने की कोशिश करने में कोई संगति नहीं है। यह सब भविष्य की ओट में है। लेकिन यदि हमें जो उनके द्वारा स्वतंत्र कराए गए भारत के निवासी हैं, अपने भाग्य पर कोई भी विश्वास है, यदि हममें वर्तमान उथल-पुथलों पर विजय पाने की क्षमता है और यदि हम में अपने लिए एक महान भविष्य का निर्माण करने की शक्ति है, तो निस्संदेह महात्मा गांधी के जीवन-कार्य और भारत के एक बार फिर स्वतंत्र देश के रूप में सामने आने में उसके भाग को हम कभी नहीं भुला सकते। स्वयं मेरे सक्रिय जीवन के गत चालीस वर्ष एक ऐसे कार्य क्षेत्र में लगे रहे हैं, जो स्वाधीनता-संग्राम से, जो भारत में उस समय पूरे जोर पर था, खासा कटा हुआ था। मैंने उस संघर्ष में कोई सक्रिय भाग नहीं लिया और न मैंने उसमें संलग्न नेताओं से सम्बन्ध ही स्थापित करने की कोशिश की, लेकिन महात्माजी उन सब व्यक्तियों से, जिनसे मेरा कभी भी परिचय हुआ, स्पष्ट रूप से इतने भिन्न थे कि जब कभी मैंने उनके दर्शन किये, उनसे मुलाकात की या उनकी वाणी सुनी, वह अवसर मेरे मस्तिष्क पर अच्छी तरह से अंकित हो गया और ऐसा अनेक बार हुआ। पहला अवसर था, 1914 का नाटकीय दृश्य, जब हिन्दू विश्वविद्यालय के शिलान्यास-समारोह के अवसर पर उन्होंने बनारस में एकत्र विराट सभा में भाषण दिया था। उस विराट समुदाय ने बड़े ध्यान से उनकी उस भर्त्सना को सुना जो उन्होंने रजवाड़ों की खुली फिजूलखर्ची की जिन्दगी और अपने इलाकों में रहने वाली जनता की अवहेलना के लिए की। इस प्रकार झाड़े जाने वाले रजवाड़ों में से कई वहां मौजूद भी थे। उनमें से सभी इस भर्त्सना के लायक थे या नहीं, यह विवाद का विषय हो सकता है, लेकिन उनमें से प्रत्येक ने स्वाभाविक रूप से उनके कथन का बुरा माना और सभा-भवन से उठकर चले गए। उनके पीछे-पीछे डॉक्टर एनी बीसेन्ट भी, जिन्होंने उनकी क्षत भावनाओं को शांत करने की व्यर्थ चेष्टा की, चली गई। जैसे-जैसे समय गुजरता गया और जीवन और उसकी समस्याओं पर गांधीजी की शिक्षाएं अधिक प्रचलित होती गर्इं, देशवासियों पर उनका प्रभाव तेजी के साथ बढ़ने लगा और शीघ्र ही यह हर किसी को साफ हो गया कि स्वतंत्रता के इस महान संघर्ष में वे भारत के सबसे बड़े नेता थे। यह भी ज्यादा से ज्यादा साफ होता गया कि उनके प्रभाव का रहस्य यह था कि उनका दृष्टिकोण मूलत: मानवतावादी और व्यावहारिक था। दूसरे शब्दों में वे मानव-जीवन और मनुष्य के सुख के अभिलाषी थे और विज्ञान या अर्थशास्त्र या राजनीति जैसे मानव-स्पन्दनरहित माने जाने वाले विषयों में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। उनके इस दृष्टिकोण ने स्वाभाविकतया उन्हें जन-साधारण का प्रिय बना दिया; चाहे यह बात उन लोगों को, जिनके दिमागों में ये विषय सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक ऊंचा स्थान रखते हैं, बहुत अच्छी न लगी हो। इनमें कोई संदेह नहीं कि गांधीजी के उत्सर्ग पर संसार के हर कोने में जो स्वेच्छित श्रद्धांजलियां उन्हें अर्पित की गई हैं, वे वास्तव में महात्मा गांधी के अपने मूलभूत मानवतावाद की स्वीकारोक्ति हैं, जिसने देश, विचार और जाति की सीमाओं को लांघ दिया गया था। भूतकाल में एशिया ने ऐसे अन्य महान मानवतावादियों को जन्म दिया है, जिनका जीवन मानवता के जीवन और मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ गया है। मैं इस बात को दोहराता हूं कि कोई व्यक्ति इतिहास के फैसले की पूर्व कल्पना नहीं कर सकता। फिर भी यह सत्य है कि इतिहास कभी-कभी अपने को दोहराता है और इस संबंध में भी यह बात सत्य हो सकती है।