अक्टूबर 2019

प्रजातंत्र, कानून और सविनय अवज्ञा

आचार्य कृपलानी

गाँधी जी ने यहाँ तक कहा कि सविनय अवज्ञा प्रत्येक नागरिक का जन्मसिद्ध अधिकार है। उनकी मान्यता है, "किसी विशेष एक्ट या कानून की सविनय अवज्ञा के औचित्य पर सवाल उठाया जा सकता है। उसमें सावधानी बरतने और देरी करने की सलाह दी जा सकती है। किन्तु इसके अधिकार के औचित्य पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। यह तो जन्मसिद्ध अधिकार है और आत्म-सम्मान को तिलांजलि दिये बिना इसका समर्पण सम्भव नहीं है।

प्रजातन्त्र में सत्याग्रह के स्थान को लेकर समाचार पत्रों और लोगों में काफी बहसें हुई हैं। कांग्रेस सरकारों का कहना है कि यह शस्त्र, प्रजातंत्रीय तरीके से जनता के वोट के नाम पर सत्तारूढ़ शक्तियों के विरुद्ध काम में नहीं लाया जाना चाहिए । इस तर्क को विरोधी दलों के द्वारा स्वीकृत नहीं किया गया है। जब तक कम्युनिस्ट केरल में सत्तारूढ़ नहीं हुए थे तब तक उन्होंने भी इसे नहीं माना था । आज कम्युनिस्ट और उनकी केरल-सरकार काँग्रेस तक को पेश करने लगी हैं कि सविनय अवज्ञा प्रजातंत्रीय तरीके से चुनी हुई सरकार के खिलाफ वैधानिक और कानूनी दृष्टि से न्यायपूर्ण नहीं कही जा सकती। वह गलत है और अनुचित है। इसलिए इस विषय पर गाँधीजी के विचारों का मनन करना उपयोगी होगा, क्योंकि यह विचार उन्होंने दिया और अन्याय से लड़ कर गलतियों को इस अहिंसात्मक पद्धति द्वारा तरीका भी उन्होंने विकसित किया। गांधीजी ने अपने विशाल लेख-भंडार में कहीं भी यह नहीं कहा है कि प्रजातंत्रीय पद्धति से बनी हुई सत्ता के विरुद्ध सविनय अवज्ञा का उपयोग नहीं किया जा सकता । यदि उन्होंने ऐसा कहा होता तो आश्चर्य की बात होती । गाँधीजी ने कभी इस बात पर विश्वास नहीं किया कि बहुमत सदा सत्यमत ही होता है। उन्होंने व्यक्ति के विवेक को-उसकी अन्तरात्मा को सबसे बड़ी जगह दी। किन्तु उसे भी उन्होंने अचूक नहीं माना, इसीलिए उस पर अहिंसा की शर्त लगायी। यदि व्यक्ति अथवा समूह हिंसा या जबरदस्ती का प्रयोग न करें, और कानून को तोड़ने के वैध और अन्य परिणामों को खुशी से भोगने के लिए तैयार हों, तो वह जिस बात को सही समझते हैं उसके लिए ऐसा उपाय काम में ला सकते हैं। किन्तु सही क्या है, इसे कौन तय करे ? यह गाँधीजी का दो-टूक उत्तर है: प्रश्न-कोई व्यक्ति सत्य की खोज में चाहे जितनी प्रामाणिकता के साथ क्यों न बढ़े, दूसरों से उसका सत्यविषयक विचार भिन्न हो सकता है। तब सत्य का निर्णय कौन करे ? गाँधी जी-स्वयं व्यक्ति ! प्रश्न-क्या सत्य की प्रामाणिक खोज हमेशा अलग-अलग होती है ? गाँधीजी-हाँ, हसीलिए तो उसे अहिंसा में जोड़ा गया है। गाँधी जी ने इस बात को माना था कि शासन की कोई भी पद्धति चाहे वह देशी हो, चाहे विदेशी, निरंकुश हो या प्रजातंत्रीय, खराब हो सकती है। वे जानते थे कि जनतंत्री ढांचे में भी शासन तानाशाही ढंग का हो सकता है, अर्थात् वह भ्रष्ट और हद दरजे का केन्द्रोमत हो सकता है। ऐसी हालत में वह व्यक्ति की स्वतन्त्रता को कुचलने वाला बन जाता है । ऐसी परिस्थिति में गांधीजी ने व्यक्ति की अन्तरात्मा को सर्वश्रेष्ठ माना, बशर्ते कि व्यक्ति अपने भीतर के सत्य का साक्षात्कार करने में प्राप्त कष्टों को सहन करने के लिए तैयार हो । गाँधी जी का यह भी कहना था कि इसी तरह संसार ने उन्नति की है। वे कहते हैं, "जब दानियल ने अपनी आत्मा को अप्रिय लगने वाले मिडाज और फारस के कानूनों की अवहेलना के फलस्वरूप मिलने वाले दंड को विनयपूर्वक सहन किया, तब उसने सत्याग्रह किया था। सुकरात ने जिस बात को सत्य की तरह जाना उसका प्रचार करने से वह पीछे नहीं हटे और वीरता के साथ मृत्यु स्वीकार की । दानियल और सूकरात अपने-अपने राज्यों के आदर्श नागरिक माने जाते हैं। गांधी जी ने सत्याग्रह को आगे विशुद्ध और अचूक शस्त्र कहा है। वे कहते हैं, "मेरा विश्वास है कि भ्रमपूर्ण उद्देश्य को पूरा करने के लिए भी यदि शुद्ध शस्त्र का उपयोग किया जाए तो उससे भी कोई न कोई अच्छा परिणाम प्राप्त हो जाता है।" वे फिर कहते हैं, "सविनय अवज्ञा को रोकना अन्तरात्मा को जकड़ना है।’’ क्या प्रजातंत्रीय शासन के विरुद्ध सविनय अवज्ञा का उपयोग किया जा सकता है ? यदि प्रजातंत्रीय शासन में भ्रष्टता की गुंजाइश न होती या वह किसी व्यक्ति की आत्मा को कभी न दुखाता तो उत्तर नकारात्मक हो सकता था। किन्तु जीवन और इतिहास के तत्व ऐसे नहीं हैं। इस बात पर गांधी जी का उत्तर स्पष्ट है, "मैं असहयोग को सार्वलौकिक उपयोग की चीज मानता हूँ। यदि राजनीति में उसे ढंग से लागू किया जाए तो वह परस्पर विनाश के जंगली तरीकों को उनकी जगह से हटा सकता है। इसलिए उसका उपयोग सीमित नहीं करना है, बल्कि विस्तृत करना है। उसके गलत उपयोग का जोखिम तो उठाना ही पड़ेगा।" किन्तु इसके साथ ही गाँधी जी कहते हैं, "बिना बड़े खतरों को उठाये कोई जबरदस्त या गतिशील कदम लेना सम्भव नहीं है और फिर यदि जीवन में बड़े-बड़े खतरे न आएँ तो जीने का मजा ही क्या है।" इसलिए यदि कोई अवसर इस तरह का आता तो वे अपने ऊपर और अपने द्वारा चलाये जाने वाले राष्ट्र के ऊपर जोखिम ले लेते थे । उनका सारा जीवन जोखिमों से भरा हुआ था। फिर भी उनका कहना है कि भले प्रकार से व्यवस्थित समाज में सत्याग्रह के बहुत कम मौके आएँगे । वे कहते हैं, "सुव्यवस्थित राज्य में सविनय अवज्ञा का अवसर कदाचित् ही उत्पन्न होता है। किन्तु जब ऐसा अवसर आ जाता है, तब उसे एक कर्तव्य ही समझना चाहिए । जो अपने सम्मान अर्थात् अन्तरात्मा को सर्वोच्च स्थान देता है, वह इस कर्तव्य का पालन करते हुए आगा-पीछा नहीं कर सकता।" दुर्भाग्य से आज विकास और कम-विकास के तमाम स्तरों पर प्रजातंत्र के सभी सम्भव-प्रकार उपस्थित हैं। स्वतन्त्रता पूर्वक जनता द्वारा सत्तारूढ़ कोई सरकार, सम्भव है कि अपने को शाश्वत बना ले, निश्चित अवधि के बाद चुनाव और वोट के तमाशे के बाद यह भी सम्भव है कि सत्ता तानाशाही हो। नाजी और कम्युनिस्ट शासनों का उदाहरण हमारे सामने हैं। भारत में प्रजातंत्रीय वोट के बाद केरल में कम्युनिस्ट सत्तारूढ़ हुए और उन पर यह आरोप है कि वह प्रजातन्त्र को बर्बाद करने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए गाँधी जी ने प्रजातन्त्र का नाम नहीं लिया बल्कि सुव्यवस्थित राज्य की बात की; और सुव्यवस्थित राज्य के बारे में भी उन्होंने यह कहा कि वहाँ भी सविनय अवज्ञा आत्मनिष्ठ नागरिक के लिए कर्तव्य बन सकती है। अपनी बात को और अधिक स्पष्ट करने के लिए गाँधी जी ने लिखा, "सविनय अवज्ञा" हर नागरिक का जन्मसिद्ध अधिकार है। मैं चाहता हूं कि इसे हर आदमी समझे। क्योंकि जो इस अधिकार को छोड़ देता है वह मानवता को छोड़ देता है। गाँधी जी ने यहाँ तक कहा कि सविनय अवज्ञा प्रत्येक नागरिक का जन्मसिद्ध अधिकार है। उनकी मान्यता है, "किसी विशेष एक्ट या कानून की सविनय अवज्ञा के औचित्य पर सवाल उठाया जा सकता है। उसमें सावधानी बरतने और देरी करने की सलाह दी जा सकती है। किन्तु इसके अधिकार के औचित्य पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। यह तो जन्मसिद्ध अधिकार है और आत्म-सम्मान को तिलांजलि दिये बिना इसका समर्पण सम्भव नहीं है। गाँधी जी ने आगे लिखा है, "जब कोई राज्य विधि-विधानरहित या भ्रष्टाचारी हो जाता है ये दोनों एक ही है- तब सविनय अवज्ञा एक पवित्र कर्तव्य बन जाती है और जो ऐसे राज्य के साथ लेन-देन करता है उसके भ्रष्टाचार और उसकी उच्छंखलता में हिस्सेदार बन जाता है। गाँधी जी ने और भी कहा है, "यदि सविनय अवज्ञा के लिएउचित वातावरण उत्पन्न कर लें तो वह हमारी सब बुराइयों पर रामबाण बन सकती है। व्यक्तियों की हद तक वह वातवरण तब तक है ही, जब तक उसकी सविनय अवज्ञा खून खराबी को जन्म नहीं देती...." ऐसी अवस्था में भी ऐसा अवसर आ सकता है जिसकी किसी भी कीमत पर उपेक्षा करना सम्भव नहीं है। ऐसे अवसर की पुकार जब नास्तिकता का पर्याय बन जाए, तब सविनय अवज्ञा एक अनिवार्य कर्तव्य हो जाती है। "जब कोई सत्ता राष्ट्रीय तंतुओं को नुकसान पहुंचाने की हद सक गललियाँ करने लगे, तब तक यह प्रजा का अधिकार है, सच कहूं तो वह कर्तव्य है कि उस समय प्रजा सरकार को राष्ट्रीय इच्छा के आगे झुकने पर सविनय अवज्ञा द्वारा बाध्य करे। गांधी जी का मत था कि संसार की कोई भी अत्याचारी सत्ता उसके अपने शिकारों के सक्रिय या निष्क्रिय सहयोग के बिना नहीं चल सकती। यदि लोग वीरता और निर्भयता के साथ ऐसी सत्ता की मांगों का मुकाबला करें और उसे अपना सहयोग न दें तो वह मुंह के बल गिर पड़ेगी। इसीसिए उनका कहना था कि निरंकुशता का उपाय दलित के हाथ में है। उनकी कल्पना का सत्याग्रह आन्दोलत आत्म-शुद्धि का आन्दोलन है। उनके मतानुसार प्रत्येक सुधार का पालन स्वयं अपने से होना चाहिए। वे कहते हैं, तुम जब किसी शासन की मरजी के मुताबिक उसके हुक्मनामे हुए चलते हो तब तुम उसे बहुत कारगर मदद पहुंचाते ही। कोई भी बुरा शासन ऐसी आज्ञाकारिता का पात्र नहीं है : इसलिए अच्छा आदमी अपनी सारी शक्ति लगा कर इस पद्धति या शासन की मुखालिफत करेगा...सविनय अवज्ञा सबसे अधिक उपयोगी, यहाँ तक कि एकमात्र औषधि है और जिसे बुराई से असहयोग करना है, उनके लिए वह अनिवार्य है।" गाँधी जी शब्दों को बहुत सोच-समझ कर काम लाते थे। उन्होंने केवल राज्य-सत्ता को बरी पद्धति की बात नहीं की है। बुरी शासन की बात नहीं की है राजसत्ता की अच्छी पद्धति भी खराब और भ्रष्ट शासन के कारण बुरी बन सकती है। प्रजातंत्र भी बुरी तरह चलाया जा सकता है। भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों में जो मतभेद आज है, वह प्रजातंत्र के आदर्श को ले कर नहीं, क्योंकि वह तो सब को मान्य है। मतभेद इस बात को ले कर है कि यह तंत्र केरल में कम्युनिस्टों द्वारा और दूसरी जगहों में किस तरह चलाया जा रहा है। गाँधी जी का विचार था कि सत्याग्रह अपनी पत्नी, बच्चों शासकों, गाँव-पड़ोस के निवासियों, यहाँ तक कि दुनिया के खिलाफ भी किया जा सकता है। सत्याग्रह सार्वलौकिक शक्ति है और सार्वलौकिक शक्तियाँ परिचित, अपरिचित, बूढ़े और जवान, स्त्री और पुरुष-इस तरह का भेद नहीं मानतीं। गांधी जी के इस कथन में कोई व्यक्ति समूह अथवा सरकार गलती कर सकती है और तब गाँधी जी के विचार से सब से अच्छा उपाय सविनय अवज्ञा ही हैहिंसा या जबर्दस्ती नहीं। अक्सर कहा जाता है कि सविनय अवज्ञा अवैधानिक नहीं है। गाँधी जी का निश्चित मत था कि सविनय अवज्ञा अवैधानिक नहीं है। जब तक सत्याग्रह करने वाले व्यक्ति, एक या अनेक, अहिंसा का पालन कर रहे हैं और अपनी अवज्ञा के बदले में दी गयी सजा को सहर्ष स्वीकार करते हैं, तब तक वह अवैधानिक नहीं है। कोई भी विधान, यदि वह सचमुच लोकतंत्रीय विधान है व्यक्ति के आत्म-सम्मान आचरण के अधिकार को अमान्य नहीं कर सकता है, बशर्ते कि वह आचरण अन्य नागरिकों के अधिकारों पर चोट नहीं पहुँचाता, वह अहिंसक है और वैसा आचरण करने वाला व्यक्ति अपनी अवज्ञा के परिणामों को स्वीकार करने के लिए तैयार है। गाँधी जी आगे चल कर कहते हैं कि सविनय अवज्ञा, कानून की अवज्ञा नहीं है बल्कि एक ऊँचे दर्जे के कानून की परिपूर्णता के लिए किया गया प्रयत्न है। सुकरात ने जब अपनी बात के प्रचार को रोकने से इनकार कर दिया तब उसने कानून तोड़ा । जब उसने इस अपराध के लिए किये गये जुर्माने को देने से इनकार कर दिया तो यह ठीक है कि उसने तत्कालीन वैधानिक सत्ता को मानने से इनकार कर दिया। किन्तु इस अवज्ञा का अन्तिम परिणाम, जहर का प्याला उसने स्वीकार किया। और इस प्रकार इतिहास की जानकारी में पहला सत्याग्रही हुआ। "दि टिरेनी आफ दि थर्टी" के बाद एयेन्स में जो नया प्रजातन्त्र कायम हुआ था, सुकरात ने इस प्रकार से उसका विरोध किया था। सुकरात कानून को मानने वाला या तोड़ने वाला नागरिक था, इस प्रश्न का उत्तर प्लेटो के संवादों में दिया गया है। संक्षेप में सुकरात ने अपनी स्थिति कुछ ऐसी मानी । वह कानून तोड़ता है, फिर भी वह अपने को कानून का गुलाम मानता है। उसने और उसके बच्चों ने कानून से प्राप्त सुरक्षा से लाभ उठाये हैं। वह यह भी मानता है कि कानून के मातहत रहने पर वह राजी था । कानून से बराबरी का दावा उसका नहीं था। जाहिर तौर पर कानून की अवज्ञा और फिर भी अपने को उसके मातहत मानना, ये दो चीजें परस्पर-विरोधी हैं, किन्तु सुकरात की निगाह में इन दोनों बातों में कोई विरोध नहीं है, केवल विरोधाभास है । कानून तोड़ते हुए सुकरात सोचता है कि वह कोई कानून नहीं तोड़ रहा है क्योंकि १. वह एक उच्चतर नियम के अनुसार चल रहा है । यह उच्चतर नियम उसे उसकी आत्मा ने सुझाया है। आत्मा के सुझाये गये उच्चतर नियम विधान के निकट आदर के पात्र हैं, भले ही कानूनी रूप से वे दंड के पात्र हों। २. कानून, सविनय, अहिंसात्मक ढंग से तोड़ा गया है, और ३. कानून तोड़ने वाला सहर्ष उसके पूरे परिणाम को भोगने के लिए तैयार है। "एपॉलाजी" में अपनी वकालत करते हुए सुकरात ने सिद्ध किया है कि वह राज्य का देश भक्त और नेक नागरिक है । वह कहता है "एथेन्स के लोगों, मैं तुम्हारा आदर करता हूँ, मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ, किन्तु तुम्हारे मुकाबिले में मैं ईश्वर की आज्ञा मानना पसन्द करूँगा और इसलिए जब तक जीवित हूँ, दर्शन की शिक्षा और उसके अनुसार आचरण की बात करने से बाज नहीं आऊँगा।" उसने राज्य के लिए क्या-क्या किया है, कितनी बार जान पर जोखिम उठाये हैं, यह भी उसने कहा । इस तरह उसने बताया कि एक नेक नागरिक देश के नियमों और देश के नियामकों के प्रति स्नेह और आदर रख कर भी उनकी अवज्ञा करने पर बाध्य हो सकता है। क्योंकि उसे कोई उच्चतर आदर्श, कोई गौरवपूर्ण विचार, वैसा करने के लिए प्रेरित कर रहा है। नीटो नामक पुस्तक में, जब सुकरात ने जजों की आज्ञा नहीं मानी, जब उसने अपनी बात का प्रचार बन्द करने से इन्कार कर दिया, तब कानूनों ने सुकरात को नहीं धिक्कारा। जब उसने जुर्माना देने से इन्कार किया, तब भी कानूनों ने उसे दोष नहीं दिया। किन्तु जब ने जेल से भाग जाने की बात सुझायी, तब कानूनों ने उसे लथेड़ा। अवज्ञा के पहले दो प्रकार के सविनय हैं: क्योंकि वह उस अवज्ञा के परिणाम भुगतने के लिए तैयार है। किन्तु जेल से भागना तो कानूनों से फौजदारी करना हुआ। भाग जाने की जो सजा है, उसके परिणाम को भोगने के लिए वह तैयार नहीं है, यही उसका अर्थ हुआ। अगर तैयार होता तो वह दिन-दहाड़े सबके सामने जेल से निकलने की कोशिश करता; इतना ही नहीं, जाते समय अगर आसपास कोई न होता, तो वह लोगों का ध्यान आकर्षित करता और अगर वह वैसा करता तो फिर उस प्रयत्न का कोई अर्थ नहीं था क्योंकि उसे जाने नहीं दिया जाता और मिलने वाली सजा में भागने की सजा भी जोड़ी जाती। भागना भी कानून के खिलाफ है और इसकी सजा है। क्रीटो यह नहीं चाहता था। क्रीटो सोचता था कि स्वतंत्रता पाने के लिए अधिकारियों को धोखा दिया जाए। किसी को भी धोखा दे कर अवज्ञा करना, सविनय अवज्ञा नहीं है, वह राज्य और विधान को तहस-नहस करने वाली चीज है। यीशु ख्रीस्त के जीवन में भी यही बात स्पष्ट होती है। जब मंदिर के अधिकारियों ने उन पर कानून भंग करने का दोष लगाया तो उन्होंने कहा कि मेरा जन्म कानून को पालने के लिए हुआ है, तोड़ने के लिए नहीं । ईसा की निगाह में तत्कालीन धर्म के अनेक कानून तोड़ने और इस प्रकार उसे परिपूर्ण बनाने में कोई विरोध नहीं था। कई बार ऐसा होता है कि जब हम किसी कानून के ऊपरी आवरण को तोड़ते हैं तभी उसकी आन्तरिक अच्छाई का आविष्कार करते हैं। इस प्रकार नियम अलौकिक बनाये जाते हैं। किसी लौकिक नियम को अलौकिक बनाने का मतलब उसको सीमा तोड़ कर उसे असीम बनाना है। उसकी आत्मा को निखारना है। लकीर पर फकीर होने से, नियम के शब्दों को पकड़े रहने से नियम का पालन नहीं होता, उल्लंघन होता है । "शब्द मारता है, शब्द की आत्मा मारती है। आधुनिक काल में व्यक्ति के विवेक के अधिकार को अक्षुण रखने के लिए थोरो, इमर्सन और टाल्सटाय ने सविनय अवज्ञा का पक्ष लिया है। "सिविल डिस ओबिडियंस" नामक अपने पत्रक में थोरो ने लिखा है, "क्या एक क्षण के लिए छोटे-से-छोटे अंश में भी नियम बनाने वाले के मुकाबले में अपने विवेक या आत्मा की पुकार की उपेक्षा करना उचित है? हर आदमी के पास विवेक किसलिए है? मेरे विचार से हमें पहले व्यक्ति होना चाहिए, उसके बाद प्रजा । कानून के प्रति आदर की आदत डालना अच्छी बात नहीं है; सत्य के प्रति आदर की आदत होनी चाहिए। यह काफी है कि कारपोरेशन, सभा, समिति या राज्य का विवेक नहीं होता।" आगे चल कर थोरो ने लिखा है कि जब किसी राज्य का अत्याचार बढ़ जाए और उसका शासन-कौशल असहनीय रूप से अव्यवस्थित हो जाए, तब उसका विरोध करना चाहिए । थोरो का एक वाक्य अमर हो गया है। "जिस राज्य में एक भी व्यक्ति अन्यायपूर्वक बन्दी बनाया जा सकता है, ऐसे राज्य में न्यायप्रिय व्यक्ति के लिए जेल ही उचित स्थान है।