अक्टूबर 2019

गांधी : एक ज्वलन्त ज्योति

सरोजिनी नायडू

भारत कोकिला महान कवयित्री एवं स्वतंत्रता सेनानी सरोजिनी नायडू गांधी की आत्मा के साथ जुड़ी थीं। बापू के साथ उन्होंने आ़जादी का संघर्ष किया था। एक प्रखर वक्ता के रूप में उनकी वाणी सुनकर अंग्रेजी सरकार भी स्तब्ध रह जाती थी। गांधी पर यह लेख उनकी आत्मा के प्रकाश से उद्भूत हुआ।

अपना पथ-निर्देश, अपना प्यार, अपनी सेवा और प्रेरणा देते रहने के लिए अपने देशवासियों की पुकार और दुनिया की आवाज के जवाब में भूतकाल में मसीह की भांति तीसरे दिन वे फिर से अवतरित हो उठे हैं और यद्यपि आज हम, जो उन्हें प्रेम करते थे, उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते थे और जिनके लिए शोक प्रकट कर रहे हैं, आंसू बहा रहे हैं और दु:खित हो रहे हैं, तथापि मैं समझती हूं कि आज, जब अपनी मृत्यु के तीसरे दिन वे अपनी ही भस्म से एक बार फिर अवतरित हुए हैं, शोक मनाना समयानुकूल नहीं है और आंसू बहाना असंगत है। वे, जिन्होंने अपने जीवन, आचरण, त्याग, प्रेम, साहस और निष्ठा से संसार को सिखाया है कि यथार्थ वस्तु आत्मा है, शरीर नहीं और आत्मा की शक्ति संसार की सारी सेनाओं की संयुक्त शक्तियों से, युगों की संयुक्त सेनाओं की शक्ति से अधिक है, कैसे मर सकते हैं? जो इतने छोटे, दुर्बल और धनहीन थे, जिनके पास अपना तन ढंकने के लिए समुचित वस्त्र भी न थे, जिनके पास सूई की नोंक-बराबर जमीन तक न थी, वे हिंसा की शक्तियों से, संसार की ताकत से और संसार में जूझती शक्तियों की भव्यता से इतने अधिक शक्तिशाली कैसे थे? क्या कारण है कि यह छोटा-सा, नन्हा-सा, बच्चे-से शरीरवाला आदमी जो इतना आत्मत्यागी था और स्वेच्छा से इसलिए भूखा रहता था कि गरीबों के जीवन से ज्यादा पास रह सके, वह सारे संसार पर (उन पर जो उनका आदर करते थे और उन पर जो उनसे घृणा करते थे) ऐसी सत्ता कैसे रखते थे, जैसी कि बादशाह भी कभी न रख सके? यह इसलिए था कि उन्हें प्रशंसा की चाह न थी, निन्दा की परवाह न थी। उन्हें केवल सत्य-मार्ग की परवाह थी। उन्हें केवल उन्हीं आदर्शों की चिन्ता थी, जिनकी वह शिक्षा देते थे और जिन पर वह स्वयं चलते थे। मनुष्य के लोभ और हिंसा से जनित बड़ी-से-बड़ी दुर्घटनाओं के समय भी, जब सारे संसार की निन्दा का रणभूमि में झड़ी पत्तियों और फूलों की भांति ढेर लग जाता था, अहिंसा के आदर्श में उनकी निष्ठा नहीं डिगी। उनका विश्वास था कि चाहे सारा संसार अपना वध कर डाले, चाहे सारे संसार का लहू बह जाए, लेकिन फिर उनकी अहिंसा संसार की नयी सभ्यता की वास्तविक नींव बनेगी। उनकी मान्यता थी कि जो जीवन के फेर में पड़ा रहता है, वह उसे खो देता है और जो जीवन का दान करता है, वह उसे पा लेता है। 1924 में उनका पहला उपवास, जिससे मैं भी संबंधित थी, हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए था। उसे पूरे राष्ट्र की सहानुभूति प्राप्त थी। उनका अंतिम उपवास भी हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए था, लेकिन इसमें सारा राष्ट्र उनके साथ नहीं था। वह इतना बंट गया था, वह इतना कटुतापूर्ण हो गया था, वह घृणा और संदेह से इतना परिपूर्ण हो गया था, वह देश के विभिन्न धर्मों की शिक्षाओं से इतना विमुख हो गया था कि एक छोटा-सा भाग ही महात्माजी को समझ सका, उनके उपवास के अर्थों को जान सका। यह बिल्कुल स्पष्ट था कि इस उपवास में राष्ट्र की निष्ठा उनके प्रति बंटी हुई थी। यह भी स्पष्ट था कि उनकी ही जाति के अतिरिक्त और कोई जाति ऐसी नहीं थी, जिसने उनको इतना नापसंद किया और अपनी नाराजगी और असंतोष को इतने निन्दनीय ढंग से व्यक्त किया। हिन्दू जाति के लिए कितने दु:ख की बात है कि सबसे बड़ा हिन्दू (हमारे युग का एकमात्र हिन्दू) जो धर्म के सिद्धांत, आदर्शों और दर्शन का इतना पक्का और सच्चा था, एक हिन्दू के ही हाथ से मारा जाये! वास्तव में यह हिन्दू-धर्म के लिए एक समाधि-लेख जैसी बात है कि एक हिन्दू के हाथ से, हिन्दू-अधिकारियों और हिन्दू-संसार के नाम पर उस हिन्दू का बलिदान हो, जो उन सबमें सबसे महान था। लेकिन यह कोई खास बात नहीं। हममें से कई के लिए, जो उन्हें भूल नहीं सकते, यह एक व्यक्तिगत दु:ख है, जो हर दिन और हर बरस खटकेगा, क्योंकि तीस साल से भी ज्यादा समय से हममें से कुछ उनके इतने निकट रहे हैं कि हमारा जीवन और उनका जीवन एक-दूसरे का अविभाज्य अंग बन गया था। वास्तव में हममें से बहुतों की निष्ठा मर चुकी है। उनकी मौत ने हममें से कुछ के अंग भी काटकर अलग कर दिए हैं, क्योंकि हमारे पुट्ठे, शिरा, हृदय और रक्त सब उनके जीवन से जुड़े हुए थे। लेकिन, जैसा कि मैं कहती हूं, यदि हम हतोत्साहित हो जाएं तो यह कृतघ्न भगोड़ों का सा काम होगा। अगर हम सचमुच ही यह विश्वास कर लें कि वह नहीं रहे, अगर हम मान लें कि क्योंकि वह चले गए हैं, इसलिए सब-कुछ खत्म हो गया है, तो हमारा प्यार और विश्वास किस काम आयेगा? अगर हम यह समझ लें कि क्योंकि उनका शरीर हमारे बीच नहीं रहा है, इसलिए अब क्या बचा है, तो उनके प्रति हमारी निष्ठा किस काम आयेगी? क्या हम उनके वारिस, उनके आत्मिक उत्तराधिकारी, उनके महान आदर्शों के रखवाले, उनके बड़े कार्य को चलाने वाली नहीं है? क्या हम उस काम को पूरा करने के लिए, उसे बढ़ाने के लिए और अपने संयुक्त प्रयासों से उनके अकेले से जो हो सकता था, उससे अधिक सफल बनाने वाले नहीं हैं? इसलिए मैं कहती हूं कि निजी शोक का समय बीत गया। छाती पीटने और ‘हाय-हाय’ का वक्त बीत गया। यह समय है हम उठें और महात्मा गांधी का विरोध करने वालों से कहें, ‘‘हम चुनौती स्वीकार करते हैं।’’ हम उनके जीवित प्रतीक हैं। हम उनके सिपाही हैं। हम रणोन्मत्त संसार के आगे उनके ध्वजवाहक हैं। हमारा ध्वज सत्य है। हमारी ढाल अहिंसा है। हमारी तलवार आत्मा की वह तलवार है, जो बिना खून बहाये जानी जाती है। भारत की जनता उठे और अपने आंसू पोंछे, उठे और अपनी सिसकियां खत्म करे, उठे और आशा और उत्साह से भरे। आइये, हम उनके व्यक्तित्व के ओज, उनके साहस के शौर्य और उनके चरित्र की महानता उनसे ग्रहण करें और ग्रहण क्यों करें? वे तो स्वयं हमें दे गए हैं। क्या हम अपने पिता के निर्देश को नहीं मानेंगे? क्या हम, उनके सिपाही, उनके युद्ध को सफल बनायेंगे? क्या हम संसार को महात्मा गांधी का परिपूरित सन्देश नहीं देंगे? यद्यपि, उनका स्वर अब नहीं निकलेगा, तथापि संसार को केवल संसार और अपने समकालीनों को ही क्यों, बल्कि संसार की युग-युग तक आने वाली संतानों तक उनका सन्देश पहुंचाने के लिए क्या हमारे पास लाखों-करोड़ों कण्ठ नहीं हैं? क्या उनका बलिदान व्यर्थ जायेगा? क्या उनका रक्त शोक के व्यर्थ कार्य के लिए ही बहाया जायेगा? क्या हम उस खून से संसार को बचाने के लिए उनके शांति-सैनिकों के चिह्न की तरह अपने माथे पर तिलक नहीं लगायेंगे? इसी वक्त और इसी जगह पर, मैं सारे संसार के आगे, जो मेरी कम्पित वाणी सुन रहा है, अपनी तरफ से और आपकी तरफ से, जिस प्रकार मैंने 30 साल से भी पहले शपथ ली थी, अमर महात्मा की सेवा का व्रत ग्रहण करती हूं। मृत्यु क्या है? मेरे पिता ने, अपनी मृत्यु के ठीक पहले, जब वे मरणोन्मुख थे और मौत की छाया उन पर गिर रही थी, कहा था, ‘‘न जन्म होता है, न मृत्यु होती है। केवल आत्मा सत्य की उच्चतर अवस्थाओं को खोजती रहती है।’’ महात्मा गांधी, जो इस संसार में सत्य के लिए ही रहते थे, उस सत्य की उच्चतर अवस्था में परिवर्तित हो गए हैं, जिसे वे खोजते थे, यद्यपि, यह कृत्य हत्यारे के हाथों हुआ। क्या हम उनका स्थान नहीं लेंगे? क्या हमारी सम्मिलित शक्ति इतनी नहीं होगी कि हम संसार को दिये उनके महान सन्देश को फैला सर्वे तथा उनका अनुकरण कर सर्वे? यहां पर मैं उनके सबसे साधारण सैनिकों में से एक हूं। लेकिन मैं जानती हूं कि मेरे साथ जवाहरलाल नेहरू जैसे उनके प्रिय शिष्य, उनके विश्वासपात्र अनुगामी और मित्र वल्लभभाई पटेल, मसीह के हृदय में सन्त जॉन की भांति राजेन्द्र बाबू तथा वे सहयोगी भी हैं, जो घड़ी-भर की सूचना पर उनके चरणों में अन्तिम श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए भारत के कोने-कोने से दौड़ आये हैं। क्या हम सब उनके सन्देश को पूरा नहीं करेंगे। उनके अनेक उपवासों के समय, जिनमें मुझे उनकी सेवा करने का, उन्हें सात्वना देने का, उन्हें हंसाने का क्योंकि उन्हें अपने मित्रों की हास्यौषध की सबसे अधिक आवश्यकता थी-सौभाग्य प्राप्त हुआ। मैं इस बात पर आश्चर्य किया करती थी कि अगर कहीं सेवाग्राम में उनके प्राण निकले, नोआखाली में उनकी देह छूटे, कहीं किसी दूर जगह पर उनकी जीवनलीला समाप्त हो तो हम उन तक कैसे पहुंच सकेंगे? इसलिए यह ठीक और उचित ही है कि वे राजाओं की नगरी में, हिन्दू साम्राज्यों की प्राचीन स्थली में, जिस स्थल पर मुगलों की भव्यता का निर्माण हुआ, उस स्थल में, जिसको विदेशी हाथों से छीनकर उन्होंने भारत की राजधानी बनाया, उसी स्थल में, वह स्वर्गवासी हुए। यह ठीक ही है कि उनका शरीरान्त दिल्ली में हुआ। यह भी ठीक है कि उनकी अन्तिम क्रिया मृत सम्राटों के बीच, जो दिल्ली में दफनाये गए थे, हुई, क्योंकि वे राजाओं के राजाधिराज थे और यह भी ठीक ही है कि वे, जो शान्ति के अवतार थे, एक महान योद्धा के आदर और सम्मान के साथ श्मशान-भूमि में ले जाये गए, क्योंकि उन सभी योद्धाओं से, जो युद्ध-भूमि में अपनी सेनाएं लेकर गए थे, यह छोटा-सा व्यक्ति कहीं अधिक बड़ा बहादुर और विजेता था। दिल्ली आज सात साम्राज्यों की ऐतिहासिक दिल्ली नहीं है। यह सबसे महान क्रांतिकारी था, जिसने अपने पराभूत देश का उद्धार किया और उसे उसकी स्वतंत्रता और उसकी ध्वजा दी, केन्द्र और विश्राम-भूमि दी। भगवान! मेरे नेता, मेरे बापू की आत्मा शान्ति से विश्राम न करे, बल्कि उनकी अस्थियों में जबरदस्त जीवन आये और चन्दन की जली लकड़ियों की राख और उनकी अस्थियों के चूर्ण में वह जीवन और उत्प्रेरणा उत्पन्न हो कि उनकी मृत्यु के बाद सारा भारत स्वतन्त्रता की यथार्थता में पुनर्जीवित हो उठे! मेरे बापू, सोओ मत! हमें मत सोने दो! हमें अपने व्रत से मत डिगने दो। हमें अपने उत्तराधिकारियों को, अपनी सन्तानों को, अपने सेवकों को, अपने स्वप्नों के अभिरक्षकों को, भारत के भाग्य-विधाताओं को- अपना प्रण पूरा करने की शक्ति दो! तुम, जिनका जीवन इतना शक्तिशाली था, अपनी मृत्यु से भी हमें ऐसा ही शक्तिशाली बनाओ, जो उद्देश्य तुम्हें सबसे अधिक प्रिय था और उसके लिए महानतम शहादत में नश्वरता को पीछे छोड़ दिया है।