अक्टूबर 2019

मैं और महात्मा : आज़ादी के हमसफर

मौलाना अबुलकलाम आज़ाद

(मौलाना अबुल कलाम आज़ाद देश के उन रहनुमाओं में से हैं, जिन्होंने कभी पाकिस्तान का समर्थन नहीं किया था, देश के बँटवारे का सदमा भी उन्हें बहुत लगा था। गाँधी के अहिंसक आन्दोलन में उन्होंने अपनी भूमिका को इन शब्दों में लिखा है। मौलाना आज़ाद की ‘हमारी आज़ादी' ? पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद इंडिया विन्स फ्रीडम में है)

उस वक्त तक महात्मा गाँधी सियासत के मैदान में आ चुके थे और चम्पारन के किसानों में वह जो काम कर रहे थे, उसके सिलसिले में उस वक्त वह राँची आए थे, तब मैं वहाँ नज़रबंद था। उन्होंने मुझसे मुलाकात करने की ख्वाहिश जाहिर की, मगर बिहार सरकार ने इसकी इजाजत नहीं दी। इस तरह मैं उनसे अपनी रिहाई के बाद जनवरी 1920 में पहली बार दिल्ली में मिल सका। उस समय विचार-विमर्श जारी था कि खिलाफत और तुर्की के भविष्य के बारे में मुसलमानों की भावनाओं से अवगत कराने के लिए वाइसराय के पास एक प्रतिनिधि मंडल भेजा जाए। गाँधीजी इन बहसों में शरीक हुए। उन्होंने इस विचार से दिलचस्पी और पूरी हमदर्दी ज़ाहिर की और इसका ऐलान किया कि वह इस मामले में मुसलमानों के साथ शरीक होने को तैयार हैं। 20, जनवरी 1920 को देहली में एक जलसा हुआ। गाँधीजी के अलावा लोकमान्य तिलक और दूसरे काँग्रेसी लीडरों ने भी उस दृष्टिकोण का समर्थन किया, जो मुसलमानों ने खिलाफत के मसले में अपनाया था। प्रतिनिधि मंडल ने वाइसराय से मुलाकात की। मैंने ज्ञापन पर दस्तखत तो किए, मगर प्रतिनिधि मंडल में शरीक नहीं हुआ। मेरी राय थी कि अब मामला ज्ञापनों और प्रतिनिधि-मंडलों की मंजिल से बहुत आगे निकल गया है। वाइसराय ने अपने जवाब में कहा कि अगर ब्रिटिश सरकार के सामने मुसलमानों का दृष्टिकोण पेश करने के लिए कोई प्रतिनिधि मंडल लंदन भेजा जाए, तो वह उसके लिए जरूरी सहूलियतें मुहैया करा देंगे। खुद अपने बारे में उन्होंने कहा कि वह कोई भी कार्रवाई करने में असमर्थ हैं। अब सवाल पैदा हुआ कि अगला कदम क्या होना चाहिए। एक जलसा हुआ, जिसमें मौलाना मुहम्मद अली, मौलाना शौकत अली, हकीम अजमल खाँ और मौलाना अब्दुल बारी फिरंगी महली भी मौजूद थे। गाँधीजी ने अपने असहयोग आन्दोलन का प्रोग्राम पेश किया। उन्होंने कहा कि अब ज्ञापनों और प्रतिनिधि मंडलों का ज़माना गुज़र गया है। हमें सरकार का समर्थन करने और उसे मजबूत बनाने से हर तरह परहेज करना चाहिए। यही तरीका हुकूमत को मजबूर कर सकता है कि वह हम से सम्पर्क करें। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि तमाम सरकारी अलंकरण वापस कर दिए जाएं, अदालतों और मदरसों का बॉयकाट किया जाए, अंग्रेजों की नौकरी कर रहे भारतीय नौकरियों से इस्तीफा दे दें और नए संविधान तैयार करने के लिए जो समितियाँ बनने वाली हैं, उनमें किसी भी तरह का हिस्सा लेने इंकार कर दें। जैसे ही गाँधीजी ने अपनी योजना बयान की, मुझे याद आया कि यह वही प्रोग्राम है, जिसका खाका टॉलस्टाय ने बहुत साल पहले पेश किया था। सन 1901 ई. में एक अराजकतावादी ने इटली के बादशाह पर हमला किया था। उस वक्त टॉलस्टाय ने अराजकतावादी जमात के नाम एक खुला खत प्रकाशित किया, जिसमें लिखा था कि हिंसा का तरीका हमारी आजादी की तहरीक या आंदोलन के लिए गलत और राजनैतिक दृष्टिकोण से अहितकर है। अगर एक शख्स कत्ल किया गया, तो हमेशा कोई दूसरा उसकी जगह लेने के लिए मिल जाएगा। हकीकत में हिंसा का नतीजा ज्यादा तेज प्रतिहिंसा हुआ करता है। यूनानियों की एक दास्तान में है कि हर सिपाही जो मारा जाता है, उसके लहू के छींटों से 999 सिपाही पैदा होते हैं। राजनैतिक उद्देश्य से कत्ल करना अपने दुश्मनों की तादाद को बराबर बढ़ाते रहना है। टॉलस्टाय ने मशवरा दिया कि अगर किसी ज़ालिम हुकूमत को बेबस करना हो, तो सही तरीका यह है कि टैक्स देने से इनकार किया जाए, नौकरियों से इस्तीफा दे दिया जाए और तमाम संस्थानों का बॉयकाट किया जाए, जिनसे हुकूमत को सहारा मिल रहा हो। उसे यकीन था कि ऐसा प्रोग्राम किसी भी हुकूमत को हथियार डाल देने पर मजबूर कर देगा। मुझे याद आया कि मैंने भी उर्दू अखबार ‘अल-हिलाल' के चंद लेखों में ऐसा ही प्रोग्राम पेश किया था। चंद सप्ताह बाद मेरठ में एक खिलाफत कॉन्फ्रेंस हुई। यही कॉन्फ्रेंस थी, जिसमें गाँधीजी ने पहली बार एक पब्लिक प्लेटफार्म से असहयोग के प्रोग्राम पर कार्य करने की अपील की। उनके बाद मैंने तकरीर की, जिसमें मैंने बिला शर्त उनकी हिमायत की। सितम्बर सन् 1920 ई. में काँग्रेस का एक खास जलसा कलकत्ता में गाँधीजी के तैयार किए गए प्रोग्राम की रूपरेखा पर गौर करने के लिए हुआ। गाँधीजी ने कहा कि अगर हम स्वराज हासिल करना और खिलाफत के मसले को ठीक ढंग से हल करना चाहते हैं, तो असहयोग का प्रोग्राम जरूरी है। इस सभा के अध्यक्ष लाला लाजपत राय थे और सी.आर. दास इसके प्रमुख व्यक्तियों में से थे। इन दोनों में से कोई भी गाँधी जी से सहमत न था। विपिनचन्द्र पॉल ने बहुत शानदार तकरीर की और कहा कि ब्रिटिश हुकूमत से लड़ने के लिए सबसे अच्छा हथियार ब्रिटिश माल का बायकाट है। गाँधीजी के प्रोग्राम के मुल्क के दूसरे हिस्सों में सही होने का उन्हें कुछ भी यकीन नहीं था। उन लोगों के विरोध के बावजूद असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव बहुत बड़े बहुमत से मंजूर कर लिया गया। इसके बाद देश को असहयोग के प्रोग्राम के लिए तैयार करने की खातिर जगह-जगह के दौरे किए गए। गाँधीजी ने मुल्क के लम्बे-चौड़े दौरे किए। मैं ज्यादातर वक्त उनके साथ रहा। मुहम्मद अली, शौकत अली अक्सर हमारे हमसफर होते थे। दिसम्बर सन् 1920 में काँग्रेस का सालाना (वार्षिक) अधिवेशन नागपुर में हुआ। उस वक्त तक मुल्क का मिज़ाज बदल चुका था। सीआर दास अब खुले आम असहयोग के प्रोग्राम से सहमति जताते थे। लाला लाजपतराय पहले कुछ खिलाफ थे। मंगर जब उन्होंने देखा कि पंजाब के तमाम प्रतिनिधि गांधीजी की हिमायत कर रहे हैं तो वह भी उनमें शरीक हो गए। इसी सेशन से मिस्टर जिन्ना कांग्रेस से बिल्कुल अलग हो गए। यहीं से शुरू होती है वह कहानी जिसने 1947 के आते-आते मुल्क का बंटवारा कर दिया।