अक्टूबर 2019

बापू की याद

जवाहरलाल नेहरू

नेहरू का अर्थ है गांधी-मानस, गांधी की आत्मा, गांधी का आदर्श। गांधी के निधन का सबसे बड़ा धक्का नेहरु ने ही महसूस किया था। नेहरु ने बापू को अपने पिता मोतीलाल नेहरू से भी आगे बढ़कर चाहा था। नेहरू का पंचशील, गांधी की आत्मा से ही उपजा था। बापू की याद में नेहरु की आँखों से उपजे हैं ये आँसू।

गांधीजी से सम्बन्ध रखने वाले कार्यक्रमों को स्वीकार करने में कठिनाई का अनुभव करता हूं, क्योंकि उनका स्मरण और ख्याल आते ही मेरे मन में अक्सर कितनी ही बातें आने लगती हैं और कभी-कभी मेरा मन इससे व्याकुल हो उठता है, लेकिन शायद गांधीजी का ख्याल आने से मेरे मन की ऐसी हालत नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि आज वे होते तो उन पर इन परिस्थितियों की क्या प्रतिक्रिया होती, वे हमें क्या सलाह देते, और आज हम उनकी उस सम्भावित सलाह से कितनी दूर जा पड़े हैं। मुझे इस बात की चिन्ता होती है और दूसरों को भी हो सकती है। मैं इस बात का ख्याल नहीं कर सकता कि क्या मैं उनके उस मानदंड के मुताबिक चल सकता हूं, जो वे पसन्द करते थे और जिसे उन्होंने हमारे सामने रखा था। तो भी मेरे मन में अक्सर ये विचार आते हैं- क्या हम मौजूदा पीढ़ी वाले उनके आदर्शों के अनुसार चल रहे हैं या नहीं चल रहे हैं और क्या हम उनके बारे में जो बातें कहते हैं। उनके प्रति साररूप से सच्चे हैं या नहीं और यह कि ये बातें सिर्फ बातें ही रह जाती हैं या हम उन पर अमल करते हैं? यह बहुत मुश्किल सवाल है- कठिन समस्या है और चूंकि यह मुश्किल है, इसलिए मैं नहीं जानता कि इसे कैसे हल करूं और इसके बार औरों से क्या कहूं। लेकिन फिर मुझे याद आता है कि गांधीजी उससे कहीं बड़े थे, जिसकी कल्पना हम सबने कर रखी थी और यह कि उनमें तो यह गुण था कि उन्होंने अपने मार्ग-दर्शन में अपने अनुयायियों को अपनी समस्यों पर खुद सोचने की आजादी दे रखी थी और उन्हें अपनी समझ के अनुसार फैसला करने की छूट भी, फिर भले ही वह समझ मध्यम या धुंधली क्यों न हो। वे किसी पर अपने विचार लादना नहीं चाहते थे- हां, वे अपने देशवासियों के दिल और दिमाग को अपने विचार के अनुसार जीतना जरूर चाहते थे, पर उस विचार को लादना नहीं चाहते थे। वे यह नहीं चाहते थे कि लोगों के विचार दबाये और संकुचित किये जायें और वे उनकी बातें अन्धविश्वास के साथ मान लें। इस तरह के अनुयायी वे कभी नहीं चाहते थे; यद्यपि होता यह था कि लोग उनके महान व्यक्तित्व के प्रभाव में बिल्कुल स्वतन्त्र मन से काम नहीं कर पाते थे। यह अनिवार्य है और ऐसे व्यक्ति के सम्पर्क में आने पर ऐसा होता ही है। फिर भी वे इस बात को प्रोत्साहन नहीं देते थे। इस तरह जब समस्याएं आयें तो मेरा ख्याल है कि हमारा फर्ज होता है कि हम उनके बारे में अपना फैसला आप कर लें, पर इस बात का ख्याल जरूर रखें कि हमने उनसे जो कुछ भी सीखा है, उसके आधार पर अपना निर्णय खुद कर लें और ऐसी बातों का सहारा न लें कि एक विभिन्न मौके पर, जुदा परिस्थितियों में उन्होंने क्या कहा होता। यह कहना मुश्किल है कि एक जुदा परिस्थिति में उन्होंने क्या किया या कहा होता, क्योंकि गाँधीजी का तो गतिशील व्यक्तित्व था। वे ऐसे व्यक्ति नहीं थे, जो बदलती परिस्थितियों में भी वही एक जैसी बातें किया करते हैं। वे कुछ निश्चित सिद्धान्तों पर दृढ़तापूर्वक चलते थे और मेरा विचार है कि पूरी कोशिश से चलकर अपनी यात्रा में सफल हुए। जो बात उनके दिमाग में साफ तौर से आ जाती थी, उससे उन्हें कोई विचलित नहीं कर सकता था। लेकिन उन्होंने जिन्दगी के ही छोटे-मोटे पहलू को ही ऐसा बुनियादी सत्य नहीं मान लिया कि जिसमें परिवर्तन हो ही न सके। उन्होंने महसूस किया था कि जिन्दगी तो एक बदलता हुआ और विकसित चमत्कार है, इसलिए उसका सामना विकसित और गतिशील ढंग से किया जाना चाहिए। भारत और मानवता की सेवा में उन्होंने आधी सदी या इससे भी अधिक जो समय गुजारा, उसमें वे स्वयं विकसित हुए। वे खुद समस्याओं को जानते थे और उन्होंने नई समस्याओं का सामना नये या कुछ-कुछ परिवर्तित ढंग से किया, क्योंकि उनमें परिवर्तन को भाँपने और उसका मुकाबला करने का गुण था। हम जैसे हैं, उसे देखते हुए उनके बारे में बातें करने और यह कल्पना करने के अधिकार किस तरह हैं कि हम उनके आदर्शों के अनुसार काम कर रहे हैं। इस बात की फिक्र मुझे रहती है। गाँधीजी के बारे में विचार करना मेरे ख्याल में इसलिए अच्छा है कि उससे हमें भान होता है कि जिस तरह हम उनकी सजीव उपस्थिति में अपने से सवाल करते थे वैसे ही उनकी अनुपस्थिति में भी करते हैं। जब हम उन्हें सजीव देखते थे तो हमें खुशी और आनन्द मिलता था; पर हम अब देखते हैं तो कुछ टीस- सी होती है और हम सन्देह करते हैं कि क्या हम जिनका नाम अक्सर लेते हैं उनके अनुसार चलते हैं? जब हम उनके निकट होते थे, तब भी हमें कुछ आत्मिक दुःख इस अनन्त प्रश्न से होता था कि क्या हम उनके योग्य अनुयायी सिद्ध हुए हैं; क्या हम शायद कहते कुछ हैं, दिखाते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। इस तरह उनकी याद हमेशा ये अनन्त प्रश्न साथ लाती है। फिर हम अपना जीवन व्यर्थ के सवालों में नहीं गुजार सकते। हमें अपने सजीव वर्तमान में काम करना है और अपनी बुद्धि की समझ के अनुसार काम करना है। इसका दूसरा पहलू भी है, जो कभी-कभी हमारी समझ के सर्वथा अनुकूल अमल में नहीं आता। यहाँ एक और कठिनाई आ जाती है। गाँधीजी तो एक दृष्टा और नेता थे, फिर भी वे उन राजनीतिक नेताओं से बिलकुल जुदा थे, जिन्हें हम आमतौर से देखते हैं फिर चाहे वे कितने ही बड़े क्यों न हों। हम परिणाम की परवाह न कर उनके सन्देश के अनुसार चलते हैं और जिसे सत्य समझते हैं उस पर दृढ़ रहते हैं। लेकिन राजनीतिक नेता कहे जाने वाले, मैं राजनीति को यहाँ बुरे अर्थ में नहीं लेता, जिन्हें हम नेता, राजनीतिज्ञ या लोकनेता कहते हैं, तभी तक नेतृत्व करते हैं जब तक वे स्वयं आगे चल सकते हैं। नेता को सचाई का दर्शन हो सकता है- संकुचित अर्थ में सही, परन्तु जब तक उसके अनुयायियों को भी सत्य के दर्शन न हों, तब तक वह क्या कर सकता है? अगर वह उन्हें अपने साथ न ले जा सके और खुद आगे बढ़ जाए तो यह एक गलत बात होगी। अगर नेता अनुयायियों के साथ कदम उठाता है तो उसे उस सत्य को अथवा अपनी धारणा के अमल को संकुचित करना होगा, क्योंकि अन्य लोगों ने उस सत्य को काफी तौर पर नहीं देखा है। इस प्रकार वह हमेशा ऐसी समस्या से तंग रहता है कि क्या होना चाहिए और सीमित परिस्थिति में क्या हो सकता है। गाँधीजी तो एक उच्च सिद्धान्तवादी और सत्य के अनुयायी थे, पर वे जनता की नब्ज को पहचानते थे। वास्तव में यदि कोई साररूप में भारत का प्रतिनिधित्व करने योग्य था तो वे ही थे। वे जनता को अच्छी तरह जानते थे और उसके अंग बन गये थे- वहाँ तक कि जहाँ हममें से कोई नहीं पहुँच सकता। उन्होंने जनता को राह दिखाने को कहा, क्योंकि उनका ख्याल था कि वह ऐसा कर सकती है और उसने ऐसा कर दिखाया। मेरा विश्वास है कि उन्होंने जनता से कोई ऐसा काम करने को नहीं कहा जो बिल्कुल असम्भव ही हो। वे किसी व्यक्ति को कठोर अनुशासन में रहने के लिए कह सकते थे, किन्तु वे समूह को ऐसा नहीं कह सकते थे। फिर भी उन्होंने किसी ऐसी बात पर कभी कोई समझौता नहीं किया जिसे वे गलत समझते थे। इस सारे विस्तृत संसार में आज कोई ऐसा राजनीतिक नेता नहीं है, फिर चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, जिसे दिन प्रतिदिन समझौता न करना पड़ता हो। ऐसा समझौता छोटी-मोटी बातों को लेकर भी हो सकता है, और कभी-कभी बड़ी बातों को लेकर भी। यह तो एक फिसलने वाली प्रक्रिया है। मुख्य रूप से और अजीब ढंग से एक जनतंत्रीय समाज में यह और भी जरूरी हो जाता है कि समझौता किया जाए क्योंकि जनतंत्रीय नेता नेतागीरी ही नहीं करता, बल्कि उसे अनुयायी भी बनना पड़ता है। मैं आपसे ऐसा इसलिए कहता हूँ कि हममें से कितनों ही को लगातार संघर्षों का सामना करना पड़ता है। संसार की समस्याओं का मुकाबला करना मुश्किल होता है और हमारे अपने देश की समस्याओं का भी। आज वे कठिन और उत्तेजक समस्याएं हैं। वे हमारी मर्दानगी को चुनौती देती हैं और फिर भी उनकी अन्तनिर्हित कठिनाइयों के होते हुए भी उन्हें गाँधीजी के कथनानुसार ऐसी बातों के अनुकूल बनाना है, जिन्हें उन्होंने भिन्न परिस्थिति में कहा या किया था। मैं उन बीसियों और सैकड़ों बातों का हवाला नहीं देता जो वे ऐसे मौकों पर कहा करते थे। यद्यपि उनकी कही हुई बातें पूरी तस्वीर उपस्थित करती हैं, क्योंकि उनकी जिन्दगी मूल रूप से ऐसी कला थी, जिसमें न गलत रेखाएं थीं, न बेमेल सुर। वे एक ऐसे महान नेता थे, जो अपने समय की ऐसी समस्या का मुकाबला कर चुके थे, जो बाद के युग में वैसा महत्व नहीं रख सकती। पर उनकी जिन्दगी में कोई बात थी, जो ऐसा स्थायी महत्व रखती थी, जो अनन्त सत्य में ही हो सकती है। हममें से कुछ लोग गाँधीजी की उन बातों से अपने को सम्बद्ध किया करते हैं, जो उन्होंने कहीं या की हैं, वे महत्वपूर्ण बातें थीं, पर शायद उतनी नहीं, जितनी उन्होंने अपनी अन्य बातों द्वारा व्यक्त की थीं। इस बात का खतरा है कि अनुयायीगण उन बातों को भुला दें जो अधिक महत्वपूर्ण थीं और छोटी-मोटी बातों में पड़े रहें। ऐसा होना अनिवार्य है, क्योंकि अनुयायी तो सीमित समझदारी रखता है और वह गुरु की महानता से आश्चर्य-स्तब्ध होकर बड़ी बातों के समझने के लिए छोटी बातों से बाहर नहीं निकल सकता, परन्तु साररूप में वह बात इस प्रकार है। इसी भारत-भूमि पर भगवान का वह प्यारा हो गया, जिसने इसे अपनी तपस्या से पवित्र किया है। उसने न केवल भारत-भूमि को पवित्र किया, बल्कि देशवासियों के मन और हृदय को ही बदल डाला। उन देशवासियों को ही नहीं, जो अपने को बहुत होशियार समझते थे, बल्कि ऐसे सामान्य और विनम्र लोगों को भी, जो कि अपना सब-कुछ खो चुके थे। इसलिए गाँधीजी की तस्वीर एक समुचित सम्पूर्ण तस्वीर है। भारत के विनम्र निवासियों के लिए उनकी यह तस्वीर ऐसे महान व्यक्ति की थी जो उनके लिए सोचता, काम करता और उनके जीवन में आशा और आनन्द का संचार करता था। यह अच्छी बात है कि हम उस तस्वीर की याद करते हैं और उन बुनियादी बातों को भी भूले नहीं हैं कि ध्येयों की अपेक्षा साधन अधिक महत्वपूर्ण हैं और यह कि गलत साधनों और बुरे हथियारों की कोशिश से प्राप्त किये जाने वाले ध्येय सही- बिलकुल सही नहीं होते। मैं इसे रटी हुई बात की तरह दोहरा रहा हूँ, फिर भी हम इसे अपने जीवन की छोटी-मोटी बातों पर लागू करने में भयंकर कठिनाई महसूस करते हैं। कभी-कभी ऐसे मौके आते हैं जब हमें स्याह और सफेद में से एक को चुनना पड़ता है। हमारी जिन्दगी में बीच-बीच में अक्सर ऐसी छाया आती है। फिर भी यह सिद्धान्त मन में रखना अच्छा है। यह हमें फिसलने और गिरने से बचायेगा