अक्टूबर 2019

मानवता के प्राण महात्मा गाँधी

पर्ल बक

(पर्ल बक विश्व की एक महान् उपन्यासकार हैं और उनका गुड अर्थ उपन्यास एक विश्व विख्यात कृति है। गाँधी उनकी सृजनात्मक चेतना के प्रेरक थे।)

अमेरिका में पेंसिल्वेनिया के निकट देहाती क्षेत्रों में एक गाँव है, पेरेक्सीर। वहीं हमारी शान्तिमयी झोपड़ी है। 31 जनवरी को वह दिन पिछले दिनों की तरह ही आरम्भ हुआ। हम सबेरे ही उठने के अभ्यासी हैं, क्योंकि बच्चों को कुछ दूर स्कूल जाना पड़ता है। नित्य की तरह ही आज हम जलपान के लिए मेज के चारों ओर इकट्ठे हुए और साधारण बातचीत करने लगे। खिड़कियों से बाहर घने हिमपात का दृश्य दिखलाई दे रहा था और आकाश की आभा भूरे रंग की हो रही थी। हमारे बच्चों को शंका हो रही थी कि कहीं और अधिक हिमपात न हो। एकाएक गृहपति कमरे में आये। उनकी मुख-मुद्रा गम्भीर थी। उन्होंने कहा, ‘रेडियो पर अभी एक अत्यन्त भयानक समाचार आया है...।' यह सुनकर हम सब उनकी ओर देखने लगे और तुरन्त ये हृदयविदारक शब्द सुनाई पड़े, ‘गाँधीजी का देहावसान हो गया!' मेरी इच्छा है कि भारत से हजारों मील दूर स्थित अमेरिका-निवासियों पर गाँधीजी की मृत्यु से जो प्रतिक्रिया हुई उसे भारतवासी जानें। हम लोगों ने हृदय दहला देने वाला यह संवाद सुना। यह साधारण मृत्यु नहीं है। गाँधीजी शाँति की प्रतिमूर्ति थे और उन्होंने अपना सारा जीवन अपने देश की जनता की सेवा के लिए लगा दिया था। ऐसे शाँतिप्रिय व्यक्ति की हत्या कर दी गई। मेरे दस वर्ष के छोटे बच्चे की आँखों में आँसू छलकने लगे और उसने कहा, 'मैं चाहता हूँ कि यदि बन्दूक बनाने का आविष्कार ही न हुआ होता तो बड़ा अच्छा था।’ हम लोगों में से किसी ने भी गाँधीजी को नहीं देखा था, क्योंकि जब हम लोग भारतवर्ष में थे, तब गाँधीजी सदा जेल में ही थे। फिर भी हम सभी उन्हें जानते थे। हमारे बच्चे गाँधीजी की आकृति से इतने परिचित थे, मानो गाँधीजी हमारे साथ घर में ही रहते थे। हमारे लिए गाँधीजी इने-गिने महात्माओं में से एक महात्मा थे। पृथ्वी के उन गिने-चुने पीरों में से वे एक थे, जो अपने विश्वास पर हिमालय की तरह अटल और दृढ़ रहते थे। उनके सम्बन्ध में हमारी धारणा भी वैसी ही अटल है। उनकी मृत्यु का समाचार सुनने के बाद हम परस्पर गाँधीजी के जीवन और उनकी मृत्यु से होने वाले सम्भावित परिणामों के सम्बन्ध में बातचीत करने लगे। हमें भारतवर्ष पर गर्व है कि महात्मा गाँधी-जैसे महान व्यक्ति भारत के अधिवासी थे। पर साथ ही हमें खेद भी है कि भारत के ही एक अधिवासी ने उनकी हत्या की। इस प्रकार दु:खी और सन्तप्त हम लोग चुपचाप अपने दैनिक कार्य में लग गये। भारतवासी सम्भवतः यह जानकर आश्चर्य करेंगे कि हमारे देश में गाँधीजी का यश कितने व्यापक रूप में फैला। मैं उनकी मृत्यु के एक घंटे बाद सड़क से होकर कहीं जा रही थी कि एकाएक एक किसान ने मुझे रोका और पूछा, ‘संसार का प्रत्येक व्यक्ति सोचता था कि गाँधीजी एक उत्तम व्यक्ति थे तो लोगों ने उन्हें मार क्यों डाला?' मैंने अपना सिर धुना और कुछ बोल न सकी। उसने संकेत से कहा, ‘जिस तरह लोगों ने महात्मा ईसा को मारा था, उसी तरह लोगों ने महात्मा गाँधी को मार डाला।’ उस किसान ने ठीक ही कहा था कि महात्मा ईसा की सूली के अतिरिक्त संसार की किसी भी घटना की महात्मा गाँधी की गौरवपूर्ण मृत्यु से तुलना नहीं हो सकती। गाँधीजी की मृत्यु उन्हीं के देशवासी द्वारा हुई। यह ईसा के सूली पर चढ़ाये जाने के बाद दूसरी वैसी ही घटना है। संसार के वे लोग, जिन्होंने गाँधीजी को कभी नहीं देखा था, आज उनकी मृत्यु से शोक-संतप्त हो रहे हैं। वे ऐसे समय में मरे, जब उनका प्रभाव दुनिया के कोने-कोने में व्याप्त हो चुका था। कुछ दिनों से अमेरिका-निवासियों में महात्मा गाँधी के प्रति बढ़ती हुई श्रद्धा को हम अनुभव कर रहे थे। महात्मा गाँधी के प्रति लोगों में अगाध श्रद्धा थी। महात्मा गाँधी के प्रति जनता में वास्तविक आदर था और हम लोगों को यह प्रतीत होने लगा था कि वे जो कुछ कह रहे थे, वही ठीक था। आज अपने देश के अति उन्नत सैनिकीकरण के मध्य हमारी दृष्टि गाँधीजी की ओर जाती थी और यह प्रतीत होता था कि (युद्ध का नहीं, बल्कि शाँति) का उनका मार्ग ही ठीक है। हमारे समाचार-पत्रों ने गाँधीजी की इस नयी शक्ति को पहचाना। भारत की इस महान व्यक्ति के कारण, अन्य देशों में प्रतिष्ठा बढ़ी। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में होने वाले भारतीय स्वातन्त्र्य युद्ध की ओर हमारी दृष्टि गई, क्योंकि उनका ढंग राष्ट्रों के बीच के मतभेद को शांतिपूर्ण ढंग से तय करने का था। मैं चाहती हूँ कि भारत के प्रत्येक नर-नारी के हृदय में विश्वास करा दूं कि उनके देश को अब अन्य देशवासी क्या समझते हैं। आज भारत केवल भारत ही नहीं है, वरन् वह संसार की मानव-जाति का प्रतीक है। चर्चिल और उनके समान अन्य व्यक्ति हमें बताते रहे कि यह आवश्यक नहीं है कि दुनिया के सभी लोग स्वतन्त्र हों। इन लोगों का कहना है कि जगत को यह जान लेना चाहिए कि कुछ थोड़े बलवान और शक्तिशाली व्यक्ति ही विश्व पर शासन कर सकते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि कोई-न-कोई शासक तो अवश्य ही होगा और यदि हम स्वयं शासित होना नहीं चाहते हैं तो हमें शासक होना चाहिए, लेकिन हम इस बात पर विश्वास नहीं करते। हम तो ऐसे संसार की कल्पना कर रहे हैं, जिसमें जनता स्वयं अपना शासन चलाने के लिए स्वतन्त्र रहे। हमारे लिए उस काल्पनिक संसार का प्रतीक भारतवर्ष है। हम प्रतिदिन भारतीय समाचारों के लिए समाचारपत्रों को बड़ी उत्कण्ठा से आँखें फाड़-फाड़कर देखते हैं। श्री चर्चिल ने जिस ‘रक्त-स्नान' की धमकी दी थी, वस्तुतः क्या यह घटना सत्य होगी? क्या यह तय है कि लोग अपने मतभेदों को शाँति से न मिटा सकेंगे? क्या युद्ध सदा होते रहेंगे? हम सभी लोगों के लिए, जिनकी धारणा थी कि जनता पर विश्वास करना चाहिए, गाँधीजी आशा के केन्द्र थे। यह बात नहीं है कि हम उस क्षीणकाय चश्मेवाले गाँधी को भावुकता में आकर कोई देवता समझ बैठे थे, बल्कि हमारा विश्वास था और हम आशा करते थे कि गाँधीजी ने मानव-जीवन के मौलिक सत्य को प्राप्त कर लिया था। उनकी मृत्यु पराजय है या विजय, इसका अन्तर भविष्य में भारतवासी विश्व को अपनी भावी गतिविधि से देंगे। उन लोगों में, जो समझते थे कि गाँधीजी सत्य-पथ पर थे, यदि उनकी मृत्यु से नई जाग्रति, नई चेतना और नया संकल्प उत्पन्न हो सके तो यह हमारे और भारत के लिए समान रूप से लाभदायक सिद्ध होगा, क्योंकि हम मानवता में विश्वास करते हैं। यदि उनकी मृत्यु से हम निराश और पराजित हो जाएं तो निश्चय ही संसार की मानवता पराजित हो जायेगी। अमेरिका में गाँधीजी की मृत्यु का समाचार धक्के की तरह लगा और कुछ क्षणों के लिए लोग स्तब्ध रह गये। लोग एक-दूसरे की ओर आश्चर्य से देखने लगे। नेहरूजी अभी जीवित हैं। अब ऐसी दुर्घटना न घटेगी। केवल यही नहीं कि पश्चिमी जगत भारत के किसी और व्यक्ति की अपेक्षा नेहरू को अधिक जानता है, बल्कि वह नेहरू की बुद्धिमता, योग्यता और धैर्य पर विश्वास भी करता है। भारत में इतना वर्ग-भेद नहीं हो जायेगा, जिससे निराशा और पराजय के कारण लोग नेहरू को पदच्युत कर दें। यदि ऐसा हुआ तो भारत की बड़ी हानि होगी और वह पश्चिमी जगत की दृष्टि में नितान्त गिर जायेगा। बुद्धिमान भारतीय ऐसी गलती करने से पूर्व अच्छी तरह सोचेंगे। मैं न केवल एक साधारण अमेरिकन की दृष्टि से यह कह रही हूँ, बल्कि भारत के सम्बन्ध में जो कुछ भी जानती हूँ कि भारत अपने लिए क्या करना चाहता है तथा नेता के रूप में संसार के लिए क्या कर सकता है, इस दृष्टि से मेरे उक्त विचार हैं। भारत का भाग्य अधर में दोलायमान हो रहा है। भारतीय अपने वर्गभेद की भावना को मिटाकर अपने विशाल हृदय, सत्यनिष्ठ नेताओं के आदेश पर चलें और संकुचित विचार वाले उन्नति में बाधक नेताओं से बचें, तभी उनका कल्याण होगा।