अक्टूबर 2019

महात्मा गाँधी की अहिंसा को समर्पित मेरी आत्मा

मार्टिन लूथर किंग

(मार्टिन लूथर किंग गाँधी के बाद गाँधी मार्ग के सबसे बड़े सिपाही थे। उन्होंने काले अधिकारवाद की समूची लड़ाई अमेरिका में गाँधी मार्ग से लड़ी और जीसस क्राइस्ट ने जो सिद्धांत दिए थे, उनका आचरण गाँधी में पाया था। प्रस्तुत है गाँधी और मार्टिन लूथर किंग के विचारों का संगम)

मैं एक दिन इतवार को हॉवर्ड विश्वविद्यालय के अध्यक्ष डॉ. मारडेकाई जॉनसन के प्रवचन सुनने फिलेडेल्फिया गया। डॉ. जॉनसन अपनी भारत यात्रा से लौटे ही थे। मेरी गाँधी में आस्था और गम्भीर रुचि थी और डॉ. जॉनसन ने उस दिन मेरी रुचि के मुताबिक गाँधीजी के ही जीवन और कर्म पर प्रकाश डाला। उनका भाषण इतना तेजस्वी, प्रखर और प्रभावशाली था कि मैं मीटिंग खत्म होते ही झट से उठा और लगभग आधा दर्जन किताबें गाँधी पर खरीद लाया। ज्यादातर लोगों की तरह गाँधी के बारे में सुना तो मैंने भी बहुत कुछ था, मगर उन्हें गहराई के साथ पढ़ा कभी नहीं था। जैसे-जैसे मैं गाँधी को पढ़ता गया, वैसे-वैसे मैं उनके अहिंसात्मक प्रतिरोध के अभियान से बहुत तेजी से आकर्षित होता चला गया। खास तौर से उनके नमक सत्याग्रह और अधिकार के लिए अनेक अनशन की प्रणाली से मैं बहुत प्रभावित हुआ। सत्याग्रह का विचार तो बहुत ही जबरदस्त था। सत्य का मतलब न केवल सत्य, बल्कि समान प्रेम और आग्रह का मतलब सत्य और प्रेम की शक्ति था। इस प्रकार गाँधी का सत्याग्रह जो कि सत्य की शक्ति और प्रेम की शक्ति का प्रतीक था, मेरे लिए अपने पूरे राजनीतिक दर्शन का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। जैसे-जैसे गाँधी दर्शन का मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ता गया, वैसे-वैसे प्रेम की शक्ति को लेकर मेरे मन में जो संदेह उठा करते थे वे भी धीरे-धीरे मिटने लगे। मुझे पहली बार ऐसा लगा कि सत्याग्रह का सिद्धांत सामाजिक सुधार एवं परिवर्तन के लिए बहुत ही ताकतवर सिद्धांत है। गाँधीजी को पढ़ने के कुछ ही दिन पहले मैंने जीसस के जीवन से यह सीखा था कि जीसस के नैतिक आचरण व्यक्ति के सम्बन्धों पर बहुत प्रभाव डालते हैं और व्यक्ति अपना जीवन बदल सकता है। जीसस के नैतिक आचरण का जो दर्शन था, वह हमें यह सिखाता था कि अपने दुश्मनों से भी प्रेम करो और अगर कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो तुम अपना दूसरा गाल भी उसके सामने कर दो। सैद्धान्तिक रूप से यह दर्शन व्यक्ति-व्यक्ति के बीच के झगड़ों तक तो सही था, किन्तु जब व्यक्ति से आगे जाकर जाति समूहों और राष्ट्रों के बीच संघर्ष होता है, तब अधिक यथार्थवादी और अधिक कारगर प्रणाली की आवश्यकता होती है। मेरे इस सोच पर गाँधी को पढ़ने के बाद यह प्रभाव पड़ा कि मैं जीसस की बात समझने में कितना गलत था। विश्व के इतिहास में गाँधी ऐसे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने जीसस के नैतिक प्रेम के सिद्धांत को व्यक्ति- व्यक्ति के बीच से ऊपर उठाकर विराट और प्रभावशाली सामाजिक शक्ति का रूप दे दिया। गाँधी के लिए प्रेम सामाजिक एवं सामूहिक रूपान्तर का एक अत्यंत शक्तिशाली औजार था। गाँधी के प्रेम और अहिंसा के इसी प्रभावशाली सिद्धांत में मैंने भी अपने लिए सामाजिक परिवर्तन के एक ऐसे रास्ते को तलाशा, जिसकी खोज में मैं कई महीनों से था। मुझे जो बौद्धिक और नैतिक संतोष न कभी बेन्थम और मिल के उपयोगितावाद से मिला न मार्स और लेनिन के क्रान्तिकारी तरीकों से, न हॉब्स के सामाजिक समझौते के सिद्धांत से, न रूसो के प्रकृति की ओर लौटने के सिद्धांत से और न ही नीत्शे के अति-मानव के दर्शन से मिल सका था, वह संतोष मुझे गाँधी के अहिंसक प्रतिरोध के दर्शन में हासिल हुआ। मुझे लगा कि यह एक मात्र नैतिक और व्यावहारिक रूप से ऐसा सुदृढ़ तरीका है, जिसको अपनाकर शोषित, पीड़ित और दलित लोग अपनी स्वतंत्रता का संघर्ष कर सकते हैं। ईसाई आदर्शों की मेरी पृष्ठभूमि के कारण ईसाई धर्म को जहाँ मैंने अपने नियमित जीवन का आदर्श बनाया, वहीं गाँधी से मैंने सीखा कि प्रेम और अहिंसा को बड़े पैमाने पर आजमाया कैसे जा सकता है। गाँधी और मार्टिन लूथर किंग का वैचारिक संगम गाँधी ने कहा था - किसी भी सभ्यता का मूल्याँकन किसी भी देश के द्वारा उस देश के अल्प-संख्यकों के साथ किए जाने वाले व्यवहार से किया जा सकता है। हमें चाहिए कि हम आसुरी शक्तियों का अपने मानवीय देवत्व से मुकाबला करें। हमें उनके असत्य का जवाब सत्य से देना चाहिए। हमें चाहिए कि हम उनकी धूर्तता और छद्मों का मुकाबला सरलता और खुलेपन से तथा उनके आतंकवाद तथा भयावहता का मुकाबला बहादुरी और धैर्यपूर्ण शालीनता से करें। - मैं अंग्रेजों से कहता हूँ कि मैं उनसे प्रेम करता हूँ और मैं उनका साथ चाहता हूँ (लेकिन ये सब उस स्थिति में हो जो आत्मसम्मान और पूर्ण समानता के प्रतिकूल न हों) - हिंसा असमानता से पैदा होती है और अहिंसा समानता से। - ईसा मसीह, डेनियल और सुकरात ने शुद्ध रूप से मौन प्रतिरोध अथवा आत्मबल का प्रतिनिधित्व किया। इन सभी (विचारकों) शिक्षकों ने अपनी देह को आत्मा के मुकाबले नगण्य समझाने में टॉलस्टाय इस सिद्धांत के सबसे प्रखर (आधुनिक) प्रतिपादक (अनुयायी) थे। - अहिंसा में बहादुरी, जान देने में निहित है न कि मारने में। - किसी भी व्यक्ति के पास यदि वह सच्चा है तो उसकी जान से ज्यादा कीमती कोई वस्तु देने के लिए नहीं होती। - यदि मुझे किसी सिरफिरे आदमी की गोली से मरना भी पड़े तो मैं हँसते-हँसते मरूँगा। मेरे अन्दर कोई आक्रोश नहीं होगा। मेरे मन में और जबान पर भगवान का नाम होगा। और एक वचन दें वह यह कि यदि कभी ऐसा घटित हो जाए तो आप एक भी आँसू नहीं बहाएंगे। मार्टिन लूथर किंग ने कहा था - मेरा एक सपना है और वह यह कि मेरे चार छोटे बच्चे एक दिन ऐसे राष्ट्र में रहेंगे, जहाँ पर उनकी पहचान उनकी त्वचा के रंग से न होकर उनके चरित्र से होगी। - यदि हम प्रतिदिन गिरफ्तार किए जाएं, हमारा प्रतिदिन शोषण हो और हम पर प्रतिदिन जल्म किए जाएं, तब भी तुम अपने आपको इतना नीचा गिरने का मौका मत दो, जिससे तुम उससे नफरत करने लगो। हमें प्रेम के हथियार का इस्तेमाल करना चाहिए। हमें अपने से नफरत करने वाले के प्रति और समझदारी से काम लेना चाहिए। हमें इस बात को समझना चाहिए कि कई व्यक्ति ऐसे हैं, जिन्हें हमसे नफरत करना सिखाया जाता है, जबकि वे स्वयं उस घृणा के लिए जिम्मेदार नहीं होते हैं। लेकिन जब हम अपने जीवन के बीच हमेशा ही एक नई सुबह के द्वार पर होते हैं। - काले आदमी (नीग्रो) को भय से मुक्ति दिलाने के लिए गोरों की आवश्‍यकता होती है। गोरों को उनकी अपराध भावना से छुटकारा दिलाने के लिए कालों की जरूरत होती है, कालों की श्रेष्ठता का सिद्धांत उतना ही हानिकर है, जितना की गोरों का आधिपत्य का। - हम बुराई का बदला भलाई से दें और अपने दुश्मनों से प्यार करें। ईसा ने हमें यह सब करने का मार्ग बताया और गाँधी ने दिखाया कि ऐसा किया जा सकता है। - मैं अन्तरात्मा से महसूस करता हूँ कि अनायास आने वाली पीड़ा मुक्तिदायक होती हैं और यदि मेरे साथ कुछ भी घटित होता है तो मुझे यह मानना चाहिए कि उसमें मेरा कहीं न कहीं हित निहित है - यदि कोई तुम्हें धक्का दे तो उसे पलटकर धक्का मत दो। हममें इतना साहस होना चाहिए कि हम उसे वापस मारने को मना कर सकें। - मेरे पति अक्सर बच्चों को कहा करते थे कि यदि किसी व्यक्ति के पास कोई भी ऐसी चीज नहीं है, जिसके लिए उसकी जान ली जा सके तो ऐसा व्यक्ति जिन्दा रहने लायक नहीं है। - मैं नहीं कह सकता आगे क्या होने वाला है। आने वाले कुछ दिन कठिनाई भरे होंगे, लेकिन इससे अब मुझे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि मैं पर्वत शिखर तक पहुँच चुका हूं। - किसी भी अन्य व्यक्ति की तरह मैं लम्बे समय तक जीना चाहूँगा। दीर्घायु होने का अपना महत्व है। अभी उससे मुझे कोई मतलब नहीं। अभी तो केवल वही चाहता हूँ जो भगवान की इच्छा है। - उसने मुझे शिखर तक पहुँचाया है और मैंने चारों ओर देखा, वहाँ मुझे एक आश्वस्त धरती के दर्शन हुए। हो सकता है तुम्हारे साथ न जा सकूँ, लेकिन मैं तुम्हें ये बताना चाहता हूँ कि हम उस महान धरती में अवश्य प्रवेश करेंगे इसलिए मैं रात में प्रसन्न हूँ। मैं किसी आदमी से नहीं डरता। मेरी आंखों ने ईश्वरीय प्रकाश को उतरते देखा है।