अक्टूबर 2019

महात्मा गाँधी और शांति

अलबर्ट आइन्सटीन

(भौतिकशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता अलबर्ट आइन्स्टीन की मृत्यु 1955 में हो गई थी। वे मूल रूप से तो जर्मन यहूदी थे, मगर जर्मनी में नाजीवादी आतंक के कारण उन्होंने जर्मनी छोड़ कर 1940 में अमेरिका की नागरिकता ग्रहण कर ली थी। एक वैज्ञानिक के साथ वे एक प्रतिभावान संगीतज्ञ और वायलिन वादक भी थे। अणुबम की खोज को उन्होंने अपने भौतिक शास्त्र की सर्वाधिक बड़ी पराजय और भूल माना था। गाँधी की करुणा, दया और अहिंसक मनुष्यता के कारण वे गाँधी को मानवता का श्रेष्ठतम संस्करण मानते थे)

जो भी आदमी मानव जाति के बेहतर भविष्य के बारे में सोचता है, वह महात्मा गाँधी के दुखद निधन से विचलित हुए बिना नहीं रहा होगा। उनकी मौत उनके अपने ही सिद्धांतों, जिसे वे अहिंसा का सिद्धांत कहते थे, से हुई अर्थात वे अपने अहिंसा के ही सिद्धांत का शिकार हुए। उनकी मौत का कारण यह था कि उस समय देश में अव्यवस्था और अशाँति के होते हुए भी उन्होंने अपने लिए सशस्त्र सुरक्षा व्यवस्था स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि बल का प्रयोग करना अपने आप में एक बुराई है और जो लोग पूर्ण न्याय के लिए प्रयासरत हों, उन्हें उस बुराई से दूर रहना चाहिए। इस विश्वास के लिए उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया और अपने दिल और दिमाग में इस विश्वास के साथ उन्होंने एक महान देश को आजादी दिलाने के लिए अगुआई की। उन्होंने यह बताया कि मनुष्य का विश्वास केवल राजनीतिक धोखेबाजी और दांवपेंच वाले खेल से नहीं, बल्कि जीवन में उच्च आचरण की जीती-जागती मिसाल बनकर जीता जा सकता है। सारी दुनिया में अचेतन रूप से गाँधी को जो सम्मान हासिल था और उनकी जो पहचान स्थापित हुई थी, वह बताती है कि हमारे इस नैतिक पतन के यंग में गाँधी राजनीति के क्षेत्र में अकेले ऐसे राजनेता थे, जो मानवीय संबंधों के ऊँचे विचारों का प्रतिनिधित्व करते थे, जिसकी आकाँक्षा हम सबको पूरी ताकत से करनी चाहिए। हमें इस कठिन नियम को सीखना चाहिए कि मानव जाति का भविष्य तभी टिक सकेगा, जब हमारा रास्ता साँसारिक मामलों में अन्य मामलों की तरह न्याय एवं कानून पर आधारित होगा न कि ताकत के डर पर जैसा कि आज तक होता रहा। हमारे समय की महान राजनीतिक हस्ती गाँधी ने ही तो हमें यह बताया कि यदि मनुष्य सही रास्ते की खोज कर ले तो वह किस हद तक कुरबानी दे सकता है और उसका क्या महत्व है। उनके द्वारा हिन्दुस्तान की आजादी के लिए किए गए कार्य इस बात के जीते जागते गवाह हैं कि यदि मनुष्य का संकल्प उसके अदम्य विश्वास के साथ कायम रखा जाए तो वह भौतिक ताकतों की अपेक्षा कहीं अधिक असरदार हो सकता है। कुल मिलाकर मेरा यह विश्वास है कि गाँधी अपने समय के सभी राजनीतिज्ञों में सर्वाधिक प्रबुद्ध विचारों वाले व्यक्ति थे। हमें उनकी ही जैसी भावनाओं के साथ कार्य करने का प्रयास करना चाहिए। हमें चाहिए कि हम अपने किसी भी मामले में हिंसा का प्रयोग न करें और ऐसे किसी काम में हिस्सा न लें जिसे हम बुरा समझते हों। बिना हिंसा का प्रयोग किए क्राँति लाना महात्मा गाँधी का ही तरीका था, जिससे उन्होंने भारतवर्ष को आजादी दिलाई। मेरा विश्वास है कि पूरी दुनियां में शांति कायम करने की समस्या केवल महात्मा गाँधी का तरीका बड़े पैमाने पर लागू करने से हल होगी। मैं अपने जीवन में सदा ही शाँतिवादी रहा हूँ और अपने समय की सच्ची महान राजनीतिक हस्ती केवल गाँधीजी को ही मानता हूँ। मैंने थौरू को कभी नहीं पढ़ा और न ही मैं उनकी जीवनी से परिचित हूँ। स्वतंत्र एवं नैतिक निर्णय लेने वाले ऐसे कई लोग हुए हैं और हैं, जिन्होंने बुराई का प्रतिरोध करना अपना कर्तव्य माना, चाहे वह बुराई कानून सम्मत ही क्यों न हो। यह हो सकता है कि गाँधी के विचारों को थौरू ने प्रभावित किया हो। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि गाँधीजी का विकास असामान्य बौद्धिक और नैतिक ताकतों के साथ राजनैतिक प्रवीणता के संगम की एक अद्भुत स्थिति के कारण हुआ। मेरे विचार से गाँधी थौरू और टॉल्सटॉय के बिना भी गाँधी ही होते। आने वाली पीढ़ियाँ बड़ी मुश्किल से विश्वास करेंगी कि हाड़-माँस का एक ऐसा भी व्यक्ति था, जिसके इस धरती पर चरण पड़े थे।