अक्टूबर 2019

सत्याग्रह और अहिंसा के मार्ग से आजादी

नेलसन मंडेला

(नोबेल पुरस्कार, नेहरू पुरस्कार एवं अनेक शाँति एवं मानवता के पुरस्कारों से विभूषित नेलसन मंडेला का जीवन सतत संघर्ष की एक ऐसी कहानी है, जिसने गाँधी के बाद विश्व समाज को सर्वाधिक प्रभावित किया है। उनकी आत्मकथा ‘लाँग वॉक टू फ्रीडम' के कुछ अंश गाँधी के संदर्भ में प्रस्तुत)

भारतीय स्वतंत्रता और सत्याग्रह का अभियान एक ऐसा अभियान था, जो हमारी यूथ लीग के लिए विदेशी सरकार के प्रतिरोध का मॉडल था। इससे लोगों में सविनय अवज्ञा की भावना पैदा हुई, उनमें क्रांतिकारी भावना का उदय हुआ और लोगों के मन से जेल में जाने का डर खत्म हुआ। इसके साथ ही यह अभियान राष्ट्रीय साउथ अफ्रीकी काँग्रेस में बहुत लोकप्रिय भी हुआ। काँग्रेस के इस गाँधीवादी अभियान ने हमें याद दिलाया कि स्वतंत्रता का संघर्ष केवल भाषण देना नहीं है, सभाएं आयोजित करना नहीं है, प्रस्ताव पास करना और प्रतिनिधि मंडल भेजना नहीं है, बल्कि अच्छे प्रकार से सामूहिक जनकार्रवाई के लिए लोगों को संगठित करना है और उन्हें यातनाओं और बलिदानों के लिए स्वेच्छा से तैयार करना है। भारतीय अभियान के जरिए महात्मा गाँधी ने 1963 में जो नकारात्मक प्रतिरोध की रणनीति अपनाई थी और नेटॉल और ट्राँसवाल में जिस जोश-खरोश के साथ भारतीय समूह ने प्रदर्शन किया था, वह घटना मुझे भी तमाम साम्राज्यवादी नियमों के खिलाफ ऐसा ही विरोध करने के लिए प्रेरक बनी। वह एक ऐसा इतिहास था और वह एक ऐसा अभियान था जो मेरी ही आँखों के सामने घटित हुआ था। हमने अपनी जनता को यह समझाया कि गाँधी ने जो अहिंसक प्रतिरोध तथा सन् 1946 में सविनय अवज्ञा का आन्दोलन भारत में चलाया था, वही रास्ता हमारा भी होगा। हमें गाँधी की तरह साहस से काम लेना होगा और अफ्रीकी नेशनल काँग्रेस जो कि अत्याचारों के विरुद्ध कमजोर एवं विनम्र पड़ जाती है, उसे बताना होगा कि वक्त आने पर और जरूरत पड़ने पर जिस प्रकार गाँधी और उनके अनुयायी कानून तोड़कर जेल चले गए, उसी प्रकार हम भी अत्याचारों के विरुद्ध कानून तोड़ने की हिम्मत अपने में पैदा करें। हमने लोगों से यह भी चर्चा की कि हम अपने अभियान को गाँधी जी के अहिंसा के उस सिद्धांत से चलाएंगे, जिसे वे सत्याग्रह कहते थे और जिसके जरिए वे लोगों का दिल जीतकर उनका मन बदल देते थे। कुछ लोगों का तर्क था कि अहिंसा शुद्ध नैतिक आधार पर नैतिक दबाव पैदा करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है। महात्मा गाँधी के सुपुत्र और इण्डियन ओपिनियन नामक अखबार के सम्पादक जो दक्षिण अफ्रीकी स्वतंत्रता परिषद् के एक महत्वपूर्ण सदस्य थे, ने भी मेरे इस विचार की पुष्टि की। मणिलाल गाँधी स्वयं भी गाँधीजी की तरह अहिंसा और विनम्रता के प्रतीक थे और उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हमारा स्वतंत्रता अभियान भी उनके पिता द्वारा बताए गए मार्ग पर चले। हमें गाँधी के अहिंसा के सिद्धांत और तरीके का राजनीतिक तिकड़म की तरह इस्तेमाल न करके परिस्थितियों की माँग के अनुसार करना है। यदि अपने शत्रु को हराने के लिए कोई काम होता है तो उसमें तिकड़मबाजी ठीक है। हमारे मामले में हम जानते हैं कि जो साम्राज्य हमारे सामने है वह हमसे कहीं अधिक शक्तिशाली है और ऐसे हिंसा के किसी भी तरीके को वे बुरी तरह से कुचल कर रख सकते हैं। इससे अहिंसा ही एकमात्र विकल्प के रूप में अत्यंत आवश्यक है। मेरी दृष्टि से गाँधी की अहिंसा में ही वही मॉडल मुझे नज़र आता है, जिसे हम परिस्थितियों की माँग पर एक अहिंसक प्रणाली की तरह काम में ला सकते हैं। अहिंसा का सिद्धांत उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितनी उसे अपनाने की रणनीति, जिसमें स्वयं गाँधी भी यह मानते थे कि हार जाने पर भी अपनी आत्मा को अशांति नहीं होती। मैं चाहता हूँ कि हम अहिंसा का प्रयोग तब तक करते चले जाएं, जब तक उसका प्रभाव कायम है। इस बात को लेकर मणिलाल गाँधी को कुछ आपत्तियाँ अवश्य थीं, मगर संयुक्त योजना निर्माता समिति ने अहिंसक असहयोग आंदोलन को एक खुला कार्यक्रम स्वीकार कर लिया और इस बात पर हम सहमत हुए कि हमारे आंदोलन के दो चरण होंगे। पहले चरण में अच्छे प्रशिक्षित स्वयं सेवक शहरी कानून तोड़ेंगे, जिसमें स्वयंसेवी कार्यकर्ता शहरों में जाकर पुलिस को सिविल नाफरमानी की सूचना देकर कानून भंग करेंगे और कर्फ्यू लग जाने के बावजूद शहरों में रहकर आंदोलन का नेतृत्व करेंगे। दूसरा चरण होगा जिसमें सामूहिक रूप से बड़े पैमाने पर जन-अवज्ञा, हड़ताल और कारखाने बन्द करा देने की कार्रवाई होगी। यह आंदोलन अहिंसक तरीके से पूरे देश में चलाया जाएगा। कुछ दिन बाद मुझे संदेह होने लगा कि जो कानून भंग करने या संविधानेतर उपाय हैं, वे भी असंभव हो जाएंगे। गाँधी के सामने भारत में एक ऐसी विदेशी ताकत थी, जो कुछ ज्यादा वास्तविकतावादी और दूरदर्शी थी। ऐसा अफ्रीकी काँग्रेस के साथ दक्षिण अफ्रीका में नहीं था। मुझे यह भी लगा कि अहिंसक और नकारात्मक प्रतिरोध तभी तक संभव है, जब तक उसका प्रभाव है और जब तक हमारा विरोधी या शत्रु उन्हीं कानूनों से बँधकर काम करता है। मगर यदि शांतिपूर्ण तरीकों का विरोध हिंसा के ज़रिए होता है तो शांति का प्रभाव समाप्त हो जाता है। मेरे लिए अहिंसा का सिद्धांत नैतिक सिद्धांत न होकर एक रणनीति था। इसलिए मैं कभी-कभी यह भी मानता था कि एक बेअसर हथियार के इस्तेमाल से फायदा ही क्या। मगर गाँधी के सत्य, शांति और अहिंसा ने जिस प्रकार मेरे अन्दर प्रवेश कर लिया था, उनसे मुझे लगा कि शायद मैं ठीक नहीं होऊँ और मैं पक्की तरह से कुछ भी तय नहीं कर पा रहा था। इसलिए मैंने मणिलाल गाँधी, और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के अनेक लोगों से अपने आंदोलन की प्रणाली पर बार-बार चर्चा की। जब भी हम किसी निर्णय पर पहुँचने की कोशिश करते तो मेरी बात को मेरे ही साथी ठुकरा देते। मेरे ही साथी मुझसे मजाक में तानाकशी करते हुए कहते कि मैंने परोसी हुई थाली सामने रखी थी और मेरे सामने से हटा दी गई और मैं भूखा ही रह गया। कुछ अनशन और भूख हड़ताल के समर्थक ऐसे समय में मुझे समझाते कि उपवास तो एक पारंपरिक ऐसा तरीका है, जिसमें सारी दुनिया को विश्वास है और गाँधी ने यह तरीका अपना कर परंपरा का ही तो निर्वाह किया था। मुझे लगा कि जब भूखे रहकर उपवासों के ज़रिए एक इनसान एक खाते-पीते स्वस्थ और शक्तिशाली साम्राज्य को हिला सकता है तो फिर मैं उपवास या भूखे पेट की ताकत को भरे हुए पेट की ताकत से कम क्यों मानूं?