अक्टूबर 2019

सत्याग्रह की आग

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

पुराणों में भक्त प्रहलाद और इतिहास में सुकरात, ईसा मसीह, मीरा आदि कुछ नाम हैं, जिन्होंने सत्याग्रह को खुद पर उतारा है। लेकिन सविनय अवज्ञा आंदोलन अर्थात् सत्याग्रह की अवधारणा को दुनिया में महात्मा गांधी ने ही जमीन पर उतारा है। गांधी खुद अपनी बनाई सत्याग्रह की भट्टी में तपकर निकली आग, उससे निकली रोशनी और तप से बने पारस थे। सत्याग्रह उनकी अद्भुत खोज है। हर छोटे से छोटे, कमजोर से कमजोर आदमी को सत्य और न्याय के लिए बड़े से बड़े, ताकतवर आदमी के जुल्मो-अन्याय के खिलाफ अहिंसा से लड़ने की राह गांधी ने ही दिखाई है। सैकड़ों साल की गुलामी से जकड़े भारत का तन और मन दोनों ही बीमार थे। वो सीधे तनकर खड़ा भी न हो सकता था। उसे बोलने में भी डर लगता था। गांधी ने इस लाचारी को सबसे पहले दक्षिण अप्रâीका से भारत लौटने पर 1917 में बिहार में चंपारण में अंग्रेजों के खिलाफ उनके द्वारा चलाए गए सत्याग्रह आंदोलन में देखा। उन्होंने सत्याग्रह की अवधारणा धारण कर भारत की आजादी के लिए उसके टूटे मन को ताकत देने का काम इस तरह किया कि जो लड़ नहीं सकते, वे बोल तो सकते हैं, बोल नहीं सकते तो मौन समर्थन तो दे सकते हैं। कमजोर से कमजोर के दिल-दिमाग में एक आग प्रज्ज्वलित कर रोशनी देने का काम किया। उस रोशनी ने पूरे देश और दुनिया को भारत की गुलामी की उसके दर्द की तस्वीर दिखाई। आग से निकली गांधी रूपी रोशनी में जो भी नहा लिया या तपकर बने गांधी रूपी पारस को जिसने भी छू लिया, वह सोना बन गया। उसके घर में आजादी की आग लग गई। पं. मोतीलाल नेहरू ने भी उस आग से तपकर बने गांधी रूपी पारस को छू लिया। उसकी रोशनी में उनका पूरा परिवार नहा लिया। पूरा आनंद भवन जो अंग्रेज कमिश्नर अमीर उमराव की पार्टी से रोशन होता था। देश की आजादी के लिए वह पूरा परिवार जेल जाने लगा। खान अब्दुल गफ्फार खान, नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण से लेकर आजादी, इंसाफ और इंसानियत के लिए मर मिटने वालों की एक लंबी शृंखला है। जो गांधी रूपी पारस को छूकर सोना और सत्याग्रह की भट्टी में तपकर खुद पारस बन गए। आग को जिसने भी छुआ, उसकी रोशनी जहां भी पहुंची उसकी जिन्दगी में रात का अंधकार खत्म हुआ और एक नया सवेरा आ गया। गांधी ने दुनिया पर जिस अंग्रेजी राज की हुवूâमत चलती थी, जिसका सूरज कभी नहीं डूबता था, उसके हीरे-मोती, सूट-बूट में बैठे वायसराय के साथ अपनी धोती में लिपटी अद्र्धनग्न देह में एक टेबल पर एल्यूमिनियम के डिब्बे में खुद का बना सादा खाना खाया। जो किसी सामान्य अंग्रेज के साथ भी संभव नहीं था। यह विचित्र किन्तु सत्य नजारा था। लेकिन किसी पाखंड का वाहक नहीं था। बहुत ही स्वाभाविक था। गांधी ने अपनी पत्नी को डांट कर उनसे आश्रम में शौचालय साफ करवाया। पुत्र का विद्रोह झेला। गांधी के सिद्धांतों से उनका आश्रम भी जेल था और सत्याग्रह से जेल भी आश्रम थी। गांधी आजादी में आंदोलन के हिंसक बनकर राह भटकने पर आंदोलन समाप्त कर देते थे। उन्हें साधन की अपवित्रता मंजूर नहीं थी। गुस्सा करना बुरी बात है, लेकिन गांधी को गुस्सा आता था। रंग, नस्ल के भेदभाव के चलते अंग्रेजों ने उन्हें दक्षिण अप्रâीका में ट्रेन से बाहर कर दिया था। उन्हें गुस्सा आया, तभी तो वे अंग्रेजों से भारत को आजाद कराने के लिए लड़े। गांधी की मातृभाषा गुजराती थी। किन्तु उन्होंने देश की एकता के लिए हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाया। गांधी पक्के हिन्दू थे, लेकिन वे उससे भी बड़े मुसलमान, ईसाई, हरिजन बने। गांधी फकीर थे, लेकिन बिड़ला, बजाज से देश के लिए दोस्ती रखी। गांधी बोलते थे उससे ज्यादा दोनों हाथों से लिखते थे और पढ़ते थे। गांधी ने सत्याग्रह को खुद पर धारण किया और हर बार नया रास्ता चुना। वे दक्षिण अप्रâीका में जब वकालत करते थे, तब उन्होंने वकील के रूप में झूठ बोलने और गलत को सही सिद्ध करने से इंकार कर दिया। वे बुद्धि और विवेक को सद्मार्ग दिखाने और उस पर चलने के पक्षधर थे। गांधीवाद भारत की जमीन पर उतर नहीं सका है। यह देश का दुर्भाग्य है। यहां पर बुद्ध, महावीर, नानक, मीरा, कबीर, दयानंद, गांधी, लोहिया हों या अंबेडकर पूरे नहीं उतरे हैं। फिर भी जितने उतरे हैं, ये सभी लोग जाति, सम्प्रदाय, दलों के कटघरे को तोड़कर अनगिनत लोगों के दिल-दिमाग में समाये हुए हैं। दुनिया में जिस तरह कोई इंसान किसी की नकल नहीं होता है, वैसे ही पूरे के पूरे विचार भी किसी में उतर नहीं सकते हैं। मौलिकता एक खूबसूरत दुनिया के लिए जरूरी है। लेकिन उसकी शर्त यह है कि महान लोग और उनके विचार जो थे, जैसे थे, उससे बेहतर उतरना चाहिए। वरना अर्थ का अनर्थ हो जाता है। जैसा गांधी के संदर्भ में हुआ है। गांधी ने शरीर पर आधी धोती धारण की वो भी उनकी अनुभूति थी। दक्षिण अप्रâीका से जब वे भारत आए, तो सूट-बूट में थे। भारत आकर उन्होंने धोती-कुर्ता निमास्तीन, बंडी और काठिवाड़ी पगड़ी धारण कर ली। बिहार में नील की खेती पर अंग्रेजों के विरुद्ध उनके सविनय सवज्ञा आंदोलन के समय वे रोज सुबह लोगों के घरों पर उन्हें बुलाने जाते थे। वे लोग दरवाजा नहीं खोलते थे, क्योंकि घर में महिलाओं के तन पर पूरे वस्त्र नहीं होते थे। बिहार से वे मद्रास गए, वहां पर वे एक सभा में भाषण कर रहे थे, लेकिन उनके दिमाग में दृश्य बिहार की महिलाओं का घूम रहा था। वे मंच से उतरे, उनके दिमाग में विचार आया कि जिस देश में नारी के तन पर वस्त्र नहीं, वहां पर मैं अकेला पांच लोगों के वस्त्र वैâसे पहन सकता हूं और उन्होंने सिर्पâ धोती धारण कर ली। गांधी बड़े बांध और बड़े उद्योग की जगह छोटे बांध और लघु कुटीर उद्योग पसंद करते थे। वे अंग्रेजी की जगह हिन्दी और स्वदेशी भाषा में देश चलाना चाहते थे। गांधी परिवार नियोजन से सहमत नहीं थे। नेहरू इसके विपरीत थे। उन पर गांधीवाद छोड़ने के जो आरोप लगते हैं, वे गलत हैं। नेहरू ने गांधी को जेल से पत्र में लिखा है कि बापू मैं आपके लघु उद्योग छोटे बांध के विचारों से सहमत नहीं हूं। इसलिए आजादी के बाद प्रधानमंत्री बनने के साथ ही नेहरू पंजाब में भाखड़ा नंगल बांध और मध्यप्रदेश में भिलाई स्टील प्लांट लाए। आजादी के बाद बनी समाजवादी पार्टी गांधी के विचारों की वाहक थी। राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, अरुणा आसफ अली, मधु लिमये, एसएम जोशी, अशोक मेहता, आचार्य कृपलानी सहित अनेकानेक लोग थे, जिन्होंने नेहरू के विचारों को नकारा। ये उस दौर में कुजात गांधीवादी कहलाए। गांधी ने जेल में देखा कि बंद तो सब देश के लिए हुए हैं, लेकिन जाति के कुचक्र के कारण बंटे हुए हैं। खाना तो ठीक एक-दूसरे का छुआ पानी भी नहीं पी सकते हैं। गांधी ने दलित की पीड़ा को शिद्दत से महसूस किया, उसी की परिणिती थी संविधान में आरक्षण। नौकरी के साथ लोकसभा-विधानसभा में यदि आरक्षण नहीं जुड़ता तो देश की आबादी का यह सबसे बड़ा तबका आज भी जिस तरह जिन्दगी के हर महत्वपूर्ण हिस्से से गायब है। आज भी शोषित वंचित है। जुल्म अन्याय का शिकार हो रहा है। आये दिन देश में घटनाएं सामने आ रही हैं। उसकी क्या स्थिति होती होगी, इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। आजादी के बाद गांधी का मिशन कमिशन में बदल गया। बाद में कमिशन भी छोटा पड़ गया। वो एक कॉम्पिटीशियन में बदल गया है। आज सत्ता की प्राप्ति हेतु मची अंधी दौड़ जिसमें साम-दाम-दंड भेद से बने अश्वमेध के घोड़े पर बैठकर लूट-खसोट की जिस किस्म की राजनीति हो रही है, उसने गांधी की तस्वीर पर एक धुंध सी ला दी है। लेकिन हकीकत इससे उलट भी है। ना मालूम कहां-कहां से जिन्दगी के हर हिस्से में अपने हक के लिए मजदूरी, खेती, किसानी, जल, जंगल, जमीन, जाति, संप्रदाय, मीडिया पर पाबंदी, बोली पर रोक, शोषण, गरीबी, लाचारी, जुल्म अन्याय के विरुद्ध चल रहे संघर्ष और आती आवाजें बताती हैं कि गांधी अभी जिन्दा है। गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ दुनिया के इतिहास की एक अनमोल विरासत है। गांधी ने भारत के दिलदिमाग को किस कदर अपने से जोड़ा था, उसकी आज की पीढ़ी कल्पना भी नहीं कर सकती। इंदौर में टोरी-कार्नर के जनक श्री बाबूलाल गिरि जिनका अभी तीन वर्ष पूर्व ही 94 वर्ष की उम्र में निधन हुआ है, वे बताते थे कि गांधी की मौत की खबर के साथ ही हमने ही नहीं, इंदौर के हर होटल वाले ने अपनी होटल का दूध ढोलकर गटरों में डाल दिया था। सबको ऐसा लग रहा था, जैसे खुद के घर के बड़े आदमी की मौत हुई हो। आजादी के बाद नेहरू युग में ही त्याग की जगह भोग और पतन की शुरुआत हो चुकी थी। लेकिन नेहरू आजादी की लड़ाई के हीरो थे। नेहरू का विकास का ढांचा अंग्रेजी और यूरोपियन सोच का था। उनका तीव्र विरोध करते हुए डॉ. लोहिया ने कहा था कि आजादी के पहले के नेहरू मेरे हीरो थे, मैं उन्हें सलाम करता हूं, लेकिन आजादी के बाद के नेहरू का मैं विरोध करता हूं। यह विरोध वैचारिक था। इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि जो लोग आज नेहरू को दोषी करार दे रहे हैं, वे सही हैं। असल में तो वे इंडिया को माथे पर और भारत को कदमों में बैठाकर विकास की बात कर रहे हैं। आज देश के पास न तो नेहरू जैसा लोकतांत्रिक वैज्ञानिक सोच का प्रधानमंत्री है और न ही डॉक्टर लोहिया जैसा चिंतक जुझारु संघर्षशील प्रतिपक्ष का नेता है। गांधी के 150 वर्ष का निष्कर्ष यह है कि गांधी का जो चित्र देश के सामने फोटो, मूर्ति के रूप में है, गांधी को जिस तरह आजादी के बाद की सत्तारूढ़ कांग्रेस तत्पश्चात् बाकी के राजनैतिक दलों ने अपने चेहरे पर लगा लिया। उससे एक कमजोर गांधी की छवि उभरती है। आज राजनीति सेवा से सत्ता में बदल गई है। भ्रष्टाचार, ऐश, ऐश्वर्य और भोग-विलास ने सत्याग्रह पर ग्रहण लगा दिया है, जिसकी गिरफ्त में देश के सभी राजनीतिक दल आ गए हैं। गांधी की प्रेम और अहिंसा की ताकत जो दुनिया की हर हिंसा और नफरत पर भारी थी। वह लुप्त प्राय दिखती है। गांधी ने हर वो कर्म और संघर्ष किया, जिससे सदियों का खंड-खंड भारत जुड़कर एकता के सूत्र में बंध सके। उनकी उन कोशिशों को अंजाम देने में रुकावटें आती रहीं। गांधी ने कहा था- ‘‘भारत-पाक बंटवारा मेरी लाश पर होगा।’’ लेकिन बंटवारा हुआ। वो एक दुखद परिणिती बन गया। गांधी मरे नहीं, वरन् उन्हें मार दिया गया। जिंदा तो दुनिया में सदा रहते आया नहीं कोई, लेकिन जिस तरह से वे गए, वैसे जाता भी नहीं कोई। गांधी की मौत ने पूरी दुनिया के सामने सदैव के लिए एक अमिट अमर गाथा लिख दी। डॉ. लोहिया ने कहा था कि 19वीं शताब्दी में दो महान घटनाएं हुई है। एक गांधी और दूसरा आइंस्टीन। एक ने दुनिया को अहिंसा और दूसरे ने हिंसा, एक ने सत्याग्रह और दूसरे ने अणुबंम दिया है।