अगस्त 2019

देश के भीतर पलायन

रोहन शर्मा

अगली जनगणना शुरू होने में दो साल से भी कम समय रह गया है लेकिन 2011 की जनगणना से हासिल हुई कई जानकारियां अभी भी सामने आने का सिलसिला बना हुआ है। ऐसी ही एक ताजा प्राप्त जानकारी के मुताबिक देश में 5.6 करोड़ लोग अपने मूल राज्य में नहीं रहते। मतलब यह कि उनका जिस राज्य में जन्म हुआ, वहां न रहकर वे किसी और राज्य में रहते हैं।

अपने देश में हर दशक के प्रारंभिक वर्ष में जनगणना होती है, जिससे न सिर्फ देश की कुल आबादी का पता चलता है बल्कि लिंग अनुपात और अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों की संख्या के बारे में भी जानकारी मिलती है। लोगों की आर्थिक-सामाजिक स्थिति का हाल-चाल भी मालूम होता है और लोगों के रहन-सहन के स्तर, उनके रोजगार की स्थिति तथा सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता का आकलन भी जनगणना के आंकडों से ही होता है। दावा किया जाता है कि जनगणना से प्राप्त आंकडों के आधार पर ही सरकारें अपनी नीतियों का निर्धारण करती हैं। यह दावा कितना सही है, यह एक अलग बहस का विषय है। बहरहाल अगली जनगणना शुरू होने में दो साल से भी कम समय रह गया है लेकिन 2011 की जनगणना से हासिल हुई कई जानकारियां अभी भी सामने आने का सिलसिला बना हुआ है। ऐसी ही एक ताजा प्राप्त जानकारी के मुताबिक देश में 5.6 करोड़ लोग अपने मूल राज्य में नहीं रहते। मतलब यह कि उनका जिस राज्य में जन्म हुआ, वहां न रहकर वे किसी और राज्य में रहते हैं। दरअसल भारत में कुछ राज्य ऐसे हैं, जिनसे बड़ी संख्या में लोग दूसरे राज्यों में शिक्षा या रोजगार के लिए के लिए जाते हैं और वहीं बस जाते हैं। जनगणना के आंकडों के मुताबिक उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश ऐसे राज्य हैं जहां से सबसे ज्यादा संख्या में लोगों का पलायन दूसरे राज्यों में होता है। दूसरी ओर महाराष्ट्र, दिल्ली और गुजरात ऐसे राज्य हैं, जहां आने वाले प्रवासियों की संख्या सबसे अधिक होती है। बिहार में अन्य राज्यों से आकर बसने वालो की संख्या सबसे कम है। यहां आकर बसने वाले करीब 10 लाख प्रवासी पड़ोसी झारखंड और उत्तर प्रदेश के हैं। उत्तर प्रदेश में बसने वाले प्रवासियों की बड़ी संख्या दिल्ली से जाकर गाजियाबाद और नोएडा मे रहने वाले लोगों की है। प्रदेश में करीब 40 लाख प्रवासी दूसरे राज्यों से आकर रह रहे हैं, जबकि प्रदेश छोडकर जाने वालों की संख्या 1.3 करोड़ के करीब है। वैसे उत्तर भारत से पलायन करके लोग दक्षिण भारतीय राज्यों में भी जाते हैं, लेकिन दक्षिणी राज्यों में बसे उत्तर भारतीयों की संख्या काफी कम है। वहां बसने वाले प्रवासी ज्यादातर आसपास के राज्यों से ही हैं। यही हाल पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और हरियाणा का है। आंतरिक यानी अंतरराज्यीय आप्रवासन कहीं न कहीं विकास प्रक्रिया में असंतुलन की देन है। अगर देश भर में उद्योग-धंधों का समान रूप से विकास हुआ होता और किसान के लिए खेती घाटे का सौदा नहीं बनती तो कुछ खास क्षेत्र के लोग रोजी-रोटी के लिए उद्योग-धंधों या कारोबार के सिलसिले में महानगरों या समृद्ध इलाकों की ओर इलाको की ओर पलायन नहीं करते। हालांकि विकास की प्रक्रिया हमेशा किसी निश्चित दिशा में नहीं चलती। एक समय उत्तर भारत के शिक्षा संस्थान देश भर में प्रसिद्ध थे और लोग उनमें दूर-दूर से पढने के लिए आते थे। लेकिन पिछले दो-तीन दशकों में दक्षिण भारत शिक्षा के मामले काफी आगे निकल गया, खासकर विज्ञान और तकनीकी शिक्षा के मामले में। इस वजह से बडी संख्या में छात्र अब साउथ का रुख करने लगे हैं। पलायन सिर्फ मजबूरी में ही नहीं होता। कुछ इलाकों में किसी खास विशेषज्ञता की मांग के कारण भी वहां दूसरे स्थानों से लोग आते है। आज के तकनीक प्रधान दौर मे माइग्रेशन एक जरुरत भी है। इसलिए इससे परेशान होने के बजाय इसे स्वाभाविक और सकारात्मक मानकर कुबूल किया जाना चाहिए। आज प्राय: हर राज्य में अनेक दूसरे राज्यों के लोग रहते है और उसके विकास में योगदान देते हैं, फिर भी कई राज्य सरकारें कई बार 'मूल निवासी' को तरजीह देने की बात करती है। यह एक नकारात्मक राजनीति है, जो कि राष्ट्रीय एकता की भावना के भी खिलाफ है। एक राज्य में रहने वाले हर व्यक्ति को बराबर अवसर और सुविधाएं मिलनी चाहिए, चाहे वह देश के किसी भी इलाके से आकर वहां बसा हो। देश में विकास का विकेंद्रीकरण आवश्यक है ताकि कुछ खास क्षेत्रों पर जनसंख्या का बोझ न बढे, लेकिन देश भर में लोगों की आवाजाही को नहीं रोका जा सकता। महिलाओं की लाचारी का ऐसा शोषण! दुनिया भर के तमाम देशों की तरह भारत में भी श्रमशक्ति के मामले में महिलाओं की हिस्सेदारी अच्छी खासी है, लेकिन उनके शोषण के जितने आयाम उन्हें देवी का दर्जा देने वाले हमारे देश में हैं, उतने शायद किसी और देश में नहीं होंगे। स्त्री सशक्तिकरण की दिशा में खूब काम करने के सरकारी और गैर सरकारी दावों के बीच इस हकीकत को रेखांकित किया है महाराष्ट्र से आई एक दर्दनाक और शर्मनाक खबर ने। खबर यह है कि महाराष्ट्र के बीड जिले में बीते तीन साल के दौरान बीस से तीस वर्ष की 4605 महिलाओं ने अपने गर्भाशय इसलिए निकलवा लिए कि उन्हें काम मिलने में अडचन न आए। अडचन यह कि वहां गन्ने की कटाई के समय ठेकेदार ऐसी मजदूर महिलाओं को काम पर रखना बेहतर समझते हैं, जिनके गर्भाशय निकाले जा चुके हों, क्योंकि ऐसे में माहवारी उनके काम में बाधा नहीं बनती। यही नहीं, अगर कोई महिला माहवारी की वजह से काम पर नहीं आती है तो ठेकेदार इसे काम में अडचन मानता है और उस महिला को बतौर जुर्माना पांच सौ रुपए ठेकेदार को देना पडते हैं। ऐसी स्थिति में फंसी महिलाओं के लिए गर्भाशय निकलवाने की मजबूरी आम है। अपनी गरीबी और बेबसी की मार झेलती इन महिलाओं के साथ इस तरह के अमानवीय बर्ताव का मामला पिछले दिनों महाराष्ट्र विधान परिषद में शिवसेना की सदस्य नीलम गोरहे ने उठाया था, जिस पर सरकार की ओर से स्वास्थ्य मंत्री एकनाथ शिंदे ने बीड जिले के 99 निजी अस्पतालों में 46०5 महिलाओं के गर्भाशय निकाले जाने की बात स्वीकार करते हुए पूरे मामले की जांच कराने का आश्वासन दिया था। लेकिन मामले की गंभीरता के अनुपात में इस पर जितनी चर्चा होनी चाहिए थी, वह नहीं हुई। अब इसी मुद्दे को राज्यसभा में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की वंदना चव्हाण ने उठाते हुए इस पर केंद्र सरकार से जांच कराने की मांग कर इसे फिर चर्चा में ला दिया है। यह अपने आप में बेहद गंभीर स्थिति है कि किसी तरह गुजारा करने वाली महिलाओं के सामने वहां गन्ने के खेतों में मजदूरी करने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं था। इसके अलावा वहां के ठेकेदारों को ऐसे अमानवीय नियम-कायदे बनाने से रोकने-टोकने वाला भी कोई नहीं, जो महिलाओं के सामने ऐसे लाचार हालात पैदा करते हैं। सवाल है कि देश और राज्य में बने श्रम कानूनों के बरक्स कुछ ठेकेदारों को अपनी मनमानी करने की छूट कैसे मिली? इससे बडी विडंबना और क्या होगी कि आजादी के 72 साल बाद भी देश में मजदूरों के हक में बने कानून बेहद कमजोर या बेअसर साबित हो रहे हैं। बात शायद अब इससे आगे जा रही है जिसमें किसी ठेकेदार ने मजदूर महिलाओं की मजबूरी का फायदा उठाते हुए निजी स्तर पर ऐसे नियम बना रखे थे कि अगर कोई महिला माहवारी की वजह से किसी दिन गैरहाजिर रहे तो उसके लिए उसे जुर्माना भरना पडे। सवाल है कि जब किसी नियम के अमल के सिलसिले में पडताल करनी होती है तो प्रशासन की निगाह से कोई छोटी से छोटी घटना भी छिप नहीं पाती, तो महिला मजदूरों के शोषण की पृष्ठभूमि में इतनी बडी अमानवीय गतिविधि पूरे तीन साल तक कैसे और किसकी शह पर चलती रही? रोजी-रोटी की खातिर और जिंदा रहने के लिए जिन महिलाओं को ठेकेदार की मनमानी का शिकार होना पडा, उन्हें असंगठित क्षेत्र में दर्ज किया जाएगा। हालत यह है कि संगठित क्षेत्र में भी रोजगार के लिए महिलाओं को अकसर कई तरह की दुश्वारियों का सामना करना पडता है। जबकि दुनिया भर में श्रमशक्ति के मामले में महिलाओं का बहुत बडा योगदान है। दुनिया के तमाम देशों में महिलाओं के अनुकूल नियम-कायदे बनाए जा रहे हैं। कई जगहों से माहवारी को ध्यान में रखकर उनके लिए सवैतनिक अवकाश के प्रावधान करने की भी खबरें आती हैं। लेकिन हमारे देश में कई बार उन्हें प्रतिकूल हालात का सामना करना पडता है। जरुरत इस बात की है कि महिलाओं की विशेष शारीरिक स्थिति को मद्देनजर रखते हुए इस तरह की मानवीय दृष्टि से युक्त कानून सभी क्षेत्रों की महिला कामगारों के लिए लागू किए जाएं और उनकी अनदेखी करने वाले नियोक्ताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो। जाति क्यों नहीं जाती? प्रेम और विवाह के मामले में जाति और संप्रदाय की दीवारों को लांघकर या पारंपरिक मान्यताओं को परे रखते हुए अपनी मर्जी से कदम बढाने को सामाजिक प्रतिष्ठा के हनन के तौर पर देखना और इसके लिए अपनी संतान या उसके साथी की हत्या कर देने वाले अमानुषिक कृत्य को हमारे समाज के आभिजात्य वर्ग और अंग्रेजी से प्रभावित मीडिया के बडे हिस्से में ऑनर किलिंग कहा जाता है। इस तरह की हत्या की घटनाएं उत्तर भारत के राज्यों में लंबे समय से बहुतायत में होती आ रही हैं, लेकिन अब यह बीमारी महामारी का रूप लेती हुई दक्षिण भारत में भी प्रवेश कर चुकी है। बीते एक सप्ताह के दौरान उत्तर से लेकर दक्षिण तक में झूठी शान के नाम पर हत्या की चार घटनाएं सामने आई हैं। जाहिर है कि आधुनिक और न्याय आधारित समाज बनाने के दावे के बीच महिलाओं को बराबरी और सम्मान की जगह देने के मामले में हम एक समाज और व्यवस्था के तौर पर बुरी तरह नाकाम हुए हैं। तमिलनाडु के थुत्तुकुडी में अंतरजातीय विवाह करने के बाद तीन महीने की गर्भवती युवती और उसके पति की झूठी शान के नाम पर हत्या कर दी गई। हत्या के आरोप में युवती के पिता को गिरफ्तार किया गया है। तमिलनाडु के ही कोयंबतूर से भी एक दंपति की इसी वजह से हत्या कर दिए जाने की खबर आई थी। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के इटावा और जेवर से भी दो दिनों के भीतर दो ऐसी घटनाओं की खबरें सामने आई हैं, जिनमें प्रेम या फिर अपनी मर्जी से विवाह करने की वजह से लडकी को उसके परिवार वालों ने मार डाला। आजादी के सात दशक बाद भी हो रही ऐसी घटनाएं स्पष्ट तौर पर बताती हैं कि आज भी हमारा समाज आदिम युगीन कबीलाई संस्कृति या मध्ययुगीन सामंती मूल्यों को ढो रहा है। इससे यह भी साफ होता कि 'बेटी बचाओ-बेटी पढाओ' से लेकर स्त्री सशक्तिकरण के तमाम कार्यक्रमों की कामयाबी अभी बहुत दूर है। परंपराओं और रुढियों की जडता हमारे सामाजिक विकास के रास्ते में किस कदर बाधक बनी हुई है कि एक पिता अपनी बेटी और उसके जीवन साथी हत्या सिर्फ इसलिए कर दे सकता है कि उन्होंने जातिगत दायरे के तोडकर प्रेम और विवाह कर लिया। ऐसी हत्या करने वाले को न सिर्फ इंसान होने की बुनियादी शर्त को समझना जरुरी लगता है और न ही उसे कानून का खौफ सताता है। सवाल है कि आखिर वे कौनसी वजहें हैं जिनके चलते आज भी बहुत सारे लोग आज भी यह समझने को तैयार नहीं हो रहे हैं कि न सिर्फ संवैधानिक व्यवस्था के तहत किसी वयस्क युवक या युवती को अपनी पसंद से प्रेम और विवाह करने का अधिकार है, बल्कि यह एक सभ्य और प्रगतिशील समाज का तकाजा भी है कि किसी वयस्क स्त्री या पुरुष के अपने निजी जिंदगी के बारे में लिए गए फैसलों का सम्मान किया जाए। माता-पिता या अभिभावक होने के नाते अपने बच्चों का ख्याल रखना और उनसे अपने प्रति संवेदना की अपेक्षा रखना गलत नहीं है। लेकिन सिर्फ इसी वजह से उनके जीवन को संचालित करने या उनकी इच्छाओं पर कब्जे को अपना अधिकार मानना और इसमें रुकावट आने पर अपने ही बच्चों को मार डालने का जघन्य अपराध पिछडी हुई सामंती और अमानुषिक सोच का परिचायक है। विडंबना यह है कि आधुनिकता और विकास की चकाचौंध के नाम पर बाहर से दिखने वाले बदलाव तो हर तरफ आम हो गए, लेकिन इनके वास्तविक मूल्यों के बारे में समझना जरुरी नहीं समझा गया। हमारा समाज अब तक जिन सामंती मूल्यों को जीता रहा है, उनके साथ अगर केवल दिखावे की आधुनिकता और विकास का घालमेल होता है तो वह ज्यादा घातक होता है। एक तरफ जातीय दंभ और झूठी हैसियत से जुडी अमानवीय मानसिकता और दूसरे, बेटी को अपनी इज्जत का पर्याय मान लेना किसी भी समाज के जातिवादी और पुरुष वर्चस्व की मानसिकता में जीने का ही सबूत है। बेटी के अपनी पसंद से प्रेम और विवाह करने पर उसे और उसके साथी को मार डालना झूठी शान की आड में की गई क्रूर हत्या ही है, जिसका कोई भी सभ्य और संवेदनशील व्यक्ति समर्थन नहीं कर सकता। बुजुर्गों की सुध बीते कई दशकों से तेजी से टूटते संयुक्त परिवारों और एकल या डिजाइनर परिवार के चलन ने हमारे समाज में बुजुर्गों की स्थिति को बेहद दयनीय बना दिया है। इससे बडी विडंबना और क्या होगी कि जो माता-पिता तरह-तरह के कष्ट उठाकर और बेहतर भविष्य के सपने देखते हुए अपने बच्चों का पालन-पोषण करते हैं, उन्हें पढाते-लिखाते हैं, कई बार उन्हें अपनी वृद्धावस्था में अपने उन बच्चों से ही उपेक्षा और अपमान मिलता है। उन्हें न तो उचित और आवश्यक भोजन नसीब होता है न ही बीमार होने पर दवाई। किसी-किसी को पारिवारिक सहारा न होने की स्थिति में बुजुर्गों के साथ ठगी और धोखाधडी की वारदातें भी अक्सर होती रहती हैं। शारीरिक रूप से अक्षम कई बुजुर्ग पारिवारिक प्रापर्टी के विवादों में उलझे रहते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इस तरह के दुख किसी भी माता-पिता को दुनिया के दूसरे तमाम दुखों से ज्यादा गहरा दर्द देते हैं। लेकिन कभी उम्र और हालात की मार तो कभी भावनाओं के बंधन से उपजी लाचारियों की वजह से उम्रदराज लोगों के सामने दुखों को अपने ही भीतर दबा लेने के सिवाय कोई विकल्प नहीं होता। यह स्थिति तब और ज्यादा जटिल हो जाती है जब उन्हें अपने हक में मौजूद कानूनी प्रावधानों की जानकारी नहीं होती या उनके प्रति वे जागरूक नहीं होते। अब केंद्र सरकार ने बुजुर्ग माता-पिता का ख्याल नहीं रखने, उनका परित्याग करने या उनसे दुर्व्यवहार करने वालों के खिलाफ बने कानूनों को और ज्यादा सख्त करने का प्रस्ताव किया है। इसके तहत अगर कोई व्यक्ति अपने बुजुर्ग अपने माता-पिता को उनके हाल पर छोड देता है या उनके साथ बेरहमी से पेश आता है तो उसे अब छह महीने तक की जेल की सजा हो सकती है। कानून में एक अहम बदलाव यह है कि इसके दायरे में अब तक माता-पिता की अपनी संतान और नाती-पोते आते हैं, वहीं अब दत्तक या सौतेली संतान, दामाद और बहू को भी इस दायरे में लाया जाएगा। किसी भी देश या राज्य की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वह जीवन चक्र की सहज प्रक्रिया की वजह से बुजुर्गों को न सिर्फ उनकी उम्र की वजह से उपजी असुविधाओं के मद्देनजर बल्कि एक नागरिक के तौर पर भी जरुरी मदद मुहैया कराए या इसके लिए बाकायदा कानूनी प्रावधान करे। इसमें एक जरुरी व्यवस्था यह करने की जरुरत है कि परिवार और समाज में उपेक्षा के शिकार तमाम बुजुर्गों की संतानों की जिम्मेदारी तय की जाए। अगर वे अपनी जिम्मेदारी से मुंह चुराते हैं तो इसे अपराध घोषित किया जाए। यूं बुजुर्गों की दुश्वारियों को कम करने के लिए राजनीतिक हलकों में समय-समय पर मांग उठती रही है और पहले भी कुछ कानूनी प्रावधान किए गए हैं। मसलन परिवार में वृद्धावस्था में पहुंच चुके लोगों की उपेक्षा और यहां तक कि मारपीट और घर से निकाल दिए जाने जैसी घटनाओं में बढोतरी के मद्देनजर ही 2007 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण पोषण व कल्याण कानून बनाया था। लेकिन समाज में बुजुर्गों के बीच जागरुकता की कमी की वजह से इसके असर का दायरा सीमित रहा। कुछ दिनों पहले बिहार सरकार ने भी एक अहम फैसला लिया है कि माता-पिता की सेवा नहीं करने और उन पर अत्याचार करने वाली संतानों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी और उन्हें जेल भेजा जाएगा। पश्चिम बंगाल, कर्नाटक आदि राज्यों में भी इस तरह के कानूनी प्रावधान किए गए हैं। ऐसे में अब अगर बुजुर्ग माता-पिता का ख्याल रखने के मकसद से केंद्र सरकार भी इस मसले पर पुराने कानूनी प्रावधानों को और ज्यादा सख्त और कारगर बनाने की दिशा में पहल कर रही है तो उसकी यह पहल निश्चित रूप से सराहनीय है। लेकिन इसके सकारात्मक नतीजे इस बात पर निर्भर करेंगे कि इन कानूनी प्रावधानों को लेकर समाज कितना जागरुक हो पाता है और वृद्धावस्था में पहुंचे लोगों को अपने अधिकारों के बारे में कितनी जानकारी हो पाती है। हालांकि यह कोई कम दुखद बात नहीं है कि बुजुर्ग अवस्था में पहुंच चुके माता-पिता की उचित देखभाल सुनिश्चित करने के लिए कोई कानूनी उपाय करना पडे, लेकिन जब एक स्वाभाविक और सामाजिक जिम्मेदारी के तहत उनकी संतान ऐसा नहीं करती है तो उन्हें कानूनन इसके लिए बाध्य करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। चांद पर कदम की याद ठीक 50 साल पहले पहली बार इंसान ने चांद पर कदम रखकर जो स्वर्णिम इतिहास रचा था, वह हमेशा याद रहने वाला क्षण है। धर्म ने चांद को पूज्य मान रखा था, लेकिन साहित्य ने इंसान को वहां पहले ही उतार दिया था, पर वास्तविक कमाल तो विज्ञान ने किया। उन दिनों पूरी दुनिया रोमांचित थी, जब अपोलो शृंखला का विमान चांद पर पहुंचा था। 20 जुलाई, 1969 को पहले नील आर्मस्ट्रांग और उनके 19 मिनट बाद बज एल्ड्रिन ने चांद पर पग धरे। चांद पर पहुंचने की वह खुमारी अभी भी इंसानों के दिमाग से उतरी नहीं है। अमेरिका की इस उपलब्धि को आज भी दुनिया का हर इंसान अपनी उपलब्धि मानता है, तो इसका पूरा श्रेय विज्ञान और वैज्ञानिकों को दिया जाना चाहिए। आज यह इतिहास है कि 24 अमेरिकी चार अभियानों के तहत चांद तक गए थे, जिनमें से 12 ने चांद पर कदम रखे। जो लोग अमेरिका के महाशक्ति होने पर प्रश्न उठाते हैं, उन्हें यह याद कर लेना चाहिए कि आज भी चांद पर इंसान को पहुंचाने वाला अमेरिका अकेला देश है। विज्ञान एक देश को कैसे आगे ले जाता है, यह हमें अमेरिका से अवश्य सीखना चाहिए। हालांकि आज भी चांद सौंदर्य का प्रतीक है, एक देव है, समय और तारीख का एक मानक है। वहां इंसान के कदम रखने से धरती पर बहुत कुछ नहीं बदला है। इसका सीधा-सा अर्थ है, इंसान को चांद से अभी कुछ ऐसा पाना है, जिससे उसके जीवन में बदलाव आएं अर्थात चांद पर विज्ञान को अभी बहुत काम करने हैं। यह गौर करने की बात है, 14 दिसंबर 1972 के बाद इंसान फिर कभी चांद पर नहीं गया, लगभग 46 साल हो गए। अमेरिका को छोड़ दीजिए, तो दुनिया में सिर्फ छह देश हैं, जिनकी चांद में रुचि है : रूस, चीन, भारत, जापान, इजरायल और जर्मनी। इनमें से भी केवल तीन, रूस, जापान और चीन इंसान को चांद पर पहुंचाने के अभियान में सक्रिय हैं। खुद अमेरिका की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। यह भी कहा जाता है कि शीतयुद्ध के कारण ही इंसान का चांद पर जाना संभव हुआ था। अंतरिक्ष विज्ञान में सोवियत संघ (पूर्व) और अमेरिका की प्रतिद्वंद्विता थी, जिसमें पहले सोवियत संघ आगे चल रहा था, लेकिन अमेरिका ने चांद पर इंसान उतारकर उससे बाजी मार ली। इसके बाद सोवियत संघ ने अपने कदम पीछे खींच लिए। आज भी अगर कोई चांद पर मानव भेजने का अभियान चलाए, तो लगभग 15 हजार करोड़ रुपये की लागत का अनुमान है। ऐसे में, विकासशील देश चांद के अध्ययन में जुटे अमीर देशों के प्रति शुभकामना के भाव रखें, यही पर्याप्त है। यहां भारत के चंद्रयान अभियान को भी याद करना सामयिक होगा। इसके जरिए चांद पर पानी की संभावना खोजने का श्रेय भारत को दिया जाता है। चंद्रयान-2 से भी भारत को बहुत उम्मीदें हैं। भारतीय वैज्ञानिकों को 20 जुलाई, 1969 की घटना से प्रेरणा लेकर प्रस्तावित गगनयान, आदित्य अभियान और शुक्र अभियान में भी जुट जाना चाहिए। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि जिस तरह की वैज्ञानिक प्रतिस्पद्र्धा के कारण इंसान चांद पर पहुंचा था, उसी तरह की व्यापक वैज्ञानिक प्रतिस्पर्धाओं का सिलसिला व माहौल पूरे संसार में बने और नकारात्मक दिशाओं में मुड़ रहे इंसानों और उनके देशों को सही राह पर विकसित होते जाने की प्रेरणा मिले।