अगस्त 2019

बदलाव की इच्छा को मुखरता देती है 'आर्टिकल 15'

संजय शरमन जोठे

कई खूबियों और खामियों से युक्त फिल्म 'आर्टिकल 15' में जो मुख्य स्वर है, वह 'भारत की हजारों साल पुरानी सामाजिक व्यवस्था के प्रति असंतोष और उसे बदलने की तीव्र इच्छा' है. अब ये इच्छा किसके दिल में और क्यों जन्म ले रही है, ये बात अधिक महत्वपूर्ण है.

आर्टिकल 15 एक अच्छी फिल्म है। इस फिल्म को अच्छी कहने का यही अर्थ है कि यह बहुत सारी दिशाओं में विचार करने को विवश करती है। कोई भी फिल्म या रचना एक आयाम में ही अपने निर्णयों को री-इन्फोर्स करती है तो वह अच्छी रचना या फिल्म नहीं कही जा सकती। समाज, और विशेष रूप से भारत का समाज ऐसा नहीं है, जिसमें कोई एक आयाम में सोचकर किसी विश्लेषण या निर्णय तक पहुंचा जा सकता हो। एक 'डायनेमिक कोम्प्लेक्सिटी' है, जिसके बीच हर अच्छी और बुरी चीज पनपती और चलती आई है। इस कारण किसी भी अच्छी या बुरी चीज का न तो एक सरल सा कारण है न एक सरल सा परिणाम ही है। इसीलिये इन चीजों या समस्याओं से मुक्त होने का कोई 'एक स्वर्णिम सूत्र' भी नहीं हो सकता। कुल मिलाकर इस फिल्म में जो मुख्य स्वर है, वह 'भारत की हजारों साल पुरानी सामाजिक व्यवस्था के प्रति असंतोष और उसे बदलने की तीव्र इच्छा' है। अब ये इच्छा किसके दिल में और क्यों जन्म ले रही है ये बात अधिक महत्वपूर्ण है। ये इच्छा सबसे पहले तो अतिशूद्रों या दलितों के दिल में जन्म ले रही है जो इस व्यवस्था से केवल नुकसान ही उठाते आये हैं। लेकिन जाति और वर्ण व्यवस्था में बीच के पायदान पर बैठे लोगों शुद्र या ओबीसी में ये इच्छा बिलकुल नहीं है। ये वो लोग हैं, जिन्हें इससे कुछ फायदा है और कुछ नुकसान है, ये लोग सबसे ज्यादा असमंजस में हैं। ये असल में ओबीसी तबका है। इन बीच के लोगों को इस व्यवस्था से फायदा हो रहा है, उन्हें इस व्यवस्था में बदलाव की नहीं, बल्कि उतने सुधार की जरूरत है, जितने से उनका खुद का शोषण रुक जाए, लेकिन वे दूसरों का शोषण करना बदस्तूर जारी रखें। यही 'ग्रेडेड इन-इक्वालिटी' का चमत्कार है, जिस पर बाबा साहेब आंबेडकर के अनुसार भारत की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था खड़ी है। बाबा साहेब के इस वक्तव्य को आगे बढ़ायें तो समझ में आता है कि यही भारत का धर्म और राजनीति भी है, इसीलिये उन्होंने राजनीति बदलने की भरसक कोशिशें करने के बाद अंत में धर्म बदलने की सलाह दी थी, जिस पर दुर्भाग्य से आज भी दलित-वंचित समुदाय अमल नहीं कर पा रहे हैं।फिल्म में इस जाति व्यवस्था की सडांध को बदलने की तीव्र इच्छा एक-दूसरे तबके में भी दिख रही है। ये तबका वर्ण व्यवस्था में सबसे ऊपर बैठा हुआ है। उसी तबके से नायक और नायक की प्रेयसी आती है। ये नायक ब्राह्मण है और यूरोप में उच्च शिक्षा हासिल किया हुआ है, दिल्ली के सुरक्षित महलों से निकलकर यूरोप के सभ्य समाज में पढ़ने जाता है और अचानक भारत के बर्बर और असभ्य समाज के गहरे गड्ढे में फेंक दिया जाता है। ऐसे में स्थिति बदलने की जो तीव्र इच्छा पैदा होती है, उसके दो कारण हैं। पहला कारण ये कि वो अभी तक जिस देश समाज और धर्म को अपना समझकर उसमें सम्मान का अनुभव करता था वो देश, समाज और धर्म कुछ और ही शक्ल लेकर सामने आ रहा है। इस देश, समाज और धर्म की जब वो यूरोप के सभ्य समाज से तुलना करता है तो उसे ग्लानि होती है, नायक का अहंकार चोटिल होता है। इसी अवस्था में उसकी प्रेयसी भी है, वह भी दलित वंचित समुदाय से नहीं आती बल्कि एक सवर्ण पृष्ठभूमि से आती है और लिबरल वाम तबके की नारीवादी है। इन दोनों के लिए विकास और सभ्यता की परिभाषाएं भारत के बाहर से आई हुई हैं। ये बड़ी अच्छी बात है। इसी अन्दर बाहर की तुलना ने उपनिवेश काल में भारत के समाज को सभ्य बनाने की शुरुआत की थी। दूसरा कारण ये कि जिस सभ्य यूरोपीय समाज से नायक आ रहा है, उससे तुलना करने के लिए या उससे अपने देश की नैतिकता की बराबरी करने के लिए उसे सुदूर अतीत या परम्परा के कोई चीज नहीं मिलती। उसे सभ्यता और नैतिकता का आश्वासन देने वाली जो एकमात्र चीज मिलती है, वह है भारत का संविधान। इसी को आधार बनाने के लिए वह तैयार हो जाता है और आगे की लड़ाई लड़ता है। अब ये गजब की बात है ये दोनों कारण असल में यूरोप से आ रहे हैं। यहाँ नोट किया जाये कि संविधान भी यूरोपीय लिबरल मूल्यों से प्रेरित है और उसमें हर कदम पर बर्बर भारतीय समाज की प्राचीन परम्पराओं और नियमों से दूर जाने की स्पष्ट प्रवृत्ति है। फिल्म का नायक भारत में एक पुलिस अधिकारी की भूमिका में जब अपने राष्ट्र और धर्म पर 'पौरुष भरे गर्व' को चूर-चूर होता देख रहा होता है, तभी उसकी प्रेयसी उसके गर्व को एक अन्य कोमल और नारीवादी आयाम से चोट मारती है। यूरोप के सभ्य समाज से भारत की तुलना कर रहा यह नायक ठीक इसी समय बारी बारी से उन लोगों से मुखातिब होता है, जो पूरे शोषक हैं, जो आधे शोषक आधे शोषित हैं और अंत में वो उन लोगों से भी मुखातिब होता है, जो सौ प्रतिशत शोषित हैं। कहानी आगे बढ़ती है। पित्रसत्ता, पुरुषसत्ता, जातीय दंभ को परम्परा और पवित्र शास्त्रों, भगवानों के उद्धरण से जायज ठहराते हुए यह स्थापित किया जाता है कि ये शोषण जो हो रहा है, वह असल में आ कहाँ से रहा है।इसके बाद शोषित लोगों की बुरी हालत को भी समझाया जाता है। 'औकात' शब्द बार-बार आता है जो असल में भारत के धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक चिन्तन की धुरी है। शोषण का मूल आधार 'औकात' का होना या न होना ही है, लेकिन ये जब अभिव्यक्त होता है तो आर्थिक आधार पर होता है। 'औकात' भारत के धर्म और शास्त्रों ने पहले ही तय कर दी है और औकात तय करने के बाद स्वाभाविक रूप से उभरने वाली सामाजिक व्यवस्था का पालन करना और करवाना हर जाति की अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी बन जाति है।इस जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए अपने से नीची जाति का अपमान करना, मजदूरी कम देना, पिटाई करना, बलात्कार करना, गंदे कामों में लगाए रखना, भयभीत कुपोषित बनाए रखना इत्यादि इत्यादि धर्म और शास्त्रों के अनुसार जायज काम हैं, जो कि व्यवस्था को बनाये रखने के लिए स्वयं ईश्वर या ब्रह्म ने बताये हैं। अपने देश, समाज या धर्म को इस नायक ने गलती से जिस रूमानियत में कुछ और ही समझ लिया था, वो जमीन पर हकीकत में कुछ और ही निकलता है। इससे उसे और उसकी प्रेयसी को चोट लगती है। पूरी फिल्म में यह चोट बार-बार शोर मचाती है। साथ ही अछूत या अस्पृश्य जातियों से आने वाले गरीब और असहाय लोगों का रुदन और विलाप भी इसमें बहुत कलाकारी और सावधानी से उभारा गया है। इस फिल्म में कई सारे उल्लेख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आते हैं। भीम आर्मी के चंद्रशेखर रावण, रोहित वेमुला प्रकरण, खैरलांजी काण्ड, अतीत के महाकाव्यों से उभर रहे पात्र और इन सबके साथ ही उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीति के कई सारे बिंब एकसाथ समानांतर बहते हैं और इस देश और इसके समाज के बारे में बहुत कुछ कह जाते हैं। इस फिल्म में कुछ कमजोरियां भी हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना ठीक नहीं। एक सबसे बड़ी कमजोरी इसकी कहानी में है। शोषित वर्ग के अर्थात दलितों-वंचितों के नायकों और मुक्तिकामियों को यहाँ कमजोर और असहाय बताया गया है। वे हमेशा रोते-सिसकते रहते हैं, जैसे यूरोप-अमेरिका से आने वाले किसी सवर्ण द्विज मसीहा का इंतज़ार कर रहे हैं। उनके अपने संघर्ष का कोई परिणाम तभी निकल सकता है जब कि शोषक अर्थात सवर्ण द्विज तबके या जातियों में ही जन्मा कोई मसीहा यूरोप से सभ्य होकर भारत आएगा और उनकी मदद करेगा। एक तरह से दलितों-वंचितों की मुक्ति की संभावना सवर्ण द्विजों के प्रयासों और सदिच्छा पर ही निर्भर है। ये निर्भरता पीड़ित करती है। इसका कारण समझना भी आसान है। असल में यह फिल्म उन लोगों के लिए बनाई गयी है जो स्वयं जातिगत शोषण की इस डिजाइन में फायदा उठा रहे हैं। ये फिल्म उनके ह्रदय परिवर्तन कि दृष्टी से बनाई गयी है। इसीलिये शोषकों के जातीय अहंकार को इतनी भी चोट न लगे जाए कि हृदयाघात ही हो जाए। हृदय परिवर्तन के लिए सच्चाई को उजागर करते हुए उसे सुरक्षित सीमाओं में रखना होता है, ताकि हृदयाघात ही न हो जाए। शोषकों के ह्रदय परिवर्तन की उम्मीद और इंतज़ार करने का यह आग्रह इस फिल्म की कहानी में एक ऐसी मजबूरी बनकर उभरता है जो बहुत निराश करती है। इतिहास में जाकर अगर हम गांधी और आंबेडकर की अप्रोच के बीच के तनाव को देखें तो यह वही तनाव है। गांधी ह्रदय परिवर्तन चाहते हैं और आंबेडकर व्यवस्था- परिवर्तन और धर्म परिवर्तन चाहते हैं। ये सुरक्षित सीमा बनाये रखना बिजनेस और मार्केटिंग के नजरिये से भी जरूरी है। सीधी सी बात है आपके प्रोडक्ट को खरीदने वाले लोगों की नैतिकता और धर्म पर बेरहम चोट नहीं पहुंचाई जा सकती। एक सुरक्षित सी 'चपत' लगाकर प्यार से आग्रह करना फायदेमंद है। यही इस फिल्म में भी किया गया है। अंत में इस फिल्म को देखने वाला 'कास्ट ब्लाइंड' तबका अगर अपनी विरासत धर्म और समाज पर रत्ती भर भी गर्व न कर सके तो वो सिनेमा हॉल में बैठे-बैठे ही टूट जायेगा। नायक और नायिका तो संविधान में गर्व करते हुए स्वयं को बचा लेते हैं, लेकिन आम सवर्ण भारतीयों से इतनी उम्मीद नहीं की जा सकती। उन्हें अंतिम रूप से गर्व करने के लिए संविधान नहीं दिया जा सकता। वे जिस एकमात्र चीज में गर्व कर सकते हैं वो बात ये है कि ‘‘चलो अतीत में हमने जो भी गलत किया, लेकिन वर्तमान में या भविष्य में इसे ठीक भी हम ही करेंगे’’। यही वो केन्द्रीय बात है, जो पीड़ित करती है। शोषित की 'एजेंसी' या 'कर्ता होने की संभावना' को व्यवस्था या 'स्ट्रक्चर' फिर से निगल लेता है। यहाँ दलितों-शोषितों को सन्देश ये दिया जा रहा है कि शोषण भी हम ही करेंगे और तुम्हें मुक्त भी हम ही करेंगे। तुम बैठकर रामलीला देखते रहो। अभी भी भारत का समाज इतना सभ्य नहीं हो सका है कि वो स्त्रीयों की आजादी का श्रेय किसी स्त्री को दे सके। या दलितों- ट्राइबल्स की मुक्ति का श्रेय खुद दलितों या ट्राइबल नेताओं को दे सके। भारत का सवर्ण द्विज पुरुष आज भी स्त्रियों का मुक्तिदाता खुद बनना चाहता है,साथ अवर्णों, दलितों और वंचितों को मुक्त करने का श्रेय स्वयं ही लेना चाहता है। इसका एक गहरा कारण है। जब शोषक तबके से आने वाले लिबरल नायक वंचितों को मुक्त करने वाली इबारत लिखते हैं तो वे व्यवस्था में कॉस्मेटिक बदलाव कर आपद धर्म निभाते हैं। वे शोषण के कील-मुहांसों का फौरी इलाज करके निकल जाते हैं, ताकि इस समाज की शिराओं में बह रहा जहरीला और दूषित रक्त ही पूरी तरह न बदल जाए। स्मृति शास्त्रों में दी गयी व्यवस्था कोई पूरी तरह न उखाड़ दे, इसके लिए पहले ही आगे दौड़कर चलताऊ बदलाव कर दीजिये। इस तरह महान बनने का श्रेय भी मिल जाएगा और प्राचीन व्यवस्था भी जस की जस बनी रहेगी। फिर जब समय अनुकूल होगा तो स्मृतियों को कानून की तरह लागू करने का कोई रास्ता निकाल लेंगे। इस तरह ये चलताऊ सुधार असल में शोषण की पीड़ा से भी अधिक खतरनाक होता है। कील-मुहांसों का इलाज करके सामाजिक व्यवस्था के मूल आधार, उसके रक्त अर्थात उसके धर्म और नैतिकता को न बदलते हुए चलताऊ सुधार ले आना एक षड्यंत्र है। इसके जरिये धर्म, शास्त्र और नैतिकता की मूल प्रस्तावनाओं को तात्कालिक चोटों से बचाया जाता है। ये भारतीय द्विजों का सबसे बड़ा षड्यंत्र है। (लेखक सामाजिक और राजनीतिक मामलों के विद्वान टिप्पणीकार हैं)