अगस्त 2019

भारत के हित में है खुशहाल, लोकतांत्रिक पाकिस्तान

प्रकाश हिंदुस्तानी

भारत में बहुत से लोग इस बात पर बहुत खुश होते हैं कि पाकिस्तान आर्थिक बदहाली के कग़ार पर पहुंच गया है। लेकिन वास्तव में यह बात भारत के हितों के लिए अनुकूल नहीं है। भारतीय हित इसी में है कि पड़ोसी पाकिस्तान खुशहाल रहे और वहां की सरकार सेना के दबाव से मुक्त हो।

इस पर खुश न हों कि पाकिस्तान बर्बादी के कग़ार पर है। इमरान खान की चारों तरफ थू-थू हो रही है। पाकिस्तानी रुपया निम्नतम स्तर पर, निर्यात नीचे, विकास दर बेहद मामूली स्तर पर! महंगाई चरम पर, जनता में त्राहि-त्राहि ! लेकिन हमें इस पर खुश होने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि यह भारत के हित में नहीं है। कूटनीति के हिसाब से देखें तो वास्तव में देश का हित सदैव सर्वोपरि होता है। वहां सिद्धांतों के लिए ज़्यादा जगह नहीं होती। हमें पाकिस्तान के बारे में उसूलों से ज़्यादा तरज़ीह अपने व्यापक हितों को देना चाहिए। भारत में बहुत से लोग इस बात पर बहुत खुश होते हैं कि पाकिस्तान आर्थिक बदहाली के कग़ार पर पहुंच गया है। लेकिन वास्तव में यह बात भारत के हितों के लिए अनुकूल नहीं है। भारतीय हित इसी में है कि पड़ोसी पाकिस्तान खुशहाल रहे और वहां की सरकार सेना के दबाव से मुक्त हो। भारत के लिए जितना अनुकूल खुशहाल या लोकतांत्रिक पाकिस्तान होगा, उससे कहीं ज़्यादा प्रतिकूल होगा बदहाल और तानाशाही शासन वाला पाकिस्तान। अतीत में झांकें तो पता चलेगा कि पकिस्तान में चार फ़ौजी तानाशाह हुए हैं। उनके ज़माने में भारत के प्रति नफ़रत चरम पर रही। फौजी तानाशाह अयूब ख़ान, याह्या ख़ान , जनरल ज़िया उल हक़ और परवेज़ मुशर्रफ़ के ज़माने में पाकिस्तान ज्यादा प्रतिकूल था। मोहम्मद अयूब ख़ान पाकिस्तान के पहले फील्ड मार्शल थे। 11 साल तक वे पाकिस्तान के राष्ट्रपति भी रहे। अयूब ख़ान ने चुनी हुई सरकार के ख़िलाफ़ सैन्य विद्रोह किया और सत्ता पर काबिज हुए। 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध अयूब ख़ान की नीतियों के कारण ही भारत को लड़ना पड़ा। अयूब ख़ान सबसे कम उम्र के जनरल थे। वे स्वयंभू फील्ड मास्टर बन गए और फिर राष्ट्रपति भी। याह्या ख़ान पाकिस्तान के तीसरा राष्ट्रपति थे और 1969 से 1971 तक उन्होंने पाकिस्तान में तानाशाही हुकूमत की। पूर्व पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में याह्या ख़ान के ज़माने में ही दमन की सीमा पार हो गई थी। पूर्वी पाकिस्तान से एक करोड़ से अधिक लोग शरणार्थी बनकर भारत में घुस आए थे। भारतीय सेना को वहां युद्ध लड़ना पड़ा और पूर्वी पाकिस्तान को मुक्त करवाकर भारत को बांग्लादेश नाम के नए देश को मान्यता देनी पड़ी। जनरल ज़िया उल हक़ पाकिस्तान के छठे राष्ट्रपति थे। तीसरे फ़ौजी तानाशाह। उन्होंने ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो का तख़्ता पलटकर सैनिक शासन कायम किया था और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को फांसी पर लटका दिया था। ज़िया उल हक़ के ज़माने में भी पाकिस्तान में गहरे इस्लामीकरण की नीतियां चलीं, क्योंकि यह इस्लामीकरण ज़िया उल हक़ को मुफ़ीद बैठता था। (वैसे तो उस इलाके में इस्लामीकरण की शुरुआत 13वीं -14वीं सदी में हुई थी) आज़ादी के वक़्त पाकिस्तान में सभी धर्मों को समान तवज्जो देने की बात कही जाती थी। उसका पालन नहीं हुआ, लेकिन इस्लामीकरण के नाम पर खाड़ी के देशों से मदद मांग-मांगकर ज़िया उल हक़ ने अपनी स्थिति मज़बूत की। अगस्त 1988 में अगर हवाई दुर्घटना में ज़िया की मौत नहीं होती, तो पाकिस्तान आज उससे कहीं ज़्यादा कट्टर होता। परवेज़ मुशर्रफ़ पाकिस्तान के सेना प्रमुख रह चुके थे और 1999 में नवाज़ शरीफ की लोकतान्त्रिक सरकार का तख़्ता पलट दिया था। उनका रुख हमेशा भारत के प्रति अदावत का रहा। धूर्तता में उनका कोई सानी नहीं था। परवेज़ मुशर्रफ़ 20 जून, 2001 से 18 अगस्त 2008 तक पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे। मुशर्रफ़ ने आतंकवादियों को आईएसआई के माध्यम हमेशा बढ़ावा दिया, जिस कारण भारत में पाकिस्तानी घुसपैठ बढ़ती चली गई और भारत-पाकिस्तान के रिश्ते बिगड़ते चले गए। कारगिल युद्ध के पीछे भी सेना प्रमुख रहे मुशर्रफ़ ही थे, जब भारत को फिर अनचाहा युद्ध लड़ना पड़ा। अब पाकिस्तान में सेना के झंडे के नीचे लोकतान्त्रिक सरकार है। यह लोकतंत्र दिखावे का ही सही, पर फौजी हुक्मरानों की तुलना में भारत के लिए ज़्यादा अनुकूल है। अब आरिफ अल्वी पाकिस्तान के राष्ट्रपति हैं और इमरान ख़ान प्रधानमंत्री। प्रधानमंत्री बनते ही इमरान ख़ान ने पड़ोसी देशों की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने की बात कही थी। उन्होंने शिक्षा में सुधार, कानून के राज को महत्व देने, शांति स्थापित करने की भी बात कही थी। इमरान के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही प्रधानमंत्री बनाते सियालकोट में तकरीबन 72 साल के बाद एक हज़ार साल पुराने शिवालय, तेजा सिंह मंदिर को पूजा-अर्चना के लिए खोला गया। 1947 में जिस वक़्त बंटवारा हुआ, इस मंदिर को खूब नुकसान पहुंचा और बाद में इसे बंद कर दिया गया। पाकिस्तान स्थित मंदिरों व गुरुद्वारा साहिबान का प्रबंध देख रहे बोर्ड ने इस मंदिर मरम्मत कराई और बीते दिनों ही सियालकोट के हिंदुओं को इस मंदिर की चाबियां सौंप दी गईं। पाकिस्तान के एवेक्यू ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड की ओर से कई मंजिलों वाले इस खूबसूरत मंदिर में एक विशेष उद्घाटन समारोह भी आयोजित किया गया था। इस मौके पर उपस्थित हिन्दू लोगों ने 'हर-हर महादेव' और 'पाकिस्तान ज़िंदाबाद' के नारे लगाए। इमरान खान के आने के बाद ही करतारपुर साहिब कॉरिडोर तैयार हुआ, जो डेरा बाबा नानक साहिब और गुरुद्वारा दरबार साहिब करतारपुर के गुरुद्वारों को जोड़ता है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने इमरान खान को पाकिस्तान के ननकाना साहिब में 25 जुलाई को होने वाले अंतरराष्ट्रीय नगर कीर्तन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया है। इमरान खान इसमें जाने वाले हैं। पाकिस्तान के ननकाना साहिब में 13 जुलाई को बाबा गुरु नानक अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी गई। घोषणा के करीब 10 साल बाद विश्वविद्यालय निर्माण का रास्ता साफ हुआ। यह 258 करोड़ रुपये की लागत से 10 एकड़ जमीन पर तैयार होगा। भारत की सख्ती के कारण पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी से गोपाल सिंह चावला को हटा दिया गया है। चावला आतंकी हाफिज सईद का करीबी है और भारत के खिलाफ साज़िशें करता है। अब पाकिस्तान ने ग़लती सुधार ली है। इमरान ख़ान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भले ही हों, लेकिन वहां की असली हुकूमत अभी भी पाकिस्तान की सेना के हाथ में ही है। पाकिस्तानी सेना के लिए जब तक इमरान खान अनुकूल बने रहेंगे, तब तक ही उनकी कुर्सी सलामत रहेगी। इमरान ख़ान एक चुने हुए प्रधानमंत्री हैं, इसीलिए दिखावे के रूप में सही, उन्हें लोकतांत्रिक बातें करनी पड़ती हैं और पड़ोसी देशों से दोस्ती की पींगें मारनी होती हैं। बिश्केक में उनकी भारतीय प्रधानमंत्री से चर्चा की तमन्ना अधूरी रह गई। इमरान के सत्ता में आने के बाद पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। पाकिस्तानी रुपये की हालत इतनी खराब हो गई थी कि वह डॉलर के मुकाबले 163 रुपये का हो गया था। अब स्थिति थोड़ी -बहुत सुधरी है, लेकिन दयनीय स्थिति तो बरकरार है ही। हाल यह है कि पाकिस्तान पर इतना ज्यादा विदेशी क़र्ज़ है कि उसका ब्याज़ चुकाने में ही उसकी 30 प्रतिशत आय खर्च हो जाती है। 11 प्रतिशत खर्चा रक्षा बजट पर हो जाता है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री अगले सप्ताह अमेरिकी यात्रा के दौरान होटल में रुकने तक के रुपये खर्च करना नहीं चाहते। पाकिस्तान को विदेशी मुद्रा के लिए एक लाख से ज़्यादा गधे चीन को निर्यात करने पड़ रहे हैं। प्रधानमंत्री के निवास की सरकारी कारें नीलाम की जा रही हैं। प्रधानमंत्री निवास की भैंसों को भी बेचा जा रहा है। पाकिस्तान के पास केवल इतनी विदेशी मुद्रा बची है कि उससे उसका केवल दो महीने का खर्च निकल सकता है। पिद्दी-सी इकॉनामी के पाकिस्तान की विकास दर 3 प्रतिशत पर अटकी पड़ी है। अब पाकिस्तान को आईएमएफ से राहत पैकेज तो मिल गया है, लेकिन उसकी शर्ते इतनी कड़ी है कि पाकिस्तान में विद्रोह की नौबत आ गई है। क़र्ज़ की शर्त है कि इससे पुराने क़र्ज़ नहीं चुकाये जा सकेंगे। सरकार सब्सिडी कम करेगी और टैक्स बढ़ाएगी। इस कारण पाकिस्तान क़र्ज़ के एक और बड़े जाल में फंस गया है। इसी बीच आतंकवाद की फंडिंग पर नजर रखने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स ने पाकिस्तान को चेतावनी दी है कि अगर तीन महीने में उसने आतंकवाद के खिलाफ संतोषजनक कदम नहीं उठाया, तो उसे काली सूची में डाल दिया जाएगा। जून 2018 से यह संस्था पाकिस्तान पर निगरानी रख रही है और अगर पाकिस्तान काली सूची में गया, तो उसे 1000 करोड़ डॉलर का झटका लग सकता है। पाकिस्तान में चार में से एक बच्चा प्राइमरी स्कूल में पढ़ाई नहीं कर पा रहा है। केवल 13 प्रतिशत लड़कियां ही नौवीं कक्षा या उससे ऊपर पढ़ाई कर पा रही हैं। आधे युवा कॉलेज की शक्ल नहीं देख पा रहे हैं। पाकिस्तान में महंगाई चरम पर पहुंच चुकी है। हाल यह है कि पाकिस्तान का रुपया अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका की मुद्रा से भी निचले स्तर पर पहुंच चुका है। पाकिस्तानी रुपया भारतीय रुपये के 40 पैसे के बराबर ही क्रयशक्ति रखता है। पहले उसकी क्रयशक्ति भारतीय अठन्नी के बराबर थी। पाकिस्तान में पेट्रोल 130 रुपये लीटर से महंगा है। एक ऐसा पाकिस्तान, जिसमें क्रयशक्ति बहुत कम है, भारतीय अर्थव्यवस्था के अनुकूल नहीं है, क्योंकि भारत के संभावित विस्तारित बाजार से पाकिस्तान का लोप होता जा रहा है। एक संपन्न पाकिस्तान भारत के लिए एक अच्छा मार्केट साबित हो सकता है। जबकि एक बदहाल पाकिस्तान कट्टर इस्लामीकरण की और आगे बढ़ेगा, जिसके मन में भारत के प्रति नफ़रत ही नफ़रत होगी। एक बदहाल पाकिस्तान भारत से दोस्ती के बजाय चीन और अमेरिकी की गोद में बैठना पसंद करेगा। बदहाल पाकिस्तान की मजबूरी होगी विदेशी क़र्ज़ का पहाड़, जिसकी शुरुआत हो चुकी है। अब हाल यह है कि पाकिस्तान में पाकिस्तानी रुपये के अलावा अमेरिकी डॉलर और चीन की मुद्रा युआन में भी लेन-देन हो सकता है। भारतीय रुपया पड़ोसी नेपाल और श्रीलंका में आमतौर पर लेन-देन के काम आता ही है। बदहाल पाकिस्तान में मदद के नाम पर चीन अपने पांच लाख लोगों को वहां बसा रहा है। नेपाल के साथ ही पाकिस्तान के स्कूलों में भी चीनी भाषा मंदरीन की पढ़ाई होने लगी है। ये सब बातें भारतीय आर्थिक हितों के लिए अनुकूल नहीं की जा सकतीं। भारत ने पाकिस्तान को जाने वाले माल पर ड्यूटी बढ़ा दी है। पाकिस्तान के कुल विदेशी कारोबार में भारत की हिस्सेदारी केवल तीन प्रतिशत ही है। भारत के कुल विदेशी कारोबार में पाकिस्तान का हिस्सा बहुत ही कम है। इतना कम कि लिस्ट में उसका नाम ही नहीं नज़र आता। पाकिस्तान से भारत का व्यापार बरसों बरस भारत के पक्ष में ही जाता रहा है। पाकिस्तान में एक चुनी हुई सरकार हमेशा भारत के लिए अनुकूल साबित होगी। भारत की ओर इमरान ख़ान के सकारात्मक कदमों को पहचानने की आवश्यकता है। आतंकी गतिविधियों को सख्ती से रोकना और घर में घुसकर मारने जैसी बातें ग़लत नहीं हैं, लेकिन हमें करतारपुर साहब गलियारे जैसे सकारात्मक कदमों को भी समझना चाहिए। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए जो कदम उठाये जा रहे हैं, उनकी सराहना करनी चाहिए। फौज का हस्तक्षेप पाकिस्तानी सरकार में कम से कम हो, इसके लिए हर तरह का संभव, नैतिक या अनैतिक, कानूनी या गैरकानूनी कदम उठाना चाहिए, क्योंकि यही भारतीय हित में है। भारत अब मुस्लिम देशों के मंच पर भी जाने लगा है। यह बात पाकिस्तान को खटक रही है। पाकिस्तानी सेना के अधिकारी पाकिस्तान की 50 से ज्यादा कंपनियों और 12 प्रतिशत ज़मीन के मालिक हैं। पाकिस्तानी फौजी फाउंडेशन 25 कंपनियां चलाता है। पाकिस्तानी मिलिट्री साइंटिस्ट डॉ. आयशा सिद्दीकी ने 'इनसाइड पाकिस्ता'न्स मिलिट्री इकॉनामी' में बताया है कि पाकिस्तानी सेना की नेटवर्थ 100 अरब भारतीय रुपये से भी अधिक है। पाकिस्तान में जितनी एफडीआई की राशि आती है, यह राशि उससे 4 गुना ज़्यादा है। पाकिस्तानी सेना के कब्जे में सिंध और पंजाब प्रांत की सबसे उपजाऊ जमीन का 12 प्रतिशत हिस्सा है। इसमें से दो तिहाई ज़मीन तो सेना के पूर्व अधिकारियों को तोहफे में ही मिली है। पाकिस्तान का आर्मी वेलफेयर फंड वहां का सबसे बड़ा देनदार बैंक असकरी कमर्शियल बैंक चलाता है। सोने और तांबे की खदानों पर भी पाकिस्तानी सेना के पूर्व अधिकारियों का कब्ज़ा है। ये सब लोग चाहते हैं कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत न हो और सेना की पिट्ठू सरकार ही सत्ता में रहे। यह उनके हित में हो सकता है, भारत के हित में नहीं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)