अगस्त 2019

परदे में रहने दो, परदा न उठाओ

डॉ. रश्मि रावत

साक्षी के चेहरे में इतने सारे भावों की रंगतें उठती-गिरती हुई दिखती हैं, इतना अंतर्द्वंद्व दिखता है कि साफ समझ आता है कि वह कितनी उलझी हुई सी मनोदशा में है। समाज का एक बड़ा हिस्सा उसे खलनायिका, परिवार की दुश्मन और समाज का कलंक बताता है। उसे खुद ही नहीं समझ आ रहा है कि मैं तो अपने पक्ष में खड़ी हुई थी परिवार और समाज का विरोध इसमें कहाँ से आ गया।

परदे के उठने से कैसे-कैसे भेद खुल जाते हैं। सारा संतुलन बिगड़ जाता है। समाज की आधी आबादी से पंख लेकर, फिर बची हुई आधी आबादी के बहुसंख्य जन से उनकी उर्जा और आबरू लेकर शेष आबादी शांत, अहिंसक अवस्था में सुकून से जीना चाहती है। पर ये आधी आबादी के फड़फड़ाते पर और बहुजन के जीने के हौंसले बार-बार क्यों शास्त्र अनुमोदित, परम्परा पोषित संतुलन को छेड़ दिया करते हैं? अब बरेली के विधायक की बेटी के लिए इनकी बेटी की पहचान काफी ही थी तब तक के लिए जबकि उसे श्रीमान ...की पत्नी कह कर न सम्बोधित किया जाता। घर के भीतर जुटाई गई सुविधाओं का भरपूर उपभोग करके दूसरे घर आराम-तलबी का जीवन बसर करने जाती तो क्या बुरा था? न वर्ण व्यवस्था को धक्का लगता न जेंडर की धुरी डगमगाती और दोनों घरों की इज्जत बची रहती। समाज में भी पूरी प्रतिष्ठा मिलती। मगर मोहतरमा को लाखों की आबादी साक्षी नाम से जानने लगी है। नहीं, साक्षी नाम को मशहूर करना उसका उद्देश्य कतई नहीं था। जिन घरों के दरवाजे कभी खुलते नहीं उनके दरवाजे दीवार बन जाते हैं। वह दरवाजों के दीवार बनने से पहले दहलीज पार करके बाहर की दुनिया देखना चाहती थी। सार्वजनिक कामों में अपनी भी सहभागिता करना चाहती थी। खिड़की के चौखटों से दिखता आसमान उसे पूरा नहीं लगता होगा। उस चौकोर से कटे-फटे आसमान को सरियों से, चौखटों से आजाद करना चाहती होगी। साक्षी की लरजती आवाज, टूटे- बिखरे शब्द, फफकते हुए, ललकारते हुए वाक्यों और उसकी कातर मगर जीवन से भरी आँखों से टपकता है ये जीवन का सत्य। उसके अभिभावकों को अनुमान होता कि उसका पढ़ना-लिखना उसे जीने का इतना हौंसला दे देगा कि वह संविधान से अपने लिए अपने होने का हक हासिल कर लेगी जो सदियों की परम्परा और जीवन-मूल्यों के सामने अक्सर लाचार सा दिखता है, तो इतना जोखिम वे भला क्यों उठाते। कम पढ़ी-लिखी लड़की भी अगर देखने में सुंदर हो और सम्पन्न हो तो उसे वर की कमी हमारे देश में नहीं रहती। बौद्धिक स्त्रियों से आंतकित पुरुषों की संख्या में कोई खास कमी आई नहीं है। इसलिए अबोध होने का बाजार भाव अभी काफी ऊँचा ही है। अब जब नागरिक के रूप में अपने अधिकारों का फायदा उठा कर लड़की जीने के लिए चल पड़ी और वह भी दलित युवक का हाथ थाम कर तो संस्कृति में भूचाल उठ गया। घर की इज्जत डोलने लगी। लड़की जब माँग में सिंदूर सजा कर टी.वी में अपनी शादी का ऐलान करती दिखी तो न मशहूर होने की मंशा से, न अपने परिवार की प्रतिष्ठा पर खरोंच डालने की नीयत से। मगर हुआ ये कि लड़की अपनी जिंदगी जीने बाहर निकली तो उसे पता चला कि घर की आबरू के बाने का धागा उसके पैर से उलझा हुआ है। वो ज्यों-ज्यों आगे कदम बढ़ाती है घर की प्रतिष्ठा उधड़ती चली जाती है। इस उधड़ी हुई इज्जत को को बचाने की खातिर प्रभु वर्ग जो तरीका अपनाता है, वह लड़की और उसके पति के पक्ष में कतई नहीं होता। उन्हें जान से हाथ धोना पड़ता। हमेशा थोथे आदर्शों और झूठी शान के नाम पर मरने-मारने पर उतारू समाज के लिए ये समझना थोड़ा मुश्किल हो रहा होगा कि जिंदगी जाने की तनिक सी आशंका भी काफी होती है जिंदगी की खातिर तमाम कदम उठाने के लिए। दुर्भाग्य से शान के लिए की गई हत्याओं के इतने हवाले मिलते हैं कि इस बात को लेकर डरना स्वाभाविक है। आशंका होने भर से सुरक्षा की व्यवस्था कानून देता है। जिंदगी को बचाने के लिए कितने भी उपक्रम किए जा सकते हैं। लड़की ने जान बचाने के लिए गुहार भी की और ऐसा करने पर जो नुक्सान हिंसा करने वालों को हो सकता है, उसकी चेतावनी भी दी। उसकी जीने की ललक और जीवन के संरक्षण की कोशिशों से उसके परिवार का गौरव खतरे में पड़ जाएगा, उसके दिमाग में इन हालातों में कहाँ आया होगा। घर की सुरक्षा के दायरे को पार कर एक नए जोखिम में दर-दर भटकती डर और असुरक्षा बोध से आक्रांत लड़की आखिर इतने दूर की कहाँ सोच पाती। उसने तो अपने घर में पिता और भाई की ताकत का जो शंखनाद बजता हमेशा देखा होगा। शक्ति प्राप्त करने का मोह उसके भीतर भी कुलबुलाता सा दिखता है। उसके तो दिमाग में ही नहीं आया होगा कि घर की उपेक्षित सा, दबा कर रखे जाने वाले सदस्य की इतनी ताकत है कि उसके कुछ बोलने भर से परिवार की शान में बट्टा लग जाएगा। उसके चेहरे में इतने सारे भावों की रंगतें उठती-गिरती हुई दिखती हैं, इतना अंतर्द्वंद्व दिखता है कि साफ समझ आता है कि वह कितनी उलझी हुई सी मनोदशा में है। समाज का एक बड़ा हिस्सा उसे खलनायिका, परिवार की दुश्मन और समाज का कलंक बताता है। उसे खुद ही नहीं समझ आ रहा है कि मैं तो अपने पक्ष में खड़ी हुई थी परिवार और समाज का विरोध इसमें कहाँ से आ गया। पहले जब यह मामला प्रकाश में आया तो लगा था कि साक्षी और उसके पति अजितेश की मारे जाने की आशंका निराधार भी हो सकती है। हालांकि जुलाई के ही महीने में देश के भिन्न भागों से 3 जोड़ों की शान के नाम पर हत्या की जाने की खबर और साक्षी के विडियो से प्रभावित होकर कई अन्य लड़कियों को भी खबर को सार्वजनिक करने में अपनी जान की रक्षा दिखाई पड़ी इसलिए पिछले कुछ दिनों में जान के खतरे की बात कई लड़कियों ने की है। किसी पत्नी को घर में उसका पति खूब मारता है तो समाज उनका निजी मामला मानता है और ऐसी हिंसा पर समाज ज्यादा ऐतराज भी नहीं करता। किसी दिन मार खाती हुई स्त्री घर से बाहर बीच नुक्कड़ में आ खड़ी हो कर कहे कि 'ले अब मार मुझे' तो पति उस तरह नहीं ही मार पाएगा। परम्परा प्रदत्त उसकी रक्षक की मुद्रा खंडित होगी। स्त्री का प्रतिरोध इसमें साफ लक्षित होता है मगर उसका मार खाने के लिए लोगों के बीच आना किसी का अपमान करने के लिए कतई नहीं है। मगर अपमान हो जाता है क्योंकि परदे के भीतर जो अनुचित हरकत की जा रही थी, वह अपमानजनक थी ही। परदे के उघड़ने से वह हरकत सबके सामने खुल गई तो वह अपमान भी सार्वजनिक हुआ। संवेदनशील समाज पति की हिंसा को दोष देगा तो जड़ समाज स्त्री को परदे के बाहर आने पर गरियाएगा। यही हुआ साक्षी के संदर्भ में भी। साक्षी के सामने आने के जीवट और मीडिया द्वारा मामले को इतना महत्व दिए जाने से यह बहुत बड़ा लाभ हो गया कि समाज की सतह के भीतर का सच पूरी तरह उघड़ कर बाहर आ गया। अक्सर सर्वनाम में अथवा सामान्यीकरण में 'पॉलिटिकली करेक्ट' दिखना आसान होता है। अगर घटनाएँ इतनी तेजी से सामने से होकर गुजरती-बदलती रहती हैं कि उनमें सतही तौर पर लोकतांत्रिक स्टैंड लेना आसान होता है। सतह के खुरचने से पहले मंच में दूसरी घटना उपस्थित हो जाती है। पर इस मामले में घटनाक्रम कुछ इस तरह का रहा कि कैमरे का फोकस लम्बे समय तक इस मुद्दे पर टिका रह गया औऱ सतह के भीतर संस्कारों के रूप में छिपी कुत्सा, हिंसा का विकराल रूप सामने आया। इन्हीं दिनों एक मंत्री ने कहा कि भारत में मानवाधिकारों की कोई जरूरत ही नहीं है क्योंकि यहाँ तो लोगों के मन संस्कारी होते हैं। इस बयान से लोगों की मानसिकता समझने में और आसानी हो गई। साक्षी जैसी लड़की अधिकतर लोग अपने घर में नहीं चाहते और लड़कियों के यह स्वरूप लेने पर कोख में ही उन्हें मार दिए जाने के सिलसिले बढ़ेंगे। यानी कि लड़की जिंदगी को भरपूर ढंग से जीने की कोशिश करेगी तो उससे पैदा होने का ही हक छीन लिया जाएगा। अगर परम्परा की हिंसा लड़कियों को अपने काबू में रखने में अपर्याप्त साबित हो तो उसे उसके अस्तित्व लेने से पहले मार दिया जाना उचित ही है। इस तरह के बयान धर्मगुरुओं, पढ़े-लिखे नौकरी पेशा मध्य वर्ग से, उच्च वर्ग से, हर आयु वर्ग की ओर से आए हैं। जो लोग शुरूआत में साक्षी के साथ थे। बाद में उनका स्त्री-विरोधी और जातिगत भेदभाव को मानने वाला व्यक्तित्व सामने आया। 3 जुलाई से घर की बच्ची बाहर है और कोई अपराध उसने नहीं किया पर एक बार भी उसके घर की ओर से कोई ऐसा वाक्य सामने नहीं आया कि उन्हें घर की लाड़ली की कमी खल रही हो, उससे मिलने के लिए मन में कोई ललक हो। उन्हें उनकी सुरक्षा का आश्वासन दे कर घर बुला सकते थे। मीडिया और प्रशासन की दखल के कारण कोई धमकी तो नहीं दे सकते मगर हर बार यही कह रहे हैं कि अब साक्षी जहाँ है, वही खुश रहे। मतलब सम्बंध का कोई जुड़ाव उससे नहीं बचा। जिस लाड़-प्यार से पाले जाने की दुहाई दे कर पूरा समाज साक्षी पर इतनी अमानवीय टिप्पणी कर रहा है, वही लाड़ प्यार सुबकती हुई साक्षी को अपने कलेजे से लगाने को आतुर क्यों नहीं दिख रहा। इतने दिनों में जिस तरह की प्रतिक्रियाएं साक्षी के परिवार की ओर से और समाज के एक बड़े हिस्से से आई हैं, उससे तो यह साबित ही हो गया कि साक्षी उन्हें बता कर, उन्हें भरोसे में लेकर कुछ भी नहीं कर सकती थी। क्योंकि अगर संवाद होना सम्भव होता तो संवाद अब भी कायम किया जाता। एक घटना से जिस तरह उसे परिवार के पेड़ से झड़ा हुआ मान लिया गया है। उससे साफ जाहिर है कि उस घर की लड़कियों को अपनी बात रखने का स्पेस नहीं दिया जाता और लोगों की हिंसक टिप्पणी इस आशंका को पुख्ता करती है कि उनके साथ हिंसा हो सकती है। पढ़े-लिखे लोग भी जिस तरह साक्षी और अजितेश के चरित्र की चीर-फाड़ कर रहे और उनके आचरण पर आख्यान रच रहे हैं। उनके द्वारा निकाले गए निष्कर्ष अतार्किक हैं। अजितेश की हीरो के माफिक आकर्षक छवि और अच्छा रहन-सहन दिखाने से ये कैसे साबित हो जाता है कि उसे जान का डर नहीं हो सकता। जिसे जिंदगी के लिए कभी डरना हो वह अतीत में शान-शौकत से कैसे रह सकता है, ये क्या बात हुई भला। और साक्षी के आँसू, स्नेहिल शब्द, माफी माँगना, घर वालों का कल्याण समझना...इस सब को साक्षी का ड्रामा माना जा रहा है औऱ कुछ दबंगई से बोल रही हो, धमका रही हो, ललकार रही हो तो वह उसकी वास्तविक स्वरूप है। जबकि जरा भी मनोविज्ञान की समझ हो तो यही लगता है कि वह जो धमकी भरी, प्रतिकार की भाषा है वह साक्षी के वजूद की सतह पर बहती है। जो इतने साल उसने अपने घर में देखा-सुना-सीखा है, वही उसके मुँह से जाने-अनजाने निकलता है। इसके विपरीत उसकी ममता, उसका स्नेह, उसका सौहार्द उसके अपने गुण हैं। उसके भावों की जटिलता और द्वंद्व को समझने के क्रम में 'हाईवे' फिल्म का आलिया भट्ट पर फिलमाया गया यह दृश्य दिमाग में कौंधता है। नामी उद्योगपति की बेटी का उसकी सगाई से एक दिन पहले अपहरण कर लिया गया है। 2-3 दिन से ट्रक में कैद रखकर उसे जगह-जगह घुमाया जा रहा है। जगह-जगह पुलिस की चेकपोस्ट लगी हुई है इसलिए लड़की का मिलना लगभग तय था। पुलिस जब ट्रक की डिक्की को चेक करती है टॉर्च मार कर तो आलिया खुद को छुपा लेती है। अगर वह पुलिस को दिख जाती तो तत्काल अपने घर जा सकती थी। मगर वह अभी घर नहीं जाना चाहती अपहरण के बहाने मिली खुली जिंदगी को ही जीना चाहती है। अपरहणकर्ता हतप्रभ हो कर कहते हैं तुम तो भाग सकती थी. तो भागी क्यों नहीं। इस दृश्य में आलिया के मनोभाव गजब के हैं। वह सोचती है हाँ मैं भाग सकती थी। फिर भागी क्यों नहीं। उसके मन में असमंजस है। भावों की उस जटिलता को आलिया ने बड़ी बखूबी निभाया है। वैसा ही असमंजस और मिली जुली प्रतिक्रियाएँ साक्षी के चेहरे से दिखती है। दिल से दुआ निकलती है कि साक्षी तुम इन बारीकियों को उन्नत जीवन बोध को समझ कर इन्हें विकसित करो। समाज के कुछ गिनती के लोग तुम्हारे साथ हैं। बहुत है तुम्हारे आगे पसरी चुनौतियों से जूझने के लिए। जितनी भी बाधाएँ आएँ तुम अपनी लौ ऊपर बढ़ाती जाना। साँचे खुद ब खुद पिघलेंगे। इनके अमानवीय शब्दों से आहत होने और अपराध भाव महसूस करने की कोई जरूरत नहीं। यह तो पितृसत्ता के हथियार हैं स्त्री के भीतर की दीपशिखा को कुंठित करने के लिए। ताकि उसे कमजोर बना कर ये उसे अपने हाथ से खर्च कर सकें। तुम इनकी बातों का संज्ञान भी न लो और मजबूती से आगे बढ़ती जाओ। तुम्हें तुम्हारे हिस्से की जमीन और आसमान जरूर मिलेगा।