अगस्त 2019

मध्यप्रदेश में तेजी से पनपता तबादला उद्योग

रविवार डेस्क

गांव में किसी सरकारी अफसर को पहुंचाना सजा कैसे हो सकती है? लेकिन अफसर बिरादरी में इसे सजा कहा जाता है और नेता धमकी भी इसी तरह देते हैं। किसी गांव में फिकवा दूंगा या नक्सली इलाके में नौकरी करना पड़ेगी। यानी सरकार खुद मानती है गांव में काम करना सजा है और शहर में मजा। यही वजह है सरकार बदलती है लेकिन गांव नहीं बदल पाते हैं, क्योंकि सबका रवैया एक सा है। हर अफसर की तमन्ना शहर में रहने की है और इसके लिए वो मोटी रकम देने को तैयार रहते हैं। उन्हें पता होता है शहर में रहने की जो सरकारी बोली है, उससे कई गुना ज्यादा कमा लेंगे। फिर पैसे देकर कुर्सी ली जाएगी तो सियासत भी ज्यादा शोर-शराबा नहीं करेगी, गुर्रा भी नहीं पाएगी। नेताओं को भी पता है जिसे शहर में रहना है, मुंह मांगी कीमत देगा और यहीं से सियासत के खर्च निकलेंगे। पर अब बात उस खर्च से निकल गई है और तिजोरियां भरने लगी हैं। तभी तो शहर मजा है और गांव सजा बना दिया गया है। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन किसी के पास तबादले का कोई मजबूत सिस्टम नहीं है। जिससे सबको गांव में काम करना पड़े, दूर-दराज के इलाकों में वक्त गुजारें और उन्हें शहर में काम करने का मौका भी मिले। अभी तो जिस अफसर के सरकार में रिश्ते होते हैं, वो मलाईदार कुर्सी पर होता है और जिसके हाथ छोटे रह जाते हैं, उसे दूरदराज में नौकरी करना पड़ती है। सरकार के इस रवैये ने अफसरों के बीच गांव-देहात को सजा बना दिया है और जिसे वहां पहुंचाया जाता है, वो अगले दिन से शहर लौटने की जुगत में लग जाता है। काम उससे होता नहीं है। बदहाली बनी रहती है। यही वजह है इलाज नहीं मिलने से मौत होती है। किसानों की पूछपरख नहीं हो पाती है और पढ़ने को स्कूल भी खड़ा नहीं रह पाता है। बच्चों को जो स्कूल में खाना दिया जाता है, उसमें कीड़े निकलते हैं और जानवर भी उसे खाने से इंकार कर देते हैं। सरकारी योजनाएं अव्वल तो वहां तक पहुंचती नहीं और अगर पहुंच जाती हैं, तो अफसर डकार जाते हैं, जबकि सरकार कोई भी हो, सबसे ज्यादा पैसा गांव पर खर्च करती है। उसके हर बजट में किसान सबसे ऊपर रहते हैं। गांव की बात हर चुनाव में होती है और भीड़ में खड़े आखिरी बंदे तक पहुंचने का दावा किया जाता है, पर चुनाव के बाद बदलता कुछ नहीं है। क्योंकि जिन्हें बदलने के लिए पहुंचाया जाता है, वो कुछ करना ही नहीं चाहते हैं, उनका पूरा ध्यान शहर जाने में लगा रहता है और जैसे ही मौका मिलता है भाग खड़े होते हैं। जो दूसरा आता है, वो भी यही सब करता है। तभी तो गांव में हमेशा डॉक्टरों की कमी रहती है, स्कूल खाली पड़े रहते हैं और सरकार सब जानती हैं, लेकिन कुछ करती नहीं है, क्योंकि तबादले का जो खेल है, वही रचती है, तय करती है, किसे सजा दी जाएगी और किसे मजा मिलेगा। हर सरकार का यही रवैया है और मध्यप्रदेश में जो कमलनाथ की सरकार आई है, उसने तो तबादले का रिकार्ड बना दिया है। अभी सरकार की जो भी उम्र है, बस तबादले में खर्च हो गई है। काम क्या हुआ है? इसका लेखा-जोखा किसी के पास नहीं है। क्योंकि मंत्रालय किसी का भी हो, वहां बस तबादले ही हुए हैं। इसमें कुछ नया नहीं है, हर सरकार यही करती है। बस इस बार इल्जाम कुछ ज्यादा सुनाई दे रहे हैं। क्योंकि कमलनाथ ने शपथ लेते ही जिस तरह से अफसरों को इधर-उधर किया, उसने विरोधियों को बोलने का मौका दे दिया। सामने वो सारे वादे थे, जो चुनाव जीतने के लिए किए गए थे, पर उस तरह ध्यान देने के बजाए रोज तबादलों की लिस्ट जारी की जा रही थी। शायद ही कोई अफसर ऐसा बचा हो जो शिवराज सरकार में जिस कुर्सी पर था, अभी भी वहीं मौजूद हो। सारे के सारे बदल डाले गए और इसमें जो खेल हुआ, उसकी आवाज दूर तक गई है। भाजपा ने बार-बार मुद्दा उठाया। कमलनाथ सरकार को घेरा, लेकिन असर नहीं हुआ। अभी तक तबादलों की लिस्ट आ रही है और हर नेता अपनी मर्जी के अफसर इधर-उधर कर रहा है। हालांकि इन इल्जामों पर कांग्रेस ने जब जवाबी हमला करते हुए भाजपा के तबादले उजागर किए तो पता चला यही सब वहां भी हो रहा था। बस इतना शोर नहीं था, क्योंकि विरोध करना कांग्रेस को आता नहीं है, भाजपा उसमें माहिर है। तभी तो भाजपा सरकार में जो हुआ, वो वहां तक नहीं पहुंचा, जितना कमलनाथ सरकार का पहुंच गया है। यहां तो बरसों बाद सरकार आई है इसलिए जो कुछ भी रुका हुआ था, खुलकर सामने आ गया। पर कसर तो भाजपा ने भी छोड़ी नहीं थी। यही वजह है जब कांग्रेस ने भाजपा की तबादला फहरिस्त जारी की तो कुछ खामोशी हुई है। असल में जो भी ताकत में आता है, सबसे पहले अफसरों को इधर-उधर करता है और पन्द्रह साल से कांग्रेस की सरकार नहीं थी। जिन अफसरों की पीठ पर पंजा चस्पा था, वो मलाई वाली कुर्सी से दूर ही थे। जैसे ही सरकार बदली, उनको मौका मिला और सब ऊंची कुर्सियों पर दिखने लगे हैं। कुछ अफसर ऐसे भी हैं, जो नेताओं के करीब रहे हैं और उनकी जरूरत हमेशा बनी रही है। क्योंकि सरकार वही चलाते हैं और उनके ईर्द-गिर्द ही सबकुछ रहता है। इसलिए वो अभी भी सामने हैं। बस कुर्सी और महकमा बदल गया है। अफसर को पता रहता है नेताओं से कैसे निपटना है। कमर उनकी झुकी रहती है और उसके जरिए वो नेताओं को काबू में कर लेते हैं। फिर मंत्रियों को भी समझ है, बिना अफसर के चल नहीं सकते और जैसे ही कोई लेटता है। उनका काम पूरा हो जाता है। हालांकि इस बार जो तबादले हुए हैं, उसमें लेन-देन की गाडियां भी खूब दौड़ी हैं। उससे जरूर कमलनाथ सरकार घिर गई। फिर आईडी के छापे पड़े और जो पैसा पकड़ाया, उसमें भी कहीं न कहीं तबादला उद्योग की आवाज सुनाई दी थी। सरकार ने हर महकमे में थोक में तबादले किए हैं। जिसमें सीधे कमलनाथ का दखल रहा है। कुछ मंत्री ऐसे भी हैं, जो अपने महकमे के तबादले ही अपनी मर्जी से नहीं करवा पाए। क्योंकि वो तो मंत्री बनकर ही खुश हैं। जो तेज तर्राट हैं और जिनके पास बड़े महकमे हैं, उन्होंने जरूर पसंद के अफसर आसपास कर लिए हैं। फिर इनके बंगलों पर जिस तरह तबादला कराने वालों की भीड़ लगी है वो भी बरसों बाद देखी गई है। हर दफ्तर में कागजों के पुलिंदे पड़े हैं और नेताओं को समझ नहीं आ रही है। इनसे वैâसे छुटकारा पाया जाए। क्योंकि जिसका काम नहीं हो रहा है, वो नाराज हो रहा है, पर हमेशा की तरह सरकारी दलाल कामयाब हंैं। वो सारे राजधानी में अभी भी काम पर लगे हैं हुए जो पुरानी सरकार में भी दलाली करते थे और कांग्रेसी मंत्रियों के आसपास भी उन्हें देखा जा सकता है। कुल मिलाकर सरकार किसी की भी हो, तबादले करना उसने जरूरत बना लिया है और जिस तरह अफसर नहीं बदलते हैं, वैसे ही दलाल भी बदले नहीं हैं।