अगस्त 2019

पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था से क्या होगा?

प्रो. आलोक पुराणिक

आर्थिक समीक्षा, बजट और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में इस समय पांच ट्रिलियन डॉलर (5,000 अरब डॉलर) की अर्थव्यवस्था की चर्चा छाई हुई है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में बताया है कि अगले पांच वर्ष में पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था कैसे बनाई जा सकती है। सवाल फिर उठता है कि पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यस्था कैसी दिखनी चाहिए। वैसे एक तर्क के हिसाब से तो वैसी ही दिखनी चाहिए, जैसी जापान की अर्थव्यवस्था दिखती है।

पांच ट्रिलियन डॉलर, यानी 5 खरब डॉलर यानी 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था कैसी दिखेगी? इस सवाल का जवाब तलाशें, इससे पहले यह ही देख लें कि अभी करीब 2.7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था कैसी दिख रही है। कहां-कहां से कैसी-कैसी दिखायी पड़ रही है। हाल में आये आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 वॉल्यूम एक, पेज नंबर 202 में बताया गया है- "देश में सबसे ज़्यादा न्यूनतम मजदूरी 538 रुपये दैनिक दिल्ली में है और सबसे कम न्यूनतम मजदूरी नगालैंड में 115 रुपये है।" 2.7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में नगालैंड वाले 1.5 रुपये पर हैं और दिल्ली वाले 538 रुपये रोज पर हैं। कम से कम घोषित दैनिक मजदूरी के मामले में यानी दिल्ली वाले की न्यूनतम मजदूरी काग़ज़ पर तो नगालैंड वाले के मुक़ाबले 4.67 गुना ज़्यादा है। तो यह स्थिति कमोबेश पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में भी रहने वाली है। साधारण शब्दों में समझिए क्या कुछ बदलेगा अर्थव्यवस्था कहां है, यह सवाल अलग है। अर्थव्यवस्था में कौन, कहां है, यह सवाल बिलकुल ही अलग है। हाल हरेक का एक सा नहीं है, एक सा होगा भी नहीं। अभी भी हाल कुछ यूं सा है कि मानिये मुंबई में मुकेश अंबानी के पड़ोस में अगर कोई बैंक मैनेजर रहता है और बैंक मैनेजर के फ्लैट के सर्वेंट रूम में कोई नौकर रहता है, तो तीनों की आय को मिलाकर तो बहुत आकर्षक जोरदार आंकड़ा निकलेगा, जिससे यह आभास जायेगा कि इस इलाक़े में बहुत शानदार आय होती है। मान लीजिये, तीनों की आय महीने की 100 करोड़ निकलती है, तो बहुत संभव है कि इसमें से 99 करोड़ महीना मुकेश अंबानी की निकले, बैंक मैनेजर की 99 लाख पचास हजार रुपये महीना हो सकती है। बचे-खुचे पचास हजार रुपये महीने की आय नौकर की हो सकती है। यह महीने की आय 100 करोड़ रुपये से दोगुना होकर 200 करोड़ हो जाये, तो फिर कमोबेश यही ढांचा रहेगा- 198 करोड़ महीना मुकेश अंबानी, एक करोड़ रुपये 99 लाख रुपये महीना बैंक मैनेजर के हो जाएंगे और बची-खुची लाख रुपये की आय नौकर के खाते में जायेगी। जब आय मुल्क की बढ़ती है तो सबकी एक सी नहीं बढ़ती। कुछ की बहुत बढ़ती है, कुछ बहुत कम बढ़ती है, कुछ की लगभग वही रहती है। आंकड़ा देश का होता है, पर आय सबकी अलग-अलग स्तर की होती है। इसलिए अर्थव्यवस्था कहां होगी, इससे ज्यादा बड़ा सवाल है कि अर्थव्यवस्था में कौन, कहां है। हाल में आये आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक देश की अर्थव्यवस्था 2018-19 में एक हिसाब से 6.6 प्रतिशत की दर से बढ़ी। इसी अवधि में खेती की अर्थव्यवस्था सिर्फ 2.9 फीसदी की दर से बढ़ी। इसी अवधि में सेवा क्षेत्र की अर्थव्यवस्था 7.5 प्रतिशत बढ़ी। खेती वाला तीन प्रतिशत साल से भी ना बढ़ पा रहा है। सेवा क्षेत्र, होटल, वित्तीय सेवा क्षेत्रों में काम करने वाला हो सकता है कि 7.5 प्रतिशत की दर से बढ़ा हो। सवाल फिर उठता है कि पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यस्था कैसी दिखनी चाहिए। वैसे एक तर्क के हिसाब से तो वैसी ही दिखनी चाहिए, जैसी जापान की अर्थव्यवस्था दिखती है। जापान की अर्थव्यवस्था भी अभी करीब पांच ट्रिलियन डॉलर की है। लेकिन भारत में मामला जापानी टाइप क्यों ना दिखता। जापान की कुल जनसंख्या 13 करोड़ के आसपास है। 13 करोड़ की जनसंख्या के लिए पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था है। यहां एक भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश की जनसंख्या करीब 22 करोड़ है। पांच लोगों का परिवार पचास हजार महीना कमा ले, तो हरेक के हिस्से दस हजार आयेंगे। उधर, दो लोगों का परिवार पचास हजार कमा ले, तो हरेक के हिस्से में पच्चीस हजार आ जायेंगे। अर्थव्यवस्था कितनी है, इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अर्थव्यवस्था में कितने है। तो कुल मिलाकर, पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र में काम कर रहे लोगों के मज़े होंगे। खेती वाले दुखी ही दिखेंगे। फिल्मों में भी अब अमीर लोग सॉफ्टवेयर इंजीनियर दिखाये जाते हैं। किसान तो अब बतौर शोषित भी ना दिखाया जाता है। सेवा क्षेत्र में भी खासकर नये टाइप की सेवाओं का धंधा बहुत चमकेगा। ट्यूशन, कोचिंग देने वाली संस्था बायजूस की बाजार कीमत करीब 35,000 करोड़ रुपये है। बायजूस के ब्रांड एंबेसडर शाहरुख ख़ान हैं। बायजूस की उम्र ज़्यादा नहीं है, दस साल भी नहीं। पंजाब नेशनल बैंक मई 1894 में स्थापित हुआ था। पंजाब नेशनल बैंक की बाज़ार कीमत करीब 33000 करोड़ रुपये की है। नयी सेवाओं की हालत बढ़िया रहेगी। पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था तक पहुंचने में शायद पंजाब नेशनल बैंक हांफ जाये। लेकिन बायजूस नयी ऊंचाई छू लेगा, पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में। खेती नए निचले स्तर पर भी जा सकती है, पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में। खेती में होना, नगालैंड में होना, कहीं नहीं पहुंचायेगा। दिल्ली में होना और सेवा क्षेत्र में होना और ख़ासकर नई तरह की सेवाओं में होना ख़ासा कमाई करवाएगा। बाकी सार-संक्षेप यह है कि मुंबई दो बारिशों के बाद तब भी डूबता था, जब भारतीय अर्थव्यवस्था का साइज़ एक ट्रिलियन डॉलर का था, तब भी डूबता था, जब दो ट्रिलियन डॉलर का था, मार्च 2020 में तो यह साइज तीन ट्रिलियन डॉलर का हो जायेगा, तब भी डूबेगा ही। 2.7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में भी बिहार के एक अस्पताल में दो सौ बच्चे मर जाते हैं। अर्थव्यवस्था के साइज़ से ज्यादा बड़ा मसला यह था कि बच्चे कहां थे। कौन, कहां होगा इस सवाल के जवाब में बस यह सुन लीजिये- 2.7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में दिल्ली वह शहर है, जहां कागज पर दैनिक न्यूनतम मजदूरी 538 रुपये और महीने की न्यूनतम मजदूरी 14000 रुपये है, वहां सीवर में घुसकर जो मजदूर मर जाते हैं, उन्हें छह हजार, सात हजार रुपये महीने की मजदूरी मिलती है। पांच ट्रिलियन डॉलर तक तो अर्थव्यवस्था पहुंच जायेगी, पर कौन, कहां पहुंचेगा, यह इस बात पर निर्भर रहेगा कि कौन अभी कहां है। (लेखक अर्थशास्त्र के प्राध्यापक और व्यंग्यकार हैं)