अगस्त 2019

विपक्ष-मुक्त लोकतंत्र बनाने की कोशिश

अनिल सिन्हा

- भाजपा की ओर से हो रही बाकी पार्टियों को तोड़ने की कोशिश महज दल-बदल की घटना नहीं है। यह लोकतंत्र का स्वरूप बदलने की कोशिशों का हिस्सा है, जिसमें एक पार्टी और एक व्यक्ति का शासन हो। निरंकुश सत्ता चलाने की यह प्रवृत्ति नई नहीं है। कांग्रेस ने इंदिरा गांधी के नेतृत्व में इस प्रवृत्ति का परिचय दिया था और इसका नतीजा आपातकाल के रूप में सामने आया। मोदी उससे भी भयानक खेल लोकतंत्र के साथ कर रहे हैं।

अगर कर्नाटक में खेले गये नाटक को अन्य राजनीतिक घटनाओं से जोड़ कर देखें तो साफ हो जाएगा कि भारत में एक विपक्षविहीन लोकतंत्र बनाने की कोशिश चल रही है। भाजपा की ओर से हो रही बाकी पार्टियों को तोड़ने की कोशिश महज दल-बदल की घटना नहीं है। यह लोकतंत्र का स्वरूप बदलने की कोशिशों का हिस्सा है, जिसमें एक पार्टी और एक व्यक्ति का शासन हो। इस पूरे अभियान के लिए विप़क्ष-मुक्त भारत जरूरी है, क्योंकि एक सशक्त विप़क्ष का मतलब होता है ऐसा लोकतंत्र, जिसमें अलग-अलग विचार और कार्यक्रमों को उसी सम्मान से देखा जाए, जिस सम्मान से सरकारी विचार और कार्यक्रम को देखा जाता है। जाहिर है कि ताकतवर विपक्ष भाजपा के अभियान को सफल नहीं होने देगा। विपक्ष सवाल उठाएगा, विरोध करेगा और जरूरी हुआ तो अपनी बात के प़क्ष में लोगों का समर्थन जुटाने के लिए सड़क पर उतरेगा। लेकिन मोदी सरकार इन सब चीजों से नफरत करती है या यूं कहिए कि आलोचना से डरती है। मोदी के कांग्रेस-मुक्त भारत की कल्पना वास्तव में एक विपक्ष-मुक्त भारत की ही कल्पना है। कर्नाटक में सरकार गिराने के लिए जो कुछ किया गया, वह पहले भी हो चुका है। विधायकों की खरीद-फरोख्त और पैसा तथा पद के लिए पार्टी बदलना कोई नई बात नहीं है। विधायकों को होटलों और रिसॉर्टों में घुमाना भी नया नहीं है। वैसे भाजपा के विधायक इसमें रिकॉर्ड बना चुके हैं। गुजरात में शंकरसिंह वाघेला और केशुभाई पटेल के बीच के युद्ध में ही हजूरिया-खजूरिया वाला प्रकरण हुआ था। विधायकों को लोभ और लालच या धमकी आदि से बचाने के लिए किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाना और उन्हें पिकनिक का आनंद देने का तरीका भाजपा के लोगों ने ही ईजाद किया है। विधायकों को मध्यकालीन सिपाहियों में तब्दील करने का यह तरीका लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। मध्यकाल में फौज को इसी आधार पर इकट्ठा किया जाता था कि लूट में उन्हें पर्याप्त हिस्सा मिलेगा। विधायकों की फौज को भी नए मंत्रिमंडल में लूट का हिस्सा देने का वादा रहता है। कर्नाटक में तो यह बात भी सामने आ रही है कि इस्तीफा देने वाले विधायकों को यह आश्वासन भी दिया गया कि उन्हें अयोग्य करार नहीं किया जाएगा और वे मंत्री बन सकते हैं। इस्तीफा देने पर दल-बदल कानून लागू नहीं होगा और ऐसे में वे आसानी से अयोग्य होने से बच जाएंगे। दो दिन पहले विधायकी से इस्तीफा देने वाला मंत्री की कुर्सी पर बैठ जाए तो शक की क्या गुंजाइश रहती है कि उसने इसी कुर्सी के लिए इस्तीफा दिया था। अगर देश की जांच एंजेसियां मजबूत होतीं तो यह पता लगाना असंभव नहीं था कि इन खेलों के पीछे कौन लोग थे और इसका खर्च किन लोगों ने उठाया। अदालत ऐसे मामलों की जांच दे सकती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का रवैया भी मौजूदा सरकार के पक्ष में फैसला देने का है। कर्नाटक के बागी विधायकों को अपनी मर्जी से चलने का मौका देकर सुप्रीम कोर्ट ने न केवल दल-बदल को अप्रत्यक्ष रूप स्वीकृति दी है, बल्कि सदन के भीतर के मामलों में विधान सभा के अध्यक्ष के अंतिम अधिकार को भी अमान्य किया है। यह फैसला विधायिका के अधिकारों को कम करता है। जरूरत इस बात की थी कि सुप्रीम कोर्ट विधायिका को दल-बदल कानून को मजबूत करने का निर्देश सरकार को देता। सच पूछिए तो दल-बदल कानून का कोई ज्यादा मतलब नहीं रह गया है। विधायकों से इस्तीफा दिला कर सदन के सदस्यों की संख्या कम करना और सरकार गिरा देना उन विधान सभाओं में दल-बदल कानून को बेअसर करने का आसान तरीका है, जहां बहुमत बड़े मामूली अतर से हो। गोवा जैसे छोटे राज्यों में तो यह काम और आसान है। हम देख ही चुके हैं कि कांग्रेस के 15 में से दस विधायकों को भाजपा में मिला लिया गया। दल-बदल करने वाले विधायक किस तरह पार्टी छोड़ने के लिए अलग-अलग तर्क ढूंढ लेते हैं। गोवा में कांग्रेस छोड़ने वालों ने सरकार के कामकाज से प्रभावित होकर पार्टी छोड़ी है तो कर्नाटक में पार्टी छोड़ने वाले सरकार के कामकाज से असंतुष्ट होकर यह काम किया है। दोनों मामले में विधायकों का भ्रष्टाचार साफ दिखाई दे रहा है, लेकिन वोटरों के फैसले के खिलाफ जाने वाले इन विधायकों को दंडित करने का कोई उपाय नहीं है। दल-बदल कानून राजीव गांधी की सरकार ने लाई थी और 1985 में बने इस कानून ने इस बीमारी से बचाने में काफी हद तक सफलता भी पाई थी। लेकिन पार्टियों ने इस कानून को तोड़ने का उपाय कर लिया है। अब तो दल-बदल करने वाले मंत्री भी बन जाते हैं और उनकी अयोग्यता का फैसला विधानसभाध्यक्ष जान-बूझकर लटकाए रखते हैं। दल-बदल कानून ने सदन के अध्यक्ष की गरिमा को भी नुकसान पहुंचाया है। सरकार को हर हाल में बचाए रखने के लिए अध्यक्ष की भूमिका को ध्यान में रख कर अब संसद और लोकसभा में इस पद पर ऐसे लोगों को बिठाया जाता है जो सरकार का पिट्ठू हो। अब यह पद भी राज्यपालों की तरह का ही हो गया है। सत्ताधारी दल के इशारे पर काम करने वाले ही लोग इन पदों पर बिठाए जाते हैं। दल-बदल वोटरों का अपमान है। सांसद या विधायक किसी पार्टी के नुमाइंदे के रूप में चुने जाते हैं और उस पार्टी को छोड़ना जनता के खिलाफ अपराध है, जिसके टिकट पर आप चुने गए हैं। जनता की भूमिका महज वोट डालने वाले की रह जाती है। इन मामलों में जनता की राय ही अहम होनी चाहिए और जन-प्रतिनिधियों के इस तरह के भ्रष्ट आचरण पर लगाम लगाने का अधिकार वोटरों को होना चाहिए। इस्तीफे के बाद तुरंत चुनाव हो और विधानसभा में सदस्यों की पूरी संख्या होने पर ही अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान होना चाहिए। वैसे भी, यह नैतिक रूप से गलत है कि सरकार बदलने के मामले में उन सीटों के वोटरों की राय नहीं ली जाए, जो खाली रह गई हैं। यह सरकार चुनने के उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन है। निरंकुश सत्ता चलाने की यह प्रवृत्ति नई नहीं है। कांग्रेस ने इंदिरा गांधी के नेतृत्व में इस प्रवृत्ति का परिचय दिया था और इसका नतीजा आपातकाल के रूप में सामने आया। मोदी उससे भी भयानक खेल लोकतंत्र के साथ कर रहे हैं। वैसे भी, गुजरात के हजूरिया-खजूरिया प्रकरण में उनकी भूमिका को विवादास्पद माना जा रहा था। इसी प्रकरण में वाघेला समर्थक वरिष्ठ नेता और सुरेश मेहता मंत्रिमंडल के सदस्य आत्माराम पटेल की जमकर पिटाई हुई थी और उनकी धोती खोल दी गई थी। राजनीति का गुजरात मॉडल अब देश का मॉडल बनने जा रहा है। कुछ लोग मानते हैं कि मोदी सरकार यह सब राज्यसभा में बहुमत कायम करने के लिए कर रही है, ताकि उन कॉरपोरेट को फायदा पहुंचाने वाले कानूनों को पारित कर सकें। सच्चाई यह है कि यह इस अभियान का एक छोटा सा हिस्सा भर है। विपक्षी पार्टियों पर नजर डालने से यह स्पष्ट हो जाता है कि विधेयक पास कराने में भाजपा को कोई कठिनाई नहीं है। वह कभी बसपा, कभी समाजवादी पार्टी का साथ ले सकती है। बीजू जनता दल और टीआरएस जैसी पार्टियां उसे उबारने के लिए तैयार ही बैठी हैं। भाजपा का असली मकसद एक पूंजीवादी हिंदू राष्ट्र बनाने का है। यह एक ऐसा राष्ट्र होगा, जिसमें धर्म और जाति तथा आर्थिक असमानताओं को वैध माना जाएगा। लेकिन भगत सिंह, गांधी, आंबेडकर, लोहिया और जयप्रकाश के विचारों की मौजूदगी में यह संभव नहीं है। देश का विपक्ष चाहे कितना भी लंगड़ा हो, वह इन्हीं विचारों से संचालित है। सच मानिए तो भाजपा ही देश की एकमात्र पार्टी है, जो स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही समानता और सहअस्तित्व के विचारों के खिलाफ है। वह मुसलमानों के साथ भेदभाव का बर्ताव करना चाहती है और हिन्दू श्रेष्ठता के नाम पर जाति आधारित शोषण जारी रखना चाहती है। भाजपा इन सारे मुद्दों को सतह पर आने देने से रोकना चाहती है। इसलिए मोदी कांग्रेस-मुक्त भारत की कल्पना करते हैं और असली मायनों में देश को विपक्ष-मुक्त बनाना चाहते हैं। वह विपक्ष को विकलांग कर देना चाहते हैं। इस मुहिम का नेतृत्व कर रहे मोदी और अमित शाह निरंकुश शासन चाहते हैं और आरएसएस उन्हें साथ दे रहा है, क्योंकि उसे लग रहा है कि उसके हिंदू राष्ट्र का सपना ये लोग ही पूरा कर सकते हैं। देश के संविधान ने एक व्यापक विपक्ष का मॉडल हमारे सामने रखा है। इसमें सिर्फ विपक्षी पार्टियां नहीं हैं। इसमें निष्पक्ष नौकरशाही, न्यायपालिका तथा चुनाव आयोग से लेकर राष्ट्रपति तथा संसद और विधान मंडल के अध्यक्ष तथा सभापति शामिल हैं। इनका काम सरकार के कामों में स्वतंत्र चेतना के साथ हिस्सा लेना। आज इन सभी संस्थाओं को भाजपा ने अपने कब्जे में कर लिया है। मीडिया को चौथा स्तंभ माना गया है। इस स्तंभ का भी काम है कि सरकार के कामों की समीक्षा आजादी के साथ करे। मीडिया की हालत तो लोग देख ही रहे हैं। क्या ऐेसे में यह माना जाए कि भाजपा ने अंतिम विजय हासिल कर ली है? ऐसा मानना सही नहीं होगा। भाजपा ने एक महत्वपूर्ण प़क्ष को नजरअंदाज कर दिया है। यह प़क्ष जनता का पक्ष है। जब तक जनता एक पक्ष के रूप में खड़ी रहेगी, विपक्ष को मिटाया नहीं जा सकता है। उसे जादूगरी से ज्यादा समय तक वश में नहीं रखा जा सकता है।