अगस्त 2019

आक्रामक बनकर ही बच सकती है कांग्रेस

प्रेमशंकर झा

आज कांग्रेस के सामने चुनौती पार्टी का कायाकल्प ऐसे दल के तौर पर करने की है, जो अपने पुराने वैभव और साम्राज्य के बिखर जाने की टीस से बाहर निकलकर कबूल करे कि अब उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है और बचाव की मुद्रा से बाहर निकलकर आक्रामक अंदाज़ में खेलना शुरू करे. उसे यह अच्छी तरह समझ लेना होगा कि न तो नरम हिंदुत्व उसे मौजूदा संकट से उबार सकता है और न ही नरम धर्मनिरपेक्षता।

भाजपा के हाथों कांग्रेस को मिली करारी शिकस्त को एक महीने से ज्यादा का वक्त बीत जाने के बाद भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी थी। कांग्रेस के केवल एक वरिष्ठ नेता, वीरप्पा मोइली ने उन्हें वो बात बताने का साहस किया, जो पार्टी का हर सदस्य जानता था: उनकी चुप्पी का एक-एक दिन इस धारणा को मजबूती दे रहा है कि उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया है और राजनीति से पूरी तरह से संन्यास ले लिया है। एक ऐसी पार्टी के लिए, जिसने पूरी ताकत से सामूहिक नेतृत्व को हतोत्साहित किया है और जो मतदाताओं को रिझाने के लिए नेहरू-गांधी वंश के फीके पड़ते करिश्मे पर पहले से भी ज्यादा निर्भर हो गई है, यह मौत को गले लगाने जैसा है। राहुल गांधी ने कांग्रेस का अध्यक्ष पद भले ही अनमने ढंग से स्वीकार किया हो, लेकिन उन्होंने इस पद के साथ आने वाली जिम्मेदारियों को स्वीकार किया था। इसलिए वे कितनी भी निराशा में क्यों न डूबे हों, उनका फर्ज बनता था है कि वे अपने साथ पार्टी को भी तबाह न करें। उनके सामने मौजूद चुनौती ग्रीक नायक प्रमथ्यु जैसी रही। किसी जमाने में पूरे देश पर कांग्रेस का सिक्का चलता था, लेकिन पिछले चार दशकों से कांग्रेस लगातार अपनी बची-खुची जमीन को ही बचाए रखने की नाकाम कोशिश करती रही है। आज कांग्रेस के सामने चुनौती पार्टी का कायाकल्प एक ऐसी पार्टी के तौर पर करने की है, जो अपने पुराने वैभव और साम्राज्य के बिखर जाने की टीस से बाहर निकल कर यह कबूल करे कि अब उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है और बचाव की मुद्रा से बाहर निकलकर आक्रामक अंदाज में खेलना शुरू करे। ऐसा करने के लिए कांग्रेस पार्टी को गांधी, नेहरू, सरदार पटेल, आजाद जैसों के खून पसीने से तामीर किए गए राष्ट्र के प्रति नए जज्बे से भरना होगा। इन महान नेताओं ने एक धार्मिक और जातिगत पूर्वाग्रहों से मुक्त देश का सपना देखा था, जिसमें अनेक सांस्कृतिक-भाषायी राष्ट्रीयताएं बराबरी के साथ रह सकती थीं और तरक्की कर सकती थीं। कांग्रेस अगर केवल अपने शुरुआती दिनों के आदर्शवाद को दोबारा पाने में सफल रहती है, तब यह आज के युवा के आदर्शों को देश की आज़ादी के नायकों के ‘आईडिया ऑफ इंडिया’ से जोड़ने में कामयाब होगी। सॉफ्ट हिंदुत्व नहीं चलेगा इस रास्ते पर पहला कदम निश्चित रूप से औपचारिक तौर पर सॉफ्ट हिंदुत्व की नीति की विदाई होना चाहिए। सॉफ्ट हिंदुत्व की नीति सॉफ्ट सेकुलरिज़्म (धर्मनिरपेक्षता) की नीति का विकास है। सतत तुष्टीकरण की इस नीति को 1980 के दशक में पार्टी ने तब अपनाया, जब भारतीय लोकतंत्र के भीतर सबसे प्रमुख और दबदबे वाली पार्टी की स्थिति धीरे-धीरे कमजोर होने लगी। 1985 में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाना और 1985 में ही तीन तलाक के मसले पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलटना इस यात्रा का एक निर्णायक मोड़ था। उसके बाद से यह एक के बाद एक समझौते करती गयी और आखिरकार जनता के बीच इसने नैतिक आधार खो दिया। बांग्लादेश के कट्टरपंथियों से सुरक्षा की तलाश में भाग कर भारत आईं तसलीमा नसरीन को जब भारत के मुस्लिम कट्टरपंथियों ने देश से बाहर जाने पर मजबूर कर दिया, तब यह हाथ पर हाथ धर कर मूकदर्शक बनी रही और ऐसा होने दिया। इसने सलमान रश्दी के सैटेनिक वर्सेज को प्रतिबंधित कर दिया। गुजरात को जोसेफ लेलीवेल्ड की महात्मा गांधी पर किताब को प्रतिबंधित करने दिया; रामायण पर एके रामानुजन के अध्ययन को दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से बाहर हो जाने दिया और शिकागो की विद्वान वेंडी डोनिगर की हिंदुत्व पर किताब को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया। सबसे शर्मनाक यह था कि भारतीय देवी-देवताओं के विवादास्पद चित्रों के कारण विश्व हिंदू परिषद द्वारा देश से बाहर कर दिये गए एमएफ हुसैन मरने के लिए भी अपने वतन नहीं लौट पाए, जिससे वे प्यार करते थे। 2014 की हार के बाद कांग्रेस की सॉफ्ट धर्मनिरपेक्षता ने विकृत होकर सॉफ्ट हिंदुत्व का रूप ले लिया है। गुजरात चुनाव से पहले पार्टी द्वारा राहुल गांधी के मंदिर जाने, उनके वहां पूजा करने और माथे पर टीका लगाने को जिस तरह से प्रचारित किया गया, वह पतन की पराकाष्ठा थी। लोगों के पास पहले से रिकॉर्ड ऐसे कॉल्स आने लगे, जिनमें पूछा जाता था कि ‘क्या आप नहीं जानते हैं कि राहुल गांधी एक जनेऊधारी हिंदू (यानी ब्राह्मण) हैं?’ सॉफ्ट हिंदुत्व ने न सिर्फ देश के पहले से ही संकटग्रस्त धर्मनिरपेक्ष आवाजों को और हाशिये पर धकेल दिया, बल्कि इसने संघ के कट्टर हिंदुत्व को भी वैधता प्रदान करने काम किया। जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने ढिठाई से स्वामी विवेकानंद की विरासत पर दावा किया, जिस तरह से आरएसएस के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल को हथियाया और कांग्रेस मूकदर्शक बनकर यह सब देखती रही और जिस तरह से उन्होंने पिछले साल गांधी जयंती के अवसर पर गांधी की विरासत पर घृणित दावा किया, वह इस बात का जीता-जागता सबूत है। इस कार्यक्रम में राहुल गांधी और सोनिया गांधी दोनों ही मौजूद थे, लेकिन विरोध में वॉकआउट करने की जगह वे चुपचाप बैठे रहे और मोदी को भारत के सबसे गर्वीली विरासत को हथियाने की कोशिश करते देखते रहे। ऐसा लगा मानो उनके लिए नाथूराम गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या इतिहास की कोई दुर्घटना मात्र हो- जैसे 1914 में सराजेवो में एक अकेले पागल धर्मांध गैवरिलो प्रिंसिप द्वारा किया कुकृत्य और जैसे 2002 का अहमदाबाद नरसंहार कभी हुआ ही न हो। अगर कांग्रेस वापसी करना चाहती है, तो उसे अपनी अतीत की गलतियों पर आत्मविश्लेषण करने में लंबा समय लगाना चाहिए। अगर इस हार में कांग्रेस कोई अच्छी चीज खोजना चाहती है, तो उसे समझना होगा कि आगे होने वाली विचारों की लड़ाई में कोई बीच का रास्ता नहीं है। हिंदुत्व के जहर से लड़ने के लिए कांग्रेस को धर्मनिरपेक्षता और बहुलतावाद जैसे आयातित और घिसे-पिटे शब्दों को तोते की रटना बंद करना चाहिए और उस पथप्रदर्शक दर्शन को फिर से खोजना चाहिए, जो ढाई हजार साल से ज्यादा समय से भारत में माने जाने वाले हर मजहब या उपासना पद्धति का सारतत्व है। यह सारत्व है धर्म। धर्म क्या है? धर्म, वैदिक भारत की असली आस्था पद्धति है। वेदों में हिंदू धर्म का कोई संदर्भ नहीं मिलता है, क्योंकि हिंदू शब्द ही लगभग एक हजार साल बाद फारस (ईरान) से आया और इसे एक विडंबना ही कहा जाएगा इसका प्रयोग करने वाले मुस्लिम थे। धर्म आधुनिक और विवादास्पद अर्थों में मजहब का पर्यायवाची नहीं है, क्योंकि उस समय तक उन मसीहाई या पैगंबरी धर्मों का जन्म ही नहीं हुआ था, जो आज धार्मिक बहसों में छाए हुए हैं। धर्म का अर्थ सही जीवन-पद्धति से है: इसमें लोगों के बीच आपसी और बाहरी व्यापक दुनिया के साथ उनके संबंधों के नियम तय किए गए थे। ऋग्वेद विभिन्न प्रकार के धर्मों में भेद करता है, जैसे प्रथम धर्म, राज धर्म और स्वधर्म। लेकिन धर्म के ये सारे भेद मानवीय कर्तव्य के इर्द-गिर्द केंद्रित हैं, जिसका अर्थ है धारण करना, सहारा देना और पालन करना। प्राचीनकाल के दौरान धर्म ने ही हिंदू धर्म में कर्मयोग का चोला पहन लिया। गौतम बुद्ध ने चार आर्य सत्य (दुख, समुदय, निरोध, मार्ग) और अष्टांगिक मार्ग के अपने उपदेशों की व्याख्या करने के लिए ‘धर्म’ शब्द का इस्तेमाल किया। तुलनात्मक धर्म के पश्चिमी छात्रों ने बौद्ध को एक अलग धर्म के तौर पर प्रस्तुत करके बौद्ध धर्म के साथ अन्याय किया, क्योंकि इसने इसे कई मजहबों में से एक और मजहब बना दिया, जिसमें तीन मसीहाई धर्म जूडावाद, ईसाई धर्म और इस्लाम भी शामिल हैं। गौतम बुद्ध द्वारा वैदिक पद का इस्तेमाल यह बताता है कि वे खुद कोई पैगंबर समझने की जगह एक समाज सुधारक समझते थे। उन्होंने धर्म के भ्रष्टाचार और अधर्म के विकास के खिलाफ विद्रोह किया था। इसका कारण धार्मिक रूढ़िवाद और ब्राह्मणवादी नियंत्रण था। वास्तव में बौद्ध धर्म मानव इतिहास में किसी संगठित धर्म के खिलाफ पहला विद्रोह था। एक महत्वपूर्ण अंतर बौद्ध धर्म को पैगंबरी धर्मों के साथ रखकर देखने से हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और अन्य रहस्यवादी धर्मों और मसीहाई धर्मों के बीच का एक महत्वपूर्ण अंतर कुहासे में छिप जाता है। मसीहाई धर्मों में आस्था का सार्वजनिक तौर पर ऐलान करना पड़ता है। इनमें से किसी धर्म का होने के लिए उस धर्म के प्रति पूरा समर्पण और दूसरे धर्मों को अस्वीकार करना पड़ता है। यह ‘सच्चे’ ईश्वर के सामने अपना पूरा समर्पण है, जिसका इनाम इस जीवन में प्रायश्चित के रास्ते पापों से मुक्ति की संभावना है। इसके उलट धर्म को जीवन में उतारना पड़ता है, उसे जीना पड़ता है। सिर्फ इस जीवन के अच्छे कर्म ही आत्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दे सकते हैं, न कि किसी पैगंबर के प्रति पूर्ण समर्पण। और इसमें पापों से मुक्ति का रास्ता भी आसान नहीं है। बौद्धमत को -बौद्ध धर्म के तौर पर पुकारना हिंदू तरीका है और आज भी हिंदुओं द्वारा अक्सर की जाने वाली टिप्पणी- ‘ये मेरा धर्म है’ इसके सारत्व को प्रकट करता है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और हिंदुस्तान टाइम्स के पूर्व संपादक हैं)