अगस्त 2019

अंग्रेजों की प्रेतात्माओं से आजादी शेष है!

कनक तिवारी

हमारे देश में यह जुमला कहावत की तरह मशहूर हो गया है 'अंगरेज़ मर गए औलाद छोड़ गए।' अंगरेज़ मर गए का आशय भारत छोड़कर चले गए और औलाद छोड़ गए का आशय अपने कानूनों, परंपराओं, प्रशासन और शिक्षा के उस कूड़ाघर से है जो भारतीय जीवन में सड़ांध की आधुनिक फैक्टरी है। अंगरेज़ी संसद तक को महात्मा गांधी ने 'हिन्द स्वराज' में वेश्या कहा था। भारत में उसी संसद की अनुकृति की गई है। देशवासी टेलीविजन पर जब अपने सांसदों की हरकतों को देखते हैं तो उन्हें लगता है कि अंगरेज़ वाकई अब भी हम पर हुकूमत कर रहे हैं।

पौने दो सौ वर्ष हुकूमत करने के बाद अंगरेज़ों की केचुल उतर गई। अंगरेज़ कौम की सभ्यता और संस्कृति का इतिहास बहुत पुराना या प्रशंसनीय नहीं है। फ्रांस, यूनान और जर्मनी जैसे मुल्क अंगरेज़ों को दकियानूस, पिछड़ा, अपरिष्कृत और स्वार्थी व्यापारी मानते रहे। गोरी चमड़ी के अंगरेज़ भारत में यह जतलाने में कामयाब रहे कि वे वैचारिक हैं। यह भी कि वे भारतीयों को आदर्श, व्यवहार, आधुनिक मूल्य और शैक्षिक दृष्टि से समृद्ध बना सकते हैं। दोष शहरी भारतीयों का कहा जाएगा। वे ब्रिटेन की आधुनिक दिखती दृष्टि के कायल हो गए थे। उन्होंने अंगरेज़ को अपनी छाती पर लाद लिया। करोड़ों ग्रामीणों, दलितों और आदिवासियों को अपनी जीवन शैली यापन करते पता ही नहीं चला अंगरेज़ उनके देश में घुस आए हैं। भारत की सांस्कृतिक समझ के तंतु सदियों के अनुभव के बाद मजबूत हो गए थे। राजनीतिक दृष्टि से गुलाम, सामाजिक दृष्टि से विग्रहयुक्त और आर्थिक दृष्टि से विपन्न होने के बाद भी वे बहुमत भारतीय अपनी मनस्विता में आज़ाद खयाली महसूस करते रहे। मोटे तौर पर स्वामी विवेकानन्द और महात्मा गांधी का ऐसा ही आकलन था। अंगरेज़ हुक्मरानों को सबसे बड़ी चुनौती 1857 के स्वतंत्रता युद्ध से मिली। ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा संचालित व्यवस्था में ऐसे कानून नहीं थे। जिनके माध्यम से जनयुद्ध के नायकों से निपटा जा सके। ब्रिटेन की संसद के लिए लाजिमी हो गया कि नए अधिनियम रचे। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भीषण नरसंहार हुआ। अंगरेज़ सिपाहियों को भी मौत के घाट उतारा गया। अंगरेज़ों की संपत्तियां भी छीनी गईं। उन्हें हिंसा का शिकार भी होना पड़ा। ये स्वतंत्रता के सशस्त्र जनयुद्ध का परिणाम थे। 1857 का युद्ध अहिंसा का प्रयोग या प्रदर्शन नहीं था। अंगरेज़ों ने 1860 में भारतीय दंड संहिता का निर्माण किया। 1859 में व्यवहार प्रक्रिया संहिता तथा कालसीमा अधिनियम लिखे। दंड प्रक्रिया संहिता और उच्च न्यायालय अधिनियम 1861 में, उत्तराधिकार अधिनियम 1865 में और भारतीय संविदा अधिनियम 1872 में रचे। भारतीय साक्ष्य अधिनियम को सर जेम्स स्टीफन ने 1872 में बनाया जबकि भारतीय दंड संहिता के निर्माता लार्ड मैकाले थे। मैकाले ने 1835 में इंग्लैंड की संसद में कहा था कि मैंने भारत का भ्रमण किया है। वहां मुझे पूरे देश में समद्धि दिखाई दी है। मुझे वहां कोई भिखारी नहीं दिखाई दिया। भारत को तबाह करना है। तो उसकी समृद्धि की जड़ों को काटना होगा। शिक्षा व्यवस्था को तबाह करना होगा। उपरोक्त के बाद भू अर्जन अधिनियम 1894 और भारतीय वन अधिनियम भी बनाए गए। नदियों, झीलों, झरनों के पानी के किनारे संस्कृतियां, सभ्यता, नगर और गांव बसे हैं। पीने तक के पानी पर कानूनी प्रतिबंध क्यों, कब और कैसे लग गए जनता को पता ही नहीं है। प्रकृति ने मनुष्य को अकूत सौगातें, पशु पक्षी, वनोपज, फल फूल औषधियों वगैरह के रूप में दी हैं। इनका सदियों से प्राकृतिक अधिकारों के तहत उपयोग होता रहा है। तरह तरह के कानून बनाकर जनता से दूर कर दिया गया है। अंगरेज़ ने सरकारी दफ्तरों में हो रहे कामकाज की भनक तक जनता को नहीं मिल पाने के पुख्ता कानूनी इंतजाम किए थे। आज़ाद देश की सरकार ऐसे सभी कानूनों को बंदरिया के बच्चे की तरह छाती से चिपकाए हुए है। अंगरेज़ सिखा गया जनता की छाती को गोलियों से छलनी कर दो। पुलिस थाने में बुलाकर भद्र व्यक्ति की इज्जत उतार लो। पुलिस की वर्दी पहनकर लूट और डकैती की संपत्ति में चोरों डकैतों के साथ बंदरबाट कर लो। माता पिता के नाम कंपनियां बनाकर घूस की गाढ़ी कमाई को सरकारी अफसर होने के बावजूद अन्य प्रदेशों में खपाते जाओ। सरकारी फाइलों पर जिम्मेदारी के नोट नहीं लिखो। मौखिक आदेश देकर निचले अधिकारियों को प्रस्ताव लिखने पर मजबूर करो। उन्हें फंसा दो और खुद राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित होने के अवसरों की तलाश करो। न्यायाधीश बन जाओ और अपने बच्चों, बीवियों और रिश्तेदारों को बड़ा वकील बनाने के लिए एक जैसे न्यायाधीशों के साथ मिलकर भाई भतीजावाद करो। निकटतम रिश्तेदारों को सरकारी कंपनियों और निजी उद्योगपतियों के मुकदमे दिलवाने के लिए टेलीफोन करो। खनिज, जंगल, लोककर्म, सिंचाई, वगैरह के ठेकों को बिल्कुल नहीं बदलो। उनकी आड़ में घूस के प्रतिशत को तय करो। भ्रष्टाचार करने के लिए सरकारी निर्णय करो। उन्हें अंगरेज़ के जुमले में नीतियां कहो। पकड़े जाने पर अंगरेज़ों द्वारा दिए गए रक्षा पदक को ओढ़ लें कि उनके द्वारा कोई भी कृत्य सद्भावनापूर्वक किया कहा जाता है। ऐसी नीतियों को चुनौती दिए जाने पर अदालतें भी अंगरेज़ों की कनफुसिया के आधार पर यही कहें कि हम सरकारी नीतियों पर पुनर्विचार नहीं कर सकते। अंगरेज़ कथित भारतीय प्रजा को राज्य के विरुद्ध बोलने की आज़ादी नहीं देता था। इसलिए उसने गोपनीयता और राजद्रोह को लेकर कानूनों का जंजाल खड़ा किया था। भारतीय शासकों ने उन नियमों से ज़्यादा कड़े कानून बनाकर संविधान में जनता को दिए गए मूलभूत अधिकारों की छाती की छलनी कर दी है। आतंकवाद और नक्सलवाद को खत्म करने की आड़ में केन्द्र और देष के कई राज्यों ने इतने कड़े गैर लोकतांत्रिक और असंवैधानिक कानून बना रखे हैं। हिंसक अपराधियों को तो पकड़ नहीं पाते लेकिन जनता की गर्दन नापने के काम में मुस्तैद हैं। हमारे देश में यह जुमला कहावत की तरह मशहूर हो गया है 'अंगरेज़ मर गए औलाद छोड़ गए।' अंगरेज़ मर गए का आशय भारत छोड़कर चले गए और औलाद छोड़ गए का आशय अपने कानूनों, परंपराओं, प्रशासन और शिक्षा के उस कूड़ाघर से है जो भारतीय जीवन में सड़ांध की आधुनिक फैक्टरी है। अंगरेज़ी संसद तक को महात्मा गांधी ने 'हिन्द स्वराज' में वेश्या कहा था। भारत में उसी संसद की अनुकृति की गई है। देशवासी टेलीविजन पर जब अपने सांसदों की हरकतों को देखते हैं तो उन्हें लगता है कि अंगरेज़ वाकई अब भी हम पर हुकूमत कर रहे हैं। (लेखक गांधीवादी चिंतक और छत्तीसगढ़ के जानेमाने वकील हैं)