अगस्त 2019

लुटियन की दिल्ली से

अनिल जैन

गडकरी क्यों नाराज हैं? केंद्रीय मंत्री और भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी इन दिनों पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से नाराज चल रहे हैं! उनको लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान उनके द्वारा की गई टिप्पणियों को लेकर कहा जा रहा है कि पार्टी के शीर्ष नेताओं से उनकी दूरी बढ़ी है। इस बीच एयर इंडिया के विनिवेश के लिए बनी समिति का पुनर्गठन किया गया तो उसमें उनको नहीं रखा गया। अरूण जेटली की अध्यक्षता वाली इस मंत्री समिति में अब जेटली की जगह अमित शाह अध्यक्ष हो गए हैं। इस समिति को पांच सदस्यों की बजाय चार सदस्यों का कर दिया गया और गडकरी को हटा दिया गया। इसमें शाह के अलावा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, रेल मंत्री पीयूष गोयल और विमानन मंत्री हरदीप सिंह पुरी सदस्य हैं। यह भी कहा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी की पिछली सरकार में सबसे प्रभावी मंत्री के तौर पर उभरे गडकरी को उनका पुराना मंत्रालय तो मिल गया है पर उनके मंत्रालय को अपने काम कि लिए खुद ही फंड जुटाना पड़ रहा है। इस बीच खबर है कि गडकरी महाराष्ट्र में प्रदेश भाजपा की कार्यकारिणी की बैठक में शामिल नहीं हुए। चुनावी तैयारियों के लिए यह बैठक बुलाई गई थी और पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद जेपी नड्डा पहली बार मुंबई गए थे। पर गडकरी इस बैठक में शामिल नहीं हुए। वे नागपुर में थे। कब तक टिके रहेंगे येदियुरप्पा बीएस येदियुरप्पा ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली नहीं कि यह चर्चा शुरू हो गई कि वे कब तक मुख्यमंत्री रहेंगे। यह चर्चा इसलिए शुरू हुई है क्योंकि वे इससे पहले तीन बार मुख्यमंत्री बने हैं पर एक बार भी कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए हैं। दो बार तो वे एक-एक हफ्ते के लिए मुख्यमंत्री बने थे और इस्तीफा दे दिया था। 2008 में जब उन्होंने भाजपा की अल्पमत सरकार को अपने ऑपरेशन लोटस के दम पर बहुमत दिला दिया तब भी तीन साल के बाद उनको इस्तीफा देना पड़ा था। उनके ऊपर कई तरह के भ्रष्टाचार के आरोप लग गए। लोकायुक्त की रिपोर्ट उनके खिलाफ आ गई, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा दिया। बाद में येदियुरप्पा पार्टी छोड़ कर गए और अलग पार्टी बना कर चुनाव लडे। मौजूदा विधानसभा में भी चुनाव के तुरंत बाद वे मुख्यमंत्री बने थे पर एक हफ्ते में ही उनको इस्तीफा देना पड़ा था। इसीलिए अब चर्चा हो रही है कि वे कब तक मुख्यमंत्री रहेंगे? क्या वे विधानसभा के बचे हुए 46 महीने के कार्यकाल तक मुख्यमंत्री रहेंगे? अभी उनकी उम्र 76 साल है, जबकि भाजपा 75 साल से ज्यादा उम्र के नेताओं को मंत्री या मुख्यमंत्री नहीं बना रही है। इसीलिए अटकल लगाई जा रही है कि थोड़े समय के बाद पार्टी ही उनको बदल सकती है। यह भी संभव है कि उनके खिलाफ चल रहे किसी मामले में आरोपपत्र वगैरह दायर हो जाए, जिसके बाद उनको पद छोड़ना पड़े। ध्यान रहे कांग्रेस और जेडीएस के 15 विधायकों ने इस्तीफा दिया हुआ है, जिनकी सीट पर उपचुनाव होंगे। अगर कांग्रेस और जेडीएस के उम्मीदवार इनमें से आधी सीटों पर भी जीत हासिल करते हैं तो सरकार फिर अस्थिर होगी। इसीलिए इसके कार्यकाल पूरा करने को लेकर अटकलें लग रही हैं। कश्मीर में राज्यपाल ने नाकामी मान ली? तो क्या यह माना जाए कि जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने यह स्वीकार कर लिया है कि आतंकवादियों से नहीं लड़ा जा सकता है? आतंकवादियों से की गई उनकी अपील के बाद तो यहीं माना जा रहा है। उन्होंने आतंकवादियों से कहा कि वे क्यों बेकसूर सुरक्षा बलों को निशाना बना रहे हैं। मलिक ने कहा कि कसूर तो नेताओं और बड़े अधिकारियों का है, जिन्होंने राज्य को लूटा है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर आतंकवादियों को निशाना बनाना ही है तो वे राज्य को लूटने वाले नेताओं और अधिकारियों को निशाना बनाएं। इसके बाद यह तंज किया जा रहा है कि राज्यपाल ने विफलता मान ली है और सुरक्षा बलों को आतंकवादियों के हमले से बचाने का यहीं रास्ता उनको सुझा है कि वे उन्हें नेताओं पर हमले के लिए कहें। हालांकि बाद में मलिक ने माना है कि उन्होंने नेताओं व अधिकारियों को निशाना बनाने वाली बात गुस्से में कही थी। पर उन्होंने चाहे जिस वजह से कही हो पर हकीकत यह है कि उनके इस बयान से राज्य की सुरक्षा व्यवस्था की कमी भी जाहिर हुई है। भाजपा में शामिल होंगे अमर सिंह सपा के एक सांसद नीरज शेखर के भाजपा में शामिल होने के बाद अमर सिंह के भी भाजपा में शामिल होने की अटकलें तेज हो गई हैं। लखनऊ के एक कार्यक्रम में जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सपा से निकाले गए राज्यसभा सदस्य अमर सिंह को हमारे अमर सिंह कह कर संबोधित किया था तभी से यह अटकल लगाई जा रही है कि वे भाजपा में शामिल होने जा रहे हैं। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने अपनी करीबी जयाप्रदा को भाजपा में शामिल करा दिया और उनको रामपुर लोकसभा सीट से टिकट भी दिलवा दी। पर खुद भाजपा में शामिल नहीं हुए। वे भाजपा से अलग रह कर भाजपा के लिए काम कर रहे हैं। भाजपा उनका इस्तीफा करा कर पार्टी में शामिल कर सकती है। फिर उनकी सीट पर उपचुनाव होगा तो वह सीट अपने आप भाजपा के खाते में जाएगी। भाजपा में इस पर दो राय है। माना जा रहा है कि राज्यसभा के जितने बाहरी सदस्यों को पार्टी में लिया जाएगा उतने को फिर अपनी पार्टी से सांसद बनाना होगा, जिससे अपनी पार्टी के नेताओं के लिए मौके कम होंगे। इसे लेकर पार्टी में कई नेता नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में अगले साल नवंबर में राज्यसभा की दस सीटों के लिए चुनाव होने हैं, जिसका इंतजार पार्टी के कई नेता कर रहे हैं। मौजूदा विधानसभा में यह आखिरी मौका होगा, जब भाजपा अपने दम पर दस में से आठ सीटें जीत सकने की स्थिति में है। बाघों की गिनती में भी हेराफेरी भारत सरकार ने दावा किया है कि देश में बाघों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। पर कई जानकार लोगों का कहना है कि इसके आंकड़ों में भी हेराफेरी की गई है। पहले रोजगार से लेकर आर्थिक विकास तक के आंकड़ों से हेराफेरी किए जाने की खबरें आती रही हैं। इस बार बाघ की संख्या के आंकड़ों में गड़बड़ी की खबर है। इससे पहले 2014 में जब बाघों की गिनती हुई थी तब बताया गया था कि भारत में 2226 बाघ हैं। पांच साल में यह आंकड़ा तीन हजार के करीब पहुंच गया। यानी पांच साल में करीब आठ सौ बाघ बढ़ गए। हैरानी की बात यह है कि आखिर पांच साल में इतने बाघ कैसे बढ़े? बताया जा रहा है कि बाघ शावकों को गिनती में शामिल करने के लिए जो उम्र सीमा पहले तय की गई थी, उसे घटा दिया गया है। 2014 की गिनती में डेढ़ साल या उससे ऊपर के बाघों की गिनती की गई थी। इस बार इसे घटा कर एक साल कर दिया गया। इससे अपने आप गिनती बढ़ गई। यह गिनती बढ़ाने का सरकार का अपना फार्मूला है। ऐसे ही फार्मूले के तहत सरकार ने हाईवे निर्माण में अपने किलोमीटर बढ़ाए थे। अगर छह लेन की सड़क एक किलोमीटर बनती है तो अब उसे छह किलोमीटर गिना जाता है। कांग्रेस की राष्ट्रीय टीम में शामिल होंगे सिद्धू नवजोत सिंह सिद्धू का इस्तीफा मंजूर हो गया है। वे कैप्टेन अमरिंदर सिंह की सरकार से बाहर हो गए हैं। उन्होंने अपने पालतू पशुओं को पटियाला भेज दिया है और बाकी सामान अमृतसर भेज दिया है। यानी वे चंडीगढ़ छोडऩे के लिए तैयार हो गए हैं। सवाल है कि क्या वे दिल्ली आ रहे हैं। कांग्रेस के जानकार नेताओं का कहना है कि सिद्धू को पार्टी का राष्ट्रीय पदाधिकारी बनाया जाएगा। प्रियंका गांधी ने इस बारे में सिद्धू से बात की है। राहुल गांधी इन दिनों दिल्ली में नहीं हैं और वैसे भी वे पार्टी की गतिविधियों के बारे में ज्यादा पूछताछ नहीं कर रहे हैं। इसलिए प्रियंका ने इस मामले में पहल की है। सिद्धू खुद को राहुल गांधी का ही सिपाही बताते रहे। वे राहुल को अपना कैप्टेन बताते थे, जिसकी वजह से कैप्टेन अमरिंदर सिंह उनसे नाराज हुए। इसीलिए कहा जा रहा है कि राहुल और प्रियंका किसी तरह से उनका कद बनाए रखेंगे। सिद्धू के एक करीबी नेता का कहना है कि वे आगे के चुनावों में पंजाब में कांग्रेस का चेहरा हो सकते हैं। बहरहाल, आगे उनका जो हो पर अभी वे राष्ट्रीय टीम में पदाधिकारी बनेंगे। कहा जा रहा है कि उन्हें पार्टी का प्रवक्ता बनाया जा सकता है। वे खुद महासचिव बनना चाहते हैं। यह भी तय है कि वे पार्टी के स्टार प्रचारक रहेंगे और राज्यों के चुनाव में पार्टी उनका इस्तेमाल करेगी। स्पीकर के लिए अमित शाह अभी भी अध्यक्ष जी! महज दो बार विधायक और एक बार लोकसभा सदस्य रहे ओम बिरला दूसरी बार लोकसभा सदस्य बनने के साथ ही स्पीकर तो हो गए हैं लेकिन वे अभी भी पार्टी कार्यकर्ता या सामान्य सांसद के मोड से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। यही वजह है कि वे सदन की कार्रवाई के दौरान किसी मसले पर बोलने के लिए गृह मंत्री अमित शाह का नाम पुकारते हैं तो अपनी पुरानी आदत के मुताबिक उन्हें 'अध्यक्ष जी' कह कर संबोधित कर देते हैं। मौजूदा सत्र में ही ऐसा दो बार हो चुका है। दोनों बार उनके ऐसा करने पर विपक्ष सदस्यों ने ही नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के सदस्यों भी ठहाके लगाए और उन्हें याद दिलाया कि वे अब स्पीकर हैं और अमित शाह अब उनके 'अध्यक्ष जी' नहीं हैं।