अगस्त 2019

आजादी के 73वें बरस में

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

डॉ. लोहिया कहते थे कि जिंदा कौम पांच साल इंतजार नहीं करती। लोहिया के जाने के बाद एक देश या कौम के तौर पर हम कितने जिंदा दिल बने रहे, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन कौम के चुने हुए रहनुमा कुछ इस कदर जिंदा दिल बनते चले गए हैं कि आज मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल और गोवा से लेकर कर्नाटक तक सब तरफ लोकतंत्र पर कहर बरपा रहे हैं। धन और सत्ता के बगैर इनकी सांसें रुक जाती हैं। हमारे राजनीतिक रहनुमाओं के पास देश की गरीब-बीमार जनता के इलाज के लिए कोई बेसब्री नहीं है, लेकिन दलबदल के जरिए सत्ता हथियाने की बैचेनी कुछ इस कदर है कि आजादी के ७३वें वर्ष की दहलीज पर ये लोकतंत्र और लोकलाज को बेशर्मी से अंगूठा दिखाते हुए कह रहे हैं- हम महान, हमारा भारत महान। गांवों की तबाही और आत्महत्या करता किसान। चिकित्सा के बगैर मरते बच्चे, बूढ़े-जवान। बर्बाद होते जंगल, पहाड़ और नदियां। फल, सब्जी, दूध, खाद्यान्न में जहरीले रसायनों की मिलावट और प्रदूषित पानी से बढ़ती बीमारियां और उनसे असमय मरते इंसान। बढ़ता भ्रष्टाचार और धन का प्रभाव। चौपट होते उद्योग-व्यापार। अनियोजित और असंतुलित विकास। बेलगाम यातायात से बढ़ती दुर्घटनाएं और मौत। महंगाई-बेरोजगारी की मार। शिक्षा का बाजारीकरण। नशे का बढ़ता चलन, बढ़ते बलात्कार तथा अन्य अपराध। जातियों और संप्रदायों के बीच गहराती नफरत और भीड़ की हिंसा। राजनीति सहित सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में आदर्शों और मूल्यों का तेजी से होता लोप। यही है नए भारत की तस्वीर है, जिसे हम चाहकर भी देख नहीं पा रहे हैं। हम वही देखते हैं और देखना चाहते हैं, जो हमारा दिमाग कहता है, जिसमें सदियों से कचरा जमा है, जो बाहर निकलने को तैयार नहीं है। इसलिए तमाम तरह की दुश्वारियां बढ़ने की रफ्तार हमारी प्रगति की रफ्तार पर भारी है। ऐसा लिखना और बोलना आजकल थम गया है, क्योंकि नरेंद्र मोदी चुनाव जीत गए हैं। दूसरी बार उनके राज्यारोहण के बाद अब उनका हनीमून पीरियड चल रहा है। पूरा देश उन पर कुर्बान जा रहा है। २०१४ की उनकी जीत के बाद भी ऐसा ही हुआ था। लेकिन २०१६ आते-आते सवालों ने सिर उठाना शुरू कर दिया था। मोदी ने उन सवालों के जवाब में अपना चौकीदार का टैग अपनी पार्टी के सभी लोगों पर लगा दिया था। मोदी सरकार की सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा एक-दूसरे का पर्याय बन गई थी। प्रतिपक्ष की दिशाहीनता और अकर्मण्यता ने उन्हें सत्ता के हनीमून का यह दूसरा मौका दिलवा दिया। ऐसे ही मौके इतिहास में इंदिरा गांधी, जनता पार्टी, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी आदि को भी मिलते और छिनते रहे हैं। जरूरी नहीं कि इतिहास अपने को दोहराए। हो सकता है लोकतंत्र पर नए तरीकों से प्रतिबंध लग जाए या मोदी देश को नई राह पर ले जाए। २३ मई, २०१९ के बाद इन दो महीनों में नई राह तो नहीं निकली, लेकिन पुरानी राह में ही नए गड्ढे खोदे जा रहे है। कर्नाटक में लंबे समय तक चले फूहड नाटक का फिलहाल समापन हो गया है। वहां कांग्रेस और जनता दल (एस) को सत्ता से बेदखल कर भाजपा काबिज हो गई है। इसके ठीक उलट मध्य प्रदेश में सरकार बचाने और गिराने के खेल में फिलहाल कमल नाथ सरकार भाजपा पर भारी पड़ती दिख रही है। कर्नाटक और मध्य प्रदेश के जिन विधायकों का तिरस्कार किया जाना चाहिए, उनका सत्कार हो रहा है। इसे उनकी योग्यता बताकर उनका प्रशस्ति गान हो रहा है। मोदी को भारी-भरकम जीत हासिल हुई, लेकिन इसके बावजूद उन्हें कांग्रेस और अन्य दलों के दलबदलुओं की जरुरत है। कांग्रेस ने भी अपने सत्ता के वैभवकाल में ऐसी ही राजनीति की थी। कांग्रेस हो या भाजपा, जो जब-जब जनता पर यकीन छोड़ बेईमानी का रास्ता अपनाती है, तो वह खुद तो डूबती ही है, देश को भी डूबोती है। उनका यह समूचा खेल मुल्क की आजादी में तरह-तरह की कुर्बानियां देने वालों के सपनों और आदर्शों को लहूलुहान कर रहा है। आने वाले कल के लिए कोई शुभ लक्षण नहीं दिख रहे हैं। फिर भी आजादी के ७३वें वर्ष में आशा की ज्योति जलाए रखिए। लोहिया के शिष्य किशन पटनायक भी कह गए है कि दुनिया में कुछ भी निर्विकल्प नहीं होता। दर्दभरे नए भारत का निर्माण प्रतिपक्ष ने अपनी ढीली-ढाली कार्यशैली से चुनाव में बुरी तरह हार कर लोकतंत्र का वह नुकसान नहीं किया, जितना उसने इन दो महीनों में अपनी हताशा और अकर्मण्यता से देश को निराश कर किया है। यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। जब राजनीति देश बनाने का मिशन है, जनसेवा का माध्यम है, तब हार पर इतना दु:खी, जीत पर इतना इतराना ठीक नहीं। जब समस्त अनैतिकताओं के साथ पैसा और सत्ता एक मात्र ध्येय बन जाती है, तब वह घर-परिवार हो या समाज और राष्ट्र, उसे पतन के मार्ग पर ले जाती है। आज भू-मंडलीकरण के दौर में वैसे तो पूरी दुनिया ही आर्थिक मंदी की चपेट में हैं, चूंकि हमारी प्राथमिकताएं अलग हैं, इसलिए हम डॉलर, पौंड और यूरो के सामने खड़े नहीं हो पा रहे हैं। हमारी स्थिति दुनिया के संपन्न देशों खासकर यूरोप, अमेरिका, चीन, जापान आदि के सामने वैसी ही है, जैसी हमारे देश में गांव के गरीब किसान की किसी मंत्री, उद्योेगपति, अफसर और बड़े कारोबारी के सामने होती है। हिन्दू-मुसलमान, मॉबलिंचिंग आदि देश की मूल समस्याओं से ध्यान हटा रहे है। देश का उद्योग-व्यापार बद से बदतर की ओर अग्रसर है। नोटबंदी और जीएसटी उसके सबसे बड़े कारक तत्व हैं। सरकार के इन दो जिद्दी कदमों ने समूची अर्थव्यवस्था को औंधे मुंह खड़ा कर दिया है। लेकिन मोदी लहर ने हर बुनियादी प्रश्न को सूखे पत्ते की तरह उड़ा दिया है। सभी धर्मों को आत्मसात कर हमारी संस्कृति ने एक साझा विरासत रचकर मानवता के रास्ते पर चलने का मार्ग दिखाया था। आज वही प्रगति की राह की सबसे बड़ी रुकावट बन गई है। भागवत कथा में कृष्ण-सुदामा प्रसंग का वर्णन हो रहा है, लेकिन वहां सुदामा के प्रवेश पर रोक है। कृष्ण जन्मोत्सव पर लाखों-करोडों रुपए खर्च हो रहे हैं और बच्चे ऑक्सीजन के अभाव में अस्पतालों में दम तोड़ रहे हैं। धर्म ने प्याज से दूर रखा, लेकिन ब्याज उससे एकाकार हो गया। मच्छर के लिए दया और इंसान के लिए नफरत। पानी छना और दर्द बिना छना। नदी गंदी, पहाड़ पर कचरा, सफाई ऊपरी, अंतर्मन गंदा। प्रज्ञा ठाकुर इस बात की तस्दीक कर रही है। यह वो हकीकत है, जिसे जानते सब हैं लेकिन मानता कोई नहीं है। इसी की दुष्परिणति है कि जीवनदायी पानी भी आज जानलेवा बनता जा रहा है। भांग, गांजा, चरस, अफीम, हेरोइन, शराब, शबाब का बढ़ता चलन देश को डूबो रहा है। अफसर, कॉरपोरेट, नेता आदि पब, क्लब, फार्म हाउस या फाईव स्टार में नशा कर भ्रष्टाचार से देश की कीमत पर अपना घर बनाते हैं। गरीब, मेहनतकश, मजदूर, सड़क किनारे अहातों और झोपड़ों में अपनी खून-पसीने की कमाई गंवाकर अपना घर बर्बाद करते हैं। बढ़ती भौतिकता, टीवी, मोबाइल ने जो दिया है, उससे अधिक छीन लिया है। छोटी-छोटी बच्चियों तक पर बलात्कार की बढ़ती घटनों देश के बिगड़ते दिमाग की कुंठित तस्वीर है। हमने प्रगति की है, इसे कौन स्वीकार नहीं करेगा। डॉक्टर और अस्पताल बनाए। इंसान की जिन्दगी को बेहतर कर उसकी उम्र को बढ़ाया, लेकिन कुछ इस अंदाज में कि बीमारी का नाम सुनते ही उसके इलाज के खर्च के बोझ से बीमार ही नहीं, उसका घर-परिवार पहले ही मरने लगता है। डॉक्टरों की संख्या आबादी के अनुपात में बेहद कम है। डॉक्टर शहर छोड़कर गांव में जाने को तैयार नहीं हैं। शिक्षा में तरक्की की है। पब्लिक स्कूलों में खुशहाल बचपन दिखता है। लेकिन गांवों में शिक्षा और चिकित्सा के अभाव में बचपन बिलखता रहता है। महाविद्यालय-विश्वविद्यालय मे नई पीढ़ी शिक्षित बन देश को तरक्की की राह पर ले जाती दिखती है लेकिन अंग्रेजी और अंग्रेजियत इनके दिल-दिमाग में बैठी दिखती है। फिर भी आशा की कुछ किरण दिखती है। लेकिन आज भी देश के करोड़ों बच्चों को शिक्षा से वंचित देखकर निराशा की तस्वीर कुछ बड़ी ही दिखती है। खाद्य पदार्थों और दवाइयों में मिलावट गंभीर अपराध है। लेकिन इसमें अपराधी को महज अर्थदंड और ६ माह से ३ साल तक की सजा है। इसमें करीब-करीब सभी अदालतों से बरी हो जाते हैं। पुलिस अधिकारी, वकील, जज सबके सब इस अन्याय के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भागीदार होते हैं। वैंâसर, किडनी और लीवर के बढ़ते मरीज देखकर भी हम सब कुछ जानते हुए भी कुछ नहीं कर पाते। इंजीनियर और नए आईएएस भी तैयार हो रहे हैं लेकिन इनके हर काम में रिश्वत की लूट छिपी होती है। अंग्रेज भ्रष्टाचार नहीं जानते थे। वे भारत को लूटते थे। अपने देश को विकसित करते थे। हमारे यहां के नए अंग्रेज विदेशों की अंधी नकल करते हैं। अपने देश, काल, परिस्थिति, अपने गरीब, गांव, किसान के मद्देनजर नहीं वरन शहर, नेता और खुद को ध्यान में रखकर सब योजनाएं बनाते हैं। शहरों से सटे गांवों में आज भी बरसात में बाढ़ आती है। वर्षाकाल में गांववासी शहर नहीं आ पाते। बच्चे स्कूल और बीमार अस्पताल जाने से वंचित रह जाते हैं, क्योंकि गांव की नदियों पर आज भी पुल नहीं बने हैं। जनता को मूर्ख बनाने के लिए गांवों की तारीफ में अकसर प्रकृति, पेड़-पौधे, गांव-गौरी, पनघट, मिट्टी की खुशबू न जाने क्या-क्या कहा जाता है, जो फिल्मों में ही अच्छा लगता है। हकीकत में मक्खी, मच्छर, कीचड़, गंदगी वगैरह बगैर ड्रेनेज लाइन के बहती रहती है। गांव बहुत ही प्यारा है, यह कहना दिल बहलाने को गालिब ख्याल अच्छा है कि तरह लगता है। हकीकत में ये गांवों को उजाड़ कर, शहरों को बढ़ाकर मेट्रो ट्रेन, बुलेट ट्रेन, बड़े-बड़े फ्लाई ओवर के साथ एक अधूरे और अनियोजित दर्दभरे भारत का निर्माण कर रहे हैं। कुछ लोगों को ऐसा लिखना बुरा लगता है। इन्हें जुल्म, अन्याय, बदहाली, असमय मौत पर गुस्सा आता ही नहीं है। महात्मा गांधी को अंग्रेजों ने ट्रेन में अपने साथ नहीं बैठने दिया, तो उन्हें गुस्सा आया था। वे अंग्रेजो के खिलाफ लड़े थे। हमें इस तरह का गुस्सा आता ही नहीं है। सदियों की गुलामी ने हमारे देश के तन और मन दोनों को बीमार बना दिया है और गुस्से को भटका दिया है। प्रधानमंत्री मंत्री पर, मंत्री अफसर पर अफसर कर्मचारियों पर, कर्मचारी भृत्य पर, मालिक नौकर पर गुस्सा करता है। कमजोर आदमी अपनी बीवी को दबाता है और बीवी अन्याय से दुखी होकर अपने बच्चों की पिटाई करती है। आप किसी मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च आदि को जनहित में जरा सा छूकर तो देख लें, लोग हिंसा पर उतर आएंगे। अहिंसक जैन भी हिंसक बन जाएंगे। १८५७ की क्रांति का सबसे बड़ा कारण गुलामी से ज्यादा कारतूसों में गाय की चर्बी थी, जिसने मंगल पांडे सहित पूरी सेना को गुस्से से भर दिया था। क्रांति पहले ही घटित हो गई थी और असफल हो गई थी। अंग्रेजों की सेना भारतीयों से ही बनी थी, लेकिन देश की अनुभूति ही नही थी, वह जातियों में खंड-खंड बंटा हुआ था। अंधविश्वास और डर से भरा हुआ था। आजादी के बाद शिक्षा का प्रसार हुआ है, जागरुकता बढ़ी है, लेकिन अंधविश्वास और डर नए-नए रूपों में सामने आ रहा है। यही ७२ वर्षीय आजाद भारत की तस्वीर है। जिसे देखकर तलत मेहमूद के गीत ‘‘तस्वीर बनाता हूं, तस्वीर नहीं बनती। एक ख्वाब सा देखा है, ताबिर नहीं बनती...’’ याद आ रहा है। ख्वाब, तस्वीर और उसकी ताबिर के लिए कर्म एवं संघर्ष करते रहिए। यही आजादी के ७३वें वर्ष का संदेशा है।