जुलाई 2019

साझी शहादत-विरासत की गाथा सरकारी बस्तों में बंद!

शमसुल इसलाम

जलियाँवाला बाग़ क़त्लेआम की शहीदों की सूची से यह सच बहुत साफ़ होकर सामने आता है कि बाग़ में हिन्दू, सिख और मुसलमान बड़ी तादाद में मौजूद थे। यह सूरत इस गौरवशाली सच को रेखांकित करती थी कि साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन एक साझा आंदोलन था और अभी मुस्लिम राष्ट्र और हिन्दू राष्ट्र के झंडाबरदार हाशिये पर पड़े थे। भारत के लोगों की यह महान जुझारू विरासत, अलमारियों में बंद पड़ी है।

विश्व इतिहास की पहली साम्राज्यवादी शक्ति अँग्रेज़ नहीं थे। इतिहास साम्राज्यों की दास्तानों से भरा पड़ा है। हम सब पुर्तगाली, रोमन, फ्रांसीसी, उस्मानियाई, जर्मन इत्यादि साम्राज्यों की रक्त रंजित दास्तानों से बख़ूबी परिचित हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि अँग्रेज़ साम्राज्य एक विशिष्ट स्थान रखता है। यह साम्राज्य ज़्यादा व्यापक स्थायी और निरंतरता लिये था। अँग्रेज़ी साम्राज्य के ज़्यादा टिकाऊ होने का सबसे बड़ा कारण यह था कि उन्होंने साम्राज्य चलाने के काम को एक संस्थागत रूप दिया था। उन्होंने इस काम के लिए दफ़्तरों का जाल-सा बिछा दिया था। साम्राज्य द्वारा की जाने वाली हर गतिविधि की सूचना हासिल की जाती थी और उसे संग्रहित किया जाता था। अँग्रेज़ साम्राज्य पहला साम्राज्य था, जिसने राज-काज से संबंधित तमाम दस्तावेज़ों और काग़ज़ातों को अभिलेखागारों में सुरक्षित रखना शुरू किया। ये सब करने के पीछे उनका पुरानी चीजों के प्रति मोह नहीं था, बल्कि वे इतिहास के इन अनुभवों के माध्यम से वर्तमान को समझना और भविष्य को संचालित करना चाहते थे। सौ साल पहले ब्रिटिश सेना ने जलियाँवाला बाग हत्याकांड को अंजाम दिया था। इसके 21 साल बाद उधम सिंह ने माइकल डायर को गोली मारकर इसका बदला ले लिया था। भारत में अँग्रेज़ों ने 1891 में केंद्रीय अभिलेखागार की स्थापना कलकत्ता में की। बाद में इसे दिल्ली लाया गया। इसमें अँग्रेज़ी शासन के तमाम सरकारी दस्तावेज़ों का तो संग्रह था ही, इसके अलावा इसमें ख़ुफ़िया रिपोर्टों, सरकार विरोधी गतिविधियों और प्रतिबंधित साहित्य का भी विशाल भंडार है। अँग्रेज़ जब भारत छोड़कर गए तो इसको भी भारत सरकार के हवाले कर गए (यह स्वाभाविक है कि उन्होंने अति-ख़तरनाक दस्तावेज़ों ख़ासकर अंग्रेज़ों के हिंदुस्तानी दलालों की करतूतों के ब्यौरे वाले दस्तावेज़ों को भारत छोड़ने से पहले नष्ट कर दिया होगा)। अभिलेखागार के बस्तों में बंद क़त्लेआम का इतिहास ऐतिहासिक दस्तावेज़ों का यह ख़ज़ाना, जो आज़ादी के बाद राष्ट्रीय अभिलेखागार कहलाया, ऊपरी तौर पर तो गुज़रे ज़माने से संबंधित बेज़ुबान दस्तावेज़ों का रिकॉर्ड ही लगता है। लेकिन जब 1994 में जलियाँवाला बाग़ अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को अँग्रेज़ शासकों द्वारा अंज़ाम दिए गए क़त्लेआम की 75वीं वर्षगाँठ के अवसर पर इस विभाग ने मूल दस्तावेज़ों, व्यक्तिगत काग़ज़-पत्रों, प्रतिबंधित साहित्य और चौंका देने वाले चित्रों की प्रदर्शनी लगाई (जिस को पहली बार 13 अप्रैल, 1994 को जलियाँवाला बाग़ में प्रदर्शित किया गया) तो एक तरफ़ गोरे शासकों के बेमिसाल बर्बर दमन और ख़ूंरेज़ी की दास्तानें जानकर दिल दहल उठा तो दूसरी ओर देश के हिन्दुओं, मुसलमानों, सिखों और अन्य धर्मों के अनुयायियों ने किस बहादुरी से इस दमन-बर्बरता का सामना किया और मिलकर बेमिसाल क़ुर्बानियाँ दीं तो इसे जानकर सीना फ़ख़्र से फूल गया। इस प्रदर्शनी को देश के विभिन्न बड़े शहरों में घुमाया गया तो बेज़ुबान दस्तावेज़ों में छिपा अँग्रेज़ शासकों की बर्बरता और जनता के प्रतिरोध का इतिहास सजीव हो उठा, मानो दफ़न इतिहास ज़िंदा होकर सामने खड़ा हो। यह प्रदर्शनी अगर एक तरफ़ अंग्रेज़ी शासन की बर्बरता, वहशीपन और चालाकी की शर्मनाक दास्तान बयान करती थी तो दूसरी ओर भारत की आज़ादी के मतवालों की बहादुरी की गाथाओं का भी जीवंत चित्रण करती थी। इस प्रदर्शनी में प्रस्तुत सामग्री चौंका देने वाली थी और इस बात का शिद्दत से एहसास कराती थी कि जब अँग्रेज़ों का राज शिखर पर था, तब भी इस देश के लोग अँग्रेज़ी लुटेरों से बराबर का लोहा ले रहे थे। यह कितना दुखद है कि इस अभूतपूर्व प्रदर्शनी में रखी चीजों को बस्तों में बंद कर दिया गया और बर्बर, दमन और विरोध की शानदार दस्तानों पर ताला डाल दिया गया जो जलियाँवाला बाग़ क़त्लेआम की 100वीं बरसी पर भी नहीं खुला है। क़त्लेआम के चश्मदीद दस्तावेज़ सबसे दिल दहला देने वाले दस्तावेज़ और चित्र 'जलियाँवाला बाग़' त्रासदी से संबंधित हैं। जलियाँवाला बाग़ के क़त्लेआम से पहले के और बाद के मूल चित्र (जो पुलिस रिकॉर्ड में थे) को दर्शाया गया। रतन देवी जिन्होंने 13 और 14 अप्रैल 1919 की रात जलियाँवाला बाग़ में हज़ारों लाशों और ज़ख़्मियों के बीच अपने पति की लाश के सिरहाने बैठकर बिताई थी, उनका रोंगटे खड़े कर देने वाला मूल बयान भी पढ़ने को मिलता है, "मैं अपने मृत पति के पास बैठ गई, मेरे हाथ बाँस का एक डंडा भी लग गया था, जिससे मैं कुत्तों को भगाती रही। मेरे बराबर में ही तीन और लोग गंभीर रूप से ज़ख़्मी पड़े थे, एक भैंस गोलियाँ लगने के कारण बुरी तरह रेंग रही थी, और लगभग 12 साल का एक बच्चा, जो बुरी तरह से ज़ख़्मी था और मौत से लड़ रहा था, मुझसे बार-बार निवेदन करता था कि मैं उसे छोड़ कर न जाऊँ। मैंने उसे बताया कि वह फ़िक्र न करे, क्योंकि मैं अपने मृत पति की लाश को छोड़कर जा ही नहीं सकती थी। मैंने उससे पूछा कि अगर उसे सर्दी लग रही हो तो मैं उसे अपनी चादर ओढ़ा देती हूँ, लेकिन वह तो पानी माँगे जा रहा था, लेकिन पानी वहाँ कहाँ था।" 4 अक्टूबर, 1919 के 'अभ्युदय' अख़बार में छपी 18 वर्षीय अब्दुल करीम और 17 वर्षीय रामचंद्र नाम के दो दोस्तों की तस्वीउरों और जलियाँवाला बाग़ में उनकी शहादत के वृतांत को पढ़कर दिल-दिमाग सन्न हो जाता है। ये दोनों ही अमृतसर से नहीं, बल्कि लहौरियों के बेटे थे। अब्दुल करीम की शहादत के तुरंत बाद जब परीक्षाफल प्रकाशित हुआ तो पंजाब विश्वविद्यालय की दसवीं की परीक्षा में वह सर्वप्रथम आए। निहत्थे देशवासियों पर हवाई बमबारी यह शर्मनाक तथ्य भी पहली बार सामने आया कि जलियाँवाला बाग़ क़त्लेआम के अगले दिन, 14 अप्रैल, 1919 को अँग्रेज़, वायुसेना के एक जहाज़ नंबर 4491, किस्म बी.ई.जेड.ई. जो कि 31वें स्क्वाड्रन का हिस्सा था, को उड़ाते हुए कैप्टन कारबेरी ने 2.20 मिनट से लेकर 4.45 मिनट तक ज़बर्दस्त बमबारी की थी। अँग्रेज़ी वायुसेना के रिकॉर्ड में दर्ज इस हवाई बमबारी के ब्यौरे के अनुसार: "समय 15.10, जगह गुजराँवाला रेलवे स्टेशन (अब पाकिस्तानी पंजाब में) के आसपास बमबारी से आग की लपटें उठ रही हैं। समय 15.20, स्थान- गुजराँवाला के उत्तर पश्चिम में 2 मील दूर एक गाँव-लगभग 150 लोगों की भीड़ पर बमबारी, गाँव में मशीन गन से 50 राउंड गोली चलाई। समय 15.30, स्थान- पहली वाली जगह से एक मील दक्षिण की ओर पचास लोगों की भीड़ पर बमबारी, गाँव में मशीन गन द्वारा 25 राउंड गोलीबारी, एक खेत में 200 लोगों की भीड़ पर बमबारी, लोग भागकर एक घर में घुसे, जिस पर 30 राउंड मशीन गन से गोलीबारी, समय 15.40, स्थान- गुजराँवाला नगर शहर के दक्षिण में लोगों की भीड़ पर बमबारी, सड़कों पर चलते हुए 'देसी' लोगों पर मशीन गन से 100 राउंड गोलीबारी। 15.50 पर जब बमवर्षक जहाज़ लाहौर के लिए चला तो कोई प्रणाली सड़कों पर नहीं थी। समय, 16.45, लाहौर हवाई अड्डे पर बमवर्षक जहाज़ की सही सलामत वापसी।" प्रतिरोध की हैरतअंगेज दास्तानें इस प्रदर्शनी में सर सिडनी ऑर्थर टेलर रौलेट की अध्यक्षता में सन् 1917 में गठित राजद्रोह समिति से संबंधित गुप्त दस्तावेज़ों को पहली बार पेश किया गया। इस समिति ने उस समय में 87,020 रुपये ख़र्च करके कलकत्ता और लाहौर में अनेक गुप्त बैठकें कीं और 18 अप्रैल, 1918 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट को सरकार ने स्वीकार करके अराजकता या क्रांतिकारी अपराध अधिनियम (रौलेट एक्ट के नाम से बदनाम) के तौर पर 18 मार्च, 1919 को देश भर में लागू किया। देश भर में इसका ज़बर्दस्त विरोध हुआ। प्रदर्शनी में मोहम्मद अली जिन्ना का 28 मार्च, 1919 वाला वह पत्र भी प्रदर्शित किया गया, जिसमें उन्होंने सरकार पर 'सभ्यता का दामन छोड़ देने' का इल्ज़ाम लगाते हुए इम्पीरियल विधान परिषद से इस्तीफ़ा देने की घोषणा की थी। जिन्ना जो बाद में एक सांप्रदायिक नेता के तौर पर उभरे। कभी भारत के आम लोगों की स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए इम्पीरियल विधान परिषद को लात भी मार सकते थे, यह जानकर सुखद एहसास होता है। इस प्रदर्शनी में केंद्रीय ख़ुफ़िया विभाग की अति गुप्त रिपोर्टों को भी पहली बार देश के सामने रखा गया। आमतौर पर शांत और अहिंसात्मक माने जाने वाले गुजरातियों ने रौलेट समिति के ख़िलाफ़ अहमदाबाद में अंग्रेज़ी सत्ता के प्रतीकों की जिस तरह होली जलाई थी, वह जानने योग्य है। प्रदर्शित गुप्त रिपोर्टों के अनुसार 11, 12 अप्रैल 1919 को अहमदाबाद में प्रदर्शनकारियों ने कलेक्टर के दफ़्तर, नगर मजिस्ट्रेट, फ्लैग स्टाफ, अहमदाबाद जेल, मुख्य टेलीग्राफ़ केंद्र और 26 पुलिस चौकियों को आग लगाई थी। स्वयं अँग्रेज़ों की इस रिपोर्ट से यह बात साफ़ होती है कि अँग्रेज़ सत्ता के विरोध के केंद्र केवल बंगाल और पंजाब ही नहीं थे। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का प्रतिरोध इस प्रदर्शनी में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के अपने हाथ से लिखे उस मूल पत्र की प्रति भी दर्शकों के लिए उपलब्ध कराई गई, जो उन्होंने पंजाब में दमन के विरोध में 'नाइट' की उपाधि त्यागने की घोषणा करते हुए वायसराय को लिखा था। इस पत्र में उन्होंने लिखा: "समय आ गया है जबकि सम्मान के पदक वर्तमान अपमान के संबंध में हमारी लज्जा के प्रतीक बन गए हैं... और मैं अपनी ओर से खड़ा रहना चाहता हूँ, हर प्रकार की विशिष्टता के बिना अपने देश के लोगों के साथ, जिनको साधारण आदमी होने के कारण एक ऐसा अपमान और जीवन सहना पड़ रहा है, जो इंसान के लिए किसी भी तरह स्वीकार योग्य नहीं है।" सरकारी कर्मचारियों का प्रतिरोध भारत सरकार के गृह सचिव का इसी दौर का एक और रोचक पत्र भी यहाँ उपलब्ध कराया गया, जिससे पता लगता है कि सरकारी दमन के ख़िलाफ़ केंद्रीय सचिवालय के सरकारी कर्मचारियों ने भागीदारी की थी। इस गुप्त पत्र में गृह सचिव ने सख़्त कार्रवाई की माँग करते हुए यह भी लिखा कि सरकार की भद्द पिटने के डर से अनुशासनात्मक कार्रवाई न की जाए। क़त्लेआम विरोधी साहित्य पर प्रतिबन्ध विदेशी शासकों के अत्याचारों और भारतीय जनता के प्रतिरोध के एक पूरे चरण पर प्रकाश डालती इस प्रदर्शनी का सबसे सशक्त हिस्सा था उस प्रतिबंधित साहित्य की उपस्थिति, जिसको अँग्रेज़ों ने ज़ब्त करके ख़ुफ़िया विभाग की फ़ाइलों में नत्थी कर दिया था। ये देश की हर भाषा में लिखा गया था। 'बा बाग़े जलियाँ' (रामस्वरूप गुप्ता द्वारा हिंदी में लिखित संगीतात्मक नाटक), 'जलियाँवाला बाग़' (फ़िरोजुद्दीन शर्फ़ द्वारा गुरमुखी में एक लंबी कविता), 'पंजाब का हत्याकांड' (उर्दू में लम्बा नाटक) और 'जलियाँवाला बाग़' (एक लम्बा गुजराती नाटक) तो किताबों के रूप में ही प्रदर्शनी में पेश किया गया। यह कितना दुखद है कि आज़ादी के 70 साल बाद भी हमारी यह गौरवशाली परंपरा धूल से अटे बस्तों में बंद है। यह वे साहित्यिक रचनाएँ थीं जिनसे दुनिया का सबसे शक्तिशाली अँग्रेज़ साम्राज्य भी थर्राता था। इस साहित्यिक प्रतिरोध के कुछ नमूने यहाँ पेश हैं: • "बेगुनाहों पर बमों की बेखतर बौछारों की दे रहे हैं धमकियाँ बंदूक-तलवार की। बाग़ की जलियाँ में निहत्थों पर चलाई गोलियाँ/पेट के बल भी रेंगाया, ज़ुल्म की हद पार की।" • "ज़ुल्म डायर ने किया था रंग जमाने के लिए/हिंद वालों को मुसीबत में फँसाने के लिए। • ख़ून से पंजाब के डायर की लिखी डायरी/रूबरू रख दी मेरी तबीयत जलाने के लिए। • बाग़े जलियाँ में शहीदों की बने ग़र यादगार/जायेंगे आशिके-वतन आँसू बहाने के लिए।" • "हम उजड़ते हैं तो उजड़ें, वतन आबाद रहे। मर मिटे हैं हम के अब वतन आज़ाद रहे। वतन की खातिर जो अपनी जान दिया करते हैं/मरते नहीं हैं वो हमेशा के लिए जिया करते हैं।" उधम सिंह ने लिया बदला इस क़त्लेआम पर देश के लोगों को प्यार करने वाले जाँबाज़ खामोश नहीं रहे, उन्होंने उन शैतानों से बदला लिया, जिन्होंने इसे अंज़ाम दिया था। इस सिलसिले में शहीद उधम सिंह का ज़िक्र न हो, यह कैसे हो सकता है। सुविख्यात क्रांतिकारी ऊधम सिंह का जन्म एक दलित सिख परिवार में हुआ और एक अनाथालय में उनकी परवरिश हुई। वे ख़ूनी बैसाखी वाले दिन जलियाँवाले बाग़ में सभा में मौजूद थे और क़त्लेआम के साक्षी भी। तभी से उनके दिल में इसका बदला लेने की ज्वाला धधक रही थी। इस बीच वे कम्युनिस्ट विचारों को ग्रहण कर चुके थे। उनके जीवन का एक ही मक़सद था कि किसी तरह लंदन (इंग्लैंड) पहुँचा जाये। जहाँ इस क़त्लेआम को अंज़ाम देने वाले 2 सबसे बड़े अफ़सर, माइकल ओ डायर जो उस समय पंजाब का अँगरेज़ शासक था) और रेजीनाल्ड डायर जिसने क़त्लेआम का हुक़्म दिया था) को जान से मारा जाये। इस काम को अंज़ाम देने के लिए और इंग्लैंड में प्रवेश पाने की जुगत में मिस्र, कीनिया, उगांडा, अमेरिका और समाजवादी रूस में वहाँ के कम्युनिस्ट तहरीकों में काम करते रहे। आख़िरकार 21 साल बाद उन्हें सफलता मिली, जब उन्होंने 13 मार्च 1940 को लंदन में माइकल ओ डायर (पंजाब का पूर्व गवर्नर तथा जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के ज़िम्मेदार अफ़सरों में से एक) की हत्या कर दी। मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने पर जब ऊधम सिंह से नाम पूछा गया, तो उन्होंने अपना नाम ऊधम सिंह नहीं बताया, बल्कि अपना नाम मुहम्मद सिंह आज़ाद बताया। ऐसा नाम जिसमें मुस्लिम, सिख और हिंदू तीनों के नाम शामिल हैं। इस तरह उपनिवेशवादी सामंतों के विरुद्ध जारी संघर्ष में एक बार फिर भारत में सभी धर्मों के बीच एकता का संदेश ज़बर्दस्त तरीक़े से प्रस्तुत किया गया। उधम सिंह को 31 जुलाई 1940 को पेंटोनविल जेल में फाँसी दे दी गयी। मौत की सजा सुनाये जाने के बाद अदालत में उन्होंने जो जवाब दिया, वह उनके गोरे शासकों के ज़ुल्म और लूट के ख़िलाफ़ उनकी प्रतिबद्धता को ही रेखांकित करता है: "मुझे मौत की सज़ा की क़तई चिंता नहीं है। इससे मैं ख़ौफ़ज़दा नहीं हूँ और न ही मुझे इस की परवाह है। मैं एक उद्देश्य के लिए जान दे रहा हूँ। अँग्रेज़ साम्राज्य ने हमें बर्बाद कर दिया है। मुझे अपने वतन की आज़ादी के लिए जान देते वक़्त गर्व हो रहा है और मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे बाद मेरे वतन के हज़ारों लोग मेरी जगह लेंगे और वहशी-दरिंदों (अंग्रेज़ों) को देश से खदेड़ कर देश आज़ाद कराएँगे। अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद का विनाश होगा। मेरा निशाना अँग्रेज़ सरकार है, मेरा अँग्रेज़ जनता से कोई बैर नहीं है। मुझे इंग्लैंड की मेहनतकश जनता से गहरी हमदर्दी है, मैं इंग्लैंड की साम्राज्यवादी सरकार के विरोध में हूँ।" राष्ट्रीय अभिलेखागार के संग्रह से पुलिस और ख़ुफ़िया विभागों एवं अख़बारों के उन चित्रों को देखकर कलेजा मुँह को आ जाता है, जिनमें पंजाब में सन् 1919 में फ़ौजी क़ानून लागू होने पर आम नागरिकों को सजा के तौर पर सार्वजनिक रूप से कोड़े खाते हुए और सड़कों पर रेंगते हुए दिखाया गया है। आत्मसम्मान को भयानक चोट पहुँचाने वाली ये तस्वीररें देखकर इस बात को समझना ज़रा भी मुश्किल नहीं रहता कि पंजाब ने भगतसिंह जैसे शहीदों को क्यों पैदा किया! जलियाँवाला बाग़ के शहीदों का ब्योरा उपलब्ध नहीं भारत सरकार के गृह विभाग के जून 1919 की एक रिपोर्ट, जिसमें पंजाब में मारे गए लोगों के आँकड़े दिये गये हैं, को देखकर यह साफ़ पता लगता है कि किस तरह अँग्रेज़ शासकों ने पंजाब में किए गए क़त्लेआम पर परदा डालने की कोशिश की। मृतक अँग्रेज़ों का ब्यौरा तो उपलब्ध है,लेकिन मारे गए भारतीयों के बारे में साफ़ लिखा गया है कि उनकी संख्या कभी भी पता नहीं की जा सकेगी। इस रिपोर्ट में गृह सचिव की यह टिप्पणी कि अगर मृतक भारतीयों के बारे में हम कोई भी संख्या दें तो वह मानी नहीं जाएगी, अँग्रेज़ शासकों के नैतिक पतन की छवि को ही रेखांकित करती है। इस सिलसिले में एक शर्मनाक पहलू यह है कि शहीद हुए देशवासियों की असली तादाद कभी नहीं जानी जा सकी। हंटर आयोग जिसे हत्यारी अँग्रेज़ सरकार ने अक्टूबर 14, 1919 में पंजाब में हुई ज़्यादतियों की जाँच के लिए नियुक्त किया था (जिसमें बंबई यूनिवर्सिटी के उपकुलपति और प्रसिद्ध वकील, चिमनलाल हरिलाल सेतलवाड़ भी थे) जिसके अनुसार 381 अंग्रेज़ी सेना की गोलियों का शिकार हुए थे जिनमें एक 6 महीने का बच्चा भी था। शहीदों की हंटर आयोग द्वारा निर्धारित यह संख्या सही नहीं मानी जा सकती। अमृतसर एक बड़ा व्यापारिक केंद्र था जहाँ दूर-दराज़ से ग्राहक और काम की तलाश में लोग आते रहते थे, इनमें बहुत से गुमनाम शहीदों की लाशों को ग़ायब कर दिया गया, जैसा कि इस तरह के बर्बर दमन की घटनाओं में पुलिस द्वारा किया जाता है। शहीदों की विरासत के साथ खिलवाड़ अंग्रेज़ी राज में तो इन शहीदों की अनदेखी की ही गयी जो स्वाभाविक भी था। लेकिन आज़ाद भारत में भी इन शहीदों के परिवारों का तिरस्कार जारी रहा और है। जिस देश में आपातकाल में सिर्फ़ एक महीने से भी कम जेल में रहने के लिए दस हज़ार रुपए प्रति माह और 2 माह से कम जेल में रहने के बदले में 20 हज़ार रुपए महीना पारिवारिक पेंशन दी जा रही हो वहाँ इन शहीदों की किसी ने सुध नहीं ली। साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ साझा आंदोलन शहीदों की सूची से यह सच बहुत साफ़ होकर सामने आता है कि बाग़ में हिन्दू, सिख और मुसलमान बड़ी तादाद में मौजूद थे। 381 शहीदों में से 222 हिन्दू, 96 सिख और 63 मुसलमान थे। इस सूची की एक ख़ास बात यह थी कि वहाँ मौजूद जनसमूह हर तरह की जातियों और पेशों से जुड़ा था, इनमें दुकानदार, वकील, सरकारी मुलाज़िम, लेखक और बुद्धिजीवी थे तो लोहार, जुलाहे, तेली, नाई, खलासी, सफ़ाई कर्मचारी, क़साई, बढ़ई, कुम्हार, क़ालीन बुनने वाले, राजमिस्त्री, मोची भी बड़ी तादाद में मौजूद थे। यह सूरत इस गौरवशाली सच को रेखांकित करती थी कि साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन एक साझा आंदोलन था और अभी मुस्लिम राष्ट्र और हिन्दू राष्ट्र के झंडाबरदार हाशिये पर पड़े थे। भारत के लोगों की यह महान जुझारू विरासत, अलमारियों में बंद पड़ी है। हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, गुजराती, पंजाबी, बंगाली, मद्रासी, और विभिन्न पेशों से जुड़े सब मिलकर दुख, पीड़ा, संघर्ष और बलिदान में सहभागी थे। यह भारत के इतिहास का एक गौरवशाली सच था, लेकिन यह सब फ़ाइलों में बंद पड़ा है। इसका नतीजा यह है कि साझी शहादत और साझी विरासत को भूलकर देश आज धार्मिक और जातीय नफ़रत फैलाने वाले गिरोहों की चरागाह में तब्दील हो गया है। (शमसुल इसलाम दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ा चुके हैं और समसामयिक विषयों पर लिखते रहते हैं।)