जुलाई 2019

हिंदी से तमिलों को आख़िर दिक़्क़त क्या है?

मणिशंकर अय्यर

कस्तूरीरंगन कमेटी की रिपोर्ट में एक आधे वाक्य को लेकर तमिलनाडु में जो हंगामा और विरोध हुआ, उससे तमिलनाडु के बाहर रहने वाले भारतीय हैरान हो गए। उन्हें समझ में नहीं आया कि आख़िर तमिलनाडु में हिंदी का इतना विरोध क्यों हो रहा है। कस्तूरीरंगन कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में सिफ़ारिश की थी कि तमिलनाडु समेत सभी ग़ैर-हिंदी भाषी राज्यों में एक क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेज़ी के अलावा सभी सेकंडरी स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जानी चाहिए। इस सुझाव का सबसे कड़ा विरोध तमिलनाडु में हुआ। इस पर हैरान होने वालों को स्कूलों में हिंदी पढ़ने की अनिवार्यता के ख़िलाफ़ तमिलभाषियों के आंदोलन का इतिहास याद करना चाहिए।

ये क़िस्सा क़रीब दो सदी पुराना है। 1833 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने ईसाई मिशनरियों को क़ाबू में रखने वाली अपनी अक़्लमंदी भरी नीति को तिलांजलि दे दी। इसके बाद पूरे देश में मानो ईसाई मिशनरियों ने हमला बोल दिया था, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को ईसा मसीह का अनुयायी बना सकें। इस काम के लिए ईसाई मिशनरियों ने दक्षिण भारत को ख़ास तौर से चुना। दक्षिण भारत में ईसाई मिशनरी गतिविधियों के उस दौर को हम दो सबूतों से समझ सकते हैं। उस दौर में दक्षिण भारत में ईसाई धार्मिक पर्चों और किताबों की बाढ़ सी आ गई थी। भाषा और धर्म 1832 तक केवल तमिल भाषा में ही 40 हज़ार से ज़्यादा ईसाई धार्मिक पर्चे और किताबें छापे गए थे। 1852 तक इनकी तादाद दो लाख 10 हज़ार तक पहुंच गई थी (MSS Pandiyan, Brahmi and Non-Brahmi, Permanent Black, 2007)। दक्षिण भारत में ईसाई मिशनरियों ने कितने बड़े पैमाने पर धावा बोला था, इसकी दूसरी मिसाल ये है कि 1852 तक मद्रास में 1185 ईसाई मिशनरी स्कूल थे, जिनमें क़रीब 38 हज़ार बच्चे पढ़ते थे (S। Narayan, The Dravidian Story, OUP 2018)। इसी दौर में बंगाल और बॉम्बे प्रेसिडेंसी में केवल 472 मिशनरी स्कूल थे। इनमें 18 हज़ार के आस-पास बच्चे पढ़ते थे। ईसाइयत का दक्षिण भारत पर ये हमला केवल अपने धर्म के प्रचार तक सीमित नहीं था। जब हिंदुओं ने ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार का विरोध किया, तो ईसाई मिशनरियों ने हिंदू देवी-देवताओं और उनकी आस्था का अपमान किया। उनके बारे में दुष्प्रचार भी किया गया। ईसाई मिशनरियों के इस धार्मिक हमले के ख़िलाफ़ दक्षिण भारत में ब्राह्मण बुद्धिजीवियों की अगुआई में एक बड़ा तबक़ा एकजुट हुआ था। ये वो ब्राह्मण बुद्धिजीवी थे, जिन्होंने वेदों का गहराई से अध्ययन किया था। वे पुराणों के भी अध्येता थे और उन्हें आदि शंकर के अद्वैत दर्शन की भी गहरी समझ थी। इसके अलावा ये ब्राह्मण समुदाय अंग्रेज़ी भाषा भी अच्छी तरह से बोल और समझ लेता था। कुल मिलाकर, ईसाई मिशनरियों का विरोध करने वाले ब्राह्मण वो लोग थे, जो भारतीय संस्कारों से भी अच्छी तरह परिचित थे और यूरोपीय-अंग्रेज़ विचारों से भी वाक़िफ़ थे। ब्राह्मण समुदाय, दक्षिण भारत में ईसाई मिशनरियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने लगा। भाषायी संस्कृति और टकराव उनका मक़सद उन परंपराओं और आस्थाओं को बचाना था, जिन्हें वो 'प्रामाणिक हिंदू परंपरा' और जीवनपद्धति मानते थे। उनके विचारों का स्रोत आर्यों के संस्कृत के ग्रंथ थे। ईसाई मिशनरियों के विरोधी इन ब्राह्मणों ने परंपरा और आस्था के नाम पर समाज पर अपने ऊंचे दर्जे वाली पकड़ बनाए रखने की कोशिश की। वे इसमें काफ़ी हद तक कामयाब भी रहे। उन्हें अंग्रेज़ी भी आती थी और संस्कृत जैसी परंपरागत धार्मिक ज़बान भी। वो अंग्रेज़ी जानने की वजह से 'साम्राज्यवादी व्यवस्था में ताक़त के स्रोत' को भी अच्छी तरह समझते थे। (Pandian, ibid)। एस. नारायण ने साम्राज्यवादी शासन व्यवस्था में ब्राह्मणों की मज़बूत पकड़ को बड़े अच्छे से बयान किया है। उन्होंने लिखा है कि, '1892 से 1904 के बीच जो 16 भारतीय आईसीएस चुने गए थे, उनमें से 15 ब्राह्मण थे। वे आगे लिखते हैं कि इंजीनियर की पढ़ाई पास करने वाले 27 भारतीयों में से 21 ब्राह्मण थे'। ये ब्राह्मण आर्यों को अपना पूर्वज मानते थे और संस्कृत भाषा को अपनी संस्कृति का हिस्सा। इनकी आबादी तमिलनाडु की कुल आबादी का केवल तीन प्रतिशत थी। लेकिन, बीसवीं सदी के आग़ाज़ के वक़्त मद्रास यूनिवर्सिटी के 67 प्रतिशत ग्रेजुएट ब्राह्मण होते थे। सरकारी नौकरियों में उनका बोलबाला था, सचिवालय और ज़्यादातर ज़िलों के प्रशासन में ब्राह्मणों का ही दबदबा था। मद्रास हाई कोर्ट और बार में तो शायद ब्राह्मण ही वक़ील और जज थे। ज्यादातर बड़े पत्रकार भी इसी समुदाय से आते थे। यहां तक कि निजी कारोबारी कंपनियों में भी ब्राह्मणों का ही जलवा था। भाषायी राजनीति अब इस दबदबे के ख़िलाफ़ इंक़लाब तो आना ही था। इसमें ज़्यादा देर नहीं लगी। 1916 में टी।एम। नायर और पिट्टी त्यागराया चेट्टी ने कांग्रेस से बग़ावत करके अपना 'गैर-ब्राह्मण घोषणापत्र' जारी किया। इसके अलावा 1916 में ही मशहूर आध्यात्मिक गुरू मरिमलाई अडिगल (अडिगल का मतलब होता है महात्मा) ने तमिल शुद्धिकरण आंदोलन शुरू कर दिया। उनका मक़सद तमिल भाषा को संस्कृत के शिकंजे से आज़ाद कराना था। तमिल भाषा में मौजूद संस्कृत और दूसरी भाषाओं के शब्दों को हटाना था। इन दोनों आंदोलनों के मेल से ही 1920 में जस्टिस पार्टी की स्थापना हुई। इस पार्टी ने कांग्रेस और ब्राह्मणों के प्रभुत्व को मद्रास प्रेसीडेंसी में कड़ी चुनौती दी। महात्मा गांधी की प्रेरणा से 1918 में दक्षिण हिंदी प्रचार सभा की स्थापना हुई। इसने तमिल पहचान के सांस्कृतिक और सियासी आंदोलन को और मज़बूत करने का ही काम किया। ये आंदोलन कांग्रेस विरोधी था, ब्राह्मण विरोधी था, आर्य विरोधी भी था, उत्तर भारत, संस्कृत और हिंदी विरोधी भी था। इसने धीरे-धीरे तमिल अलगाववाद का रूप धर लिया। आख़िर में इस आंदोलन के बीच से अलग द्रविड़नाडु यानी तमिल राष्ट्र की मांग उठने लगी। हिंदी और ब्राह्मण विरोध की ये सामाजिक-भाषायी-सांस्कृतिक क्रांति 1937 में हुए चुनाव के दौरान अपने उरूज पर पहुंच गई। जस्टिस पार्टी ने भी इस चुनाव में हिस्सा लिया। इसे और भी कट्टर नेता ईवी रामास्वामी नायकर के 'स्वाभिमान आंदोलन' से और बल मिला। 1938 में ईवी रामास्वामी नायकर ने जस्टिस पार्टी का नेतृत्व अपने हाथ में ले लिया। तब उन्होंने इसका नाम बदल कर द्रविदार कझगम यानी द्रविड़ों का संगठन कर दिया। लेकिन, 1937 के चुनाव में अपनी शानदार चुनावी मशीन की बदौलत शातिर ब्राह्मण नेता सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) मद्रास प्रेसीडेंसी के मुख्यमंत्री चुने गए। कांग्रेस की राष्ट्रवादी विचारधारा पर चलते हुए राजाजी ने मशहूर राष्ट्रवादी तमिल पत्रिका सुदेशमित्रम में 6 मई 1937 को लिखा कि, 'जब हम हिंदी सीख लेंगे तभी दक्षिण भारत को सम्मान हासिल होगा'। तमिल स्वाभिमान तमिलों के स्वाभिमान को ये ज़ख़्म देने के बाद राजाजी ने उस पर नमक डालते हुए प्रेसीडेंसी के सभी सेकंडरी स्कूलों में हिंदी पढ़ना अनिवार्य बनाने वाला एक सरकारी फ़रमान भी जारी कर दिया। इस सरकारी आदेश ने हिंदी विरोध के आंदोलन को मानो और हवा दे दी। हिंदी भाषा को तमिलों के स्वीकार करने की रही-सही उम्मीद इस आंदोलन की भेंट चढ़ गई। हिंदी के ख़िलाफ़ तमिलों का आंदोलन अगले तीन साल यानी 1937 से 1940 के दौरान जारी रहा। इसने तमिलनाडु की राजनीति को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया। राजगोपालाचारी सरकार के हिंदी अनिवार्य करने के आदेश के ख़िलाफ़ जस्टिस पार्टी और मुस्लिम लीग ने मिलकर तमिझ पदाई (तमिल ब्रिगेड) तैयार की, जिसने त्रिची से मद्रास तक की 42 दिनों की पदयात्रा निकाली। ये यात्रा एक अगस्त से 11 सितंबर 1938 तक चली थी। अपने रास्ते में ये यात्रा 239 गांवों और 60 क़स्बों से गुज़री थी। एक मोटे अनुमान के मुताबिक़ इस लंबी पदयात्रा में 50 हज़ार लोग शामिल हुए थे। उनके नारों में, 'आर्य हँस रहे हैं और तमिल रो रहे हैं' और 'ब्राह्मण समुदाय मातृभाषा तमिल की हत्या कर रहे हैं', जैसे उत्तेजक नारे शामिल थे। तीन साल के उस दौर में हिंदी-विरोधी सभाओं का आयोजन आम बात बन गई। 1938 में हिंदी-विरोधी कमांड की स्थापना की गई थी। महिलाओं की एक सभा में ईवी रामास्वामी नायकर को 'पेरियार' (महान) की उपाधि से सम्मानित किया गया। तब से वो इसी नाम से जाने जाते हैं। उसके बाद पेरियार ने 'तमिलनाडु केवल तमिलों के लिए' का नारा दिया। साथ ही पेरियार ने अलग, संप्रभु द्रविड़ राष्ट्र की मांग कर डाली। तमिल मूल के अमरीकी विद्वान सुमति रामास्वामी के मुताबिक़ हिंदी विरोध का ये आंदोलन, 'तमिलनाडु के बिल्कुल अलग, सामाजिक और सियासी हितों और समुदायों को जोड़ने वाला बन गया। हिंदी के विरोध में तमिलनाडु के कट्टरपंथी और नास्तिक, भारतीय और द्रविड़ों के अधिकारों के समर्थक, यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर और सड़कों पर गाने-बजाने वाले अशिक्षित गवैये, पर्चे बाँटने वाले और कॉलेज के छात्र, सब एकजुट हो गए'। उस दौर में मुस्लिम लीग के नेता पी, कलीफ़ुल्ला ने ऐलान किया कि, 'मैं रवुथर मुसलमान हूं। लेकिन, मेरी मादरी ज़बान तमिल है, उर्दू नहीं। मुझे ये कहने में ज़रा भी शर्म नहीं। मुझे इस बात पर गर्व है।' हिन्दी से मुश्किलें सत्यमूर्ति और सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भी महात्मा गांधी को लिखकर हिंदी को तमिलनाडु पर थोपने के राजाजी के हठधर्मी वाले तरीक़े पर अपना विरोध जताया। लेकिन राजाजी अपनी बात पर अड़े रहे। मद्रास प्रेसीडेंसी में हिंदू विरोध का ये आंदोलन तब ख़त्म हुआ, जब अक्टूबर 1939 में सभी कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने बिना सलाह-मशविरे के भारत को दूसरे विश्व युद्ध में घसीटे जाने के ख़िलाफ़ इस्तीफ़ा दे दिया। इसके बाद मद्रास के गवर्नर लॉर्ड अर्सकाइन ने वो कुख्यात सरकारी आदेश वापस ले लिया, जिसे राजगोपालाचारी की सरकार ने जारी किया था। गवर्नर लॉर्ड अर्सकाइन ने वायसराय को लिखा कि 'हिंदी को अनिवार्य बनाने के फ़ैसले से इस सूबे में बहुत मुश्किलें पैदा हो रही हैं। ये फ़ैसला राज्य की जनभावना के निश्चित रूप से ख़िलाफ़ है।' तमिलों का ये हिंदी विरोध हमने संविधान सभा की बैठकों में भी देखा था तब टीटी कृष्णमाचारी और एन गोपालस्वामी आयंगर ने संविधान सभा को हिंदी को इकलौती 'राष्ट्रभाषा' घोषित करने से रोका। भाषा के मुद्दे पर समझौता ये हुआ कि राष्ट्रभाषा के मसले को 15 साल यानी 1965 तक के लिए टाल दिया जाए। जैसे ही ये तारीख़ क़रीब आई, डीएमके नेता सी. एन अन्नादुरै ने 1963 में घोषणा की कि, 'ये तमिल लोगों का कर्तव्य है कि वो हिंदी थोपने वालों के ख़िलाफ़ जंग लड़ें।' अन्नादुरै के विरोध और अपनी सरकार में तमिलनाडु के दो मंत्रियों के इस्तीफ़े के बावजूद, लालबहादुर शास्त्री सरकार ने तमिलनाडु के कांग्रेसी मुख्यमंत्री भक्त वत्सलम के साथ मिलकर तमिलनाडु में 'तीन भाषाएं पढ़ाने के फॉर्मूले' को लागू कर दिया। इसके बाद राज्य में दंगों और ख़ुद को आग के हवाले करने की घटनाओं की बाढ़ सी आ गई। ब्लैक फ्लैग डे यानी 25 जनवरी 1965 से 13 फरवरी 1966 के दौरान तमिलनाडु क़त्लोगारत का मैदान बन गया। हिंदी विरोध के इस आंदोलन ने तमिलनाडु में कांग्रेस की सियासी ताक़त को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया। इंदिरा गांधी ने इस मामले में संवेदनशीलता से काम लिया। इसके बाद उन्होंने 1968 में लैंग्वेज एक्ट पारित किया। इसकी वजह से तमिलनाडु में हिंदी विरोध का आंदोलन अगली क़रीब आधी सदी तक शांत रहा। जैसा कि डीएमके अध्यक्ष एम। के। स्टालिन ने मुस्कराते हुए कहा था कि अब कस्तूरीरंगन कमेटी ने 'मधुमक्खियों के छत्ते पर पत्थर फेंका है'। अगर हिंदी-हिंदुत्व की राजनीति करने वाले कट्टरपंथियों की चली, तो आगे का सफ़र बेहद ख़ूंरेजी होने वाला है। हम एक बार फिर तमिलनाडु में 1937-40 और 1965 का दौर देख सकते हैं। ये देश को मेरी चेतावनी है। ब्राह्मणों के प्रभुत्व का नकारात्मक पहलू सबको ये तो पता है कि ईसाई मिशनरियों के बेक़ाबू उत्साह ने उत्तर, मध्य और पूर्वी-पश्चिमी भारत में 1857 की पहली जंग-ए-आज़ादी को हवा दी थी। लेकिन, लोगों को दक्षिण भारत और ख़ास तौर से मद्रास प्रेसीडेंसी में ईसाई मिशनरियों के धर्म प्रचार से हुई तबाही का अंदाज़ा शायद नहीं है। रॉबर्ट काल्डवेल नाम का ईसाई मिशनरी 1837 में 23 बरस की उम्र में मद्रास पहुंचा था। इसके बाद उसने स्थानीय लोगों को ईसाई बनाने के लिए पूरे दक्षिण भारत में धर्मसभाएं आयोजित करना शुरू किया। ये सिलसिला 1891 में उसकी मौत तक जारी रहा था। उसका एक बयान,दक्षिण भारत में सक्रिय मिशनरियों की सोच को दिखाने के लिए काफ़ी है। काल्डवेल ने 11 साल भारत में रहने के बाद 1848 में लिखा था कि, 'भारत की ही तरह हिंदुत्व शब्द भी यूरोपीय विद्वानों की खोज है। आम भारतीय इससे अनजान हैं'। काल्डवेल के साथी हेनरी राइस का मानना था कि आम हिंदू को तर्क की बिल्कुल भी समझ नहीं है। उनके ये विचार ईसाई धर्म के प्रचार के लिए छापे गए पर्चों में दर्ज थे। (लेखक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं)