जुलाई 2019

एक देश-एक चुनाव का सवाल

रोहन शर्मा

इन दिनों एक देश-एक चुनाव, सूखे का संकट, हिमालय के पिघलते ग्लेशियर, वैश्विक आबादी में असंतुलन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोधी बर्खास्त आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को आजीवन कारावास की सजा आदि खबरें सुर्खियों में हैं। ये ऐसी खबरें हैं जिनकी गूंज लंबे समय तक सुनाई देती रहेगी।

दो महीने के दौरान सात चरणों में लोकसभा चुनाव संपन्न होने और नई सरकार बनने के बाद 'एक देश-एक चुनाव' यानी लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस मुद्दे पर आम सहमति बनाने की कोशिश के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल सर्वदलीय बैठक भी हो चुकी है, जिससे कांग्रेस के अलावा समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, द्रमुक, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, तेलुगु देशम सहित कई क्षेत्रीय दलों ने दूरी बनाए रखी। जनता दल (यू), मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, बीजू जनता दल, अकाली दल, वाईएसआर कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) आदि दलों ने बैठक में शिरकत तो की लेकिन इनमें से ज्यादातर ने एक देश एक चुनाव की संकल्पना को अव्यावहारिक बताते हुए खारिज कर दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने 'एक देश-एक चुनाव' का इरादा अपने पिछले कार्यकाल में भी जताया था, लेकिन इस मसले पर विचार-विमर्श के जरिए आम सहमति बनाने के लिए पहलकदमी की शुरुआत इसी कार्यकाल में शुरू की गई है। इस सिलसिले में संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी सरकार ने अपने इरादे का जिक्र कराया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारी चुनाव प्रणाली में लंबे कुछ बुनियादी बीमारियां घर कर गई हैं और उसमें लंबे समय से सुधार की जरूरत महसूस की जा रही है। चुनावों का आलम यह है कि दो-चार महीने भी ऐसे नहीं गुजरते, जब देश चुनावी मोड़ में न दिखता हो। हालांकि इस सदी में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव की नौबत नहीं आई है, लेकिन विधानसभाओं के चुनाव के मामले में ऐसा नहीं है। हर चार-पांच महीने बाद किसी न किसी राज्य में विधानसभा के चुनाव होते रहते हैं। इनके घोषित होते ही आचार संहिता लागू हो जाती है जिससे सरकारें अहम फैसले नहीं ले पातीं और खामियाजा पूरे देश को भुगतना पडता है। एक अनुमान के मुताबिक विधानसभा और लोकसभा चुनाव अलग-अलग होने से हर साल करीब चार महीने आचार संहिता के दायरे में आ जाते हैं। इसका उलट पक्ष यह कि चुनाव वाले राज्यों में अपने दलीय हितों के मद्देनजर केंद्र सरकार लोक-लुभावन फैसले लेने लगती है, जिसका नुकसान बाकी राज्यों को होता है। राजनीति का मुहावरा ऐसा बदला है कि राज्यों में भी वोट केंद्र के फैसलों पर पड़ने लगे हैं। बढ़ता चुनावी खर्च एक अलग समस्या है, जिससे काले धन को बढ़ावा मिल रहा है। सुरक्षा बलों और बाकी अमले की तैनाती में पैसे तो लगते ही है, उनकी नियमित भूमिकाएं भी प्रभावित होती है। इसलिए सरकार का तर्क है कि चुनाव एक साथ कराए जाएं तो इन बीमारियों का असर कम हो सकता है। कुछ समय पहले चुनाव आयोग ने भी कहा था कि वह एक साथ सभी चुनाव कराने में सक्षम हैं, लेकिन उसकी क्षमताओं की सीमा पिछले कुछ समय में बार-बार दयनीय रूप में उजागर हुई है। 2017 में गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा का कार्यकाल लगभग एक साथ खत्म हुआ था, लेकिन दोनों राज्यों के चुनाव की अधिसूचना अलग-अलग समय पर जारी की गई। सवाल है कि जब चुनाव आयोग दो राज्यों में एक साथ चुनाव नहीं करा सकता है तो वह पूरे देश में एक साथ कैसे चुनाव कराएगा। हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव भी उसने दो महीने में सात चरणों में कराए। पूछा जा सकता है कि इतना लंबा चुनाव कार्यक्रम बनाने का क्या औचित्य रहा होगा? गुजरात में राज्यसभा की एक साथ रिक्त हुई दो सीटों के लिए अलग-अलग चुनाव कराने का आयोग का फैसला तो हर तरह से हास्यास्पद ही है, जिसके बारे में वह कोई सफाई देने की स्थिति में नहीं है। सवाल यह भी है कि एक साथ चुनाव हो जाने के बाद भी अगर वहां की सरकार कार्यकाल पूरा होने से पहले ही गिर जाती है और वैकल्पिक सरकार नहीं बन पाती है तो क्या वहां मध्यावधि चुनाव नहीं कराए जाएंगे? ऐसे और भी कई सवाल हैं जो 'एक देश-एक चुनाव' की संकल्पना को अव्यावहारिक ठहराते हैं। लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं होता कि चुनाव सुधार के बुनियादी सवालों से मुंह मोड़ लिया जाए। गंभीर रूप से बीमार हो चुकी चुनाव प्रणाली का उपचार तो हर हाल में होना ही चाहिए। सूखे का गहराता संकट भीषण गरमी, मॉनसून में देरी और प्री मॉनसून बारिश की कमी ने इस साल देश में सूखे के संकट को गंभीर बना दिया है। आईआईटी, गांधीनगर के वैज्ञानिकों के मुताबिक देश का लगभग आधा हिस्सा सूखे से प्रभावित है और इसमें भी 16 फीसद इलाके तो भीषण सूखे की मार झेल रहे हैं। ये वैज्ञानिक देश में रियल टाइम में सूखे के आकलन पर काम कर रहे हैं। ड्राउट अर्ली वार्निंग सिस्टम (ड्यूज) के अध्ययन के मुताबिक भी देश के 44 फीसद हिस्से कम या ज्यादा सूखे से प्रभावित हैं। इस वर्ष मॉनसून का आगमन ही आठ दिन की देरी से हुआ है और उसका भारत-यात्रा बहुत ही धीमी गति से आगे बढ़ रही है। साथ ही कई राज्यों में प्री-मॉनसून की बारिश भी सामान्य से काफी कम हुई है, जिसकी वजह से भयावह जल संकट पैदा हो गया है और कृषि पैदावार में भी कमी आने की आशंका गहरा रही है। दरअसल, इस साल मार्च से मई तक होने वाली प्री मॉनसून वर्षा में औसत 21 प्रतिशत की कमी आई है। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार उत्तर-पश्चिम भारत में प्री मॉनसून वर्षा में 37 फीसद की, जबकि प्रायद्बीपीय भारत में 39 फीसद की कमी रही। हालांकि फानी तूफान की वजह से हुई वर्षा ने मध्य भारत, पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में इस कमी की भरपाई कर दी। लेकिन अल नीनो की वापसी के अंदेशे से इस बार मॉनसून के कमजोर होने की आशंका मंडरा रही है। गैर-सरकारी मौसम एजेंसी स्काईमेट के अनुसार इस साल बारिश के औसत से कम, 93 प्रतिशत ही रहने की उम्मीद है। कुछ समय पहले मौसम विभाग ने 96 प्रतिशत बारिश का पूर्वानुमान व्यक्त किया था। स्काईमेट के मुताबिक मध्य भारत में सबसे कम, सिर्फ 91 प्रतिशत बारिश होने की संभावना है। वर्ष 2018 में मॉनसून की स्थिति बेहतर रहने के बावजूद बड़े बांधों में पिछले वर्ष के मुकाबले से 10-15 फीसदी कम पानी है। केंद्रीय जल आयोग की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार पिछले सप्ताह के दौरान देश के 91 प्रमुख जलाशयों में 27.265 बीसीएम (बिलियन क्यूबिक मीटर) जल संग्रह हुआ। यह इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का मात्र 17 प्रतिशत है। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगान और तमिलनाडु गंभीर रूप से सूखे का सामना कर रहे हैं। पिछले दिनों चेन्नई के संकट की खबर आई। वहां इसी सप्ताह चार जलाशय सूख गए और अब बहुत कम मात्रा में पानी बचा हुआ है। संकट दूर करने के लिए वहां वेल्लोर के जोलारपेट से एक करोड़ लीटर पानी विशेष ट्रेन के जरिए भेजा जाएगा। देश के बाकी महानगरों का सूरत-ए-हाल भी बहुत बेहतर नहीं है। बेंगलुरु का भूजल स्तर पिछले दो दशक में 10-12 मीटर से गिर कर 76-91 मीटर तक जा पहुंचा है। दिल्ली का भूजल भी लगातार कम हो रहा है। महाराष्ट्र पिछले 47 साल का सबसे बड़ा सूखा झेल रहा है। अन्य कई राज्य भी इसकी चपेट मे आ गए हैं। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगले एक वर्ष में जलसंकट की इस समस्या से 10 करोड लोग प्रभावित होंगे, वहीं 2030 तक देश की 40 फीसदी आबादी इस गंभीर समस्या की चपेट मे होगी। सच तो यह है कि मौसम में आ रहा बदलाव लगातार हमारे जन-जीवन पर गहरा असर डाल रहा है। इस बदलाव को अच्छी तरह समझकर उसके अनुरूप नीतियां बनानी होंगी। बारिश में लगातार कमी का यह पांचवां साल था। जाहिर है, बारिश में लगातार कमी आती जा रही है। इसे नोटिस में लेने की जरूरत है। हम यह मानकर नहीं बैठ सकते कि हालात कभी बदल भी सकते हैं। सरकार ने जल शक्ति मंत्रालय का गठन कर यह जताने की कोशिश की है कि वह हालात की गंभीरता को लेकर सचेत है। लेकिन यह एक फालतू की चोंचलेबाजी है, क्योंकि केंद्रीय स्तर पर जल संसाधन मंत्रालय तो पहले से ही अस्तित्व में है। असल दरकार तो एक ऐसे विशेष तंत्र की है, जो मॉनसून के आकलन और उसके मुताबिक रणनीति तैयार कर सके। अभी तमाम फौरी राहत उपाय करने चाहिए, लेकिन कई दीर्घकालीन कदम भी उठाने होंगे। हिमालयी ग्लेशियरों पर संकट हिमालय की गोद में दुनिया की कई महान सभ्यताओं का जन्म और विकास हुआ है। कॉकेशश से लेकर भारत के पूर्वी छोर से भी आगे म्यांमार में अराका नियोमा तक सगरमाथा यानी माउंट एवरेस्ट की अगुआई में फैली हुई विभिन्न पर्वतमालाएं हजारों-लाखों वर्षों के दौरान विभिन्न सभ्यताओं के उत्थान और पतन की गवाह रही हैं। इन्हीं पर्वतमालाओं के तले सिंधु घाटी की सभ्यता से लेकर मोअनजोदड़ो की सभ्यता का जन्म हुआ। लेकिन इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जिन पर्वतमालाओं की छत्रछाया में मानव सभ्यता ने इतनी ऊंचाइयां हासिल कीं, आज वही पर्वतमालाएं मनुष्य की खुदगर्जी और सर्वग्रासी विकास की विनाशकारी अवधारणा की शिकार होकर पर्यावरण के गंभीर खतरे से जूझ रही हैं। इस खतरे से न सिर्फ इन पहाड़ों का बल्कि इनके गर्भ में पलने वाले प्राकृतिक ऊर्जा और जैव संपदा के असीम स्रोतों और इन पहाडों से निकलने वाली नदियों का अस्तित्व भी संकट में पड़ गया है। दरअसल, भारतीय उपमहाद्बीप की विशिष्ट पारिस्थितिकी की कुंजी हिमालय का भूगोल है। लेकिन हिमालय की पर्वतमालाओं के बारे में पिछले दो-ढाई सौ बरसों में हमारे अज्ञान का लगातार विस्तार हुआ है। इनको जितना और जैसा बरबाद अंग्रेजों ने दो सौ सालों में नहीं किया था उससे कई गुना ज्यादा इनका नाश हमने पिछले 60-70 साल में कर दिया है। इनकी भयावह बरबादी को ही मौसम चक्र में बदलाव की वजह बताया जा रहा है, जिससे गरमी के मौसम में बहुत ज्यादा गरमी, सर्दी के मौसम में लगातार बहुत ज्यादा सर्दी और बेमौसम बारिश होती रहती है। इस सबके चलते पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लेशियरों पर संकट लगातार गहराता जा रहा है। गौरतलब है कि देहरादून स्थित वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों की ओर से हिमालय के बढ़ते प्रदूषण पर किए शोध के निष्कर्षों के मुताबिक पश्चिमी देशों और खासकर यूरोपीय देशों में बढ़ते प्रदूषण का प्रभाव तेजी के साथ हिमालयी देशों पर पढ़ रहा है। इस समूचे इलाके में कार्बन की मात्रा में जिस तेजी से इजाफा हो रहा है, उससे ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का खतरा पैदा हो गया है। हालांकि ऐसी आशंका पहली बार नहीं जताई गई है, मगर समस्या यह है कि बार-बार के अध्ययनों में पर्यावरण के सामने पेश होने वाली चुनौतियों के बारे में स्पष्ट संकेत मिलने के बावजूद दुनियाभर में इस मसले पर कोई ठोस पहलकदमी नहीं हो सकी है। समय-समय पर पर्यावरण को लेकर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन होते हैं और उनमें कार्बन उत्सर्जन कम करने से लेकर हर स्तर पर प्रदूषण पर काबू पाने का संकल्प लिया जाता है, लेकिन यह सब एक तरह से कर्मकांडी उपक्रम बनकर रह जाता है। इसी का नतीजा है कि आज भी यूरोपीय देशों में तेजी से बढ़ते प्रदूषण की वजह से हिमालयी इलाकों में पारिस्थितिकीय तंत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहा है और उसके चलते वायुमंडल में कई तरह के बदलाव आ रहे हैं। यह सब उन अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में जताई जाने वाली चिंताओं के खोखला होने का ही सबूत है। सवाल है कि आखिर किन वजहों से दुनियाभर में कार्बन उत्सर्जन कम करने पर जोर देने वाले यूरोपीय देशों में प्रदूषण का स्तर ऐसी खतरनाक स्थिति में पहुंच गया है कि उससे अब हिमालयी क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं? गौरतलब है कि जलवायु में बढता तापमान हिमालयी ग्लेशियर से ढंके हिंदूकुश पर्वतमाला की चोटी को लगातार गला रहा है। कुछ समय पहले हिंदूकुश हिमालय एसेसमेंट नाम से किए गए एक अध्ययन के मुताबिक अगर तापमान बढ़ने की यही गति बनी रही तो इस सदी के अंत तक हिमालय पर्वत के ग्लेशियरों का करीब दो तिहाई हिस्सा खत्म हो जाएगा। माना जाता है कि इतना हिस्सा करीब दो अरब लोगों के लिए पीने के पानी के स्रोत के रूप में काम आ सकता है। फिलहाल जलवायु परिवर्तन को रोकने की कोशिशें एक हद तक कामयाब होती हैं तो भी हिमालयी ग्लेशियर का एक बडा हिस्सा नहीं बचाया जा सकेगा। सिर्फ इतने से ही यह समझा जा सकता है कि पारिस्थितिकी तंत्र में आने वाले इस असंतुलन से कैसे संकट पैदा हो सकते हैं और इसका समूची दुनिया में मानव जीवन पर कितना घातक असर होगा। संजीव भट्ट को सजा जामनगर (गुजरात) की एक अदालत ने पुलिस हिरासत में मौत के 30 साल पुराने मामले में गुजरात कॉडर के बर्खास्त आईपीएस अफसर संजीव भट्ट को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। देश की आजादी के बाद संभवत: यह पहला मौका है, जब हिरासत में मौत के मामले में अदालत ने किसी को जिम्मेदार ठहराते हुए उसे आजीवन कारावास सुनाई है। इस फैसले से तो ऐसा लगता है कि हमारे यहां हिरासत में मौत के मामले अपवाद स्वरूप ही होते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि पुलिस या न्यायिक हिरासत में किसी की मौत हो जाना हमारे देश में कोई नई बात नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक हर साल औसतन 1500 लोग पुलिस या न्यायिक हिरासत में मर जाते हैं। ऐसी मौतों के मामले की सुनवाई करते हुए हमारी उच्च और सर्वोच्च अदालतें कई बार इन मौतों को हत्या तक करार दे चुकी हैं, लेकिन ऐसे किसी भी मामले में संजीव भट्ट से पहले न तो किसी को मौत की सजा सुनाई गई और न ही आजीवन कारावास की। भट्ट करीब आठ महीने से जेल में बंद हैं। तीस साल पुराने जिस मामले में उन्हें सजा सुनाई गई है, वह 1990 का है, जब भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की अयोध्या रथयात्रा को बिहार में रोक कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। उस वक्त भट्ट जामनगर में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात थे। आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद देश के जिन कई शहरों में दंगे भड़क उठे थे, जामनगर भी उनमें से एक था। वहां दंगे के सिलसिले में प्रभुदास माधवजी वैशनानी सहित 133 लोगों को टाडा कानून के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया था। वैशनानी नौ दिन तक हिरासत में रहे थे। बाद में उन्हें खराब सेहत के आधार पर जमानत पर रिहा कर दिया गया था। रिहाई के बाद ठीक दसवें दिन इलाज के दौरान अस्पताल में उनकी मौत हो गई थी। मेडिकल रिकॉर्ड के अनुसार किडनी फेल हो जाने की वजह से मौत हुई थी। उनके भाई ने पुलिस हिरासत में मारपीट का आरोप लगाया था, जिसके आधार पर भट्ट और अन्य अधिकारियों के खिलाफ हिरासत में प्रताडना का मामला दर्ज किया गया था। साल 1995 में मजिस्ट्रेट द्बारा इस मामले का संज्ञान लिया गया था, लेकिन 2011 तक इस मामले में कोई कार्यवाही नहीं हुई, क्योंकि गुजरात हाई कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी। बाद में उन पर मुकदमा चलाया गया। संजीव भट्ट उस वक्त सुर्खियों में आए, जब उन्होंने 2002 में गुजरात की मुस्लिम विरोधी हिंसा को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए। उन्होंने दावा किया था कि गोधरा कांड के बाद 27 फरवरी, 2002 की शाम मुख्यमंत्री आवास पर हुई उस सुरक्षा बैठक में वे मौजूद थे, जिसमें मोदी ने कथित तौर पर पुलिस अधिकारियों से कहा था कि हिंदुओं को अपना ग़ुस्सा उतारने का मौका दिया जाना चाहिए। मोदी सरकार का कहना था कि इस बात के सबूत नहीं हैं कि संजीव भट्ट उस बैठक में मौजूद थे। माना जाता है कि मोदी सरकार और संजीव भट्ट के बीच संबंध इस हलफ़नामे के बाद और तल्ख़ हो गए थे। बाद में भट्ट ने गुजरात की हिंसा को लेकर और भी कई खुलासे किए। अंतत: भट्ट को गृह मंत्रालय ने अगस्त 2015 में 'सेवा से अनधिकृत रूप से अनुपस्थित' रहने की वजह से पद से बर्खास्त कर दिया। जिस मामले में भट्ट को सजा सुनाई गई, उस मामले में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि मामले में 300 गवाहों के बयान लिए जाने थे लेकिन कई महत्वपूर्ण गवाहों को छोड़कर महज 'मनचाहे' 32 गवाहों का ही परीक्षण किया गया। जो भी हो, बहरहाल राजनीति में रंगा यह मामला हमारी न्याय व्यवस्था की असलियत बयां करता है। इस सिलसिले में फैसले से दो दिन पहले रूस में शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देशों के प्रधान न्यायाधीशों के एक सम्मेलन में भारत के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई का दिया गया बयान बेहद प्रासंगिक है। उन्होंने कहा है कि....ऐसी स्थितियों ने दुनियाभर में न्यायिक इकाइयों पर भारी दबाव डाला है और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि कुछ न्यायिक क्षेत्रों में न्यायपालिका ने भी लोकलुभावन ताकतों के आगे घुटने टेके हैं। वैश्विक आबादी में असंतुलन संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक आबादी रिपोर्ट-2019 में ऐसे कई ट्रेंड्स रेखांकित किए गए हैं, जो हम सबसे सजग होने की मांग करते हैं। विश्व जनसंख्या में बढ़त-घटत के ये रुझान न केवल हमारी जीवन शैली से जुड़ी सामाजिक सांस्कृतिक मान्यताओं में बदलाव की जमीन तैयार कर रहे हैं, बल्कि दुनिया की सभी सरकारों में इस मसले पर सहयोग और समन्वय की जरूरत भी बता रहे हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक 2050 तक विश्व की जनसंख्या मौजूदा 770 करोड़ से बढ़ कर 970 करोड़ हो जाएगी। हालांकि जनसंख्या वृद्धि दर में लगभग हर जगह गिरावट दर्ज की जा रही है। वैश्विक स्तर पर प्रति महिला औसत जन्म दर 1990 में 3.2 थी, जो 2019 में घटकर 2.5 रह गई। 2050 तक इसके और कम होकर 2.2 हो जाने का अनुमान है। किसी देश की आबादी घटने न लग जाए इसके लिए प्रति महिला औसत जन्म दर 2.1 होना जरूरी बताया जाता है। बहरहाल, वैश्विक स्तर पर हम भले ही जनसंख्या बढ़ते जाने की चुनौती झेल रहे हैं, पर दुनिया के 55 देश ऐसे हैं जहां आबादी घट रही है। 2050 तक इन देशों की आबादी में एक फीसदी या उससे अधिक गिरावट के आसार हैं। यह कमी सिर्फ जन्म दर में गिरावट के कारण नहीं आ रही है। कुछ देशों में इसके लिए लोगों का पलायन भी जिम्मेदार है। अराजकता और अशांति के शिकार कुछ इलाकों से लोग जान बचाने के लिए भाग रहे हैं। कुछ देश ऐसे भी हैं, जहां कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, लेकिन रोजगार के अच्छे अवसरों की नामौजूदगी उन्हें बेहतर ठिकानों की ओर जाने के लिए मजबूर कर रही है। बहरहाल, वैश्विक आबादी के इस बिगड़ते संतुलन को ध्यान में रखें तो आने वाले वर्षों में विभिन्न देश अकेले अपने स्तर पर इस समस्या का कोई हल नहीं निकाल पाएंगे। बेहतर होगा कि वैश्विक स्तर पर नीतियों, योजनाओं और कानूनों में समन्वय लाने के प्रयास अभी से किए जाएं, ताकि जो बदलाव मांग और पूर्ति की कष्टप्रद प्रक्रिया के तहत आ रहे हैं, उन्हें ज्यादा सहज तरीके से संभव बनाया जा सके। जनसंख्या में जारी उथल-पुथल का ही दूसरा पहलू है आबादी के अलग-अलग आयु वर्गों का बदलता अनुपात। स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ने के साथ ही पूरी दुनिया में बुजुर्ग आबादी का हिस्सा बढ़ता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में 65 साल से ऊपर के बुजुर्गों की संख्या अभी पांच साल से कम उम्र के बच्चों से ज्यादा हो चुकी है और 2050 तक आबादी में उनका हिस्सा छोटे बच्चों का दोगुना (भारत के मामले में तीन गुना) हो चुका होगा। आबादी का ऐसा टेढ़ा अनुपात जल्द ही हमारे सामने बुजुर्गों की देखरेख और उनकी ऊर्जा के रचनात्मक उपयोग की चुनौती पेश करेगा, साथ ही हमें अपने कुछ स्थापित जीवन मूल्यों पर पुनर्विचार के लिए भी बाध्य करेगा।