जुलाई 2019

लोग गरमी से नहीं, व्यवस्था की काहिली से मरते हैं!

अनिल जैन

हैरानी की बात है कि हमारे देश में भीषण सर्दी और बाढ़ को तो कुदरत का कहर या प्राकृतिक आपदा माना जाता है, लेकिन झुलसा देने वाली गरमी को प्राकृतिक आपदा मानने का कोई प्रावधान सरकारी नियम-कायदों में नहीं है। ऐसे में, भीषण गरमी के बावजूद सरकारों पर लोगों की जान बचाने का कोई दबाव नहीं रहता। बडी संख्या में साधनहीन लोग गरमी की वजह से मौत का शिकार बनते हैं। सरकारे बस एडवाइजरी जारी कर देती हैं कि लोग गरमी के प्रकोप से बचने के लिए यह करे और वह न करे।

केरल के तट पर दस्तक देते हुए मॉनसून अपनी सालाना भारत-यात्रा पर निकल पड़ा है। चूंकि इस बार उसका सफर एक सप्ताह देरी से शुरू हुआ है, लिहाजा देश के बाकी हिस्सों में भी उसका देरी से पहुंचना लाजिमी है। मॉनसून के इंतजार में व्याकुल हो रहे देश के विभिन्न हिस्सों को इस समय भीषण गरमी ने बुरी तरह झुलसा रखा है। राजधानी दिल्ली सहित देश में कई जगहों पर तापमान 48 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचा है। बढ़ते तापमान का आम जनजीवन पर गहरा असर पड़ा है। गरम हवा की लपटों से इंसान ही नहीं, पशु-पक्षी भी झुलस रहे हैं। देश के विभिन्न इलाकों से साधनहीन लोगों के बीमार होने तथा मरने की खबरों का सिलसिला जारी है। लेकिन सरकार और समाज के स्तर पर कहीं कोई चिंता जैसी बात नजर नहीं आती। पूरा देश या तो विश्वकप क्रिकेट के काराबोर में या फिर हिंदू-मुसलमान करने में मगन है। व्यवस्था तंत्र के शीर्ष पर बैठे राजनेता एक किक्रेट खिलाड़ी के अंगूठे की चोट पर तो अफसोस जाहिर करते हैं लेकिन मौसम के सितम से मरने वालों पर संवेदना के दो बोल भी उनके मुंह से नहीं फूटते। देश की संसद में 'जय श्रीराम', 'हर-हर महादेव', 'राधे-राधे', 'अल्लाह हु अकबर' के नारों से सांसद एक दूसरे पर फब्तियां कसते हैं, राष्ट्रपति के अभिभाषण में देश की गुलाबी तस्वीर पेश की जाती है, लेकिन इन मौतों का जिक्र कोई नहीं करता। संसद की यह स्थिति उसके आवारा और बदचलन होने की तसदीक करती है। देश का मीडिया खासकर टेलीविजन के चौबीसों घंटे चलने वाले खबरिया चैनलों की बदतमीजी, बदचलनी और बदनीयती की कहानी तो पुरानी है ही। अकेले बिहार में ही भीषण गरमी और लू से अब तक 100 से अधिक लोगों की मौत हो गई है। वहां दिमागी बुखार से बच्चों के मरने का सिलसिला भी जारी है, जिसकी एक अलग ही कहानी है। वैसे तो हर साल मई के महीने में गरमी पूरे शबाब पर होती है और जून आते-आते जब धूल भरी आंधी चलने लगती है तो गरमी का असर कुछ कम होने लगता है। मगर इस बार ऐसा नहीं हुआ। जून बीतने को है लेकिन गरमी कम होने का नाम ही नहीं ले रही है। न सिर्फ उत्तर भारत के मैदानी इलाके बल्कि दक्षिण के पठार भी गरमी से बुरी तरह झुलस रहे है। इसी सबके बीच मौसम विभाग की चेतावनी भी डराने वाली है। उसकी ओर से कहा जा रहा है कि उत्तर भारत को अभी और कुछ दिनों तक गरमी का सितम झेलना पडेगा। भीषण गरमी पड़ने की चेतावनी के साथ ही इस बार मॉनसून के कमजोर रहने का अनुमान भी जताया गया है। जाहिर है कि अगर ऐसा होता है तो इससे सीधे तौर पर न सिर्फ हमारी खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था बल्कि प्रकारांतर से समूची अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। दरअसल पिछले कुछ सालों से इस मौसम में यह शिद्दत से महसूस किया जा रहा है कि इस बार गरमी पिछले साल से ज्यादा है। तापमान संबंधी आंकडे भी इस बात की तसदीक करते हैं कि गरमी साल दर साल बढ रही है। मौसम विभाग के अनुसार 1901 के बाद साल 2018 में सबसे ज़्यादा गर्मी पडी थी और कुछ समय पहले लगाए गए अनुमान के मुताबिक इस साल औसत तापमान में 0.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। मौसम की जानकारी देने वाली वेबसाइट 'एल डोरैडो' ने पिछले दिनों दुनिया के सबसे गरम जिन 15 इलाकों की सूची जारी की थी, वे सभी जगहें भारत में ही हैं- मध्य भारत और उसके आसपास। सूची में दिए गए 15 नामों में से नौ महाराष्ट्र, तीन मध्य प्रदेश, दो उत्तर प्रदेश और एक तेलंगाना का है। मौसम विज्ञानियों के मुताबिक इस भीषण गरमी में कुछ भूमिका प्रशांत महासागर में मौजूद 'अल नीनो' प्रभाव की भी हो सकती है। अल नीनो की मौजूदगी के चलते ही इस वर्ष एक बार फिर कमजोर मानसून की भविष्यवाणी भी की जा रही है। अल नीनो की वजह से प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से ज्यादा गरम हो जाता है, जिससे मानसून के बादलों के बनने और उनके भारत की ओर बढ़ने की गति कमजोर हो जाती है। इस समय भी प्रशांत महासागर का पानी गरम होने की वजह से समुद्री हवाओं का एशियाई लैंडमास की ओर रुख करना संभव नहीं हो पा रहा है, लिहाजा जमीन की तपन कम होने का नाम नहीं ले रही है। जब भी गरमी इस तरह से बढ़ती है, तो यह भी कहा जाने लगता है कि यह ग्लोबल वार्मिंग का नतीजा है। यह सही है कि मौसम चक्र बदल रहा है, जिसकी वजह से पर्यावरण भी बदल रहा है और ग्लोबल वार्मिंग को हमारे युग के एक हकीकत के तौर पर स्वीकार कर लिया गया है। फिर भी इस बात को अभी शायद पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि हर कुछ साल के अंतराल पर आ जाने वाली भीषण गरमी या कड़ाके की जानलेवा सर्दी इस ग्लोबल वार्मिंग का ही परिणाम है। लेकिन गरमी की वजह से मरने वालों की बड़ी संख्या यह तो बताती ही है कि हर कुछ साल बाद आने वाली मौसमी आपदा या उसके बिगड़े मिजाज का सामना करने के लिए हमारी कोई तैयारी नहीं है। गरमी के मौसम में जब पारा धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता है तो इनसानी शरीर भी सहज रूप से अपने को उसे बर्दाश्त करने लायक बना लेता है। लेकिन मौसम अगर अचानक गरम हो जाए तो शरीर को उसके साथ तालमेल बैठाने में दिक्कत आ जाती है और इसका नतीजा बीमारियों में बदलता दिखता है। इस समय यही हो रहा है। बात सिर्फ भीषण गरमी की ही नहीं है, उत्तर भारत में कड़ाके की शीतलहर और अनवरत मूसलाधार बारिश के चलते आने वाली बाढ़ के शिकार भी ज्यादातर सामाजिक और आर्थिक रूप से निचले क्रम के लोग ही होते हैं। दरअसल ऐसे लोगों को मौसम नहीं मारता, बल्कि वह गरीबी और लाचारी मारती है, जो उन्हें निहायत प्रतिकूल मौसम में भी बाहर निकलने को मजबूर कर देती है। हैरानी की बात यह भी है कि हमारे देश में भीषण सर्दी और बाढ़ को तो कुदरत का कहर या प्राकृतिक आपदा माना जाता है, लेकिन झुलसा देने वाली गरमी को प्राकृतिक आपदा मानने का कोई प्रावधान सरकारी नियम-कायदों में नहीं है। ऐसे में, भीषण गरमी के बावजूद सरकारों पर लोगों की जान बचाने का कोई दबाव नहीं रहता। वे बस एडवाइजरी जारी कर देती हैं कि लोग इस गरमी के प्रकोप से बचने के लिए यह करे और वह न करे। देश के विभिन्न हिस्सों में बड़ी संख्या में लोग गरमी की वजह से मौत का शिकार बनते हैं लेकिन उनकी खबर तक नहीं बन पाती। गरीब तबके के पास गरमी से मुकाबला करने के पर्याप्त बुनियादी इंतजाम नहीं होते। करोडों परिवार ऐसे हैं जिनके पास पंखे-कूलर जैसी सुविधा भी नहीं है। पीने का साफ पानी नहीं है। लू लगने पर उन्हें पर्याप्त चिकित्सा सुविधा भी नहीं मिल पाती। ऐसे में गरमी गरीब को निगल जाती है। इस स्थिति की इसकी बड़ी वजह हमारी भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक नेतृत्व की काहिली तो है ही, इसके साथ ही एक अन्य वजह यह भी है कि मौसम से लड़ने वाला हमारा सामाजिक तंत्र भी अब कमजोर हो गया है। एक समय था जब सरकार से इतर समाज खुद मौसम की मार से लोगों को बचाने के काम अपने स्तर पर करता था। सामाजिक और पारमार्थिक संस्थाएं लोगों को पानी पिलाने के लिए जगह-जगह प्याऊ लगाती थीं या शरबत पिलाने का इंतजाम करती थीं। यही नहीं, पशु-पक्षियों के लिए भी पीने के पानी का इंतजाम किया जाता था। सड़कों के किनारे पेड़ भी इसीलिए लगाए जाते थे ताकि राह चलते लोग उन पेड़ों की छांव में कुछ देर सुस्ता सकें। सच कहे तो किसी भी मौसम की अति हमारे भीतर के इनसान को आवाज देती थी, परस्पर एक-दूसरे की चिंता करने के लिए प्रेरित करती थी। लेकिन आर्थिक आपाधापी और विकास के इस नए दौर में परस्पर चिंता और लिहाज का लोप हो गया है और इसीलिए परमार्थ के ये काम अब बंद हो गए हैं। अब तो सड़कों से पेड़ भी गायब हो गए हैं और बिना पैसा खर्च किए प्यास बुझाना भी मुश्किल है। पानी को हमारी सरकारों ने लगभग पूरी तरह बाजार के हवाले कर दिया है और बाजार को इससे कोई मतलब नहीं कि गरमी में पानी राहत या जान बचाने के लिए कितना उपयोगी है। ऐसे में लोगों का लू की चपेट में आना स्वाभाविक है। कहा जा सकता है कि गरमी के कहर को जानलेवा बनाने के लिए हमारी सरकारों और हमारे सामाजिक तंत्र का निष्ठुर रवैया जिम्मेदार है।