जुलाई 2019

दिमागी बुखार से ग्रस्त हमारा तंत्र

डॉ. रश्मि रावत

पिछले कुछ वर्षों में समय के साथ और-और कमजोर पड़ते हुए भारत का आईना मुजफ्फरपुर जिला बनता जा रहा है। साल भर पहले जिले के बालिका आश्रय गृह में बच्चियों के साथ अमानवीय कृत्य का जो सच सामने आया था, उसने देश भर का दिल दहला दिया था। इन दिनों मुजफ्फरपुर जिले में बच्चे चमकी बुखार से जूझ रहे हैं। कुपोषित शरीर और खाली पेट में बीमारी से लड़ने की ताकत नहीं है इसलिए बच्चे बड़ी संख्या में मौत का शिकार बनते जा रहे हैं। बदकिस्मती से जिस धरती पर उन्होंने जन्म लिया, वहाँ की व्यवस्था में इतनी संवेदना नहीं है कि बच्चे अपना अस्तित्व भी बनाए रख सकें।

सन 1954 में प्रकाशित मैला आँचल उपन्यास के डॉ. प्रशांत के पूर्णिया गाँव को ले कर किए गए शोध का यह निष्कर्ष है कि ‘गरीबी और जहालत ही रोग के कीटाणु हैं।’ सम्पूर्ण भारत की दरिद्र, भूखी और शोषित जनता के जीवन का यह ऐसा सच है, जिसे सब जानते तो हैं, फिर भी चेतना से ओझल बनाए रखते हैं। इसका परिणाम यह है कि यह मैला आँचल और भी मैला हो कर फैलता जा रहा है। इन दिनों मुजफ्फरपुर जिले में बच्चे चमकी बुखार से जूझ रहे हैं। कुपोषित शरीर और खाली पेट में बीमारी से लड़ने की ताकत नहीं है इसलिए बच्चे बड़ी संख्या में मौत का शिकार बनते जा रहे हैं। बदकिस्मती से जिस धरती पर उन्होंने जन्म लिया, वहाँ की व्यवस्था में इतनी संवेदना नहीं है कि बच्चे अपना अस्तित्व भी बनाए रख सकें। ऐसा नहीं है कि ये पहली बार हुआ हो। उत्तरी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ दशकों में चमकी बुखार से कई मौतें हुई हैं। गोरखपुर की भौगोलिक संरचना मुजफ्फरपुर जैसी ही है। कुछ ही समय पहले संसाधनों के अभाव में बड़ी तादाद में वहाँ बच्चों की मौत हुई हैं। साँस भर ऑक्सीजन के अभाव में घुटते-तड़पते बच्चे दम तोड़ते रहे। 2014 से अब तक हजार से ऊपर बच्चे सिर्फ मुजफ्फरपुर में ही मौत के मुँह में समा गए हैं। फिर भी प्रशासन की नींद नहीं खुलती। एक कप दूध, केला, पैरासिटामोल जैसी सस्ती दवाइयाँ, पेट भर अन्न तक जुटाने का कोई इंतजाम इन बच्चों के लिए नहीं किया। नन्ही मुट्ठी भर गुड़/शक्कर, अन्न भी उनकी जान बचा सकता था। खाली पेट न लू झेली जा सकती है न लीची, न बीमारी,....जाहिर है अंततः जिंदगी भी नहीं। उदारीकरण के बाद से और भी तेजी से तीसरी, चौथी दुनिया कही जाने वाली दुनिया सब जगह पसरती चली गई है। भारत भी दो हिस्सों में बँटा हुआ है। हर क्षेत्र 'हैव' और 'हैव नॉट्स' में विभक्त है। एक है साधन सम्पन्न लगभग एक तिहाई इंडिया, जिसने बाकी के दो-तिहाई हिंदुस्तान को अपना उपनिवेश बनाया हुआ है। उसके हिस्से के संसाधन इसी इंडिया के पास चले जाते हैं। लूट की यह हद इतने क्रूर ढंग से बढ़ती जाएगी कि जिंदा रहने का सहज मानवाधिकार भी बड़ी मात्रा में लोगों से छिनता चला जाएगा। यह बड़ी शोचनीय स्थिति है। कुछ रोज पहले लगा कि लीची खा कर बच्चे बीमार हुए होंगे। तीसरी दुनिया के बाशिंदे समृद्ध दुनिया की चीजें हजम भला कैसे करें। जाँच-पड़ताल के बाद यही सामने आया कि खाली पेट लीची खाने से समस्या पैदा होती है, पर उनमें से कम ही बच्चों ने लीची खाई थी। विश्व स्वास्थय संगठन (WHO), विश्व बैंक और यूनीसेफ के आँकड़ों पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार, अधिकतर अफ्रीकन देशों में बच्चों और 15 से 49 वर्ष की उम्र की स्त्रियों की पोषण की स्थिति गोरखपुर से बहुत बेहतर है। यूँ तो पूरे बिहार की भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है और देश भर में ही तीसरी दुनिया जगह-जगह बिखरी हुई है। गोरखपुर में भी इंडिया और वंचित भारत में बँटी दोनों आबादियाँ एक साथ मौजूद हैं। पिछले कुछ वर्षों में समय के साथ और-और कमजोर पड़ते हुए भारत का आईना मुजफ्फरपुर जिला बनता जा रहा है। लगभग साल भर पहले जिले के बालिका आश्रय गृह में बच्चियों के साथ अमानवीय कृत्य का जो सच सामने आया था, उसने देश भर का दिल दहला दिया था। समाज सेवा, पत्रकारिता जैसे व्यवसाय की आड़ में कुकर्मों का दुष्चक्र गढ़ा गया था, जिनकी समाज में बहुत ऊँची साख होती है। और हैरानी की बात है कि यह सब सामने आया था समाज वैज्ञानिक शोध के जरिए। यह तो मानने वाली बात है नहीं कि मीडिया और प्रशासन को इतने बड़े प्रपंच की हवा न लगी हो। अब वर्तमान में भी लोकतंत्र के स्तंभ की नालायकी साफ दिख रही है। बल्कि ज्यादा उचित यह कहना होगा कि किसी के भी सरोकार में बच्चे कहीं हैं ही नहीं कहीं। तीसरी दुनिया के लोगों का अर्थात कमजोर पड़ते, पिछड़ते भारत का रहना-न रहना उनके लिए कोई मायने नहीं रखता। किसी भी बड़े दल के चुनावी घोषणा पत्र में बच्चे शामिल नहीं थे। शिक्षा और चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी देशवासियों को नसीब हों, इसकी कोई फिक्र व्यवस्था को नहीं है। विभिन्न रपटों में जिले में कुपोषण की जो स्थिति सामने आई। बहुत ही निराशाजनक है। युगांडा, नाइजीरिया जैसे अफ्रीकी देशों से भी काफी बदतर स्थिति में यहाँ के लोग हैं। सरकारी अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थय केंद्र एकमात्र स्थल हैं, जहाँ इन बच्चों का इलाज हो सकता था। पर 50 लाख की आबादी वाले जिले में इनकी संख्या अपर्याप्त है। जो हैं भी उनकी स्थिति इतनी लचर थी कि इलाज के साधनों का तो भयंकर अभाव था ही, इस भीषण गर्मी में पीने के लिए साफ पानी तक नहीं था। मरीज और उनके परिजन गंदा प्रदूषित पानी पीने के लिए मजबूर थे। सरकारी अस्पताल इस दो-तिहाई आबादी का एकमात्र शरण स्थल हैं और वहाँ की भी हालत इतनी दयनीय है कि स्वस्थ व्यक्ति भी बीमार हो जाए। चिकित्सा जैसी बुनियादी जरूरत उपलब्ध करवाना सरकार की जिम्मेदारी होनी ही चाहिए। इसके निजीकरण से स्थिति विकराल होती गई है। सरकार के लिए निजी कम्पनियों का हित ही अधिक महत्व रखता है। इन्हीं की राहें सुगम करने के लिए आयुष्मान भारत जैसी योजनाएँ लाई जाती हैं। गरीब परिवारों को लक्ष्य बनाकर ही इस स्वास्थ्यए बीमा योजना की शुरुआत की गई थी। गरीबों के नाम पर बीमा कम्पनियों का व्यवसाय तो निश्चित तौर पर ही काफी फला-फूला होगा, मगर क्या एक भी परिवार को इसका लाभ आज तक भी मिला? इस विकट स्थिति में जबकि सरकारी अस्पतालों में एक बेड में 3-3 मरीजों को लिटाने के बाद भी जगह नहीं बन पा रही है और डॉक्टरों की भी भारी कमी महसूस की जा रही है। बच्चों की इस अकाल मौत को रोकने में तिनके का भी सहारा क्या इन योजनाओं से मिला? पूरी तस्वीर साफ होते हुए भी लगता ही नहीं कि साफ हवा-पानी, पेट भर खाने की इनकी जरूरत का जरा भी संज्ञान सरकार ले रही हो। एक तो पहले ही 1990 के नीतिगत स्तर पर भी आम लोगों के स्वास्थय के सवाल का महत्व कम होता जा रहा है। स्वास्थ्ये पर खर्चे की प्रतिशतता कम होती गई है। 2017 में यह जी.डी.पी की मात्र 1.15 प्रतिशत थी। ऊपर से प्रशासन तंत्र की लापरवाही बहुत ही हैरतअंगेज है। मीडिया ने बच्चों की इस दुर्दशा और चिकित्सा तंत्र की बदहाली को अति मुखर हो कर कवर किया। मगर सोचने की बात यह है कि न बच्चों की दशा अचानक खराब हुई और न ही चिकित्सा सुविधाओं की बदहाली कोई नयी बात है। अतः समय रहते हुए मीडिया सक्रिय होता तो प्रशासन के सोते हाथी को भी हरकत में लाया जाना संभव होता और तब ये मौतें बहुत आसानी से टाली जा सकती थीं। बच्चों के पेट में मुट्ठी भर अनाज का होना भी इस खौफनाक मंजर को घटने से रोक सकता था। समाज के अन्य सदस्य भी इसमें सहयोगी हो जाते। भूख से होने वाली एक मौत भी राष्ट्रीय कलंक का विषय होती है। अन्न का अभाव महामारी में तब्दील हो कर दानवी ढंग से मासूस जानों को निगलने लगे। ये तो मानवीय समाज के सदस्य कदाचित नहीं चाह सकते। समय रहते मशीनरी हरकत में आ क्यों नहीं पाती? जब स्थिति ने इतना विकराल रूप ले लिया कि इमरजेंसी के स्तर पर इलाज दिए जाने की जरूरत आन पड़ी। उस समय मीडिया की जरूरत से अधिक मुस्तैदी से इलाज में बाधा ही पड़ी। निर्णायक शक्तियों को घेरने के बजाय इलाज में लगे डॉ. और पैरा मैडिकल क्षेत्रों के लोग पर ही आरोप-प्रत्यारोप का भौंडा सिलसिला शुरू कर दिया, और सारे मामले को जिस संवेदनहीनता से प्रस्तुत किया गया। उससे लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ की छीजती ताकत और गुम होते मानवीय सरोकार की बानगी दिखी। हालांकि अपवाद स्वरूप चंद उदाहरण मानवीय सरोकारों के भी दिखे। माना कि दूरदर्शन एक ऐसा माध्यम है, जहाँ जो दिखता है उसे ही घटित माना जाता है इसलिए उनके लिए दिखाना जरूरी होता है। ऐसे नाजुक समय में जब पल-पल जीवन पर भारी पड़ रहा हो, दृश्यों को संजोने और दिखाने में जिस समझदारी और संवेदनशीलता की जरूरत थी, खेद पूर्वक कहना पड़ रहा है कि उसका लेश भी शायद ही दिखाई पड़ा। कुछ स्थानीय चैनल के पत्रकार जरूर अपने कैमरे छोड़ कर मरीजों को लेकर अस्पताल भागते नजर आए। राजेश जोशी की कविता 'बच्चे काम पर जा रहे हैं' मन को बहुत छूती है कि बच्चों से बचपना छीन लिया गया है। जब उन्हें स्कूल जाना चाहिए था, खेलना-कूदना चाहिए था, बेचारे काम करने के लिए मजबूर हैं। मानो सारे खिलौने अंतरिक्ष चले गए हों। वर्तमान स्थिति में जब बच्चे खुद ही बड़ी संख्या में दुनिया छोड़ते जा रहे हैं, क्या कहा जाए। इस पर गहरा विचार किया जाना चाहिए कि विश्व में छठी बड़ी अर्थव्यवस्था का दावा करने वाले इतने बड़े लोकतंत्र की प्राथमिकताएँ कैसे और कब इतनी बदलती चली गईं कि जीवन के बुनियादी सवाल उसके एजेंडे में ही नहीं हैं और मनुष्य वर्ग, धर्म, जाति, क्षेत्र, लिंग के आधार पर बुरी तरह बँटता जा रहा है। प्रचंड उपभोक्तावादी दौर के शक्ति संकेतकों के आधार पर जिसका भी खाता दुबला हो, वह कुचला जा रहा है। बेतरह कुचला जा रहा है। उदयप्रकाश की कहानी 'मैंगोसिल' बच्चों की ऐसी ही विकट स्थिति निराले अंदाज में बयां करती है। साहित्यकार की संवेदनशील आँखें पहचान लेती हैं कि गरीबी और जहालत महाबीमारियों के कीटाणु बढ़ते जा रहे हैं। इसकी गाज बच्चों पर गिरेगी। बच्चे सबसे नर्म चारा होते हैं किसी भी संकट का। और फिर जब सभ्यता इस दिशा में जा रही हो तो जो भी नाजुक है, कोमल है और अपने अस्तित्व के लिए दूसरे पर निर्भर है। उसका क्या हाल होगा, महसूस किया जा सकता है। इस लम्बी कहानी में मैंगोसिल नामक रोग की कल्पना की गई है जिसमें बच्चों के सिर बहुत बड़े हो जाते हैं। उनके मस्तिष्क दुनिया भर की जानकारियों से भरे अनुभव समृद्ध मस्तिष्क हैं और वे बस दो- ढाई साल ही जिंदा रह पाते हैं। इस बीमारी का शिकार सिर्फ निर्धन, वंचित तबके के बच्चे ही बनते हैं। यह बीमारी सम्पन्न लोगों को नहीं होती। बीमारी का वर्गीय चरित्र कहानी में और जीवन में भी एकदम स्पष्ट है। जाहिर है बीमारी दी जा रही है हो नहीं रही है। इन बीमारियों का होना सभ्यता की हार है। आधुनिकता के उस दावे का पूरी तरह खोखला हो जाना है कि हर पेट को खाना और तन ढ़कने को कपड़ा मिलेगा। 'मैंगोसिल' कहानी में गरीबी और बीमारी से जूझते परिवार का बच्चा सूरी इस बीमारी से ग्रस्त है। यूँ तो उसकी बीमारी पर देश-विदेश की प्रतिष्ठित संस्थाएँ शोध करने में जुटी हुई हैं। उनके भी निष्कर्षों का भाव फणीश्वरनाथ रेणु के सालों पहले निकाले गए निष्कर्ष जैसे ही हैं। मगर अनुभव समृद्ध, परिपक्व मस्तिष्क सम्पन्न सूरी का खुद का निष्कर्ष भी यही है कि 'निश्चित ही उस रोग से उसकी मृत्यु नहीं हुई थी।' इन निष्कर्षों के पीछे से झाँकता परिदृश्य जब सालों से इतना साफ है तो आखिर कब तक हम उनसे अपनी नजरें फेरे रहेंगे? इस चुनौती से सीधे आँखें मिलाकर इससे पार पाने का माद्दा पैदा करने के अलावा कोई विकल्प है नहीं। कम से कम मध्य वर्ग को तो इसे शीघ्रातिशीघ्र समझ ही लेना चाहिए। यदि अपने से इतर किसी 'अन्य' के लिए संवेदित होने के संस्कार हम खो भी बैठे हैं तो भी समझदारी का तकाजा कहता है कि ये पहली और तीसरी दुनिया की मौजूदा संरचना स्थायी तो है नहीं। कमजोर पड़ते मनुष्यों की आबादी तो बढ़ती जा रही है। इसकी चपेट में जाने से खुद को भी कहाँ रोक पाएंगे, अगर अब भी कोई हस्तक्षेप न किया तो। (लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन के साथ ही विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के लिए नियमित लिखती हैं)