जुलाई 2019

बच्चों की मौत के लिए राजनीतिक बुखार जिम्मेदार

अतुल कुमार

मुजफ्फरपुर में 150 से अधिक बच्चों ने अपनी जान गंवा दी है। 'चमकी बुखार' कही जा रही इस बीमारी से मर रहे बच्चों के लिए अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी कोई संवेदना सामने नहीं आई है। उनके बीते कार्यकाल में छत्तीसगढ़ में ऑपरेशन गलत होने से मरी महिलाओं के प्रति भी वे उदासीन थे। पंजाब में आंखों के ऑपरेशन से अंधे हुए लोग भी उन्होंने अनदेखे किये। देश के तमाम हिस्सों में शेल्टर होम्स में अनाथ लड़कियों के बलात्कारों और हत्याओं पर भी वे मौन ही रहे। जिस देश और राज्य में छोटे-छोटे बच्चे किसी बीमारी से दम तोड़ रहे हों,उस देश का प्रधानमंत्री और उस राज्य का मुख्यमंत्री निश्चिंत घूम रहा हो। समझ लीजिये देश कहां जा रहा है।

उत्तर बिहार के नेपाल से लगते जिले मुजफ्फरपुर में प्रति वर्ष बरसात के पहले एक अज्ञात बीमारी से बच्चों के मरने का रिवाज सा बन गया है। आश्चर्य की बात है कि इतना लंबा समय बीत जाने के बावजूद इस बीमारी का कारण तक का पता नहीं चल पाया है। मुजफ्फरपुर में 150 से अधिक बच्चों ने अपनी जान गंवा दी है। मीडिया में अभी भी यह डॉक्टरों की हड़ताल और वर्ल्ड कप की खबरों से पीछे है। मीडिया जितना बता रहा है, उससे ज्यादा छिपा रहा है। जापानी इन्सेफेलाइटिस की बीमारी से जुड़े हर पहलू पर शोध हो चुका है। लेकिन मीडिया और सरकार दोनों लोगों से सच्चाई छिपा रहे हैं। सच्चाई देश की स्वास्थ्य व्यवस्था ही नहीं, सरकारी क्रूरता की पोल खोल देगी। 'चमकी बुखार' कही जा रही इस बीमारी से मर रहे बच्चों के लिए अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी कोई संवेदना सामने नहीं आई है। उनके बीते कार्यकाल में छत्तीसगढ़ में ऑपरेशन गलत होने से मरी महिलाओं के प्रति भी वे उदासीन थे। पंजाब में आंखों के ऑपरेशन से अंधे हुए लोग भी उन्होंने अनदेखे किये। देश के तमाम हिस्सों में शेल्टर होम्स में अनाथ लड़कियों के बलात्कारों और हत्याओं पर भी वे मौन ही रहे। बिहार में उनके सहयोगी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी लगभग उनके जैसा रवैया ही अपना रहे हैं और केंद्र की उपलब्धियों का ढिंढोरा पीट रहे हैं। जिस देश और राज्य में छोटे-छोटे बच्चे किसी बीमारी से दम तोड़ रहे हों, उस देश का प्रधानमंत्री और उस राज्य का मुख्यमंत्री निश्चिंत घूम रहा हो। समझ लीजिये देश कहां जा रहा है। यही हाल महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और कर्नाटक के सूखाग्रस्त गांवों का है। उन गांवों की आपदा को लेकर भी सरकारें गंभीर नहीं हैं। जमीनी हकीकत यह है कि हर समय गरीब की बात करने वाले देश और समाज के ठेकेदारों एजेंडे में गरीब है ही नहीं। आमतौर पर इस बीमारी को मुजफ्फरपुर की लोकप्रिय लीची से जोड़कर देखने की अफवाह भी फैलाई जा रही है। कहा जा रहा है कि कीटनाशकों के उपयोग से लीची जहरीली हो गई जो खाने के बाद बच्चों पर दुष्प्रभाव छोड़ रही है। कुछ लोग लीची भूखे पेट खाने को भी जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। इन कारणों में सच्चाई अगर होगी भी तो रत्तीभर ही। क्योंकि अगर लीची से मौत हो रही हैं तो केवल दलित-गरीब ही क्यों मर रहे हैं। सभी वर्गों के बच्चों में इसका दुष्प्रभाव दिखना चाहिए। खाली पेट लीची खाने का कुछ दुष्प्रभाव होता है, लेकिन इतना भी नहीं कि वह महामारी बन जाए। फिर भी अगर यह सही होता तो छह महीने के बच्चे इस रोग की चपेट में कैसे आ जा रहे हैं? हालांकि, शोधकर्ताओं ने इस फल की भूमिका भी खोज ली है। उनके मुताबिक लीची में एक प्रकार का विष होता है, जो शरीर में ग्लूकोज की मात्रा कम कर देता है। कम पकी लीची में इसकी मात्रा दोगुनी होती है। दिमाग को लगातार ग्लूकोज की जरूरत होती है। बच्चे दिन में ज्यादा लीची खाने के बाद रात का खाना छोड़ देते हैं और यह जानलेवा बन जाता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक रात का खाना नहीं खाने पर संचित ग्लूकोज की मात्रा कम हो जाती है और दिमाग को ग्लूकोज की सप्लाई नहीं मिलती है। कुपोषण से ग्रस्त बच्चों में संचित ग्लूकोज की मात्रा नहीं के बराबर होती है और बच्चे के लिए जानलेवा स्थिति हो जाती है। यह जानकारी डॉक्टरों को है, सरकार को है। अगर किसी को नहीं है तो वे हैं मरीज के अशिक्षित परिवार वाले। इस शोध का सरकार ने क्या उपयोग किया? क्या लोगों में इसकी जागरूकता फैलाई गई? क्या कुपोषण रोकने के कार्यक्रमों के इन क्षेत्रों में क्रियान्वयन की समीक्षा नहीं होनी चाहिए थी? इतने महत्वपूर्ण शोध को मीडिया में प्रचारित करने के बदले बीमारी को लीची से जोड़ कर देखना एक औचित्यहीन और गैर जिम्मेदाराना प्रयास ही कहा जाएगा। इस बीमारी के बारे में सरकारी आंकड़े बताते हैं कि मुजफ्फरपुर के दो अस्पतालों में 150 से अधिक बच्चों की मौत हुई है। लेकिन अनधिकृत तौर पर आंकड़ें इससे दोगुने से भी अधिक बताए जा रहे है। तर्क में दम भी लगता है। अर्थात, जो बच्चे गांवों में झोलाझाप डॉक्टरों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, बिना इलाज या निजी अस्पतालों में मर रहे हैं, उनकी कोई गिनती नहीं हो रही है। सरकार भी इनकी गिनती करना नहीं चाहती। इससे सरकार की फजीहत में कमी रहेगी और घोषित मुआवजे भी कम देने पड़ेंगे। इस जानलेवा रोग के बारे में कहा जा रहा है कि यह रोग नहीं, महामारी है। आश्चर्य की बात है कि वर्षों से यह बीमारी बच्चों की जान ले रही है, लेकिन यह बीमारी है क्या, यह होती क्यों है और इसका इलाज क्या है, अभी तक इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है। एक जानकारी के अनुसार, इस अज्ञात रोग से मरने वाले प्राय: सभी बच्चे दलित और पिछड़े समाज के परिवारों के हैं। शायद इसलिए भी इस मामले में न तो बिहार सरकार और न ही भारत सरकार उतनी तत्पर और संवेदनशील दिखाई दे रही है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि हर वर्ष बरसात के पहले यह जानलेवा बीमारी आती है और बच्चों कीं जान लेती है। अभी तक इस बीमारी का कारण पता नहीं चल पाया है'। इस बीच केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन भी मुजफ्फरपुर आकर औपचारिकता पूरी कर गए हैं। औपचारिकता इसलिए कि 2014 में भी हर्षवर्धन ही स्वास्थ्य मंत्री थे और बच्चों की मौत का जायजा लेने उस वक्त भी मुजफ्फरपुर आए थे। उन्होंने उस समय वादा किया था कि मुजफ्फरपुर अस्पताल में 100 बिस्तरों वाली नई इकाई इस बीमारी के बच्चों के लिए बनाई जाएगी तथा बेहतर इलाज के लिए और भी इंतजाम किए जाएंगे। पांच वर्ष बाद पुन: ये आए और लगभग उन्हीं वादों को फिर दोहराया गए। आश्चर्य इस बात पर भी है कि नीतीश कुमार ने भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्री को उनके द्वारा किए गए वादों का स्मरण कराकर उसे पूरा कराने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। भीषण गर्मी से शुरू होता है इस बीमारी का प्रकोप यह बीमारी मुख्यतः बूढ़ी गंडक के दोनों तरफ के इलाके को प्रभावित कर रही है। असल बात यह है कि प्रभावित बच्चे की उम्र 6 महीने से 10 साल तक की है। ये वे बच्चे हैं जो शाम में आधा पेट खाना खा कर सो जाते हैं और सुबह उठने पर उन्हें उल्टी, दस्त और तेज बुखार के कारण बेहोशी हो जाती है। इस बीमारी का लक्षण 104 डिग्री तक बुखार और बेहोशी बताया गया है। पिछले 10-11 साल से जब भीषण गर्मी पड़ती है तो इस बीमारी का प्रकोप शुरू होता है और मौसम ठंडा होने के बाद ही खत्म1 हो जाता है। बीमारी गरीब बच्चों को ही प्रभावित करती है। चार साल पहले सामाजिक संगठनों के दबाव पर सरकार ने विरोलॉजी रिसर्च सेंटर, पुणे की एक शाखा यहां खोलने की बात कही। पुणे सेंटर से एक टीम भी आई, पर उसकी रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया। सरकार ने तब मृत बच्चों के परिवार को ₹50,000 देने की बात कही, लेकिन यह मुआवजा किसी प्रभावित परिवार को नहीं मिला। इस बार सरकार ने फिर से चार लाख रुपये मुआवजा देने की घोषणा की है। चार साल पहले इस बीमारी से बचाव के लिए जागरूकता फैलाने की कोशिश की गई और उसका असर भी हुआ और बीमारी में कमी आई। लेकिन पिछले साल से जागरुकता कार्यक्रम बंद हो गया, जिसका नतीजा इस साल फिर से दिखाई दे रहा है। बीमारी लाइलाज नहीं, सरकारी लापरवाही लाइलाज है अभावों से जूझते हुए इस देश में भी कई गंभीर शोधकर्ताओं ने भी इस पर काम किया है और पता चला है कि यह बीमारी लाइलाज नहीं है, लाइलाज है सरकार, सरकारी लापरवाही और उदासीनता। इसका जो कारण सामने आ रहा है वह और भी शर्मसार करने वाला है। आज भी बिहार में 40% से अधिक बच्चे कुपोषित हैं और बिहार सरकार का स्वास्थ्य बजट महज 1.4% है। कुपोषण की बीमारी बिहार तक ही सीमित नहीं है पूर्वी उत्तर प्रदेश और गुजरात भी कुपोषण का शिकार है। इनमें अति गरीब दलित परिवारों के बच्चे हैं, जिन्हें कथित भारतीय लोकतंत्र में इंसान का दर्जा ही नहीं प्राप्त। कभी किसी दलित नेता ने भी इनकी आवाज बनना जरूरी नहीं समझा है। इनकी अपनी कोई आवाज नहीं, इनके वोट की भी कीमत नहीं। निष्कर्ष इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सरकार ने इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया। बीमारी के असली कारणों को जानने के लिए शोध होना चाहिए, वह नहीं हुआ। सही से जागरूकता नहीं फैलाया जाना भी बड़ी संख्या में बच्चों के मौत का कारण है। साथ ही यह बीमारी पानी की गुणवत्ता, गर्मी-धूप से बच्चों का बचाव न हो पाना मुख्य कारण है। अगर सरकार समय रहते उचित शोध के साथ रोकथाम के उपाय और इलाज को लेकर गंभीरता दिखाती तो इस हादसे को टाला जा सकता था। इसके साथ ही बिहार में बहुत ही कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था और बड़े पैमाने पर फैले कुपोषण को भी इसका जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। इसलिए मुज़फ़्फ़रपुर की घटना सरकारों द्वारा हर स्तर पर अनदेखी और लापरवाही का नतीजा है। सुझाव अभी बिना देर किए पीएचईडी विभाग सभी जल स्रोतों की जांच कर देखे और रिसर्च करे। मेडिकल और पीएचईडी विभाग संयुक्त रूप से काम करे। हो सकता है कि यह अशुद्ध जल के कारण ही बीमारी फैल रही हो । इस काम में अन्य जल पर कार्य कर रहे लोगों और जानकारों की भी सलाह ली जाए। दुनियाभर में महामारियों का सामना करने में एक दूसरे के साथ सहयोग करने की परंपरा बनी हुई है। अगर अपने देश में इस बीमारी के कारण का पता नहीं चल पा रहा है तो दुनिया के अन्य मुल्कों से इस विषय में सहायता प्राप्त की जा सकती है। दुनियाभर के प्रयोगशालाओं के द्वार इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं के कारण का पता लगाने के लिए खुले रहते हैं। रोग का कारण और निदान की जानकारी के लिए इस क्षेत्र के सर्वोत्तम लोगों को आमंत्रित किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में ग़रीबों के बच्चों की इस महामारी से रक्षा हो सके। अगर ऐहतियाती उपाय पहले से कर लिए जाएं तो आज के विज्ञान के युग में न तो इस तरह की महामारी का दंश समाज को झेलना पड़ेगा और न ही मुख्यमंत्री और सरकारों को मरे हुए बच्चों के लिए मुआवजे की घोषणा करने की नौबत आएगी। लेकिन इन सबके लिए सबसे जरूरी है राजनीतिक संवेदनशीलता और तत्परता, जो अभी किसी स्तर पर नहीं दिख रही। बिना इनके इस तरह की बीमारी हर साल सैकड़ों नौनिहालों को लीलती रहेगी और मीडिया से लेकर सरकार तक हाहाकार मचता रहेगा। आश्वासन की बात यही मानी जाएगी कि सरकार कुछ पैसों की घोषणाएं कर दिया करे। (लेखक समाजवादी जन परिषद से जुडे़ टिप्पणीकार हैं)