जुलाई 2019

विपक्ष की संख्या ही नहीं, हैसियत भी घटी

उर्मिलेश

सत्रहवीं लोकसभा का पहला सत्र शुरू हो चुका है। इस लोकसभा में जहां सत्ता पक्ष का संख्या बल पहले से कहीं ज्यादा भारी है, वहीं विपक्ष पहले की तरह सिमटा हुआ है। इस बार उसका संख्या बल तो कम हुआ ही है, साथ ही कई दिग्गजों के हार जाने से उसकी हैसियत भी घट गई है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी के नेतृत्व वाली सरकार का यह दूसरा कार्यकाल है। इस बार भाजपा के पास 303 सीटें हैं, पहले से भी ज़्यादा। पार्टी को बहुमत या सरकार चलाने के लिए किसी तरह के गठबंधन की ज़रूरत ना तो 2014 में थी और ना ही 2019 में है। पर भाजपा नेतृत्व ने पिछली बार की तरह इस बार भी एनडीए का बैनर बरकरार रखने का फैसला किया। विपक्षी पहले की तरह ही सिमटा हुआ सा है। कांग्रेस की पिछले चुनाव में 44 सीटें थीं, इस बार 52 हैं। तीसरे नंबर पर द्रमुक है, उसे 23 सीटें मिली हैं। चौथे स्थान पर तृणमूल और वाईएसआर कांग्रेस हैं, जिन्हें 22-22 सीटें मिली हैं। समझा जाता है कि वाईएसआर कांग्रेस संसद में अपने आपको विपक्ष के व्यापक दायरे में रखने से परहेज़ करेगी। मतलब ये कि विपक्षी दायरे के सिर्फ़ तीन ही दल हैं, जिनके पास 20 से अधिक सीटें हैं। ये हैं-कांग्रेस, टीएमसी और द्रमुक। वामपंथी खेमा और सिमट गया है। यह उसका ऐतिहासिक पराभव है-भाकपा के खाते में 2 और माकपा के खाते में 3 सीटें आई हैं। इस तरह, सत्रहवीं लोकसभा में सिर्फ विपक्ष की संख्या में ही कटौती नहीं है, विपक्षी-राजनीति की हैसियत भी घटी है। नयी-पुरानी पीढ़ी के कई विपक्षी दिग्गज चुनाव हार गए। पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा, मल्लिकार्जुन खड़गे, मोहम्मद सलीम, ज्योतिरादित्य सिंधिया और धर्मेंद्र यादव हारने वालों में प्रमुख हैं। इस बार ये सदन में नहीं दिखेंगे। यह पहला मौका है, जब संसद के नये सत्र से पहले विपक्ष की कोई साझा बैठक भी नहीं हुई। भारतीय लोकतंत्र के लिए ये लक्षण बहुत शुभ नहीं हैं। सत्र के शुरुआती दो दिन नई लोकसभा के नवनिर्वाचित सदस्यों के शपथ ग्रहण आदि में बीते। 19 जून को लोकसभाध्यक्ष का चुनाव हुआ। इसी सत्र में 5 जुलाई को केंद्रीय बजट भी पेश होना है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 20 जून को संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित कर चुके हैं। संसदीय नियमों और परंपरा के हिसाब से हर आम चुनाव के बाद नवगठित लोकसभा के पहले अधिवेशन के दौरान राष्ट्रपति का संबोधन होता है। फिर उनके अभिभाषण पर संसद के दोनों सदनों में पेश सरकार के धन्यवाद प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा होती है। चुनावी नतीजों से जहां सत्तापक्ष के हौसले बुलंद हैं, वहीं विपक्ष ज़रूरत से ज़्यादा पस्त नज़र आ रहा है। विपक्षी खेमे के सबसे बड़े दल कांग्रेस मे ज्यादा निराशा नज़र आ रही है। पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछले दिनों पार्टी पद से अपने इस्तीफ़े की पेशकश की थी। देश भर के कांग्रेस नेताओं और आम कार्यकर्ताओं ने एक स्वर से राहुल को पार्टी पद पर बने रहने को कहा, लेकिन अभी तक उस बारे में ठोस ऐलान नहीं हुआ है। पिछली लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे इस बार चुनाव हार गए। फिलहाल पार्टी संसदीय दल के नेतृत्व को लेकर एक तरह का खालीपन सा है। सदन में विपक्ष की साझा और कारगर रणनीति के बनाने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी कांग्रेस की है। सदन-पटल पर विपक्ष का बड़ा दल ही अन्य दलों के बीच समन्वय की भूमिका निभाता है। कांग्रेस की तरफ से अभी तक इस मोर्चे पर खामोशी और निष्क्रियता नज़र आ रही है। यह स्थिति समूचे विपक्ष के लिए निराशाजनक है। भारतीय संसद में ऐसे कई मौके देखे गए, जब सदन में विपक्ष ने अपेक्षाकृत अपनी कम संख्या के बावजूद प्रचंड बहुमत वाले सत्ता-पक्ष के लिए समय-समय पर बड़ी चुनौतियां पैदा की हैं। सन् 1984 का उदाहरण हमारे सामने है, जब तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस की लोकसभा में 414 सीटें थीं। उसके पास 12 अन्य लोग भी जुड़े और इस तरह सदन में पार्टी को 426 सदस्यों का समर्थन था। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार के सामने विपक्ष संख्या बल के स्तर पर कुछ भी नहीं था। विपक्षी खेमे में सबसे बड़ी पार्टी तेलुगु देशम को 30 सीटें मिली थीं। भारतीय़ जनता पार्टी के पास महज 2 सीटें थीं। जनता पार्टी के पास 16 और माकपा के पास 23 सीटें थीं। लेकिन विपक्षी के पास कई दमदार नेता थे। वे सरकार को समय-समय पर अपने सवालों से घेरने में लगे रहते थे। कुछ समय बाद ऐसी स्थिति पैदा हुई कि प्रचंड बहुमत वाला सत्ताधारी दल अंदर ही अंदर दरकने लगा। विपक्ष ने उसका भरपूर फायदा उठाया और सन् 1989 के चुनाव में कांग्रेस अपनी सरकार नहीं बना सकी। लेकिन आज विपक्ष संख्या और क्षमता-दोनों ही स्तरों पर विपन्न नजर आ रहा है। सदन में इस बार सरकार 'तीन तलाक़' पर फिर नए सिरे से विधेयक पारित कराने की पहल करेगी। समझा जाता है कि नये विधेयक का प्रारूप पहले वाले विधेयक से अलग नहीं है, जबकि विपक्ष के ज्यादातर दल उसमें संशोधन की मांग उठाते रहे हैं। इस विधेयक पर सत्ताधारी दल का सहयोगी जदयू और नया संभावित सहयोगी-वाईएसआर कांग्रेस भी विपक्ष के साथ जा सकते हैं। लोकसभा में विधेयक आसानी से मंजूर हो जाएगा, पर बहस के दौरान सहयोगियों के आलोचनात्मक तेवर के चलते सरकार की कुछ किरकिरी हो सकती है। विवादास्पद राष्ट्रीय नागरिकता विधेयक पर भी भारी विवाद की संभावना है। विपक्ष अगर सक्षम और सक्रिय हो तो इस सत्र में वित्तीय संकट के सवाल पर भी मोदी सरकार को घेर सकता है। संयोगवश, इस सत्र में बजट भी पेश किया जाना है। निर्मला सीतारमण का यह पहला बजट होगा। जीडीपी और विकास-दर के मौजूदा सरकारी दावों पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। प्रधानमंत्री के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रह्मण्यम जैसे जिम्मेदार और जानकार अर्थशास्त्री ने भी यह सवाल उठाए हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि विपक्ष इस मुद्दे पर क्या-कुछ करता है! इस बार पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह राज्यसभा में नहीं होंगे। उनकी सदस्यता खत्म हो गई। उन्हें तमिलनाडु या किसी अन्य राज्य से फिर राज्यसभा में लाने की तैयारी चल रही है, पर चुनाव होने में अभी देर है। ऐसी स्थिति में संसद के दोनों सदनों में आर्थिक मामलों के डॉ। सिंह जैसे किसी बड़े विपक्षी विशेषज्ञ की कमी भी खलेगी। भाजपा के भी कई दिग्गज-लालकृण आडवाणी, सुषमा स्वराज और मुरली मनोहर जोशी इस बार सदन में नहीं दिखेंगे। विपक्षी खेमे के ज्योतिरादित्य सिंधिया, माकपा के मोहम्मद सलीम और सपा के धर्मेंद्र यादव जैसे सक्रिय सदस्य भी सदन में नहीं होंगे। नवनिर्वाचित अनेक युवा सदस्यों के लिए यह मौका भी होगा कि सदन के कई बेहद गणमान्य पूर्व-सदस्यों की अनुपस्थिति में वह किस तरह अपनी दक्षता का प्रदर्शन करते हैं और देश की संसदीय राजनीति में अपने लिए जगह बनाते हैं! (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)