जुलाई 2019

मोदी की वापसी से लोकतंत्र के सामने नई चुनौतियां

अनिल सिन्हा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव जीत कर वापस सत्ता में आ गए हैं। यह एक ऐसी घटना है, जिसका भारतीय लोकतंत्र पर दूर तक जाने वाला असर होगा। लोगों को भले ही यह ज्यादा बढ़ कर कही गई बात लगे, लेकिन सच है कि भारत की संस्थाएं और राजनीतिक संस्कृति को ऐसी हानि होने वाली है जिसकी कल्पना आजाद देश की नींव रखने वाले हमारे पुरखों ने भी नहीं की होगी। लेकिन क्या देश के राजनीतिक दल और संगठन इस चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने दूसरी पारी की शुरुआत अपनी ही पार्टी पर कब्जा मजबूत करने से की। वैसे वे पिछले पांच सालों में ही पार्टी के सारे दिग्गजों को निबटा चुके थे, इस बार उन्होंने बचे खिलाड़ियों को ठिकाने लगा दिया है। हालात की नजाकत को देखते हुए अरुण जेटली और सुषमा स्वराज ने खराब स्वास्थ्य का बहाना बना कर अपना रास्ता ले लिया। लेकिन मोदी की पिछली सरकार में गृह मंत्री का पद संभालने वाले राजनाथ सिंह इस उम्मीद में डटे रहे कि शायद उन्हें बख्श दिया जाएगा। उन्हें अंत तक पता नहीं था कि उनका मंत्रालय छीना जाने वाला है। कैबिनेट में दूसरे नंबर के मंत्री के रूप में उन्हें शपथ तो दिलाई गई, लेकिन गृह मंत्रालय छीन लिया गया। यह मंत्रालय अमित शाह ने ले लिया। यह साफ है कि अमित शाह दूसरे नंबर पर होंगे। मोदी ने पिछले कार्यकाल में ही सत्ता को अपने हाथों में केंद्रित कर लिया था और विदेश मंत्रालय से रक्षा मंत्रालय तक के सारे फैसले प्रधानमंत्री कार्यालय से हो रहे थे। फिर भी, लोगों के सामने कुछ चेहरे मंत्री के रूप में दिखाई देते थे, जिनकी अपनी राजनीतिक हैसियत थी। अब ऐसे नेता सीन से हटा दिए गए हैं। अब मोदी ही सरकार का चेहरा होंगे और अमित शाह उनके सहायक। यही बात पार्टी पर भी लागू होती है। अमित शाह ने पार्टी का अध्यक्ष पद नहीं छोड़ा है और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया है। पार्टी और सरकार, दोनों उनके हाथ में है। सत्ता का कुछ ऐसा ही केंद्रीकरण इंदिरा गांधी ने किया था जिसका परिणाम इमरजेंसी के रूप में सामने आया था और कांग्रेस एक खानदान की पार्टी के रूप में बदल गई। सवाल उठता है कि मोदी के कार्यकाल में सत्ता का केंद्रीकरण देश को किस ओर ले जाएगा? इस सवाल का जवाब समझने के लिए जरूरी है कि इंदिरा गांधी की ओर से किए गए सत्ता के केंद्रीकरण का उद्देश्य को समझने की कोशिश की जाए। उनका उद्देश्य सिर्फ इतना था कि उनके और परिवार की सत्ता बनी रहे। उन्होंने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए संस्थाओं का इस्तेमाल किया और कुछ मनमानी नियुक्तियां भी की, लेकिन इनके स्वरूप को नहीं बिगाड़ा। लेकिन यहां ऐसा नहीं है। मोदी सुनियोजित तरीके से संस्थाओें को नष्ट कर रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री रह कर विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री का काम संभाला और इन मंत्रालयों की स्वायत्तता खत्म कर दी। सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय जैसी जांच एजेंसियों का विरोधी पक्ष के नेताओं के खिलाफ खुल कर इस्तेमाल किया। सीबीआई मुख्यालय पर पुलिस बल के जरिए कब्जा कराने का काम किया ताकि उसके निदेशक को वहां से आनन-फानन में हटाया जा सके और एक नए निदेशक को बिठाया जा सके। चुनाव आयोग इतना संदेह के घेरे में कभी नहीं रहा जितना इस बार के चुनाव में। गुजरात काडर के आईएएस अधिकारी से मुख्य चुनाव आयुक्त बने सुनील अरोड़ा पर मोदी की मदद के ऐसे आरोप लगे कि आयोग की साख पूरी तरह खत्म हो गई। सुप्रीम कोर्ट भी विवादों से न बच सका। यह भी समझना जरूरी है कि सत्ता में बने रहने के लिए इंदिरा गांधी की ओर से किए गए सत्ता के केंद्रीकरण और मोदी की ओर से हो रहे सत्ता के केंद्रीकरण में बुनियादी अंतर है। इंदिरा किसी बाहरी सत्ता-देशी या विदेशी-के हित में काम नहीं कर रही थीं। मोदी दो बाहरी सत्ता के लिए काम कर रहे हैं। एक सत्ता है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। इसका उद्देश्य हिंदू राष्ट्र बनाना है, जिसमें मुसलमान और ईसाई दूसरे दर्जे के नागरिक होंगे। दूसरी सत्ता है कारपोरेट, जिसमें देशी और विदेशी कंपनियां शामिल हैं। इन दोनों सत्ताओं के लक्ष्यों को पूरा करना तब तक संभव नहीं होगा, जब तक देश की संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थाएं पूरी तरह नष्ट नहीं हो जाती हैं। अगर बैंकों का पैसा कारपोरेट को लूटने देना है तो यह काम आरबीआई को कमजोर किए बगैर नहीं हो सकता है। इसी तरह विश्वविद्यालयों में इतिहास और विज्ञान आरएसएस के दृष्टिकोण से पढ़ाना है तो उसके लिए यूजीसी जैसी संस्थाओं को निकम्मा बनाना जरूरी है। आखिर कोई स्वायत्त संस्था दीनानाथ बत्रा के लिखे इतिहास को पढ़ाने की अनुमति कैसे दे सकती है, जिसका कोई प्रमाण नहीं है और जो मनगढ़ंत बातों को इतिहास मानता है। मुसलमानों या अन्य अल्पसंख्यकों के अधिकार भी तभी छीने जा सकते हैं, जब देश की सारी संस्थाएं बेकार बना दी जाएं। ये संस्थाएं एक सेकुलर और समाजवादी किस्म का समाज बनाने का आश्वासन देने वाले संविधान से पैदा हुई हैं। इन संस्थाओं को तोड़े बिना ये हित साधे नहीं जा सकते हैं। इंदिरा गांधी एक सेकुलर और लोकतांत्रिक परिवेश में पली-बढ़ी थीं और उन्हें संस्थाओं की उपस्थिति को लेकर कोई एतराज नहीं था। एक मर्यादित राजनीतिक स्वार्थ की वजह से उन्होंने इमरजेंसी लगाई थी और उसे खुद हटा भी लिया। वह आसानी से सत्ता से बाहर हो गईं और वापस आने पर फिर उन कानूनों को वापस लाने की कोशिश नहीं की, जो उन्होंने इमरजेंसी के दौरान बनाए थे और जिन्हें जनता पार्टी की सरकार ने खत्म कर दिया था। उनके बेटे राजीव गांधी ने भी संस्थाओं से छेड़छाड़ नहीं की। मनमोहन सिंह के दस साल शासन में रहने के बाद भी गांधी परिवार आसानी से सत्ता से बाहर कर दिया गया और इसे बचाए रखने के लिए उसने कुछ नहीं किया। लेकिन पांच साल सत्ता में रहने के बाद नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने सत्ता में बने रहने के लिए जिस तरह भारतीय राजनीति की सारी परंपराएं तोड़ दीं और सारी मर्यादाओं को लांघ लिया, उसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है। पहली बार हुआ कि देश में चुनाव पर इतना पैसा खर्च हुआ। जिसका हिसाब लगाना मुश्किल है। पहली बार सेना की कार्रवाई का इस्तेमाल चुनावी फायदे के लिए किया गया और राष्ट्रवाद के नकली मुद्दे पर चुनाव लड़ा गया। एक समय था कि चुनाव आयोग मीडिया पर भी नजर रखता था कि वह किसी पार्टी के पक्ष में अपनी ताकत नहीं लगा पाए। एकतरफा रिपोर्टिंग का जवाब देना पड़ता था। इस बार तो पूरे चुनाव के दौरान बिना लाइसेंस वाला नमो टीवी चलता रहा और उसने बंद करने के आदेश को भी नहीं माना। सोशल मीडिया पर निगरानी का वायदा भी आयोग ने किया था, लेकिन उसका इस्तेमाल भी भाजपा ने हजारों करोड़ खर्च कर के किया और आयोग मुंह ताकता रहा। सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने पक्ष और विपक्ष के बदले निष्पक्ष का नारा दिया है। गहराई से देखने पर पता चलता है कि यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक नारा है। लोकतंत्र में राजनीतिक पक्ष और विपक्ष होते हैं। निष्पक्ष रहना है न्यायपालिका और अन्य संस्थाओं को। मंत्रिमंडल के गठन के जरिए जो संकेत उन्होंने दिए हैं, निष्पक्षता का नारा उसी की पुष्टि करता है। वह एक निरंकुश शासन चाहते हैं, जिसमें सिर्फ एक ही पक्ष हो। प्रधानमंत्री मोदी की ओर से पहली सर्वदलीय बैठक विधान सभाओं और लोकसभा चुनाव साथ-साथ कराने के लिए आयोजित की गई। यह भी देश के संघीय ढांचे के खिलाफ है। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग स्थितियां हैं और वहां कभी सरकारें गिर सकती हैं। केंद्र में भी ऐसे मौके आए हैं, जब सरकार गिर गई है। यह एक अलोकतांत्रिक बंदिश होगी कि कार्यकाल पूरा नहीं होने तक सरकारें नहीं बदलेंगी और नए प्रतिनिधि नहीं चुने जाएंगे। देश में लोकतंत्र की रक्षा के आंदोलन के प्रमुख सिपाही जयप्रकाश नारायण और डॉ. राममनोहर लोहिया ने जरूरत पड़ने पर पांच साल के पहले प्रतिनिधि बदलने का नारा दिया था। डॉ. लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करती हैं। जेपी ने कहा था कि प्रतिनिधि वापसी के अधिकार के बगैर लोकतंत्र अधूरा है। मोदी के सांसदों और अमित शाह ने अपने सांप्रदायिक रास्ते पर पहले की तरह चलते रहने के संकेत भी दे दिए हैं। भारत ने क्रिकेट वर्ल्ड कप में जब पाकिस्तान को शिकस्त दी तो गृह मंत्री अमित शाह ने ट्वीट कर इसकी तुलना बालाकोट के सर्जिकल स्ट्राइक से की। यानी पाकिस्तान के नाम पर लोगों को भड़काने का काम जारी रहेगा । यही नहीं, ओवैसी जब सांसद की शपथ ले रहे थे तो जय श्रीराम के नारे लगे और जवाब में ओवैसी ने अल्लाहो अकबर के नारे लगाए। सदन में सांप्रदायिक नारे लगा कर ध्रुवीकरण की राजनीति को जारी रखने के स्पष्ट संकेत मोदी सरकार दे रही है। नागरिकता कानून और तीन तलाक का कानून लाकर सरकार इसको और हवा देगी, यह तय है। इसमें ओवैसी जैसे लोग भाजपा के काम आएंगे, जो मुस्लिम हितों की रक्षा के नाम पर सांप्रदायिकता का माहौल बनाने में भाजपा की मदद करेंगे। सदन में जय श्रीराम और अल्लाहो अकबर के नारे संविधान और संसद की मर्यादा का उल्लंघन हैं। इस लड़ाई में फंसा कर उदारीकरण की उन नीतियों को लागू किया जाएगा, जो अब तक पूरे नहीं किए जा सके हैं। फायदे में चल रही सरकारी कंपनियों के शेयर निजी कंपनियों को दिए जा रहे है और सरकार वालमॉर्ट के आने का रास्ता भी खोलने जा रही है। श्रम कानून और भी मजदूर विरोधी बनने वाले हैं और सरकार के खिलाफ उठने वाली आवाज को दबाने के लिए कानून को सख्त बनाया जाने वाला है। ऐसे राजनीतिक परिदृश्य में विपक्ष कहां है? सच मानिए तो वह नीम बेहोशी में है। यह बेहोशी सिर्फ चुनावी हार के कारण नहीं है, बल्कि संगठन के बिखरने के डर से भी है। देश में वैचारिक शून्यता का यह आलम है कि पश्चिम बंगाल में सीपीएम के काडर भाजपा में जा रहे हैं। आज से दस साल पहले कोई सोच भी नहीं सकता था कि कोई कम्युनिस्ट काडर अपनी पार्टी छोड़ेगा। विचारों की प्रतिबद्धता ऐसी थी कि शहर में एक छोटे से समूह के रूप में सक्रिय कम्युनिस्ट काडर सत्ता पाने की कोई उम्मीद नहीं होने पर भी अपने विचारों को नहीं त्यागते थे। उदारीकरण की अर्थव्यवस्था में कार्यकर्ता भी बिकाऊ माल हैं। पोस्टर और बाकी सामानों की तरह काडर भी बिकते हैं। जब कम्युनिस्ट पार्टी का यह हाल है तो बाकी पार्टियों का क्या होगा? व्यक्तियों या परिवारों के इर्दगिर्द घूमने वाली इन पार्टियों का भाजपा विरोध भी अस्थाई और अवसरवादी है। कांग्रेस और लालू प्रसाद के राजद को छोड़ कर कोई भी पार्टी यह दावा नहीं कर सकती है कि भाजपा उसके लिए स्थायी रूप से अछूत है। वैसे भी कुछ सामुदायिक हितों और सामाजिक समीकरण को छोड़ कर इन पार्टियों के पास कोई वैचारिक राजनीति नहीं है। राहुल गांधी ने सूट-बूट की सरकार का आरोप मोदी सरकार पर लगाया और अपने घोषणा-पत्र में एक नेहरूवादी आर्थिक ढांचे को महत्व दिया, लेकिन उनके साथ मनमोहन सिंह और चिदंबरम जैसे अर्थनीतिकार हैं जिन्होंने मौजूदा आर्थिक नीतियों की नींव रखी है। कांग्रेस से इन नीतियों के विरोध की उम्मीद करना बेकार है। यही हाल बाकी पार्टियों का है। टीडीपी और एनसीपी जैसी पार्टियां तो कारपोरेट को फायदा पहुंचाने में भाजपा से भी आगे हैं। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भी सिर्फ सामाजिक मुद्दों पर ही भाजपा से टकराने का इरादा रखती हैं। आर्थिक मुद्दों पर नहीं। उन्हें तो सीबीआई और ईडी का डर दिखाकर ही काबू में कर लिया जाएगा। कांग्रेस या किसी और विपक्षी पार्टीं से सड़क पर उतरने की उम्मीद करना गलत ही होगा। पहले तो अण्णा हजारे जैसे निर्दलीय लोग नजर आते थे, जिनसे सड़क पर आने की उम्मीद की जा सकती थी। लेकिन आम आदमी पार्टी के निर्माण और अण्णा के व्यक्तिवाद ने इन विकल्पों को भी शक के दायरे में ला दिया। ऐसे में, क्या विकल्प की उम्मीद छोड़ दी जाए? इस मामले में इतिहास पर ही भरोसा करना ठीक होगा। परिस्थितियां नया नेता और नई पार्टी ला देती हैं। इतिहास हमें यही बताता है। हमें भी भारत की लोकतांत्रिक शक्ति में यकीन रखना चाहिए।