जुलाई 2019

विवाह

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

विवाह एक उत्सव है। प्राकृतिक, नैतिक, सामाजिक धर्म है। नव-जीवन नव मार्ग की ओर प्रशस्त कर्म है। कभी दु:ख, तो कभी सुख, कभी कठिन तो कभी सरल, पनघट की डगर है। हकीकत में विवाह सृष्टि की संरचना का प्रेम पर्व है। यह १±१ का २ का गणित नहीं है। वरन् दो जिस्म एक जान के रूप में १ और १ ग्यारह (११) का स्वरूप लेकर सतत् चली आ रही चिर निरंतर १११११११११११११११ की अनंत शृंखला है। एक लेखिका की पुस्तक नाम भूल रहा हूं, बरसों पहले पढ़ा था- ‘‘विवाह देह की देहरी पर सानुष्ठान रख वह स्नेह आधारित सुदीप्त है, जो मानव के पंचकोषमय व्यक्तित्व के नितांत गोपनीय प्रकोष्ठों को आभाषित कर सृष्टि की संरचना करता है।’’ विवाह एक संस्कार है। कालांतर में इसमें धीरे-धीरे रस्म-रिवाज के नाम पर कुरीतियां प्रवेश करती गर्इं। न मालूम किसने और कब लड़की को अभिशाप और लड़के को वरदान बना दिया। घोड़ी, बैंड-बाजा, टीका, मिलनी, सात पेâरे आदि कई तरह की पुरानी परम्पराओं में रस्मों के नाम पर कई तरह के लेन-देन और दहेज की बीमारी प्रवेश कर गई। इससे तनाव इस कदर बढ़े कि विवाह निर्विघ्न हो जाए, इसलिए ना मालूम कितने देवी-देवता की मन्नतें मांगी जाने लगीं। औद्योगीकरण, व्यवसायीकरण से बनी उदार अर्थव्यवस्था ने कभी राजाओं के यहां जैसे विवाह होते थे, वैसे विवाहों की शुरुआत करवा दी। हमारी संस्कृति में भोजन करने के पूर्व हाथ जोड़ते थे, जूठा छोड़ना पाप था, सब विलुप्त हो गया। फिजूलखर्ची और दिखावे ने विवाह की असली खुशी छीन ली। आजकल जो विवाह हो रहे हैं, उनमें अपने-अपने रीति-रिवाजों के साथ देशी-विदेशी संस्कृति प्रवेश कर गई है। संस्कृति देशी हो या विदेशी दोनों ही अपने देश, काल, परिस्थितियों के अनुरूप ढलती, बनती और चलती है। हर दौर में एक नया संदेश देती है और जिन्दगी को खूबसूरत बनाती है। फर्वâयह है कि आप उन्हें अंजाम वैâसे दे रहे हैं। ऊपरी तौर पर हम आधुनिक हो गए, लेकिन दिमाग वही पुरातन है। जब संस्कार समृद्धता के कदमों में घुटने टेक देते हैं, तब विवाह और उससे बन रहे पति-पत्नी, घर-परिवार समाज के रिश्ते दम तोड़ने लगते हैं। स्वागत समारोह पाश्चात्य संस्कृति की देन है। स्वागत समारोह में स्टेज पर वर-वधू जब अपने अभिभावकों के साथ खड़े होकर आमंत्रित अतिथियों से शुभकामनाएं लेते हैं, उस वक्त जो दृश्य उपस्थित होता है, वो विचित्र किन्तु सत्य होता है। विवाह पत्रिका में लिखा होता है कि आकर अनुग्रहित करें। नेता, अधिकारी या विशिष्टजन आकर अनुग्रहित करते हैं। उनके साथ तुरंत बड़े ही आत्मीय भाव से फोटो शूट होता है। इनके अतिरिक्त आने वाले मजबूरी या खुशी से स्टेज पर जाकर लिफाफा देकर घर धनी को अपनी मुंह दिखाई की रस्म अदा कर उपस्थिती दर्ज कराते हैं। अब यह उनकी खुश किस्मती या बदकिस्मती है कि उसका फोटो शूट होता है या उसे मुस्कराकर या निस्तेज भाव से जैसे किसी मॉल में लाइन में खड़े होकर पेमेंट लेते हैं, उस तरह लिफापेâलेकर विदा कर दिया जाता है। हमारे देश में इस तरह के अपमान जिन्दगी के हर हिस्से में मौजूद है। इसलिए जाने-अनजाने में सहन करने की आदत है। हजारों वर्षों की गुलामी से उत्पन्न कु-संस्कार यह सब करवाता है। विवाह की सफलता की ग्यारंटी किसके यहां कितने बड़े वीआईपी, लाल बत्ती वाले आने से होती है। यह उस आदमी की सफलता-असफलता का पैमाना तय करती है। शादी का आयोजक आने वाले मेहमानों, रिश्तेदारों को नहीं, वरन् जिस अधिकारी, मंत्री या मुख्यमंत्री से उसका नाम मात्र का परिचय है, उसका आसमान में नजरें गड़ाए इंतजार करते हुए अपनी असली खुशी गंवा देता है। मंत्री, मुख्यमंत्री आएं यह सम्मान हो सकता है, लेकिन बाकी के लोग धक्के खाएं, यह लोक का अपमान होता है। कहते हैं कि गृहस्थी सबसे कठिन धर्म है। साधु, भोगी बनना आसान है, लेकिन गृहस्थी की पगडंडी हर पल, चौबीसों घंटे ता-उम्र चलने वाली जिन्दगी की सबसे कठिन डगर है। यह इंसान को कमजोर करती है। मोहमाया के बंधन में पंâसाकर घर-परिवार सृजित करती है। घर-परिवार इंसान को स्वार्थ में डुबोता है। यही स्वार्थ परमार्थ के साथ संतुलन बनाकर जीवन की नैय्या पार कराता है। इसलिए विवाह का फलसफा है कि थोड़ा तुम उठ जाओ, थोड़ा हम झुक जाएं। मिलने की सूरत बस यही निकलती है। विकल्पहीनता लोकसभा चुनाव परिणाम २३ मई को गुजरे एक माह से अधिक हो गया है। देश का प्रतिपक्ष केजरीवाल जैसे अपवाद को छोड़ दें तो लकवाग्रस्त है। चुनाव परिणाम के बाद भी कांग्रेस, सपा, बसपा, राजद आदि दल अपने-अपने कारणों से पतन के गर्त में जा रहे हैं। दुर्भाग्य कि वे अभी भी सुधरने को तैयार नहीं है। प्रतिपक्ष कल जिन नरेन्द्र मोदी पर लोकतंत्र में तानाशाही का इल्जाम लगाता था, चुनाव में जीतकर वही मोदी लोकतंत्र की पताका फहरा रहे हैं। प्रतिपक्ष की दिशाहिनता ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी रूकावट बन गई है। यह स्थिति देश हित में ठीक नहीं है। इसे सिर्पâएक घटना से समझा जा सकता है कि २०१८ दिसंबर में ५ राज्यों की विधानसभा चुनाव हारते ही नरेन्द्र मोदी सरकार ने २० से अधिक वस्तुओं पर जीएसटी घटा दी थी। अपने सहयोगी दलों को जिन्हें २०१४ के जीते के गुरुर ने भगा दिया था उनसे माफी मांग दोस्ती कर ली थी। आज पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों ही भाजपा है। जनता की स्थिति जायें तो जाएं कहां, समझेगा कौन यहां दर्द भरे दिल की जुबां की तरह ही बनी हुई है। यूरोप-अमेरिका आदि देशों में सत्ता परिवर्तन पर जीत की खुशी और हार का गम हमारे देश जैसा नहीं होता है। कारण कि सरकार और नेता बदलने पर वहां पर नेता की जिन्दगी पहले की तरह ही ज्यों की त्यों रहती है। हमारे देश में सत्ता से हटते ही सत्तासीन उसकी पार्टी घर परिवार, दोस्त, भागीदार और समर्थकों की जिन्दगी से अवैध पैसा और पावर दोनों चले जाते हैं। बेहतर की उम्मीद से हर नई सरकार आती है लेकिन बेहतर और जनता को बदतर करके चली जाती है। उ.प्र. हो या बिहार बगैर इलाज के मरते बड़े और बच्चे हमारे अधूरे अपरिपक्व लोकतंत्र पर प्रश्न चिन्ह लगाते है। २०१९ लोकसभा चुनाव कांग्रेस का ऐतिहासिक अपराध है। नरेन्द्र मोदी का जीतना और कांग्रेस सहित प्रतिपक्ष का धराशायी होने की वजह कांग्रेस जो देश की प्रतिपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी थी उसका अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना था। यदि राहुल गांधी ने पुलवामा अटैक में ४२ सैनिकों के मरने के बाद पूरे देश में आंदोलन किया होता। भारत के गृहमंत्री से इस्तीफा मांगा होता। यदि राफेल घोटाले पर की जांच की मांग पर दिल्ली के रामलीला मैदान पर सत्याग्रह कर गिरफ्तारी दी होती। यदि बेरोजगारी, किसानों की मौत पर और दलित और अल्पसंख्यकों की पीड़ा सहित कानून व्यवस्था से परेशान जनता की लाचारी पर दो लाठियां भी खाई होती, तो जनता समझ जाती कि इनकी हमारे दर्द में भागीदारी है। शरद यादव ने तीन वर्ष पूर्व साझा विरासत बचाओ सम्मेलन दिल्ली, इंदौर, जयपुर और मुम्बई में करके प्रतिपक्षीय दलों को एकत्रित कर एक सक्षम विकल्प दिया था। जनता का विश्वास अर्जित करने के लिए चुनाव पूर्व निति सिद्धांत आधारित गठबंधन पूरे कार्यक्रम के साथ देश की जनता के बीच में ले जाकर बताना था। लेकिन कांग्रेस को भाजपा की नकली कॉपी बनने का विकल्प पसंद था। पूरे देश के चुनाव परिणाम देखेंगे तो पायेंगे कि सबसे बुरी हार वहीं पर हुई है, जहां पर कांग्रेस थी। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे तीन माह पूर्व जीते विधानसभा चुनाव हवा हो गए। दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तराखंड साफ हो गए। आंध्र, तेलंगाना, उड़ीसा, कर्नाटक भी रपूâहो गए। पंजाब और केरल ने लाज रखी। उत्तरप्रदेश, बिहार में मुलायम-अखिलेश, लालू, तेजस्वी, मायावती की हकीकत को जनता ने पहचाना। इनके परिवारवाद से त्रस्त होकर दलित, पिछड़े तो इनसे पहले ही दूर हो गये थे। इस बार दलितों में बचे कुचे जाटव और पिछड़ों में यादव भी दूर हो गए। उन्होंने समझ लिया कि दलित पिछड़ों के नाम पर ये लोग सत्ता की मलाई सिर्पâअपने घर परिवार को खिलाते हैं। दलित-पिछड़ों को दूध-दही तो क्या छाछ भी नहीं पिलाते हैं। इनके परिवारवाद और प्रधानमंत्री बनने के लिए १०-२० सांसदों के भरोसे प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने की मूर्खता में नरेन्द्र मोदी की वादा खिलाफी और नाकामयाबियां ओझल हो गई। जनता सब जानती है। उसने आज के गौरवशाली मोदी-शाह को लोकसभा चुनाव के पूर्व १० लोकसभा-उपचुनाव हराये थे। बचे कुचे राज्य विधानसभा भी हराए थे। लेकिन जब बात दिल्ली सरकार की आई तब जनता ने बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय दिया। देश में दो ही तरह के वोट थे, एक मोदी पक्ष के, दूसरे विपक्ष के थे। जनता ने देखा कि नेता और दल चुनाव पूर्व ही एक-दूसरे पर हमले कर रहे हैं, वे सरकार बनाकर आपस में लड़ेंगे या देश के दुश्मनों से लड़ेंगे। आतंकवादियों का पाकिस्तान के हमलों का जवाब वैâसे देंगे? जनता यह जानती थी कि मोदी का कोई शुद्ध दूध के दुकान नहीं है, वो यह भी जानती थी कि कांग्रेस और बाकी प्रतिपक्षी दल भी कोई दूध के धुले नहीं हैं। मिलावट दोनों में ही हैं। जो दल सबल प्रतिपक्ष नहीं बन सकता है, जो गांधी की बात करता है और गांधी के सत्याग्रह की अवधारणा से दूर रहता है। वो एक जिम्मेदार सरकार वैâसे बना सकता है। जिसकी उम्र १२५ वर्ष है, जो देश की सबसे बड़ी पार्टी है। जिसकी जिम्मेदारी अन्य छोटे-छोटे प्रतिपक्षी दलों को जोड़ने की है। वो अपने घमंड में उन्हें दूर भगा रही है। अपने पुराने वैभव का याद करते हुए वो भूल रही है कि उसकी इमारत खंडहर बन चुकी है। उसके पास पुराने केन्द्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायकों के रूप में सेनापतियों का एक बड़ा समूह है, लेकिन जनता रूपी सेना को अपनी हठधर्मिता और भोग विलास से दूर भगा दिया है। जनता ने देश काल परिस्थिति के मद्देनजर अपना पैâसला सुना दिया। लोकसभा मेंप्रतिपक्ष के हमलों से कभी सरकारें हिल जाया करती थी। पिछले पांच वर्षों में वो धार धीरे-धीरे कमजोर हुई है। अभी अभी लोकसभा में कांग्रेस के नेता पश्चिमी बंगाल के अधीर रंजन चौधरी ने जो भाषण दिया वो अपरिपक्व और लचर था। रापेâल पर तो कांग्रेस को सांप सूंघ गया। उनका यह कहना कि मोदीजी आप सोनिया जी राहुल जी को जेल नहीं भेज सके उनका बचकानापन था। जो उन पर ही भारी पड़ गया। उन्हें तो मोदी को यह कहना था कि आपने गलत तरीके से जेल भेजने की पहले भी कोशिश की और अभी भी करेंगे। लेकिन हम आपको करने नहीं देगें। मोदी ने उन्हें २५ जून १९७५ का काला अध्याय याद दिला दिया। साथ ही सरकार नहीं वरन न्याय पालिका तय करती है। यह कह कर लोकतंत्र का झंडाबरदार बना दिया। मध्यप्रदेश, राजस्थान में जो सरकारें बनी हैं वे बगैर एक दिन भी धूप में निकले पसीना बहाये सिर्पâमोदी की नोटबंदी, जीएसटी, किसानों की बदहाली और बेरोजगारी से दु:खी जनता द्वारा परिवर्तन के लिए दिए गए वोट की मुश्किल से बनी सरकारें हैं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने सड़कों पर जनता के लिए आंदोलन किए थे, जेल यात्राएं की थी, वहां की कामयाबी बेमिसाल थीं। बघेल के आंदोलन से रमणिंसह जैसे सबसे मजबूत माने जा रहे मुख्यमंत्री को ढेर कर दिया। इसलिए कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सबब और सबक यही है कि वो अपनी जड़ों की और लौट आए। उसे गांधी से जुड़ना होगा। गांधी की सत्याग्रह की अवधारणा के साथ आंदोलन करना होगा। पार्टी अपने आप बन जाएगा।