जून 2019

गांधी और आंबेडकर : कुछ आत्मीय प्रसंग

अव्यक्त

गांधी और आंबेडकर के बीच सत्याग्रह और दलितोद्धार के धरातल पर कई सहमतियों और वैचारिक समानताओं की ओर हमारा ध्यान प्रायः जाता ही नहीं हैं। एक लंबे दौर में इनके लड़ाकू अनुयायियों ने इन दोनों महान शख्सियतों के बीच इतनी दूरियां पैदा कर दी हैं, इतनी दीवारें खड़ी कर दी हैं कि हमें इन दोनों महापुरुषों के बीच के आत्मीय प्रसंगों को को जानकर भी आश्चर्य होता है।

जब गांधी की हत्या हुई थी तो घटनास्थल पर पहुंचने वालों में सबसे पहले व्यक्तियों में भीमराव आंबेडकर ही थे और प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक वे बहुत देर तक वहां रुके थे। हममें से बहुत से लोग इसे शिष्टाचार ही मानेंगे। लेकिन गांधी और आंबेडकर के बीच लगभग 20 वर्षों के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संबंधों की बुनियाद में एक अद्भुत आत्मीयता और आपसी सहानुभूति मौजूद थी, जिस पर शायद ही कभी चर्चा होती है। मतभेदों के बावजूद गांधी की साफगोई और सच्चाई की प्रशंसा आंबेडकर ने एकाधिक अवसरों पर की है। 1935-36 में जब आंबेडकर ने हिन्दू धर्म छोड़ने और सामूहिक धर्मांतरण करने की धमकी दी, तो 4 मार्च, 1936 को गुजरात के सावली गांव के एक कार्यक्रम में जमनालाल बजाज ने इस पर गांधी की राय पूछी। गांधी ने कहा- डॉ. आंबेडकर की जगह अगर मैं होता, तो मुझे भी इतना ही क्रोध आता। उस स्थिति में रहकर शायद मैं अहिंसावादी नहीं बनता। डॉ. आंबेडकर जो कुछ करें हमें नम्रता से सहना चाहिए। इतना ही नहीं, बल्कि हरिजनों की सेवा इसी में है। अगर वे सचमुच हमें जूतों से मारें, तो भी हमें सहन करना चाहिए। …पर उनसे डरना नहीं चाहिए। डॉक्टर आंबेडकर की कदमबोसी करके उन्हें समझाने की भी जरूरत नहीं है। इससे कुसेवा होगी। वे या अन्य हरिजन जो हिन्दू धर्म में विश्वास न रखते हों, वह यदि धर्मांतर करें तो वह भी हमारी शुद्धि का ही कारण होगा। हम इसी योग्य हैं कि हमारे साथ ऐसा व्यवहार हो। इसी तरह जब लाहौर के जाति-पाति तोड़क मंडल मंडल ने जातिप्रथा के अंत पर आंबेडकर को अपना प्रसिद्ध भाषण नहीं पढ़ने दिया था, तो गांधी ने इस घटना पर 11 जुलाई, 1936 को 'हरिजन' में लिखा- ‘‘डॉ. आंबेडकर ने जैसा भाषण तैयार किया था उससे कम की उनसे उम्मीद ही नहीं की जा सकती थी। लेकिन लगता है कि समिति ने एक ऐसे व्यक्ति के मौलिक विचार सुनने से जनता को वंचित कर दिया जिसने समाज में अपना एक अद्वितीय स्थान बना लिया है। भविष्य में चाहे वह कोई भी बाना धारण करें, मगर वे ऐसे आदमी नहीं हैं जिन्हें यह गवारा हो कि लोग उन्हें भूल जाएँ...’’ गांधीजी ने आगे लिखा- ‘...डॉ. आंबेडकर स्वागत समितियों से यों हार जानेवाले नहीं थे। उसके इन्कार के जवाब में उन्होंने उस भाषण को अपने ही खर्चे से प्रकाशित किया है। उन्होंने उसकी कीमत आठ आने रखी है। लेकिन मैं उनसे कहूंगा कि वे उसे घटाकर दो आने या कम से कम चार आने कर दें तो ठीक होगा। यह एक ऐसा भाषण है कि कोई सुधारक इसकी उपेक्षा नहीं कर सकता। रूढ़िग्रस्त लोग भी इसे पढ़कर लाभ ही उठाएंगे।’ इसी तरह 21 मार्च, 1936 के 'हरिजन' में गांधी लिखते हैं- ‘जबसे डॉक्टर आंबेडकर ने धर्म-परिवर्तन की धमकी का बमगोला हिन्दू समाज में फेंका है, उन्हें अपने निश्चय से डिगाने की हरचन्द कोशिशें की जा रही हैं। …हां ऐसे समय में (सवर्ण) सुधारकों को अपना हृदय टटोलना जरूरी है। उसे सोचना चाहिए कि कहीं मेरे या मेरे पड़ोसियों के व्यवहार से दुखी होकर तो ऐसा नहीं किया जा रहा है। …यह तो एक मानी हुई बात है कि अपने को सनातनी कहने वाले हिन्दुओं की एक बड़ी संख्या का व्यवहार ऐसा है, जिससे देशभर के हरिजनों को अत्यधिक असुविधा और खीज होती है। आश्चर्य यही है कि इतने ही हिन्दुओं ने हिन्दू धर्म क्यों छोड़ा, और दूसरों ने भी क्यों नहीं छोड़ दिया? यह तो उनकी प्रशंसनीय वफादारी या हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता ही है, जो उसी धर्म के नाम पर इतनी निर्दयता होते हुए भी लाखों हरिजन उसमें बने हुए हैं।’ लगातार अपने अनुभवों के आधार पर अपने जीवन और विचारों का शोधन करते जानेवाले गांधी ने आंबेडकर से मिलकर भी बहुत कुछ सीखा था। अपने शुरुआती दिनों में अंतर्जातीय विवाह का विरोध करनेवाले गांधी ने बाद में इतना तक प्रण कर लिया था कि वे ऐसी किसी शादी में शरीक नहीं होंगे, जिनमें लड़का या लड़की में से कोई एक दलित न हो। वे ऐसी शादियों का आयोजन अपने आश्रम तक में करवाते थे। 7 जुलाई, 1946 के 'हरिजन' में वे लिखते हैं, ‘यदि मेरा बस चले तो मैं अपने प्रभाव में आनेवाली सभी सवर्ण लड़कियों को चरित्रवान हरिजन युवकों को पति के रूप में चुनने की सलाह दूं।’ गांधी जी के निधन के दो महीने बाद जब स्वयं डॉ. आंबेडकर ने जाति से ब्राह्मण डॉ शारदा कबीर से विवाह किया, तो सरदार पटेल ने उन्हें पत्र में लिखा- ‘मुझे यकीन है कि यदि बापू आज जीवित होते, तो अवश्य ही उन्होंने आपको आशीर्वाद दिया होता।’ अंबेडकर ने जवाब में लिखा, ‘मैं आपकी बात से सहमत हूँ कि यदि बापू जीवित होते, तो इसे अपना आशीष दिया होता।’ राजमोहन गांधी अपनी पुस्तक ‘अंडरस्टैंडिंग दी फाउंडिंग फादर्स’ में लिखते हैं कि आंबेडकर ने अपनी आशंकाओं के उलट यह पाया था कि गांधी के विचार खुद उनसे बहुत मेल खाते थे। इससे आंबेडकर को बड़ा आश्चर्य हुआ था। उनके मुताबिक पूना पैक्ट के तत्काल बाद ही डॉ. आंबेडकर ने गांधी से कहा था, ‘यदि आप अपने आप को केवल दलितों के कल्याण के लिए समर्पित कर दें, तो आप हमारे हीरो बन जाएंगे।’ आंबेडकर की गांधी के प्रति सहृदयता और सम्मान का पता हमें दिसंबर 1927 में महाड़ में ही आयोजित सत्याग्रह परिषद् के आयोजन से चलता है। अंबेडकर की प्रेरणा से आयोजित इस परिषद् के शामियाने में महात्मा गांधी का भी चित्र लगाया गया था। इससे दो वर्ष पहले 1925 में बेलगांव में आयोजित बहिष्कृत परिषद में अंबेडकर ने कहा था, ‘जब कोई भी तुम्हारे निकट नहीं आ रहा है, तब महात्मा गांधी की सहानुभूति कोई छोटी बात नहीं है।’ आंबेडकर और गांधी के बीच सत्याग्रह और दलितोद्धार के धरातल पर इतनी सहमतियों और वैचारिक समानताओं की ओर हमारा ध्यान प्रायः जाता ही नहीं हैं। एक लंबे दौर में इनके लड़ाकू अनुयायियों ने इन दोनों महान शख्सियतों के बीच इतनी दूरियां पैदा कर दी हैं, इतनी दीवारें खड़ी कर दी हैं कि हमें इन सहज और मानवीय तथ्यों को जानकर भी आश्चर्य होता है। क्या हम इन दोनों महापुरुषों के बीच के आत्मीय प्रसंगों को अब भी स्वीकारने के लिए आसानी से तैयार हो पाएंगे? अंतर्मन में पड़ी गांठें क्या इतनी आसानी से खुल पाती हैं? (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और चिंतक हैं)