जून 2019

सरकार के दावों की खुलती कलई

रोहन शर्मा

एंटीगुआ की सरकार ने मेहुल चौकसी को भारत के हवाले करना तो दूर, उसे गिरफ्तार करने से भी इंकार कर दिया है। भारत सरकार के दावों के मुताबिक भारत ने इंटरपोल के जरिए चोकसी को पकडने की कार्रवाई शुरू की थी और इसी सिलसिले में जांच एजेंसियों ने भी एंटीगुआ सरकार पर दबाव बनाया था। लेकिन अब एंटीगुआ ने इंटरपोल को साफ शब्दों में कह दिया है कि वह अपने नागरिक यानी मेहुल चोकसी को गिरफ्तार नहीं करेगा।

पूरे चुनाव अभियान के दौरान सरकार की ओर से पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) घोटाले के आरोपी मेहुल चौकसी को जल्द ही भारत लाने के दावे किए जा रहे थे। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपनी चुनावी रैलियों में मेहुल चोकसी और घोटाले में सहयोगी रहे उसके भानजे नीरव मोदी समेत देश छोडकर भाग चुके इसी तरह के अन्य घोटालेबाजों को भी जल्द ही पकडकर भारत लाने की बात कर रहे थे। लेकिन अब न सिर्फ इन सारे दावों की कलई खुलने लगी है बल्कि सरकार की नीयत में खोट का भी खुलासा हो रहा है। खबर है कि एंटीगुआ की सरकार ने मेहुल चौकसी को भारत के हवाले करना तो दूर, उसे गिरफ्तार करने से भी इंकार कर दिया है। भारत सरकार के दावों के मुताबिक भारत ने इंटरपोल के जरिए चोकसी को पकडने की कार्रवाई शुरू की थी और इसी सिलसिले में जांच एजेंसियों ने भी एंटीगुआ सरकार पर दबाव बनाया था। लेकिन अब एंटीगुआ ने इंटरपोल को साफ शब्दों में कह दिया है कि वह अपने नागरिक यानी मेहुल चोकसी को गिरफ्तार नहीं करेगा। एंटीगुआ की यह दो टुक भारत के लिए किसी झटके से कम नहीं है। एंटीगुआ सरकार के यह तेवर साफ तौर पर इस बात का संकेत है कि भारत सरकार जो चाहे कर ले, मेहुल चोकसी उसके हाथ नहीं आने वाला है। हालांकि यह मानने की कोई वजह नहीं है कि भारत के विदेश मंत्रालय और जांच एजेंसियां को इस बात की जानकारी नहीं होगी कि एंटीगुआ के क्या नियम कायदे हैं। फिर भी सरकार की ओर से देश की जनता को बढ-चढकर यह दिलासा दिया जाता रहा कि चोकसी और उसके जैसे अन्य भगोडें आर्थिक अपराधियों को पकडकर जल्द ही भारत लाया जाएगा। चुनावों के दौरान किए गए सरकार के इस तरह के दावों के निहितार्थों को आसानी से समझा जा सकता है। अगर चुनाव से हटकर भी बात की जाए तो, हकीकत यही है कि सरकार चाहे कितने भी दावे करे, भगोडे आर्थिक अपराधियों का प्रत्यर्पण आसान नहीं होता। एक समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेहद करीबी रहा मेहुल चौकसी और उसका भानजा नीरव मोदी पंजाब नैशनल बैंक को साढे तेरह हजार करोड रुपए का चूना लगाकर भारत से भागे हैं। चोकसी ने एंटीगुआ की नागरिकता दो साल पहले ही ले ली थी। तब वह अदालत से भगोडा घोषित नहीं हुआ था और एंटीगुआ की नागरिकता लेने संबंधी प्रक्रिया में भारत सरकार की ओर से मंजूरी मिलने में उसे कोई दिक्कत नहीं आई थी। इसलिए सवाल तो भारत सरकार की नीयत और उसके तंत्र पर ही उठते हैं। जब पीएनबी घोटाल सामने आने लगा था, तभी चौकसी पर शिकंजा क्यों नहीं कसा गया? नीरव मोदी इस समय ब्रिटेन की जेल में बंद है। उसके मामले की सुनवाई लंदन की एक अदालत कर रही है और सरकार दावा कर रही है कि उसे भी भारत लाने की कोशिश हो रही है। लेकिन जिस तरह मेहुल चोकसी और नीरव मोदी भारत से भागे हैं, उससे तो यही लगता है कि वे भागे नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित बच निकलने का रास्ता दिया गया। इसी तरह विजय माल्या का मामला देखें तो भी आसानी से पता चल जाता है कि सब कुछ सामने होते हुए भी जांच एजेंसियां ने उसे भागने से रोका नहीं। यह हमारी खामख्वाह की खुशफहमी है कि विजय माल्या और नीरव मोदी ब्रिटेन के कानूनी शिकंजे में हैं, जबकि हकीकत यह है कि वे वहां पूरी तरह महफूज हैं और अपने बचाव के लिए कानूनी प्रक्रिया का फायदा उठा रहे हैं। भारत सरकार भी यह बात जानती है कि उन्हें भारत लाना आसान नहीं है। मेहुल चोकसी तो माल्या और मोदी से कहीं ज्यादा सुरक्षित है, क्योंकि अब वह भारत का नहीं बल्कि एंटीगुआ का नागरिक है। उसकी सुरक्षा एंटीगुआ सरकार की जिम्मेदारी है। फिर भारत और एंटीगुआ के बीच प्रत्यर्पण संधि भी नहीं है। ऐसे में वह अपने नागरिक को भारत के हवाल कैसे कर सकता है? कहा जा सकता है कि आर्थिक अपराध करके भागने वालों के प्रत्यर्पण को लेकर सरकार जो चिंता दिखा रही है, वह बेमतलब और सिर्फ दिखावटी ही है। गरमी की मार और सूखे की आहट देश के आम जनजीवन और खासकर कृषि क्षेत्र पर पहले से मंडरा रहे संकट के बादल अब और गहरा गए हैं। हाल के दिनों में बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और तूफान की मार झेल चुके कृषि क्षेत्र को अब एक बार फिर सूखे के संकट से दो-चार होना है। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में तो अभी ही सूखे जैसे हालात बन गए हैं, जबकि पिछले वर्ष इन राज्यों में पर्याप्त से अधिक वर्षा हुई थी। मध्य प्रदेश और राजस्थान के भी कुछ इलाकों से इसी तरह की आ रही खबरों के बीच मौसम वैज्ञानिकों द्वारा आगामी मानसून के कमजोर रहने की दी जा रही चेतावनी भी चिंता बढाने वाली ही है। इस समय देश के कई हिस्से भीषण गरमी की चपेट में हैं। कई शहरों का तापमान 46 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जा रहा है। बढ़ते तापमान का जनजीवन पर गहरा असर पडा है। कई जगहों से जान-माल के नुकसान होने की खबरें आई हैं और कई जगहों पर तो स्कूल बंद कर दिए गए है। दरअसल पिछले कुछ सालों से इस मौसम में यह शिद्दत से महसूस किया जा रहा है कि इस बार गरमी पिछले साल से ज्यादा है। तापमान संबंधी आंकडे भी इस बात की तसदीक करते हैं कि गरमी साल दर साल बढ रही है। मौसम विभाग के अनुसार 1901 के बाद साल 2018 में सबसे ज़्यादा गर्मी पडी थी और इस बार भी अभी से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि इस साल औसत तापमान मे 0.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है। मौसम की जानकारी देने वाली वेबसाइट 'एल डोरैडो' ने पिछले दिनों दुनिया के सबसे गरम जिन 15 इलाकों की सूची जारी की थी, वे सभी जगहें भारत में ही हैं- मध्य भारत और उसके आसपास। सूची में दिए गए 15 नामों में से नौ महाराष्ट्र, तीन मध्य प्रदेश, दो उत्तर प्रदेश और एक तेलंगाना का है। एक सामान्य राय है कि जलवायु परिवर्तन या ग्लोबल वार्मिंग के कारण ऐसा हो रहा है। लेकिन कई विशेषज्ञ मानते हैं कि शहरों में बढते निर्माण कार्यों और उनके बदलते स्वरूप के चलते हवा की गति में कमी आई है। एक राय यह भी है कि तारकोल की सडकें और कंक्रीट की इमारतें उष्मा को अपने भीतर सोखती है और उसे दोपहर और रात में छोडती हैं। बहरहाल बढती गरमी से सीधा जुडा हुआ है पानी का संकट। कुछ राज्यों में अभी से सूखे जैसे हालात पैदा होने की खबरों के साथ ही यह खबर भी संकट सूचक ही है कि पिछले साल यानी 2018 में मॉनसून की स्थिति बेहतर रहने के बावजूद कमोबेश सभी बडे बांधों और अन्य जलाशयों में पिछले वर्ष से 10-15 फीसदी कम पानी है। केंद्रीय जल आयोग द्वारा हाल में जारी आंकडों के मुताबिक देश के 91 बडे जलाशयों में इस वक्त उनकी क्षमता का 25 फीसदी औसत पानी ही उपलब्ध है। दरअसल मार्च से मई तक मॉनसून से पहले होने वाली वर्षा में भी हाल के वर्षों में औसतन 21 प्रतिशत की कमी आई है। भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक उत्तर-पश्चिम भारत में मॉनसून से पहले वाली वर्षा में 37 फीसदी की कमी रही जबकि प्रायद्वीपीय भारत में 39 फीसदी की कमी। हालांकि फोनी तूफान की वजह से हुई वर्षा ने मध्य भारत, पूर्व और पूर्वोत्तर के इलाकों में इस कमी की भरपाई कर दी है। लेकिन अल नीनो की वापसी के अंदेशे से इस बार मॉनसून के कमजोर होने की आशंका मंडरा रही है। हालांकि मौसम का अध्ययन और अनुमान करने वाली एक निजी संस्था 'स्काईमेट वेदर' के मुताबिक मॉनसून अप्रैल में कमजोर होता नजर आया था, पर इसमें फिर मजबूती के लक्षण दिख रहे हैं। जो भी हो, प्रशासन को सतर्क हो जाना चाहिए। कमजोर मानसून और सूखे का संकट किसानों के साथ-साथ उद्योग जगत और देश के आर्थिक प्रबंधकों के लिए भी चिंता पैदा करने वाला है, क्योंकि रोजगार और उपभोक्ता मांग से कृषि क्षेत्र का परस्पर गहरा नाता है। जून में खरीफ की बुवाई शुरू हो जाएगी। देखना होगा कि किसानों बिजली और पानी की आपूर्ति बाधित न हो। इसी तरह भीषण गरमी से जानमाल की क्षति रोकने के लिए भी तमाम जरूरी उपाय किए जाना चाहिए। अमेरिकी फौजों की वापसी का मतलब इराक में तैनात अमेरिकी सैनिकों को पिछले साल दिसंबर में क्रिसमस की मुबारकबाद देने पहुंचे राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि सीरिया और अफगानिस्तान में तैनात अमेरिकी सैनिकों को जल्द ही वापस बुला लिया जाएगा। यह ऐलान करते हुए उन्होंने कहा था कि पुलिस की भूमिका निभाते हुए अमेरिका पूरी दुनिया की रखवाली का ठेका नहीं ले सकता। उनके इस बयान के तीन महीने बाद ही गत मार्च में अमेरिका समर्थित सीरियाई विद्रोही गुटों ने इस्लामिक स्टेट (आईएस) के कब्जे वाले आखिरी इलाके को मुक्त कराने के साथ ही आईएस पर जीत का ऐलान कर दिया था। इस ऐलाने के साथ ही साफ हो गया था कि सीरिया में अमेरिकी सैनिकों की भूमिका अब समाप्त हो गई है। अब राष्ट्रपति ट्रंप ने भी अपनी ओर से सीरिया पर जीत का ऐलान करते हुए वहां से और उसके साथ ही अफगानिस्तान से भी जल्द ही अपने सैनिकों की वापसी के ऐलान को दोहराया है। हालांकि अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का फैसला चौंकाने वाला है, क्योंकि ट्ंरप ने अमेरिका की अफगान नीति में बदलाव करते हुए हाल ही में वहां अपने सैनिकों की नई टुकडी भेजी थी। वैसे दोनों ही देशों से अमेरिकी सैनिकों की वापसी इस अर्थ में सकारात्मक ही कही जाएगी कि इससे सैनिकों और उनके परिवारजनों को राहत मिलेगी। लेकिन यह सवाल बना रहेगा कि अमेरिका ने जिस मकसद से अपने सैनिक वहां भेजे थे, वह कितना पूरा हो सका है? क्योंकि अफगानिस्तान में तो चीजें लगातार उलझती गई हैं। जहां तक सीरिया का सवाल है तो कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि आईएस के जिहादियों के खिलाफ मोर्चा संभाल रहे कुर्दिश लडाके अमेरिकी फौजों की वापसी से अपने को कमजोर महसूस कर सकते हैं। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अमेरिका की वहां कोई खास भूमिका थी ही नहीं। उलटे उस पर आईएस को खडा करने का ही आरोप लगता रहा है। ट्रंप भले ही सीरिया पर जीत का दावा करे, लेकिन अमेरिकी प्रशासन अच्छी तरह समझता कि वह आईएस के लडाकों को मार तो सकता है लेकिन आईएस को खत्म नहीं कर सकता। इसलिए अमेरिकी सैनिकों की वापसी के ऐलान से यह संदेश गया है कि अमेरिका वहां से पिंड छुडाकर निकल भागा है। अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी का संदेश भी इससे अलग नहीं है। अमेरिका ने वहां से अपने सैनिकों की वापसी का फैसला तालिबान के साथ शांति समझौते की कीमत पर किया है। अफगानिस्तान के आधे भू-भाग पर अभी भी तालिबान का ही कब्जा है और अमेरिका उसकी इस ताकत को समझता है। जमीनी हकीकत यह है कि अफगानिस्तान को आतंकवाद से निजात नहीं मिली है, न ही वहां राजनीतिक प्रक्रिया मजबूत हो सकी है। अमेरिका ने तालिबान से बातचीत की कई कोशिशें करके देख ली, लेकिन उनका कोई नतीजा नहीं निकला। अमेरिका के अफगानिस्तान से निकलने की एक वजह रूस भी है, जो न सिर्फ वहां आईएस से लडने में तालिबान की मदद कर रहा है बल्कि वहां शांति स्थापित करने के लिए अपने तरीके से प्रयास भी कर रहा है। इसीलिए अमेरिका ने रूस की मदद से तालिबान को वार्ता के लिए राजी किया और बदले में 17 सालों से वहां जमी अपनी फौज को हटाने का फैसला किया। इस फैसले के मुताबिक अगले कुछ महीनों में वहां मौजूद सभी 14,000 अमेरिकी सैनिक धीरे-धीरे वापस बुला लिए जाएंगे। अमेरिका की कोशिश किसी तरह वहां से निकल जाने की है क्योंकि ट्रंप की आक्रामक नीति का कोई फायदा नहीं हुआ, उलटे तालिबान की ताकत मे जबर्दस्त बढोतरी हुई है और कहा जा रहा है कि देश के 40 से 50 फीसदी हिस्से पर उसका कब्जा हो चुका है। दूसरी तरफ देश का पूर्वी हिस्सा आईएस के कब्जे में आता जा रहा है। जो भी हो, अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का दक्षिण एशिया पर भी गहरा असर पड सकता है। फिलहाल तो अमेरिकी फैसले से भारत की चिंताओं में भी इजाफा किया है। आने वाले दिनों में अफगानिस्तान में अराजकता बढ सकती है, जिससे हमारी परियोजनाएं प्रभावित हो सकती है। इसलिए भारत को सतर्क होकर स्थितियों पर नजर रखनी होगी।