जून 2019

हिंसा की अंधेरी सुरंग

डॉ. रश्मि रावत

देश के विभिन्न भागों से लगातार ये खबरें आई हैं कि बरात नहीं ले जाने दी, घोड़े पर नहीं बैठने दिया, मंदिर जाने से रोका। उत्तराखंड में सवर्णों के साथ कुर्सी पर बैठकर खाना खाने के कारण दलित युवक की इतनी पिटाई कर दी गई कि 9 दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई। हाल ही में लक्जरियस कार खरीदने पर दलित युवक की पिटाई की गई और कार को भी क्षतिग्रस्त कर दिया गया। जाहिर है बात सिर्फ मनुवादी संस्कारों तक ही सीमित नहीं है कि यथास्थितिवादियों को परम्परा का टूटना सहन नहीं हो रहा हो। बल्कि हाशिए के लोगों का विकास ही उन्हें मंजूर नहीं है।

गुजरात, राजस्थान, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश से पिछले दिनों दलित-उत्पीड़न की जिस तरह की खबरें आई हैं, वह राष्ट्रीय शर्म का विषय है। लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत जीने वाले सभ्य समाज के अंदर इस तरह की घटनाएँ कैसे हो सकती हैं? गुजरात के पाँच गाँवों में दलितों को घोड़ी नहीं चढ़ने दिया गया था। गुजरात के अरवल्ली जिले के खामबिसार गाँव के पाटीदार समुदाय के लोगों ने दलित की बरात को रोकने के लिए मुख्य सड़क पर भजन और यज्ञ का आयोजन किया। अगड़ी और प्रभावी जाति की औरतें सड़क पर भजन करने लगीं। औरतें खुद अपने परिवार के पुरुष सदस्यों द्वारा प्रताड़ित की जाती हैं। ऐसी भेदभावमूलक, संकीर्ण सोच वाले परम्परावादी पुरुष स्त्रियों से कैसा सुलूक करते होंगे, समझा जा सकता है। स्त्री-अस्मिता की चेतना भी पिछले चंद वर्षों में खूब फैली है और समाज का हाशियाकृत बहुजन समाज समझ चुका है कि पॉवर ऑफ सीट पर सदियों से बैठे वर्चस्वशाली लोगों की नीयत पर भरोसा नहीं किया जा सकता। स्त्री-समूह संख्याबल में सबसे बड़ा हाशिया संरचित करता है। दमित अस्मिताएँ वंचना और वेदना झेलते जाने के लम्बे अनुभव के कारण एक-दूसरे से जुड़ा हुआ महसूस करती हैं और समझ चुकी हैं कि मुक्ति साथ मिलकर जीने और लड़ने में ही है। ऐसे में सन 2019 में किसी की बरात रोकने के लिए सड़क में बैठ कर भजन-कीर्तन करने के लिए इतनी बड़ी संख्या में औरतें कैसे तैयार हो गईं, इस बात ने भी काफी हैरान और विचलित किया। इन औरतों ने जिन्होंने खुद शोषण झेला है और जो हमेशा अपमानित, उपेक्षित होते रहने की पीड़ा से वाकिफ हैं, के मन में भी दलित जाति के प्रति इतना विद्वेष होना चकित करता है। उन्हें तो उस अपमान की वेदना समझ आनी चाहिए थीं जब किसी के बुनियादी जीवन-अधिकारों को जीने से किसी को रोका जाता है, तो कैसा लगता है। एक मासूम स्त्री दुल्हन बने बरात के इंतजार में है। उसके मान, उसके सपनों की बाधा बनने में हम क्यों साथ दें? इतनी बड़ी संख्या में बैठी औरतों में से किसी के मन में न आया होगा। सवर्ण वर्ग इसी तरह वंचित समुदायों को एक-दूसरे के बरक्स खड़े कर के खुद सत्ता और संसाधन का उपभोग करता रहता है। ऐसा करके दूसरों पर तो अत्याचार करते ही हैं, स्वयं आदमियत से गिरा हुआ उसका आचरण उसे भी इंसानी गरिमा से जीने लायक नहीं छोड़ता। हिंसा उसके स्वभाव का स्वाभाविक हिस्सा बन चुकी है। जाने-अनजाने वह हिंसक व्यवहार से दूसरों को छलनी करता जाता है। वर्चस्वस्थ समूह का अधिकांश हिस्सा सदियों से मिले विशेषाधिकार को बनाए रखने के लिए अधिकाधिक हिंसक होता जा रहा है। संविधान के प्रति उसकी कोई आस्था नजर नहीं आती। ऐसे में लोकतांत्रिक मिजाज के साथ-साथ सामाजिक चेतना समाज में फैलेगी और समानता, स्वतंत्रता के बुनियादी अधिकारों को हर नागरिक जी पाएगा, इसकी उम्मीद तो कम ही दिखती है। ब्राह्मणवादी पाखंड ने धर्म के आवरण में झूठ को सच बनाकर समाज में इतना गहरे बैठा दिया है कि समाज का एक बड़ा हिस्सा सदियों से मूल्यों और नैतिकता के नाम पर हिंसा को जीता है। कानून और संविधान की शिक्षा व्यापक पैमाने पर दिए जाने की सख्त जरूरत है। हालांकि निर्णायक पदों पर बैठे हुए लोगों की नीयत ही अगर समतामूलक समाज बनाने की न हो तो? हाशिए के समुदायों ने जरूर शिक्षा और जागरूकता के बढ़ने के साथ संवैधानिक मूल्यों को अपने जीवन में उतारा है। स्वचेतनता और सामुदायिकता ही हाशिये की, समाज की ताकत है। संविधान के नजर में सब नागरिक बराबर हैं। मगर संविधान को जीवन में उतारने की नीयत सिर्फ हाशिए के समुदायों की है। इसलिए दूसरी ओर से भरोसा छोड़ कर इन समुदायों ने सीख लिया है कि अपनी जागरूकता और संगठन के बल पर ही प्रशासन तंत्र को अपने कल्याण में सक्रिय करने के अलावा और कोई चारा नहीं है। मिल कर दबाव न बनाया जाए तो प्रशासन आँख-कान मूँदे आराम से सोया पड़ा रहता है। इसके अत्यंत भयावह परिणाम हो सकते हैं। शासन-तंत्र को सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने के लिए शक्ति और संसाधनों से लैस किया गया है, लेकिन हिंसक तत्वों में प्रशासन का कोई भी डर क्यों नहीं है? देश के विभिन्न भागों से लगातार ये खबरें आई हैं कि बरात नहीं ले जाने दी, घोड़े पर नहीं बैठने नहीं दिया, मंदिर जाने से रोका। उत्तराखंड में स्वर्णों के साथ कुर्सी पर बैठकर खाना खाने के कारण दलित युवक की इतनी पिटाई कर दी गई कि 9 दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई। हाल ही में लक्जरियस कार खरीदने पर दलित युवक की पिटाई की गई और कार को भी क्षतिग्रस्त कर दिया गया। जाहिर है बात सिर्फ मनुवादी संस्कारों तक ही सीमित नहीं है कि यथास्थितिवादियों को परम्परा का टूटना नहीं सहन नहीं हो रहा हो, बल्कि हाशिए के लोगों का विकास ही उन्हें मंजूर नहीं है। वर्चस्व को बनाए रखने की मंशा से भी दलितों की बढ़ती शक्ति और सामर्थ्य के साथ उन पर हिंसा उग्रतर होती जा रही है। 26 अप्रैल को अलवर में इतना जघन्य अपराध दलित दम्पति के प्रति किया गया कि उसके विषय में पढ़ने और उस पर लिखने में भी हाथ काँप रहे। सहने वाले ने कैसे यह सब सहा होगा। यह कैसा समाज बनाया है हमने? पाँच अपराधियों ने मोटर साईकिल सवार दलित दम्पत्ति का पीछा किया फिर सुनसान जगह पर बाइक से उन्हें गिरा कर हिंसक तरीके से उनके कपड़े फाड़ डाले, उनके पैसे छीन लिए, उन्हें खूब मारा और 21 वर्षीय युवा पति के सामने 19 साल की पत्नी का लगातार 3 घंटे तक बलात्कार करते रहे। ऐसा करते हुए उनके चेहरे पर कोई शर्म नहीं थी। हँसते हुए वे ये काम कर रहे थे। शर्मसार करने के लिए ये ही हद से ज्यादा था। पर उन आरोपियों ने बेशर्मी की सब सीमाएँ पार कर दीं। अपने इस कुकर्म की तस्वीरें लीं और 11 वीडियो बनाई। कितना वीभत्स काम उन्होंने किया है। घटना के दौरान और बाद के कई दिनों में भी इसका लेशमात्र भी एहसास न होना हैरान और शर्मिंदा करता है। अपराधी खुलेआम गाँव में घूमते रहे और आयोजन में शरीक हुए। उन्हें किसी का कोई डर नहीं था। उलटे वे लगातार पीड़ित पति को फोन करके उनसे 10 हजार रुपए माँग रहे थे और धमकी दे रहे थे कि न देने पर वीडियो पब्लिक में अपलोड कर देंगे। अगर पीड़िता उसकी पत्नी न हो तो वे चाहते थे कि उसे दोबारा उनके पास भेजा जाए वरना वे वीडियो अपलोड कर देंगे। अपराधियों का मनोविज्ञान खौफनाक निष्कर्षों की ओर ले जाता है। दम्पति को पकड़ कर पहले उनकी जाति पूछना। फिर उन्हें जाति के नाम पर नीचा दिखाना, गाली देना और उन्हें समाज की कमजोर कड़ी समझ कर आसान शिकार समझना। फिर बार-बार ये जानने की कोशिश करना कि वे दोनों विवाहित हैं या नहीं। पहले जातिगत तौर पर कमजोर को चिह्नित कर दलित को हिंसा का निशाना बनाना, फिर दलितों में भी और अधिक नीचे की पायदान पर अवस्थित स्त्रियों पर और अधिक अत्याचार करना और अगर स्त्री को विवाह संस्था की भी वैधता न मिली हुई होती तो उनके लिए वे और अधिक नर्मचारा थी। उनकी सोच ये थी कि अगर पीड़िता इसकी पत्नी नहीं होगी तो पति आसानी से उसे दोबारा भेज देगा। किस समाज से उनके भीतर ऐसी घोर अमानवीयता के बीज पड़े होंगे कि जाति, वर्ग, लिंग, सामाजिक वैधता के आधार पर कमजोर कड़ी खोजना और उसे अपनी कुत्सा का शिकार मानना। अपनी सुरक्षा के प्रति इतना भरोसा उन्हें कैसे था कि वे खुले आम विचरेंगे, ब्लैकमेल करेंगे, वीडियो अपलोड करेंगे और उन पर कोई आँच नहीं आएगी? उनकी ये सोच प्रशासन और समाज के लिए कितना बड़ा कलंक है। यूँ तो अपराधी अपराधी होता है। उसकी कोई जाति नहीं होती। मगर इन गुंडों के भीतर की हिंसा जाति के जिक्र के साथ प्रचंड हुई तो स्थिति को जाति की पहचान के साथ ही समझना होगा। वे पाँचों आरोपी गूजर समुदाय के थे। यूँ वे भी बहुजन समाज के अंतर्गत शामिल हैं। अपने से कमजोर कड़ी खोज कर उसका शोषण करने की प्रवृत्ति इस कदर बढ़ गई है कि खौफ पैदा होता है। मीणा समुदाय द्वारा दलितों पर हिंसा की भी खबरें आई थीं। बिना किसी डर के अपने अपराध को जनता के बीच वायरल करने के आत्मविश्वास के पीछे समाज एवं प्रशासन को अपने साथ समझने के अलावा और भला क्या हो सकता है? बताया जाता है कि भाजपा के एक स्थानीय नेता का समर्थन इन्हें प्राप्त था और पुलिस ने तो कार्रवाई में परले दर्जे की लापरवाही और ढीलापन दिखाया ही। इसका कारण जातिगत, वर्गगत भेदभाव करने का पुलिसिया रवैया तो है ही। चुनावी माहौल में अपराधियों का अतिरिक्त सक्रिय हो जाना भी चिंताजनक है। पुलिस फोर्स चुनाव करवाने और नेताओं की सुरक्षा में व्यस्त था और जनता इतनी बुरी तरह हिंसा झेल रही थी। 26 अप्रैल को घटना हुई। 29 अप्रैल पीड़ित शिकायत दर्ज करवाने थाने पहुँचे मगर एफ.आई.आर हुई है 2 मई को। 29 अप्रैल को पुलिस को वीडियो वायरल की धमकी का पता था, फिर भी पुलिस ने समय पर एक्शन नहीं लिया, जबकि आरोपियों के सम्पर्क नम्बर और उनकी स्थान-विशेष में होने की सारी सूचनाएँ पीड़ित पक्ष ने पुलिस को मुहैया करवा दी थीं। 4 मई से पहले पुलिस एक्शन ले लेती तो 4 मई को वीडियो वायरल होने से बच जाता। पीड़ितों व उनके परिजनों को अतिरिक्त वेदना न झेलनी पड़ती। पीड़िता की माँ तो चंद सेकंड की वीडियो देख कर ही बेहोश हो गई थी। पुलिस की निष्क्रियता के अलावा राजनीतिज्ञों ने भी इतनी बड़ी वेदना को सियासी सवाल बना दिया। पीड़िता को दिल दहलाऊ दुर्घटना के बाद नेताओं-ऱाजनेताओं-मीडिया-सामाजिक संगठनों इत्यादि से मिल कर कई-कई बार घटना को दोबारा जीना पड़ा। एक ओर प्रदेश में शासनरत कांग्रेस ने चुनाव तक मुद्दे को दबा कर असंवेदनशीलता का परिचय दिया। दूसरी ओर इस घटना पर भाजपा का रोष और अतिरिक्त सक्रियता देखते ही बनती थी। जो कठुआ में बलात्कारियों को बचाने तक में मुस्तैद थी। स्त्री के शरीर के साथ इतनी बुरी हिंसा अत्यधिक संवेदनशील मुद्दा है। इसे भरपूर संवेदनात्मक, मानवीय ढंग से ही लिया जाना चाहिए, मगर इतने महत्वपूर्ण विषय को जाति, वर्ग, राजनीति के सवालों से जोड़ कर देखा जाता है। अगर पीड़िता किसी दबंग समुदाय से होती तो शायद इंसाफ मिलने में इतना समय न लगता। भीम आर्मी समेत तमाम दलित संगठन और बहुजन समाज अगर सड़कों में न उमड़ पड़ता तो प्रशासन और देर से सक्रिय होता और तब लापरवाही के जिम्मेदार पुलिस वालों पर निलंबन और अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाई भी शायद न होती। इस मुद्दे पर सवर्ण लोगों ने उस तरह से साथ नहीं दिया जैसे निर्भया के केस में दिया था। उनकी संवेदना कितनी सेलेक्टिव है। इस बात को भी तीखा रोष बहुजन समाज में उमड़ा और अपराधियों के लिए फाँसी की सजा, लिंग काटने जैसे कई हिंसात्मक सुझाव आए। वर्चस्वशाली वर्ग संविधान की अवहेलना करता है। बहुजन समाज ही संवैधानिक मूल्यों को जीता है और संविधान प्रदत्त अधिकारों के बल पर अपना विकास करता है। अब भी यदि सामाजिक चेतना न फैली और प्रशासन समान बर्ताव की ओर सक्रिय न हुआ तो लोकतंत्र का बने रहना नामुमकिन ही लगता है। मध्यकालीन कबीलाई भाषा और मुद्रा में दोनों ओर से उग्र हिंसात्मक क्रिया-प्रतिक्रिया दिखाई दे रही है। आज के समय जब समाज संविधानसम्मत ढंग से अन्याय का निराकरण करने की ओर अग्रसर है और 'आँख के बदले आँख' वाले प्रतिकारात्मक दंड विधान बीते जमाने की चीज हो चले हैं। फाँसी की सजा का प्रावधान भी अधिकतर देशों में खत्म हो गया है। भारत भी उस ओर बढ़ रहा है। अब भी विषमता की हिंसा खत्म करके शासन-व्यवस्था सुदृढ़ नहीं की तो जाने-अनजाने हम हिंसा आधारित कबीलाई समाज की ओर ही बढ़ते चले जाएँगे। समाज और प्रशासन के प्रतिकूल रवैये के कारण बहुजन समाज का भी संविधान और कानून से भरोसा टूट गया तो, क्या होगा। क्या हम यह नहीं समझ सकते? (लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन के साथ ही विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लिखती हैं)