जून 2019

डॉ. पायल की आत्महत्या में छुपा खतरनाक संकेत

मीनू जैन

आम चुनाव के नतीजे आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के केंद्रीय कक्ष में अपने गठबंधन के सांसदों को और प्रकारांतर से देश-दुनिया को संबोधित करते हुए दावा किया कि इस चुनाव के जरिए भारत में जाति और धर्म की दीवारें टूट चुकी है, लेकिन मुंबई में मेडिकल की पढाई कर रहीं डॉ. पायल तडवी का आत्महत्या करना बताता है कि हाल के वर्षों में जाति-धर्म की दीवारें गिरने के बजाय न सिर्फ मजबूत हुई हैं बल्कि ऊंची भी उठी हैं। मुस्लिम भील समुदाय की डॉ. पायल को भी लगभग उन्हीं हालात में आत्महत्या करने जैसा कदम उठाना पडा है, जिन हालात में चार साल पहले हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली थी। पायल तडवी की आत्महत्या प्रधानमंत्री मोदी के 'सबका साथ सबका विश्वास' के उदघोष को ही चुनौती नहीं है, बल्कि हमारे सभ्य समाज के तेजी से असभ्य होते जाने का भी संकेत है।

सबका साथ, सबका विश्वास और सबका विकास' के लोकलुभावन उदघोष के साथ दूसरी बार देश की सत्ता की बागडोर संभाल चुकी मोदी सरकार यदि वास्तव में इस देश के अल्पसंख्यकों का भरोसा जीतना चाहती है तो उसे तुरंत प्रभाव से सवर्णों और खासकर अपने समर्थकों में गहरे तक जमी सांप्रदायिक नफरत और उससे जुडी हिंसा के मामलों को अपराध की श्रेणी में लाना होगा। पिछले एक सप्ताह से देश का मेनस्ट्रीम मीडिया मुंबई के टीएन टोपीवाला नेशनल मेडिकल कॉलेज की रेजिडेंट डॉक्टर पायल तडवी की आत्महत्या को किसी 'अघोषित एजेंडा' के तहत जातिगत विद्वेष का रंग देकर उसे महज सवर्णों के आरक्षण–विरोध से उपजे असंतोष व गुस्से का मामला साबित करने में जुटा हुआ है. जबकि सच्चाई यह है कि डॉक्टर पायल तडवी भील आदिवासी मुस्लिम थीं. पायल के माता–पिता आबिदा और सलीम तडवी जलगांव जिला परिषद में सेवारत हैं. उनके पति डॉक्टर सलमान तडवी मुंबई के आरएन कूपर अस्पताल में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं. डॉक्टर पायल टोपीवाला मेडिकल कॉलेज से पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही थीं और द्वितीय वर्ष में थीं. वह महाराष्ट्र राज्य के जलगांव जिले के उस आदिवासी भील समुदाय से आती हैं, जिसके तकरीबन 2.07% सदस्य इस्लाम धर्म के अनुयायी हैं (स्रोत: http://censusindia.gov.in/Tables_Published/SCST/dh_st_maha.pdf). भारत के आदिवासी मुसलमानों में एक बड़ी आबादी भीलों की हैं जो महाराष्ट्र में बसती है. मध्यकाल में फारुकी वंश के राज में इस इलाके की एक बड़ी भील आबादी ने इस्लाम को अंगीकार कर लिया था. बताया जाता है कि पिछले कई दशकों से हिंदुत्ववादी संगठन इस समुदाय की 'घरवापसी' के प्रयासों में जुटे हुए हैं. यह सच है कि अपनी तीन सीनियर सवर्ण डाक्टरों, अंकिता खंडेलवाल, भक्ति मेहरा और हेमा आहूजा, के द्वारा निरंतर अपमान और उत्पीडन से त्रस्त होकर अंतत: 22 मई, 2019 को पायल तडवी ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. उन तीनों सीनियर्स ने केवल व्यक्तिगत रूप से बल्कि सोशल मीडिया पर भी पायल के खिलाफ जातिसूचक अभद्र बातें लिखने से परहेज़ नहीं किया. रिपोर्ट के अनुसार कॉलेज प्रशासन से उत्पीड़न की शिकायत के बाद ये तीनों सवर्ण डॉक्टर पायल को ऑपरेशन थियेटर में प्रवेश नहीं करने देती थीं और प्रसव और सर्जरी के लिए प्रथम वर्ष की छात्राओं की मदद लेती थी जबकि उनसे वरिष्ठ द्वीतीय वर्ष की छात्रा पायल वहां मौजूद रहती थी. वे तीनों उसके लिए खुलेआम जाति व धर्मसूचक अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करती थीं. इन तीनों डॉक्टरों द्वारा पायल की आदिवासी पृष्ठभूमि को लेकर अभद्र टिप्पणियों और मानसिक उत्पीडन की शिकायत उसने उच्च अधिकारियों से की थी. परन्तु अधिकारियों ने सुनकर भी अनसुना कर दिया. जब मामला दलितों, आदिवासियों या अल्पसंख्यकों का हो तो उसकी सुनवाई होगी भी या नहीं, इस पर संशय के बादल मंडराते रहते हैं. धर्म और जाति के कीचड़ में आकंठ डूबे समाज में यह कोई नई बात नहीं है. यह उन स्वर्ण हिन्दू महिलाओं के दिलोदिमाग में उबलती साम्प्रदायिक नफ़रत की एक बानगी है जो अभी तक नफरत की राजनीति का सक्रिय हिस्सा नहीं थीं. अब स्वर्ण हिन्दू महिलाओं के मध्य कट्टरवादी पहचान के साथ एक ऐसे उच्च शिक्षित वर्ग का उदय हुआ है जो 'विधर्मियों को आतंकित, अपमानित और प्रताड़ित करना अपना विशेषाधिकार समझता है. डॉक्टर पायल के साथ इनका घृणित व्यवहार इनकी कट्टरपंथी सोच को बेनक़ाब करता है. नि:संदेह यह देश की सामाजिक एवं धार्मिक समरसता के लिए खतरे की घंटी है. इस मामले को आरक्षण विरोधी मानसिकता के चश्मे से देखने वालों की जानकारी के लिए बता दें कि संविधान के अनुसार अनुसूचित जनजाति के लोग चाहे किसी भी धर्म का पालन करते हों, उन्हें बिना शर्त आरक्षण का अधिकार प्राप्त है. 26 साल की डॉक्टर तडवी स्त्रीरोग विशेषग्य थी. महाराष्ट्र के गढ़चिरोली आदिवासी इलाकों में चिकित्सक के रूप में सेवाएं दे चुकी थी और अब मुंबई के टोपीवाला मेडिकल कॉलेज से पोस्ट-ग्रेजुएट कोर्स कर रही थी. समाज की मुख्यधारा में हाशिए पर पड़े हुए अपने आदिवासी समाज की वह पहली महिला डोक्टर थीं. आदिवासियों के प्रति प्रच्छन्न जुगुप्सा के चलते इस मुकाम तक पहुचने में पायल को किन पथरीले रास्तों से गुजरना पडेगा होगा इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है. इस समूचे प्रकरण की तह में जाएं तो 'इस्लामोफोबिया' से उपजी सवर्ण हिन्दू नफरत का स्याह चेहरा साफ़ तौर पर उजागर होता है. पायल का आदिवासी मुस्लिम होना उसकी जान का दुश्मन बन गया. पायल तडवी को कथित रूप से मानसिक प्रताड़ना देने वाली तीनों आरोपी डॉक्टर को साम्प्रदायिक नफरत को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने के जुर्म में कड़ी से कड़ी सजा सुनाई जाए ताकि भविष्य में सामाजिक ताने–बाने को तार–तार करने की कुत्सित साजिशों पर लगाम लगाईं जा सके. आदिवासी समुदायों के मध्य शिक्षा को लेकर आ रही जागृति को उसके शैशवकाल में कुचल देने का यह एक षड्यंत्र है ताकि विरोध के स्वर को नेस्तनाबूद करके उनके जल–जंगल और जमीन पर कब्ज़ा जमाया जा सके. दलितों, आदिवासियों और अल्प संख्यकों के प्रति घृणा का जो माहौल तैयार कर दिया गया है उसके चलते इन समुदायों के प्रति नफरत की हिंसा के मामलों में पिछले सालों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है. डॉक्टर पायल की आत्महत्या की जड़ में सवर्णों की सांप्रदायिक नफरत ही है. उन्हें यह बात बर्दाश नहीं कि आत्मविश्वास और योग्यता से लबरेज़ कोई दलित या मुस्लिम छात्र उनकी बराबरी करे. इस सारे प्रकरण का एक और अत्यंत खौफ़नाक पहलू जो उभरकर सामने आया है वह है बहुसंख्यकों द्वारा दलितों व अल्प संख्यकों की एक नए प्रकार की लिंचिंग! इसे 'मानसिक लिंचिंग' की संज्ञा दी जा सकती है. एक ऐसी प्रताड़ना जिसमें शारीरिक के बजाए शाब्दिक हिंसा के माध्यम से शिकार के मनोबल और आत्म सम्मान को इतना लहूलुहान कर दो कि उसके सामने आत्महत्या के अलावा और कोई विकल्प ही न रह जाए. यह एक राष्ट्रीय चिंता का विषय होना चाहिए कि नफरत और कट्टरवाद की दीमक देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में लग चुकी है. विभिन्न संस्थानों में तेजी से फलते–फूलते सवर्णवाद के तहत पहले तो कोशिश यही की जाती है कि इन तबकों के छात्र–छात्राएं यहाँ दाखिला न ले पाएं और यदि फिर भी संवैधानिक प्रावधानों के चलते वे दाखिला पाने में सफल हो जाते हैं तो उनको तरह – तरह से इस कदर प्रताड़ित और अपमानित किया जाता है कि वे अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर चले जाते हैं. पायल जैसे गिने–चुने हिम्मती फिर भी डटे रहते हैं उन्हें इस उम्मीद में तब तक प्रताड़ित किया जाता है जब तक वे खुद ही मैदान छोड़ने के लिए मजबूर नहीं हो जाते. रोहित वेमुला के बाद पायल तडवी भी इसी सवर्ण साजिश का शिकार हुई है. सड़क चलते लोगों से उनका नाम पूछकर उनके धर्म का पता लगाना और गैर– हिन्दू होने पर उनके साथ शारीरिक हिंसा करना इस नए किस्म की मॉब लिंचिंग का एक बिलकुल नया पहलू है. अब उन्मादी भीड़ के हाथों मारे जाने के लिए आपका गौमांस व्यापारी होना जरूरी नहीं है. यदि आप गैर-हिन्दू विद्यार्थी हैं तो भी आप इन ताकतों के निशाने पर हैं. शिक्षा संस्थानों को नफरत की राजनीति का अड्डा बनने से रोकें अन्यथा एक देश के रूप में भारत की उस संकल्पना की नींव ढह जाएगी जिस पर यह सर्वसमावेशी देश युगों से खड़ा हुआ है. (लेखिका डिग्निटी डॉयलॉग की पूर्व संपादक हैं। देहरादून में रहती हैं)