जून 2019

नीतीश कुमार की इस पैंतरेबाजी का क्या मतलब

मणिकांत ठाकुर

नीतीश कुमार के जेडीयू मोदी सरकार का हिस्सा बनने से उस समय नाटकीय इंकार क्यों, जब शपथ ग्रहण में कुछ ही मिनट शेष रह गये थे? इस तरह का इंकार किसी बड़ी चुभन वाली नाराज़गी, या अंदरूनी दलगत विवशता के बिना हो सकता है क्या? ख़ुद नीतीश भी बोल गये कि सरकार में ऐसी सिम्बॉलिक भागीदारी का कोई मतलब नहीं है. तो फिर बेमतलब बातचीत इतनी लंबी क्यों चली कि खाने के समय परोसी हुई थाली वापस खींच लेनी पड़ी?

नवगठित मोदी मंत्रिमंडल में जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के शामिल नहीं होने की चौंकाने वाली ख़बर ठीक शपथ ग्रहण के वक़्त ऐसे टपकी, जैसे भोजन के लिए परोसी हुई थाली में अचानक कोई मक्खी गिर जाए. बीजेपी के जश्नकाल में जेडीयू का ऐसा स्वाद-बिगाड़ने वाला रुख़ सामने क्यों आया, इस पर तरह-तरह की बातें होने लगी हैं. विपक्षी नेताओं ने इसे 'प्रथम ग्रासे मक्षिका पात' कहना शुरू कर दिया है. ऐसा मौक़ा उन्हें मुश्किल से हाथ लगा है. जेडीयू के अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस बाबत मीडिया को पहली जानकारी देते हुए जितना बताया, उससे ज़्यादा छिपाया. उन्होंने कहा कि बीजेपी नेतृत्व ने अन्य सहयोगी दलों की तरह जेडीयू को भी मात्र एक मंत्री-पद देकर मंत्रिमंडल में सांकेतिक हिस्सेदारी का जो प्रस्ताव दिया था, वह उनकी पार्टी को मंज़ूर नहीं हुआ. नीतीश कुमार ने ये भी जोड़ा कि इस कारण कोई नाराज़गी नहीं है और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) या मोदी सरकार के साथ जेडीयू मज़बूती से जुड़ा रहेगा. यहीं सवाल उठता है कि तब मोदी सरकार का हिस्सा बनने से उस समय नाटकीय इंकार क्यों, जब शपथ ग्रहण में कुछ ही मिनट शेष रह गये थे? इस तरह का इंकार किसी बड़ी चुभन वाली नाराज़गी, या अंदरूनी दलगत विवशता के बिना हो सकता है क्या? ख़ुद नीतीश भी बोल गये कि सरकार में ऐसी सिम्बॉलिक भागीदारी का कोई मतलब नहीं है. तो फिर बेमतलब बातचीत इतनी लंबी क्यों चली कि खाने के समय परोसी हुई थाली वापस खींच लेनी पड़ी ? ज़ाहिर है कि असली वजह छिपाने के लिए नक़ली वजह तब गढ़नी पड़ती है, जब सियासी नफ़ा-नुक़सान की समझ देर से आयी हो. जेडीयू ख़ेमे से ही इस ख़बर को हवा मिली थी कि पार्टी के राज्यसभा सदस्य राम चंद्र प्रसाद सिंह (आरसीपी) और नवनिर्वाचित सांसद राजीव रंजन उर्फ़ ललन सिंह केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल होने जा रहे हैं. दोनों नीतीश कुमार के बेहद क़रीबी और विश्वस्त माने जाते हैं. आरसीपी तो नीतीश के स्वजातीय (कुर्मी) भी हैं और ललन सिंह भूमिहार समाज से आते हैं. अति पिछड़ी जातियों से जो इसबार जेडीयू के सांसद चुने गए हैं, उनकी भी उम्मीद भरी नज़र नीतीश पर लगी हुई थी. जातीय समीकरण वाली सियासत चला रहे नेताओं की एक बड़ी मुश्किल यह भी है कि मौक़ा सीमित होने पर किसी एक को ख़ुश करना, दूसरे की नाराज़गी का सबब बन जाता है. जेडीयू ने चाहा यही था कि मोदी सरकार में दो कैबिनेट मंत्री और एक राज्यमंत्री पद मिल जाए, ताकि जातीय संतुलन बिठाया जा सके. लेकिन बहुमत की बुलंदी छू लेने वाली बीजेपी से इतनी अतिशय उदारता की ज़िद तो नीतीश कुमार कर भी नहीं सकते थे. इसलिए उन्होंने अपने दल के भीतर जातीय द्वंद्व जैसी आग सुलगने की आशंका से बचने के लिए अंतत: मोदी सरकार का अंग बनने से मना कर दिया. ख़ासकर इसलिए भी कि बिहार विधानसभा के चुनाव अगले ही साल होने वाले हैं और नीतीश ख़ुद को बीजेपी के पीछे दबे-दबे रहना नहीं दिखना चाहते. बिहार में जो उन्होंने गत लोकसभा चुनाव में 17-17 सीटों की बराबरी और सत्ता-सझीदारी में अपना वर्चस्व दिखाया, उसे आगामी विधानसभा चुनाव में कमज़ोर पड़ने देना भी उन्हें गँवारा नहीं है. हो सकता है बीजेपी को ख़ुद के बूते मिले 303 वाले प्रचंड बहुमत का स्वाभाविक भय जेडीयू को सताने लगा हो, एकबार झुके तो बार-बार झुकने जैसा भय! इसलिए राज्य की सत्ता पर अपनी पकड़ आगे भी सुनिश्चित करने जैसी रणनीति ने नीतीश कुमार को पूर्ण समर्पण से रोका होगा. या ऐसा भी हो सकता है कि परदे के पीछे अमित शाह से राय-मशवरा करके ही उन्होंने जेडीयू में विरोध या विवाद से बचने का रास्ता निकाला हो. अगर ऐसा बिलकुल नहीं है तो बीजेपी नेतृत्व से इस बाबत किसी तरह की नाराज़गी या दोनों दलों के रिश्ते में तनिक भी दाव-पेंच नहीं होने का दावा संदेहास्पद हो जाता है. शपथ ग्रहण समारोह के बाद बीजेपी नेताओं ने इस प्रकरण को नज़रअंदाज़ करने का जो रुख़ अख़्तियार किया था, उसमें 'सबकुछ ठीक-ठाक होने' जैसा भाव तो बिलकुल नहीं था. बिहार के सियासी हलक़े में भी चर्चा होने लगी कि ऐसे अचानक बात बिगड़ जाने के पीछे कोई अंदरूनी तनातनी ज़रूर है. सवाल पूछा जा रहा है कि कथित 'सांकेतिक भागीदारी' को जब एनडीए के अन्य प्रमुख घटक दलों ने स्वीकार कर लिया, तो जेडीयू ने क्यों इनकार किया? दोनों पक्ष अभी असली वजह को दबा-छिपा लेने में भले ही कामयाब दिख रहे हों, लेकिन बात है ही इतनी सियासी कि खुली-अधखुली शक्ल में सामने आ ही गयी है. (लेखक बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं)