जून 2019

मोदी की असली परीक्षा तो अब होगी

ललित सुरजन

एक सहज अनुमान था कि लोगों को रोजगार, बेहतर अर्थव्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य इन सबकी बेहतरी चाहिए। लेकिन नतीजे बताते हैं कि इन सबसे पहले भारत की जनता को राष्ट्रवाद की ख़ुराक चाहिए। चाहे पुलवामा हमला हो, बालाकोट की एयर स्ट्राइक हो, प्रज्ञा ठाकुर की उम्मीदवारी हो या गोडसे का महिमामंडन हो, भाजपा का हर दांव सटीक लगा। भाजपा लोगों को यह समझाने में कामयाब रही कि पाकिस्तान से भारत की सुरक्षा मोदी ही कर सकते हैं।

2019 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एक बार फिर ऐतिहासिक जीत हासिल की है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का हमेशा दावा रहा कि वे तीन सौ से अधिक सीटें लाएंगे और यह दावा सच साबित हुआ। 2014 के चुनाव में भी भाजपा मोदीजी को चेहरा बनाकर मैदान में उतरी थी और उसने तब भी जीत का परचम लहराया था। लेकिन तब मोदीजी कांग्रेस विरोधी लहर पर सवार थे। 2011 से अण्णा हजारे और उनके अनुयायियों ने भ्रष्टाचार के विरोध और लोकपाल लाने को लेकर यूपीए सरकार के विरुद्ध जो माहौल बनाया था, 2014 में उसका लाभ भाजपा को मिला था। तब मोदी देशवासियों से 60 साल के मुकाबले 60 महीने मांगते थे। जनता ने उन्हें 60 महीने दिए, तो उन्होंने फिर ऐसा माहौल बनाया कि केवल पांच साल में सब कुछ ठीक नहीं होगा, कम से कम पांच साल और चाहिए। और जनता ने एक बार फिर उन्हें पांच सालों के लिए देश सौंप दिया है। बीते पांच सालों में मोदी सरकार ने क्या-क्या वादे पूरे किए, इस पर पूरे चुनाव के दौरान चर्चा होती रही। विपक्षी हिसाब और जवाब दोनों मांगते रहे, जबकि भाजपा राष्ट्रवाद, पाकिस्तान, गाय, गोडसे की बात करती रही। एक सहज अनुमान था कि लोगों को रोजगार, बेहतर अर्थव्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य इन सबकी बेहतरी चाहिए। लेकिन नतीजे बताते हैं कि इन सबसे पहले भारत की जनता को राष्ट्रवाद की ख़ुराक चाहिए। चाहे पुलवामा हमला हो, बालाकोट की एयर स्ट्राइक हो, प्रज्ञा ठाकुर की उम्मीदवारी हो या गोडसे का महिमामंडन हो, भाजपा का हर दांव सटीक लगा। भाजपा लोगों को यह समझाने में कामयाब रही कि पाकिस्तान से भारत की सुरक्षा मोदी ही कर सकते हैं। भाजपा की जीत से यह बात समझ आती है कि बहुसंख्यक भारतीय धर्मभीरू हैं, वे 15-20 करोड़ अल्पसंख्यकों को लेकर सशंकित रहते हैं, और वे अपने एक छोटे से पड़ोसी देश से भी भयभीत हैं। भय की इन भावनाओं का दोहन भाजपा ने बखूबी किया। इसके अलावा भाजपा का चुनाव प्रबंधन भी प्रतिद्वंद्वियों से बेहतर रहा। इसलिए वह अपने असंतुष्ट सहयोगी दलों को भी साथ ले आई और जिन राज्यों में उसने विधानसभा में हार का सामना किया था, वहां भी जीत हासिल की। ईवीएम जैसे मुद्दे पर भी उसने आखिरकार विपक्ष को हरा दिया। यह चुनाव जितना ज़मीन पर लड़ा गया था, उतना ही सोशल मीडिया पर भी लड़ा गया था, जहां भाजपा की बड़ी फ़ौज पहले से मौज़ूद है। लेकिन इस बार मोदी विरोधी भी काफ़ी मुखर रहे। इससे ऐसा लगने लगा था कि देश में भाजपा के खिलाफ माहौल बन रहा है, साइलेंट वोटर, अंडर करेंट जैसे शब्दों के जरिए यह समझने और समझाने की कोशिशें हो रही थीं कि मतदाता चुप है, तो इसका मतलब है कि वह सत्तारूढ़ दल के खिलाफ है। लेकिन नतीजों ने ऐसे सारे अनुमानों को ध्वस्त कर दिया। एक्ज़िट पोल और बहुत से न्यूज़ चैनल भी देश में मोदी सरकार बनवा रहे थे, इसलिए भाजपा की जीत के साथ उन्हें भी जीत हासिल हुई है। लेकिन इस जीत के साथ अब कई सवाल भी खड़े हुए हैं। नरेन्द्र मोदी ने अपने और अपनी पार्टी के लिए प्रचंड बहुमत हासिल किया है, लेकिन उनकी असली परीक्षा अब शुरू हुई है। अब उन्हें यह तय करना होगा कि वे राष्ट्रवाद और हिंदुत्व जैसे मुद्दों को ही फेंटते रहेंगे या अब देश के सामने पेश असल चुनौतियों पर काम करेंगे। बेरोजगारी, किसानों की दुर्दशा, महंगाई, तेल का संकट ऐसे कई मोर्चों पर तत्काल कार्रवाई की जरूरत है। इन चुनावों में देश स्पष्ट रूप से दो हिस्सों में बंटा नजर आ रहा है, क्या मोदी सच में सबको साथ लेकर चलेंगे? अल्पसंख्यकों, दलितों के मन में जो आशंकाएं पल रही हैं, उनका निवारण कैसे होगा? भाजपा की जीत को जो लोग कट्टर हिंदुत्व और गोडसेवादियों की जीत मानकर उच्छृंखल होंगे, उन पर क्या अंकुश लगाया जाएगा? देश की संवैधानिक संस्थाओं पर जिस ख़तरे की बात लगातार उठाई जा रही है, क्या नरेन्द्र मोदी की सरकार उस ख़तरे को कम करेगी या डर पहले से अधिक बढ़ेगा? बीते पांच वर्षों में जिस तरह भाजपा सरकार की जगह मोदी सरकार शब्द प्रचलित हो गया है, उससे कहीं न कहीं संविधान की उस भावना को ठेस पहुंची है, जिसके तहत लोकतांत्रिक चुनाव में राजनैतिक दलों की प्रधानता होती है, न कि व्यक्ति की। क्या मोदी अपनी सरकार में संविधान और उसके उद्देश्यों को सुरक्षित रखेंगे? आने वाले पांच सालों में मोदी से इन सवालों के जवाब की अपेक्षा रहेगी। वैसे यह वक़्त तमाम जीतने वालों के लिए बधाई और शुभकामनाओं का है, इन अपेक्षाओं के साथ कि वे संसद में जनहित और देशहित के मुद्दे निज हित से परे होकर उठाते रहेंगे। हारने वालों के लिए यह आत्ममंथन और भावी संघर्ष के लिए तैयार होने का वक़्त है। (लेखक देशबंधु के प्रधान संपादक हैं)