जून 2019

कांग्रेसः चुनौतियों के सामने एक लाचार संगठन

अनिल सिन्हा

इस बार के लोकसभा चुनावों ने फिर से यही सिद्ध किया है कि कांग्रेस भाजपा से लड़ाई लड़ने में सक्षम नहीं है। उसकी अक्षमता ने कई लोगों को इतना निराश किया है कि वे उसकी मौत की कामना करने लगे हैं। कई लोग राहुल गांधी की जगह किसी और को पार्टी के नेता के रूप में देखना चाहते हैं। आखिर चुनावों में पार्टी के कमोबेश 2014की स्थिति पर ही टिके रहने की वजह क्या रही? उसकी हार के पीछे क्या कारण हैं?

उत्तर भारत के तीन राज्यों को भाजपा से छीन लेने के बाद कांग्रेस फिर से पुरानी स्थिति पर ही लौट गई है और उसने विधान सभा चुनावों में पाए मतों का बड़ा हिस्सा गंवा दिया। लोकसभा चुनावों में मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा ने 58 प्रतिशत वोट पाए हैं। कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में सिर्फ एक सीट जीती। राजस्थान में वह भी नहीं मिली। छत्तीसगढ में भी भाजपा को 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिल गए। महाराष्ट्र में पार्टी को सिर्फ एक सीट मिली। कर्नाटक में भी पार्टी को सिर्फ एक सीट मिली। वहां वह साझा सरकार चला रही है। इन राज्यों में पार्टी के मिले मतों का प्रतिशत भी पहले से गिर गया। पंजाब को छोड़ कर अपने कब्जे वाले राज्यों मे पार्टी ने बहुत ही खराब प्रदर्शन किया है। अगर पार्टी को दक्षिण के केरल और तमिलनाडु में सफलता न मिली होती तो उसकी हालत और भी खराब हो जाती और वह शायद दूसरे नंबर की पार्टी भी नहीं रह पाती। पार्टी ने करीब आधी सीटें उन राज्यों में जीती हैं जहां उसका मुकाबला भाजपा से नहीं था। इसमें केरल में शशि थरूर की सीट एक अपवाद है क्योंकि वहां उन्होंने भाजपा उम्मीदवार को हराया है। तीन राज्यों में जीत का भी लाभ नहीं उठा पाई गौर से देखें तो कांग्रेस नरेंद्र मोदी के खिलाफ कोई प्रतिरोध खड़ा नहीं कर पाई। इसका पैमाना वे राज्य हैं जिनमें उसकी सरकारें हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ में उसका सीधा मुकाबला भाजपा से था। इन राज्यों में में पार्टी नेताओं को बहाना बनाने का कोई मौका नहीं है। उन्हें चुनाव से पहले यह मौका भी था कि वे अपना संगठन मजबूत करते और एक ऐसे शासन का नमूना पेश करते कि भाजपा को लोकसभा की इतनी सीटें जीतने का मौका नहीं मिलता। इन राज्यों में कांग्रेस की पराजय ने यह सिद्ध किया कि राज्य के नेताओं को दिल्ली में सरकार बनाने की इच्छाशक्ति नहीं थी। अब तो ऐसा लगता है कि इन राज्यों में उन्हें परिस्थितियों ने सत्ता दिला दी जिसके लिए वे तैयार नहीं थे। दिल्ली दरबार से एक बार परवाना मिल जाने के बाद उसी पुराने ढर्रे पर काम करने लगे जिसके वे आदि थे। दरअसल, ये वही लोग थे जिनकी वजह से कांग्रेस ने इन राज्यों में सत्ता गंवाई थी। पार्टी के नेता एक-दूसरे के खिलाफ पहले की तरह साजिश में लग गए। यहां वे अपनी संगठन क्षमता और नई सत्ता की ऊर्जा से कोई नई कहानी बुन सकते थे। लेकिन वे विफल रहे। इसमें केंद्रीय नेतृत्व का भी दोष था। उसने इन राज्यों में अपनी स्थिति मजबूत मान ली और सांगठनिक तैयारी का कोई कारगर तरीका नहीं अपनाया। कांग्रेस के नेताओं का यह रवैया सिर्फ अपनी पार्टी के साथ नहीं रहता है बल्कि अपनी सहयोगी पार्टियों के साथ भी। इसका उदाहरण कर्नाटक है। वहां पार्टी के भीतर और सहयोगी पार्टी के साथ उनका तनाव लगभग बना ही रहा और इसके कारण वे खुद भी हारे और अपनी सहयोगी पार्टी को भी ले डूबे। इसके विपरीत पांच साल तक तनाव के बावजूद शिव सेना और भाजपा महाराष्ट्र में साथ आई और उसने जबर्दस्त सफलता पाई। बिहार में भी सालों से वे नीतीश कुमार की सरकार में साझा कर रहे हैं, लेकिन उसे आसानी से चला रहे हैं। उन्होंने लोक सभा चुनावों में भी अधिक सीटें देने की नीतीश कुमार की मांग मान ली और राज्य में विपक्षी पार्टियों को धूल चटा दी। इस तरह की राजनीतिक कुशलता की एक ही वजह थी कि सत्ता हासिल करने की उनकी इच्छाशक्ति प्रबल थी और व्यक्तियों पर पार्टी का नियंत्रण है। कांग्रेस मं ये दोनों बातें दिखाई नहीं देती। कांग्रेस की इसी बीमारी ने गुजरात जैसी जगहों में भी उसे बेअसर साबित किया। राज्य विधान सभा के चुनावों में कड़ी मेहनत ने प्रधानमंत्री मोदी की नींद उड़ा दी थी और पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया था। उसने वहां जिग्नेश मेवानी, हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकुर जैसे नेताओं को सामने लाया। लेकिन लोकसभा चुनवों में उन सारी उपलब्धियों को किनारे छोड़ कर पार्टी फिर से पुराने नेताओं के भरोसे चलने लगी। लंबे समय तक गुजरात में फेल सिद्ध होने वाले अहमद पटेल केंद्रीय भूमिका में नजर आने लगे। चुनाव के दौरान सैम पेत्रोदा जैसे लोग विवादास्पद बयान देने लगे और मणिशंकर अय्यर की भूमिका निभाने लगे। असल में, राहुल गांधी को विरासत में तीन तरह के नेता मिले हैं। इनमें एके अंटोनी और मोतीलाल वोरा जैसे लोग हैं जो इंदिरा गांधी के जमाने से काम कर रहे हैं। दूसरा, संजय गांधी के साथ काम करने वाले नेता हैं जिसमें कमलनाथ जैसे लोग हैं जो बाद में राजीव गांधी के चहेते भी थे। अहमद पटेल और डा मनमोहन सिंह जैसे सोनिया गांधी का आर्शीवाद पाए नेता भी हैं। नए नेताओं में ज्यादातर पुराने कांग्रसियों के बेटे-बेटी हैं और युवा हैं। इनमें ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट शामिल हैं। दरबारी संस्कृति की जकडन क्या कांग्रेस की दरबारी संस्कृति के पीछे की वजह उसका वंशवाद है? गहराई से जांच करने पर यह गलत लगता है। एक तो देश की कई पार्टियां हैं जो परिवार की जागीर हैं। इनमें समाजवादी पार्टी, डीएमके, राजद से लेकर शिव सेना, डीएमके और तेलुगु देसम जैसी पाटियां हैं। यही नहीं कुछ पार्टी जो अभी सीधे-सीधे वंशवाद का इजहार नहीं करती हैं, लेकिन एक व्यक्ति की ओर से संचालित हैं। इन पार्टियों में आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी जैसी पाटियों को गिनाया जा सकता है। निर्णय की प्रक्रिया के एक-दो आदमी के हाथ में केंद्र होने का उदाहरण अब भारतीय जनता पार्टी में भी दिखाई देता है। यहां भी दरबार वाली स्थिति है। पार्टी के सभी निर्णय अमित शाह और नरेंद्र मोदी लेते हैं। लेकिन वे बिना संघ परिवार की इजाजत से ऐसा नहीं कर सकते। भाजपा के नीतिगत फैसले आरएसएस की सहमति के बगैर नहीं होते हैं। यह संगठन लोकतांत्रिक ढंग से फैसले नहीं लेता है। वैसे भी, भाजपा में एक महासचिव और संगठन मंत्री आरएसएस की ओर से नियुक्त किए जाते हैं। आंदोलन से परहेज की कार्य संस्कृति इसका अर्थ है कि पार्टी की बीमारी की असली वजह वंशवाद नहीं है और न ही फैसले लेने की प्रक्रिया का केंद्रीकरण है। इसकी असली वजह है-एक निश्चित विचारधारा का अभाव और आंदोलन से परहेज वाली कार्य-संस्कृति। पार्टी की विचारधारा में बदलाव के संकेत इंदिरा गांधी के शासन में दिखाई देने लगे थे। उन्होंने जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में बनी मजबूत लोकतांत्रिक राजनीतिक परंपरा को नुकसान पहुंचाया और अंत में आपातकाल लगा कर इसे कभी भरपाई न की जा सकने वाली हानि पहुंचा दी। आपातकाल के समय के नेता ही राजीव गांधी के समय में प्रभावी रहे। उनके समय में ही उदारवादी नीतियों की नींव रखी गई जिसकी परिणति नरसिंहा राव के समय मे नई आर्थिक नीतियों के निर्माण में हुई। गांधी जी के रास्ते को नेहरू ने छोड़ना शुरू कर दिया था, इंदिरा और राजीव ने नेहरू का रास्ता छोड़ना शुरू किया। राव के समय में कांग्रेस नेहरू की नीतियों से एकदम अलग हो चुकी थी। यही नीति सोनिया गांधी ने अपनाई। उन्होंने नरसिंहराव के समय की आर्थिक नीति के निर्माता मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना कर अपनी प्राथमिकता बता दी। पार्टी के सभी बड़े नेता- चिदंबरम, कमलनाथ, आनंद शर्मा आदि इसके पक्के समर्थक हैं। वे निजीकरण, विदेशी पूंजी और सरकारी कंपनियों को निजी हाथों में सौंपने के बारे में एक राय रहे हैं। इस तरह भाजपा की आर्थिक नीतियों और मनमोहन सिंह की नीतियों में कोई फर्क नहीं दिखाई देता। यही वजह है कि मोदी सरकार ने आने के बाद वह जिस किसी फैसले की घोषणा करती थी तो आनंद शर्मा जैसे नेता यही कहते पाए जाते थे कि यह तो हमारे कार्यक्रम की नकल है। बुनियादी बदलाव के लिए पार्टी तैयार नहीं राहुल गांधी पार्टी की इस नीति में बुनियादी बदलाव लाए और वह जनविरोधी आर्थिक नीतियों से अलग होने लगे। सूट-बूट की सरकार के नारे से शुरू होकर वह सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत करने और शिक्षा तथा स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च बढाने और न्यूनतम आमदनी स्कीम जैसे कार्यक्रम पर आ गए। सच पूछिए तो इस बुनियादी बदलाव के लिए उनकी लीडरशिप तैयार नहीं थी। उसने कांग्रेस के घोषणा-पत्र को बहस में लाने का काम नहीं किया। पार्टी के पास वैसे प्रतिबद्ध और प्रशिक्षित कार्यकर्ताओें का अभाव था जो इन कार्यक्रमों को जनता के बीच ले जाए। इसके लिए बाद में प्रियंका गांधी को लाया गया, लेकिन उन्हें और ज्योतिरादित्य को उत्तर प्रदेश में लगाया गया, जहां कुछ ज्यादा हासिल होने की उम्मीद नहीं थी। वहां के मृतप्राय संगठन में जान फूंकने की निरर्थक कोशिश की गई। यहां वह सामाजिक स्तर पर भाजपा के साथ गए समूहों को वापस कांग्रेस की ओर लाने की कोशिश कर रही थी जिसकी नगण्य संभावना थी। इस महात्वाकांक्षा में उसने समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन के लिए जरूरी मेहनत भी नहीं की। इससे पार्टी की स्थिति बेहतर हो सकती थी और गांधी परिवार को ज्यादा ऊर्जा भी नहीं लगानी पड़ती। इससे अमेठी की सीट भी बच सकती थी। वहां मायावती और अखिलेश यादव थोड़ी ताकत भी लगाते तो स्मृति ईरानी के लिए सीट जीतना आसान नहीं होता। प्रियंका ने कुछ दलित और पिछड़ों को साथ लाने की कोशिश की, लेकिन इसके लिए कोई जरूरी आधार तैयार नहीं था। पार्टी के पास कई दलित और ओबीसी नेता हैं, लेकिन सोशल इंजीनियरिंग के लिए उनका उचित इस्तेमाल नहीं हुआ। इन समूहों में कोई समर्थन पैदा करने में वह असमर्थ रही और इन समूहों का प्रतिनिधित्व करने वालों पर साथ आने का दबाव पैदा करना संभव नहीं हो पाया। इसके विपरीत भाजपा ने कारपोरेट पूंजीवाद और कट्टर हिंदुत्व के साथ सोशल इंजीनियरिंग की स्पष्ट रणनीति अपनाई। इसे उसने आक्रामक राष्ट्रवाद के रूप में पेश किया। सामाजिक न्याय के सिद्धांत को आत्मसात करने में पार्टी की विफलता की वजह से ही महाराष्ट्र जैसे राज्य में वह कोई गठबंधन या नया सामाजिक समीकरण बनाने में विफल रही। वह वहां शरद पवार के साथ रहने की जगह वह नए समीकरण पर काम कर सकती थी। प्रकाश आंबेडकर और ओवैसी के गठबंधन वंचित बहुजन आघाडी ने कई सीटों पर कांग्रेस को हराने में भाजपा की मदद दी। उन्हें ऐसा करने से वह रोक नहीं पाई क्योंकि उसके पास उन्हें साथ लाने की कोई कुंजी नहीं थी। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अशोक चव्हाण और वरिष्ठ नेता सुशील कुमार शिंदे भी इसी अघाडी की ओर से वोट काटने के कारण चुनाव हार गए। विचारधारा की अस्पष्टता विचारधारा की अस्पष्टता ने ही पार्टी को हिंदुत्व के खिलाफ खडा नहीं होने दिया। राहुल गांधी से लेकर दिग्विजय सिंह तक अपने को आस्थावान हिंदू साबित करने में लगे थे। कट्टर हिंदुत्व के सामने नरम हिंदुत्व रखने की नीति ने पार्टी नेताओं को जोकर ही बनाया। इससे ब्राह्मणवाद के खिलाफ लड़ने वाली ताकतों को एकजुट करने की संभावना मिट गई। नरम हिंदुत्व के जरिए वोटरों को लुभाने की इस कोशिश का नाकाम होना पक्का था। इस नीति के कारण मुसलमानों और दलितों में उत्साह भरने में वह नाकामयाब रही। वह सवर्णों को वापस साथ लाने की निरर्थक कोशिश में लगी रही। वैचारिक अस्पष्टता और अवसरवाद के कारण पार्टी ने वामपंथी पार्टियों को भी अपने से दूर रखा। पश्चिम बंगाल में पार्टी ने अगर वामपंथी पार्टियों के साथ समझौता किया होता तो शायद भाजपा इतना वोट हासिल नहीं कर पाती। वहां ममता और भाजपा, दोनों का उद्देश्य वामपंथी पार्टियों को समाप्त करने का है। इसमें वे सफल हुए। कांग्रेस ने भी अपने तरीके से उनका साथ दिया। कांग्रेस के देशव्यापी प्रदर्शन पर नजर डालें तो यह साफ हो जाता है कि इसने भाजपा को नुकसान पहुंचाने के बदले वाम पार्टियों को ही नुकसान पहुंचाया है। केरल में पार्टी ने यही काम प्रत्यक्ष तरीके से किया। पार्टी ने सामाजिक न्याय और वामपंथी शक्तियों के साथ भाजपा विरोधी विकल्प बनाने की कोशिश नहीं की। उसने एक नेहरूवादी घोषणा-पत्र बनाया, लेकिन उसके अनुरूप राजनीति नहीं की और वामपंथी, लोकतंत्रिक तथा सेकुलर मोर्चा नहीं बनाया। इसलिए पार्टी के घोषणा-पत्र के अनुरूप इसका अभियान नहीं चल पाया। यही वजह है कि पार्टी का प्रदर्शन खराब रहा और वह अपने को नरेंद्र मोदी के हिंदू राष्ट्रवाद के विकल्प के रूप में प्रस्तुत नहीं कर पाई। राफेल के मामले को राहुल ने जोर से उठाया, लेकिन पार्टी ने इस पर कोई आंदोलन नहीं किया। इस घोटाले को उठाने में उसने विपक्ष का साथ नहीं लिया। इसे एक राष्ट्रविरोधी हरकत के रूप में पेश करने में वह विफल रही। भाजपा का मुकाबला तो कांग्रेस को ही करना होगा क्या कांग्रेस को खत्म हो जाना चाहिए? क्या राहुल गांधी को नेतृत्व दूसरे के हाथ में देना चाहिए? दोनों ही सवाल अप्रासंगिक और अनुचित है। पार्टी से बाहर के लोगों को क्या हक है कि वे ऐसी सलाह दें? यह एक नितांत अलोकतांत्रिक सलाह है। अगर किसी ने पार्टी के साथ मिल कर भी काम किया हो तो उसे ऐसा कहने का हक नहीं है। राहुल गांधी को त्यागपत्र देने की सलाह देने वालों को यह ध्यान रखना चाहिए कि यह कांग्रेस का अंदरूनी मामला है। क्या वे यही सलाह अखिलेश और चंद्राबाबू का दे सकते हैं? ऐसा कहकर वे लोग मोदी-अमित शाह के किस्से को ही आगे बढा रहे हैं। सच्चाई यह है कि देश के स्तर पर भाजपा के खिलाफ अंतिम क्षण तक खड़ी रहने वालों में वामपंथी और कांग्रेसी ही हो सकते हैं। बाकी पार्टियां कभी भी भाजपा के साथ हाथ मिला सकती हैं। कांग्रेस के नेता निजी तौर पर भले ही भाजपा की मदद करें, पार्टी के तौर पर उन्हें उससे संघर्ष करना ही पड़ेगा। कांग्रेस का इतिहास ही भाजपा के जड़ जमाने में सबसे बड़ा बाधक है। यही वजह है कि मोदी-शाह ने सबसे ज्यादा प्रहार नेहरू और उनकी विरासत पर किया। उन्होंने प्रज्ञा ठाकुर के जरिए गांधी पर भी हमला किया है। कांग्रेस आजादी के आंदोलन की उस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है जो हिंदू सांप्रदायिकता और नफरत की राजनीति के खिलाफ है। उसे इस विरासत के अनुरूप भाजपा के खिलाफ लड़ाई का ऐतिहासिक दायित्व निभाना है। अगर वह इसमें विफल होगी तो इतिहास उसे माफ नहीं करेगा। फिलहाल, वह चुनौतियों के सामने लाचार है।