जून 2019

नए विपक्ष की तलाश

अरविन्द मोहन

नरेन्द्र मोदी की निर्णायक जीत के समय विपक्षी राजनीति की चर्चा कुछ असामान्य लग सकती है, पर ज्यादा जरूरी है। और अगर जीत से उत्साहित प्रधानमंत्री और भाजपा कई तमाशाई हरकतें कर रहा है, अपनी सामान्य नाटकीयता को और बढ़ाकर पेश कर रहा है तो विपक्ष बहुत साफ हतोत्साहित और बुझा हुआ लग रहा है। अगर हार कबूलने और जीते को बधाई देने का सामान्य शिष्टाचार भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गान्धी ने निभाया तो ज्यादातर विपक्षी नेता घोंघे की तरह अपने सुरक्षित खोल मेँ छुप गए लगते हैं। समाजवादी पार्टी, बसपा और बाकी दलों की तरफ से कोई चुनावी शिष्टाचार भी नहीं निभाया गया है। 'नैतिक कारणों से' इस्तीफे की पेशकश भी राहुल, ममता और राज बब्बर जैसे कांग्रेसियों ने ही की है, जो खारिज भी हो चुकी है।

जिस तरह की जीत नरेन्द्र मोदी को मिली है, उसमें सबकी 'बोलती बन्द' है। जीत के अपने कारण हैं, नरेन्द्र मोदी बड़ा कारण हैं पर विपक्षी हार के कारण उससे ज्यादा बड़े और साफ हैं। अगर नरेन्द्र मोदी अपने 2014 के किसी भी बड़े चुनावी वादे को पूरा नहीं कर पाए और नोटबन्दी तथा जीएसटी जैसे भारी नुकसानदेह फैसले लेकर भी बच ही नहीं गए, शानदार जीत दर्ज कर पाए तो उसकी जिम्मेवारी/श्रेय बालाकोट से ज्यादा नरेन्द्र मोदी विरोधी दलो और नेताओं की अकर्मण्यता, अदूरदर्शिता, अहंकारी व्यवहार, मुख्य विपक्ष की जगह आपसी लड़ाई और बड़े को निपटाने की जगह छोटे प्रतिद्वन्द्वी को पहले निपटाने की रणनीति है। ममता के लिए भाजपा से ज्यादा बड़ा दुश्मन माकपा और कांग्रेस रहे, मायावती को भाजपा से निपटने के पहले कांग्रेस को निपटाना ज्यादा जरूरी लगा। कोई साफ-सुथरा गठबन्धन बनाने, कुछ स्पष्ट कार्यक्रम और एजेंडा बनाने की जगह आपसी होड़ ने ही लगभग डेढ़-दो सौ सीटों का तालमेल भी बेअसर कर दिया, हड़बड़ी और आधी-अधूरी तैयारी से आया न्याय जैसा शानदार और चुनाव जिताने में सक्षम कार्यक्रम भी फिसड्डी साबित हुआ। जिस तेजस्वी को अभी जुमा-जुमा पांच दिन हुए वे भी नीतीश कुमार की वापसी को अपनी शान के खिलाफ समझकर, कन्हैया को अपना प्रतिद्वन्द्वी समझकर बॉसगीरी दिखाएँ और टिकटों की खुली बिक्री में लगे हों तो ऐसा विपक्ष जीत जाए तभी हैरानी होती। गठबन्धन राजनीति की सीमाओं और सम्भावनाओं पर बात करने का सामान्य ढंग से कोई मतलब नहीं लगता, लेकिन इस चुनाव में गठबन्धनों की जो हालत हुई है, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में, वह निश्चित रूप से काफी कुछ सोचने का मसाला देता है। बिहार मेँ एक गठबन्धन फेल हुआ तो दूसरा जबरदस्त रूप से कामयाब। वह भी विश्लेषण का विषय होना चाहिए, पर काफी सारे लोग उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबन्धन की हार को ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा मानते हैं। मायावती को पहले इस बात का 'विलेन' माना जाता था कि उन्होंने इस गठबन्धन में कांग्रेस को नहीं आने दिया। अगर दस एक सीटें देकर भी कांग्रेस को साथ ले लिया गया होता तो हवा बदल जाती। तेजस्वी भी अगर अपने पिता की सलाह मानकर नीतीश को इस पाले में आने देते तो सचमुच हवा बदल जाती। पर माया-तेजस्वी के फैसलों के बाद जो 'हवा' चली, वह यही बताती है कि कांग्रेस के आने से भी कोई खास फर्क नहीं पड़ा और बिहार में तो कांग्रेस के रहते भी महागठबन्धन की हालत उत्तर प्रदेश के गठबन्धन से भी बुरी हो गई। अगर इन दोनों राज्यों के नतीजों पर बारीकी से गौर करें तो साफ लगेगा कि हर सीट पर मुसलमानों के वोट के अलावा बहुत ही कम जोड़ हुआ है- वह भी यादव, जाटव या उम्मीदवार की अपनी जाति का कुछ वोट। जी हाँ, उत्तर प्रदेश में पूरा यादव और दलित ही नहीं जाटव वोट भी गठबन्धन की तरह नहीं आया है। मुसलमान खौफ में हैं, भाजपा और नरेन्द्र मोदी को वोट नहीं दे सकते इसलिए उनका अधिकांश वोट भाजपा के विरोध में गया है। आप उसे अपनी बिरादरी के साथ जोड़कर चुनाव जीतने का ख्वाब देख रहे हैं तो यह चुनाव ऐसी राजनीति के अंत की घोषणा करता है। और चुनाव के पहले से ही नरेन्द्र मोदी का खौफ ऐसा हो गया कि आप इस राजनीति को धर्मनिरपेक्षता बताने से भी डरने लगे, टोपी पहनना भूल गए, हवन करने लगे। और ऐसी हवा चली तथा मोदी-साध्वी प्रज्ञा ने बिना मुसलमान के भी मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात में ऐसा ध्रुवीकरण करा लिया कि सब उड़ गए। ममता को छोड़कर कोई लड़ता भी नहीं लगा और ममता की लड़ाई ऐसी हो गई कि लाभ से ज्यादा नुकसान कर गई। अब तो अगले चुनाव में उन्हें बंगाल की अपनी सत्ता को बचाना भारी पड़ जाएगा। सो अचरज नहीं कि अपनी जीत के बाद भाजपा के मुख्यालय से 'राष्ट्र को धन्यवाद' देते हुए नरेन्द्र मोदी अगर धर्मनिरपेक्षता के डिस्कोर्स को ध्वस्त करने को अपनी सबसे प्रमुख उपलब्धि बता रहे थे तो यह बात राजनीति करने वाले और राजनीति पर सोच-समझ रखने वाले सभी लोगों को ध्यान देने वाली थी। यह सही है कि प्रबन्धन और चौकसी में नरेन्द्र मोदी और उनके पट शिष्य अमित शाह का कोई जवाब नहीं है, पर लड़ाई सिर्फ इससे नहीं लड़ी गई। संघ परिवार, भाजपा और नरेन्द्र मोदी ने पूरा चुनाव बहुत ही साफ, सोची रणनीति और एक लम्बी दृष्टि के साथ लड़ी। उनकी तुलना में फुरसत की राजनीति, मतदान से तीन दिन पहले चुनाव प्रचार करने निकली मायावती-अखिलेश की जोड़ी और कभी भी रणनीति तथा सोच न बदलने वाले नेताओं को मिला चुनावी फल लोगों की अपनी समझ से ज्यादा उन पर तरह-तरह से चढ़े मोदी रंग का भी नतीजा है। कांग्रेस ने जरूर मुख्य विपक्ष का अपना सही एजेंडा रखा, कार्यक्रम दिया पर न संगठन था, न मौजूद संगठन ने राहुल-प्रियंका का साथ दिया। राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की हाथ आई सत्ता के दोनों बुजुर्ग नायक अपने-अपने साहबजादों को टिकट दिलवाने और फिर चुनाव लड़वाने में ही अटके रहे। आम तौर पर वोटर का हनीमून नई सरकार से इतनी जल्दी खत्म नहीं होता, यहाँ तो बोरिया-बिस्तर भी गोल हो गया। पर इस बार का नतीजा बताता है कि आपके न्याय, समाजवाद, पिछड़वाद, दलितवाद से ज्यादा मजबूत आधार मुसलमानों ने उपलब्ध कराया, यादवों ने कराया, एक हद तक दलितों ने कराया। आप न कोई संगठन बना पाए न कोई वैकल्पिक राजनैतिक डिस्कोर्स। कांग्रेस ने न्याय योजना और प्रियंका जैसे तुरुप के पत्ते को बिना तैयारी के उतारकर ऐसे दावा किया जैसे कोई भूचाल लाने की तैयारी है। और आपको भ्रम रहा कि मंच पर साथ खड़े होकर हाथ हिला देने भर से फलाँ-फलाँ जातियाँ और सामाजिक समूह आपके पीछे खड़े हो जाएंगे, संघ और भाजपा कार्यकर्त्ताओं का मुकाबला कर लेंगे। एक बार मंच पर पैर छूने से चुनावी बैतरिणी पार हो जाएगी। वैकल्पिक दर्शन की बात भी कोई करता था तो राहुल ही जिनको अल्पसंख्यकों ने उत्तर प्रदेश में इस भ्रम में छोड़ा कि गठबन्धन मजबूत है और वही मुकाबला कर रहा है। अब तो लग रहा है कि अगर वे कांग्रेस को चुनते तो भी नतीजा लगभग यही होता। साफ है कि सेकुलरिज्म की राजनीति इस तरह सिर्फ मुसलमानों के कन्धे से चलेगी तो वह छद्म सेकुलरिज्म होगी और उसमें मुसलमान और अकेला और कमजोर होगा । उसे एक तरफ बताकर हिन्दुओं का ध्रुवीकरण कराना आसान हो जाएगा। इस बार मुसलमान एकदम खामोश रहे तब भी ध्रुवीकरण हुआ। दूसरी चीज क्षेत्रीय दलों की ताकत कम हुई है। काफी समय बाद, लगभग इन्ही तीस सालों में, यह स्थिति आ गई कि हर संसद में क्षेत्रीय दलों का कुल योग राष्ट्रीय दलों से ऊपर हो जाता था। पिछले चुनाव में पहली बार राष्ट्रीय दलों की संख्या ऊपर आई। इस बार के अंतिम आंकडे तो नहीं आए हैं पर जो लक्षण हैं उनसे साफ है कि इस बार हिन्दी पट्टी में क्षेत्रीय दलों की ताकत निर्णायक ढंग से कम हो गई है। क्षेत्रीय दलों की हालत यह है कि उन्हें चाहिए तो सारी सत्ता और जिम्मेवारी बहुत सीमित। मायावती के सामने कोई दूसरी कुर्सी नहीं होती, वे मीडिया के सामने आकर भी मोदी की ही तरह एकालाप ही करती हैं। इस सब पर वे चौकस हैं पर तीस साल से जारी भूमंडलीकरण पर, विदेश नीति पर, खेल नीति पर क्या राय है किसी को पता हो तो बताए। यही बात अधिकांश क्षेत्रीय सूरमाओं के लिए लागू होती है। दलित नेता सिर्फ दलित सवाल पर सक्रिय होगा, आदिवादी सिर्फ आदिवासियों के मसले पर और पिछड़ा नेता चौबीसों घंटे सिर्फ नए-नए आरक्षण के सवाल उठाएगा तो पूरी राजनीति कौन करेगा। एक पक्ष यह भी है कि इस चुनाव में नरेन्द्र मोदी के सामने कोई और प्रतिद्वन्द्वी नहीं था। असल में 2019 के नरेन्द्र मोदी के लिए 2014 का नरेन्द्र मोदी ही सबसे बडी चुनौती था। और कालाधन लाकर हरेक को 15-15 लाख देने, दो करोड़ लोगों को सालाना रोजगार देने से लेकर इतने सारे वायदे थे कि उसके आगे किसी भी सरकार का प्रदर्शन फीका ही होना था। नरेन्द्र मोदी ने अपनी चौबीसों घंटे की मेहनत और उससे भी ज्यादा चालाक सोच तथा पुलवामा में सैनिकों की शहादत के तत्काल बाद बालाकोट हमला करके इस नाकामी को जबरदस्त सफलता में बदल दिया। इसके इर्द-गिर्द ही चुनाव का मुख्य विमर्श गढ़ा गया और इसने 2014 वाले मोदी को ढ़क दिया। फिर इस चुनाव ने संसाधनों, प्रबन्धन कौशल के जोर और जबरदस्त रणनीतिकारों के लिए भी याद किया जाएगा। दूसरी ओर यह भी दिखा कि साफ बनती विपक्षी एकता को भी नहीं सम्भाला जा सकता। कर्नाटक और तीन हिन्दी भाषी प्रांतों की पराजय ने मोदी को और चौकस किया तो विपक्ष के नेताओं का माथा खराब हुआ। चुनावी रणनीति में जातिगत अंकगणित पर राष्ट्रवाद-हिन्दूवाद, मजबूत नेतृत्व की केमिस्ट्री भारी पड़ी और लगभग पूरा विपक्ष जाति और मुसलमान वोट के अंकगणित में उलझा रहा। ऐसा नहीं है कि ये चीजें पहले न थीं और सिर्फ बिहार और उत्तर प्रदेश में ही यह होता था। पर पिछले तीस सालों से अर्थात मंडल आने के बाद से बाद से इस गणित का जोर कुछ ज्यादा ही हो गया था। इस चुनाव ने न सिर्फ इस अंकगणित वाली राजनीति को खारिज किया है, बल्कि इसका प्रभाव निर्णायक ढंग से खत्म कर दिया है। पर इस बार सामाजिक न्याय और बहुजनवाद के नाम पर तीस-तीस साल से एक जाति या दो-तीन सामाजिक समूहों के नाम पर राज करने या सत्ता सुख भोगने वाले लोगों और परिवारों पक्का जबाब मिल गया है। पर इस चुनावी प्रतिक्रिया को पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों द्वारा अपने अधिकार, राजनैतिक स्पेस और सत्ता के लिए लड़ने की महत्वाकांक्षा का पटाक्षेप नहीं मानना चाहिए और न उसकी जरूरत का अंत। वह जरूरत तो और बढ़ गई है। पर उसे लड़ने का अलग तरीका ढूंढना होगा, अलग एजेंडा बनाना होगा, अलग तरह का नेतृत्व विकसित करना होगा। इन दलों की हालत यह है कि उन्हें चाहिए तो सारी सत्ता और जिम्मेवारी बहुत सीमित। राहुल और प्रियंका ने मेहनत बहुत की लेकिन जब आपकी पार्टी के वरिष्ठ नेता भी आपसे मिलने को तरस जाएं, जब कोई संवाद न हो तो इतने बड़े और विविधता भरे मुल्क में दो लोगों की मेहनत और लगन से ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला है। गैर-कांग्रेसी नेताओं का आचरण राहुल-प्रियंका से भी बदतर है। मायावती के सामने किसी को जूते पहनकर आने की इजाजत नहीं है पर तीस साल से जारी भूमंडलीकरण पर, विदेश नीति पर, खेल नीति पर क्या राय है किसी को पता हो तो बताए। यही बात अधिकांश क्षेत्रीय सूरमाओं के लिए लागू होती है। दलित नेता सिर्फ दलित सवाल पर सक्रिय होगा, आदिवादी सिर्फ आदिवासियों के मसले पर और पिछड़ा नेता चौबीसों घंटे सिर्फ नए-नए आरक्षण के सवाल उठाएगा तो पूरी राजनीति कौन करेगा। सारा चिंतन सिर्फ इस पर आ जाए कि इस बार किस समूह के आरक्षण की मांग उठानी है तो यह सामाजिक न्याय की क्रांतिकारी अवधारणा का नाश ही है। अखिलेश यादव ने कब मुलायम सिन्ह की सपा को पिछड़ों-मुसलमानों की जगह यादवों की पार्टी में बदल दिया इसका उनको खुद अन्दाजा नहीं है। इसलिये यह चुनाव अगर राजनीति के इस बड़े बदलाव की शुरुआत करता है और सभी विपक्षी दलों की राजनीति में बदलाव की मांग करता है तो इसका स्वागत करना चाहिए।