जून 2019

चुनाव नतीजों ने बदली देश की धुरी

हरिमोहन मिश्र

सत्रहवें आम चुनाव के नतीजे साफ तौर पर बता रहे हैं कि देश एक अलग धुरी में पहुंच गया है। इस धुरी के नजारें अगले पांच साल में देखने को मिलेंगे। उम्मीद करनी चाहिए कि नई धारा कुछ सकारात्मक पहलुओं को भी सामने लाए। जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के सेंट्रल हॉल में एनडीए के सांसदों की बैठक में कहा कि हमें अल्पसंख्यकों के डर को मिटाना है। हालांकि मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, बिहार में मुसलमानों के खिलाफ हाल की हिसक घटनाएं इसके उलट संकेत दे रही हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि समाज में विभाजनकारी शक्तियां सिर न उठाएं और अर्थव्यवस्था में गुणात्मक सुधार हो, ताकि लोगों की जिदगी में सूकून आए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नतीजों के बाद संसद के सेंट्रल हॉल में एनडीए सांसदों की बैठक में कहा, ‘यह जीत सेकुलरिस्टों के खिलाफ है।’ इसके पहले नतीजों की शाम वे कह चुके थे, ‘अब जाति की राजनीति खत्म हुई। बस दो ही जातियां बच गई हैं, एक, गरीब और दूसरे, गरीबी हटाने वाले।’ इसके बरक्स हार की समीक्षा के लिए कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कथित तौर पर अपनी मायूसी इन शब्दों में जाहिर की, ‘वरिष्ठ नेताओं कमलनाथ, अशोक गहलोत, चिदंबरम वगैरह ने पार्टी के बदले अपने बेटों के भविष्य को तरजीह दी।’तो, क्या आम चुनाव 2019 के विस्मयकारी नतीजों के रहस्य इन बयानों में कहीं छुपे हैं? या फिर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की नेता मायावती के इस बयान में कि ‘यह चुनावी जीत ईवीएम में बड़े पैमाने पर लक्ष्य तय करके धांधली से हासिल की गई है। जानबूझकर कुछ सीटों पर ईवीएम में छेड़छाड़ नहीं की गई, ताकि संदेह न हो? वही सीटें हमारे पाले में आईं।’ दरअसल इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की धुआंधार जीत को सामान्य तर्क और पारंपरिक पैमाने से समझ पाना आसान नहीं है, जिसमें भाजपा की झोली में 303 सीटें और एनडीए के पाले में 353 सीटें आ गिरीं। इसके रहस्य का एक सूत्र नरेंद्र मोदी के उस बयान में भी तलाशा जा सकता है कि पहली बार एक प्रो-इन्कंबेंसी मौन लहर देश में बह रही है। बेशक, यह रहस्य लंबे समय तक बड़े से बड़े राजनीति शास्त्रियों के लिए उलझन का कारण बना रह सकता है क्योंकि इसमें वाकई आजादी के करीब 70 साल बाद देश की फितरत में बड़े बदलाव के अक्स दिख सकते हैं। इसमें आजादी की लड़ाई से निकली उदार राष्ट्रवाद की धारा के विपरीत खासकर नई पीढ़ी में दबंग हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के प्रति आकर्षण भी दिख सकता है। लेकिन ये नतीजे धर्मनिरपेक्षवादी दलों के बिखराव और विश्वसनीयता खोते जाने की भी कहानी कहते हैं, बशर्ते ईवीएम में उस पैमाने पर धांधली न हुई हो, जिसकी आशंका भाजपा प्रत्याशियों के वोट में बेहिसाब बढोतरी से पैदा होती है। फिर भी, यह इस मायने में ऐतिहासिक है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की 2014 से भी धमाकेदार वापसी 1984 के बाद किसी मौजूदा सरकार की इतनी बड़ी जीत पहली है। यकीनन इसमें ऐसे कई आश्चर्यजनक पहलू हैं, जिसे राष्ट्रीय और क्षेत्रवार नतीजों के गणित से भी जाना जा सकता है। इसके राष्ट्रीय परिदृश्य को देखें तो इस तथाकथित मौन लहर से विंध्य के पार आंध्र प्रदेश, केरल और तमिलनाडु ही बच पाए, जहां कथित सेकुलर और क्षेत्रीय भावनाओं को यह बेध नहीं पाया। हालांकि दक्षिण में भी तेलंगाना में इसकी हल्की-सी छुअन दिखी तो कर्नाटक में धमाकेदार असर दिखा। इसके अलावा इसके असर को पूरब में सिर्फ ओडिशा कुछ काटने में कामयाब हुआ, जहां नवीन पटनायक न सिर्फ पांचवी बार मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड कायम करने में सफल रहे, बल्कि कुल 21 संसदीय सीटों में से आठ पर ही भाजपा को रोक दिया। हालांकि राज्य में विपक्ष की जगह अब कांग्रेस की जगह भाजपा ने ले ली है। इसके अलावा इस लहर से उत्तर में सिर्फ पंजाब (कुल 13 में से एनडीए सिर्फ 4 सीटें) और कश्मीर घाटी को छोड़ दें समूचे पश्चिम, उत्तर और पूरब इसका ऐसा जोरदार असर दिखा कि सबका सूपड़ा साफ हो गया। सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, भाजपा और मोदी-अमित शाह की जोड़ी को पस्त करने का हांका लगा रहे तमाम क्षेत्रीय दलों और क्षत्रपों के दांत खट्टे हो गए। इन नतीजों में सिर्फ चुनौती देने वाले ही नहीं बह गए, बल्कि पिछले पांच साल में मोदी सरकार की आर्थिक-सामाजिक हर मोर्चे पर भीषण नाकामियां भी औंधे मुंह मिट्टी में समां गईं। 2019 के शुरू में ही किसानों की दुर्दशा, बेरोजगारी की 45 साल में सबसे ऊंची दर, अर्थव्यवस्था की बदहाली की बातें ऐसा झंझावात पैदा कर रही थीं कि मोदी सरकार बगलें झांकती नजर आती थी। उसने बेरोजगारी के आंकड़े तक जारी नहीं होने दिया। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के ऐसे आंकड़े जारी किए जिस पर वह खुद भी सफाई देने में दिक्कत महसूस कर रही थी और दुनिया भर में पहली दफा भारत के आंकडों पर गहरा संदेह जाहिर किया जाने लगा। इसके पहले भाजपा तीन प्रमुख हिंदी प्रदेशों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सत्ता कांग्रेस के हाथों गंवा चुकी थी। हालात ऐसे थे कि 2014 के बाद पांच बजट पेश करने का जनादेश पाई मोदी सरकार छठा बजट (अंतरिम) ले आई और पिछली तारीख से दो हेक्टेयर जोत तक के किसान परिवारों को सालाना 6,000 रु. देने का ऐलान किया। ऊंची जातियों को खुश करने के लिए आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को 10 फीसदी आरक्षण देने का विधेयक ले आया गया। लेकिन इसके बाद ही कश्मीर के पुलवामा में आतंकी हमले में सीआरपीएफ के 44 जवान मारे गए और जवाब में पाकिस्तान में बालाकोट एयर स्ट्राइक हुआ। इसी के इर्द-गिर्द मर्दाना या दबंग राष्ट्रवाद का अफसाना गढ़कर सारे जमीनी मुद्दों को हवा में उड़ाने की कोशिश हुई। नतीजे तो यही साबित करते हैं कि यह कोशिश कामयाब हो गई। विपक्ष मोदी सरकार की नाकामियों, संवैधानिक संस्थाओं की बर्बादी, नोटबंदी और जीएसटी से आर्थिक बदहाली और कुछ हद तक राफेल विमान सौदे में भ्रष्टाचार के मुद्दों पर अपना अभियान केंद्रीत कर रहा था। लेकिन अपनी शुरुआती योजनाओं या धारणाओं के विपरीत वह एकजुट मोर्चा नहीं कायम कर पाया। जहां उसने मोर्चेबंदी की भी तो वह बेमानी साबित हुआ। विपक्ष की मोर्चेबंदी के लिहाज से तकरीबन पांच चुनौतियां मोदी-शाह की अगुआई में एनडीए के सामने थीं। बड़े दावे के साथ कांग्रेस हिंदी प्रदेशों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के अलावा पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली में अकेले दम पर तो बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र और कर्नाटक में सहयोगियों के साथ चुनौती देने का दम भर रही थी। अभी पांच महीने पहले ही मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में पंद्रह साल बाद और राजस्थान में अपनी बारी के तहत कांग्रेस सत्ता में लौटी थी। इसलिए पार्टी को पूरा भरोसा था कि केंद्र के प्रति लोगों में नाराजगी उसे बदले हालात में काफी सीटें दिला देंगे लेकिन हुआ ठीक उलटा। राजस्थान में सभी 25 सीटें वह गंवा बैठी तो मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ सिर्फ अपने बेटे नकुल के लिए छिंदवाड़ा की सीट ही बचा पाए। कुछ जानकारों के हिसाब से भोपाल में दिग्विजय सिंह के खिलाफ मालेगांव धमाके की आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को उतारकर भाजपा ने हवा पलट दी। इसके असर से न सिर्फ भाजपा के गढ़ मालवा में मंदसौर किसान गोलीकांड से बह रही नाराजगी की हवा का रुख मुड़ गया, बल्कि गुना में ज्योतिरादित्य सिंधिया का गढ़ भी ढह गया। छत्तीसगढ़ में भी हाल के विधानसभा चुनावों में बुरी तरह पिटी भाजपा कुल 11 में से 9 सीटें जीत गई। कर्नाटक और महाराष्ट्र में तो सारे सकारात्मक कारकों के बावजूद न सिर्फ कांग्रेस, बल्कि जद (एस) और राकांपा की जमीन भी खिसक गई। कर्नाटक में पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा तक अपनी सीट नहीं बचा पाए। वहां कांग्रेस और जद (एस) के बीच कलह भी इसकी वजह बताई जा रही है लेकिन ज्यादातर सीटों पर भाजपा की जीत का अंतर इतना भारी है कि सिर्फ कलह को ही वजह नहीं बताया जा सकता। महाराष्ट्र में भी कुछेक सीटों पर ही प्रकाश आंबेडकर के तीसरे मोर्चे वंचित अघाड़ी को मिले वोटों को कांग्रेस-राकांपा उम्मीदवारों की हार का दोषी बताया जा सकता है। ज्यादातर सीटों पर तो जीत का फासला बड़ा है। कांग्रेस को ऐसी ही निराशा बिहार, झारखंड में अपने सहयोगियों के साथ झेलनी पड़ीं, जहां लगभग विपक्ष की जमीन हवा हो गई। हिंदी प्रदेशों में मोदी लहर के खिलाफ सबसे मजबूत मोर्चेबंदी उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-रालोद गठबंधन के रूप में मौजूद थी। यह गठबंधन सामाजिक समीकरणों और केंद्र तथा राज्य में योगी आदित्यनाथ सरकार के खिलाफ दोहरी नाराजगी के बूते काफी मजबूत लग रहा था। यहां भाजपा (60) और अपना दल (2) की जीती तकरीबन दो-तिहाई से सीटों पर जीत का अंतर भी थोड़ा है। करीब दस सीटों पर गठबंधन से बाहर रह गई कांग्रेस को मिले वोट भी जीत-हार तय करने में प्रभावी हुए। इसलिए यह कयास भी है कि कांग्रेस के उम्मीदवारों ने भाजपा के बदले गठबंधन को नुकसान पहुंचाया। यहां ईवीएम की गड़बड़ियों की आशंकाएं भी शिद्दत से जाहिर की जा रही हैं। बदायूं में सपा उम्मीदवार धर्मेंद्र यादव से लेकर बलिया में सनातन पांडेय तक ऐसी धांधलियों के आरोप लगा रहे हैं। ईवीएम में कथित धांधली के आरोप सबसे पहले मायावती ने उठाए। हालांकि बसपा के 10 उम्मीदवार जीत गए और सपा को सिर्फ पांच सीटों से ही संतोष करना पड़ा। फिर आखिरी समय में रायबरेली और अमेठी में कांग्रेस को वोट देने की मायावती की अपील के बावजूद अमेठी में राहुल गांधी की हार हो गई। इससे ये आशंकाएं भी उभरने लगी हैं कि खासकर पूरब और मध्य उत्तर प्रदेश में बसपा के वोट सपा या कांग्रेस को ट्रांसफर नहीं हो पाए हैं। वोट ट्रांसफर न होने की दो मिसालें तो खास हैं। एक, मैनपुरी में सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव 2014 में करीब साढ़े तीन लाख वोटों से जीते थे जबकि बसपा उम्मीदवार को 1.30 लाख वोट मिले थे। लेकिन 2019 में बसपा सुप्रीमो मायावती के उनके साथ मंच साझा करने के बावजूद मुलायम सिंह सिर्फ 94,000 वोटों से ही जीत पाए। दूसरी मिसाल कन्नौज में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल की हार का है। 2014 में डिंपल करीब 22,000 वोटों से हारी थीं और बसपा उम्मीदवार को करीब सवा लाख वोट मिले थे। 2019 में डिंपल के वोटों में सिर्फ 40,000 की बढ़ाातरी हुई और वे चुनाव हार गईं। फिर, यहां ऊंची जातियों के अलावा अति पिछड़ी जातियां और गैर-जाटव अनुसूचित जातियों के वोट भी मुस्तैदी के साथ भाजपा की ओर जाने के कयास हैं। इसी तरह बिहार और झारखंड में महागठबंधन समाज के बड़े वर्ग को आश्वस्त नहीं कर पाया। इन प्रदेशों की कथा यह भी बताती है कि हिंदी प्रदेशों में वाकई कोई मौन लहर काम कर रही थी। बंगाल की आश्चर्यजनक बानगी इन नतीजों का सबसे चौंकने वाला पहलू बंगाल में भाजपा की महत्वपूर्ण पैठ है। बहुत लोगों के लिए यह भरोसा करना मुश्किल है कि भाजपा वहां 18 सीटें जीत गई। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस 22 सीटें ही मिलीं। लगभग समूचा उत्तर और पश्चिम-दक्षिण बंगाल में भाजपा की जमीन तैयार हो गई। हिंदू महासभा का जन्म जरूर बंगाल में हुआ था और आजादी के वक्त सबसे पहले दंगे भी उसी इलाके में हुए लेकिन आजादी के बाद बंगाल में जनसंघ या भाजपा के प्रति रत्ती भर भी आकर्षण अभी तक नहीं रहा है। लेकिन इस बार बड़े पैमाने पर वाम कार्यकर्ताओं के भाजपा की ओर रुख करने के संकेत मिल रहे हैं। बंगाल में भाजपा की पैठ एक मायने में आजादी के आंदोलन के वक्त स्थापित राष्ट्रवाद की उदार धारा के पतन का द्योतक है। इससे स्पष्ट है कि देश एक अलग धुरी में पहुंच गया है। यह धुरी किस रूप में अपने नजारे दिखाएगी, वह अगले पांच साल देखने को मिलेंगी। उम्मीद करनी चाहिए कि नई धारा कुछ सकारात्मक पहलुओं को भी सामने लाए। जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए की बैठक में संसद के सेंट्रल हॉल में कहा कि हमें अल्पसंख्यकों के डर को मिटाना है। हालांकि मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, बिहार में मुसलमानों के खिलाफ हाल की हिंसक घटनाएं इसके उलट संकेत दे रही हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि समाज में विभाजनकारी शक्तियां सिर न उठाएं और अर्थव्यवस्था में शिद्दत से सुधार हो, ताकि लोगों की जिंदगी में सूकून आए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और आउटलुक के संपादकीय सलाहकार हैं)