जून 2019

गांधी बनाम गोडसे

डॉ. सुभाष खंडेलवाल

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को नाथुराम गोडसे ने ३० जनवरी १९४८ को मारकर सदैव के लिए अमर कर दिया। १९४७ के भारत-पाक बंटवारे ने दोनों देशों को लहूलुहान कर दिया था। लाशों से भरी ट्रेनें आ-जा रही थीं। सिर इधर, तो धड़ उधर था। हजारों लोग मारे गए थे। करीब ५ से १० लाख लोग मारे गए थे, जिसके अधिकृत आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। इसका भी रिकॉर्ड नहीं है कि ज्यादा हिन्दू मारे गए थे या मुसलमान। यह तथ्य हमेशा इतिहास में दर्ज रहेगा कि वे सभी इंसान थे। इस मारकाट ने लोगों के दिल दिमाग को बुरी तरह दहला दिया था। दुनिया के इतिहास में ऐसी नृशंसता और नफरत का मंजर और कहीं दर्ज नहीं है। गांधी का क्या प्रभाव था, वह आज का भारत और खासतौर पर उसकी पीढ़ी नहीं समझ सकती। इंदौर के टोरी कॉर्नर के जनक बाबूलाल गिरी ने वो दृश्य देखा था। ऐसा लगा था जैसे देश के हर घर का मुखिया को मार दिया गया हो। वे बताते थे कि ‘‘हमने अपनी जिंदगी में ऐसी मौत या शहादत नहीं देखी। हमारी होटल है। जिस तरह लोग अपने घर में किसी की मौत होने पर घर में रखा दूध-खाना सब बहा देते हैं, वैसे ही उस दिन हर होटल वाले ने अपना दूध बहा दिया था। उसका घी या मावा नहीं बनाया था।'' गांधी की मौत ने नफरत के उस ज्वालामुखी के लावे पर बरफ डाल दी थी। आजादी के बाद गांधी की वारिस कांग्रेस सत्ता में आ गई। गांधी के समाजवादी धारा के वारिस समाजवादी प्रतिपक्ष में आ गए। कल की जनसंघ, आज की भाजपा से जुड़े हिन्दू महासभा, आरएसएस आदि संगठनों पर प्रतिबंध लग गया। वे बचाव की मुद्रा में आ गए। आजादी के बाद अगले २५ वर्ष तथाकथित मुस्लिम तुष्टिकरण में चले गए, जिससे इस देश के मुसलमान के हिस्से में सिर्फ नुकसान और बदनामी ही आई, फायदा राजनीतिक दलों को मिला। पिछले ८०० बरस में कभी हिन्दू-मुसलमान नहीं हुआ था। वह वोट की फसल बनकर हिन्दू मुसलमानों में बंट गया। सन १९८६ में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने शाहबानो प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय द्बारा दिए गए फैसले को मुस्लिम कठमुल्लावाद के दबाव में आकर संविधान संशोधन के जरिए पलट दिया। उसी की प्रतिक्रिया में हिन्दू साम्प्रदायिकता ने राममंदिर आंदोलन के रूप में जन्म लिया। सन १९९२ में बाबरी मस्जिद विध्वंस ने इसकी पूर्णाहूति कर दी। देश में आर्थिक नव उदारीकरण की बयार बहने लगी। नरेंद्र मोदी २०१४ का चुनाव कांग्रेस की असफलता को भुनाते हुए विकास के नाम पर जीते थे। सत्रहवीं लोकसभा का चुनाव वे जिन अनेकानेक कारणों से जीते हैं, उनमें मुख्य प्रतिपक्ष का दिशाहीन हो जाना है। पिछले पांच वर्षों में उत्तरप्रदेश और बिहार में चार सौ से अधिक साम्प्रदायिकता के प्रकरण दर्ज हुए, लेकिन वे अपने मोहल्ले से भी आगे नहीं बढ़ सके। हकीकत में हमारा देश जातिवादी है। हिन्दू मुसलमान की बात करने वाले ही १९८४ में दिल्ली और देशभर में एक रात में ही हजारों सिक्खों का कत्ल कर देते हैं। मंडल और आरक्षण के नाम पर दलितों-पिछड़ों को जला देते हैं। आजादी की लड़ाई में जब गांधी जेल गए तो उन्होंने देखा कि आये तो यहां सब देश के लिए हैं लेकिन खाना तो ठीक पानी भी एक-दूसरे का छुआ नहीं पी सकते हैं। हजारों वर्षों की राजा महाराजा, बादशाहों की गुलामी और उसके बाद अंग्रेजों की गुलामी ने इस देश के तन और मन दोनों ही को बीमार कर दिया है। जनता लड़ना, बोलना तो ठीक सीधे तनकर खड़े भी नहीं हो सकती। आजादी की लड़ाई में सर्वाधिक १९४२ में भारत छोड़ो आंदोलन में ५० हजार के करीब लोग जेल गए थे। जबकि देश ३६ करोड़ का था। आपातकाल सन् १९७५ में भी देश ५० करोड़ का था और ५० हजार लोग जेल गए थे। गांधी की सत्याग्रह की अवधारणा ने सोये देश को जगाया था। जो लड़ नहीं सकता बोलने से भी डरता था, वो चुपचाप या अन्य तरीकों से मदद करता था। पिछले पांच वर्षों में देश भर के विभिन्न हिस्सों से खेतीहर मजदूर किसान कर्मचारी, छात्र, बेरोजगार, दिल्ली आते रहे। ये सब गांधी के विचारों की देन है। कई संगठन पैदल और नंगे बदन आकर दिल्ली में अनशन और आंदोलन करते रहे। हजारों स्वीकृत नौकरी चयनीत नौजवान घर बैठे रहे। प्रतिपक्ष खासतौर पर कांग्रेस ने क्या किया? यदि गांधी को उन्होंने छू भी लिया होता तो देश हिल जाता। कांग्रेस गांधी से दूर है। वो गोडसे बोलने पर नाराज हो सकती है। लेकिन जब नरेन्द्र मोदी लोकसभा में गांधी के साथ लोहिया-पटेल को भी उदधृत कर रहे हैं। तब लगता है कि देश के गांव-गली मोहल्ले में हर वो इंसान जो रोटी, रोजगार, नौकरी, शिक्षा, चिकित्सा के लिए और गुंडागर्दी, बलात्कार और सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ खड़ा होता है, वो गांधी ही है। दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला, पख्तूनीस्तान में खान अब्दुल गफ्फार खान, अमेरिका में मार्टिन लूथर विंâग ने गांधी की विरासत को ही आगे बढ़ाया है। भारत के डॉ. लोहिया जब अमेरिका जाकर अश्वेत होने पर और भारतीय भेषभूषा के कारण होटल में जाने से रोक लिए जाते हैं, तब वहीं सत्याग्रह कर पूरी दुनिया को अन्याय का प्रतिकार कर न्याय के लिए लड़ाई लड़ना सीखाते हैं। लेकिन आज मुल्क के नेता और दल आजादी के ७२ वर्ष बाद गांधी और गोडसे के दो राहे पर खड़े हैं। २०१९ के नीहितार्थ २०१९ मोदी की महाविजय है। इसके अनेकानेक निहीतार्थ है। पहला है बालाकोट, सेना और देशभक्ति। दूसरा हिन्दू साम्प्रदायिकता। तीसरी सरकार के किए गए काम जैसे गैस की टंकी और मकान। चौथी है टीवी मीडिया पर एकाधिकार। पांचवी है धन बल की बेइंतहा ताकत। छठा है कुशल रणनीति अथक परिश्रम और सातवां है, इन सबसे बनी मोदी लहर। इससे आगे निहितार्थ की तस्वीर और भी है जो विजयी उत्सव में ढंक गई है। भाजपा २०१७-२०१८ में पूर्व दस लोकसभा उपचुनाव उ.प्र. की मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री की गोरखपुर और पूâलपूर, राजस्थान की अलवर, अजमेर, म.प्र. की झाबुआ और बिहार अररिया जैसे सीटे हार चुकी थी। नोटबंदी, जीएसटी, बेरोजगारी और वादाखिलाफी से जनता नाराज थी। भाजपा और कांग्रेस में यही फर्वâ है भाजपा ने आजादी के ७२ वर्षों में १० वर्ष की सत्ता देखी है। कांग्रेस में ६० वर्ष की सत्ता देखी है। दिसंबर २०१८ के म.प्र. राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार उसके लिए वरदान ओर कांग्रेस के लिए अभिशाप बन गए। भाजपा का घमंड कमजोर था टूट गया। उसे दिन में ही आसमान में तारे दिख गए। भाजपा ने यू टर्न लिया पिछले साढ़े चार वर्षों से उसके घमंड ने उसके सभी गठबंधन सहयोगियों को भगा दिया था। अमित शाह सीधे पंजाब पहुंचे बादल के चरण स्पर्श किए आशीर्वाद लिया। पिछले साढ़े चार वर्षों से सबसे अधिक आलोचना करने वाले उद्धव ठाकरे के पास महाराष्ट्र पहुंचकर उनसे भी दोस्ती गले मिल लिया। इसके बाद बिहार पहुंचे उन नीतिश कुमार के पास जिन्हें गठबंधन सहयोगी बनाने के बाद केन्द्री मंत्रीय परिषद में दो मंत्री पद भी नहीं दिए थे। उस पर कमाल यह कि लोकसभा २०१४ में भाजपा की जीती हुई २३ लोकसभा सीटों में से ६ कम करके नीतिश को १७ और बाकी दलों को ६ सीटें देकर खुद को १७ पर समेट लिया। उत्तरप्रदेश में नाराज पटेल को भी ३ सीटें दे दी इस तरह से देश के अन्य हिस्सों में भी झुककर एक बड़ा चुनाव पूर्व का गठबंधन बना लिया। जीत के दृढ़ संकल्प और अपनी जमीनी हकीकत को समझना मोदी शाह की जोड़ी की खुबी थी, वहीं उनकी सफलता भी बन गई। जीत से कांग्रेस का घमंड आसमान पर पहुंच गया। वो अखाड़े का जुलूस बन गई। उसके पहलवान लकड़ी लेकर घूमाने लग गए। घायल उसके साथ के दल हो रहे थे। कांग्रेस चुनाव पूर्व गठबंधन धर्म भूल चुकी थी। देश की जनता लोकतंत्र के हठ का यह विचित्र नजारा देख रही थी। जिसमें उसके समक्ष सिर्पâ मोदी थे। देश में दो ही तरह के वोट थे मोदी के पक्ष के और विपक्ष के। विपक्ष के जब नेता ही बंट गए वोट तो बाद में बंटना ही थे। राहुल गांधी भाषण दे रहे थे। कि बंगाल में ममता बेनर्जी की सरकार में जनता बदहाल है। मोदी कह रहे थे वो ही प. बंगाल, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब आदि में कांग्रेस और उसके भविष्य के गठबंधन सहयोगी एक-दूसरे के लिए कह रहे थे और मोदी के आरोपों की पुष्टि कर रहे थे। २०१४ का चुनाव कांग्रेस की असफलता थी। २०१९ चुनाव कांग्रेस और प्रतिपक्षीय दलों की असफलता है। २०१४ मई में दिल्ली की सातों लोकसभा जनता ने भाजपा को दी थी। उसी जनता ने आठ माह बाद दिल्ली में मोदी-अमित शाह और पूरे केन्द्रीय मंडल द्वारा घूम-घूम कर वोट मांगने के बाद भी ७० में से ६७ सीटें केजरीवाल को दी थी। चुनाव दिल्ली की केन्द्र सरकार का था। भाजपा की शादी की बारात उसके गठबंधन सहयोगियों के साथ निकल रही थी। जिसके दूल्हे नरेन्द्र मोदी थे। प्रतिपक्ष की शादी का कोई निमंत्रण भी नहीं छपा था और न ही बारात में गठबधंन सहयोगियों को बुलावा था। फिर भी इस चल पड़ी बारात से दुल्हा लापता था। चर्चा में कई दूल्हे थे। वो भी ऐसे की शादी के पहले ही आपस में सरेआम झगड़ा कर रहे थे। यदि चुन भी लिए जाए तो दिनों की भी ग्यारंटी नहीं थी। इस तरह के झगड़े और टूटन देश पहले भी देख चुका था। गठबंधन की सरकारें पहले भी बनी और गिरी थी। जिनको गिराने की वाहक कांग्रेस ही बनी थी। प्रियंका गांधी के मुंह से चुनाव में ये निकल भी गया कि हम २०२२ की तैयारी कर रहे हैं। मोदी सोमवार, मंगलवार, बुधवार आदि वार गिनकर हर वार पर अलग-अलग दूल्हें बता रहे थे। जनता ने छुट्टी का दिन रविवार तय कर दिया। रॉफेल सौदे में हुए कथित घोटाले को लेकर राहुल ने लगभग अकेले ही लड़ाई लड़ी लेकिन इस लड़ाई में उनसे चूक हुई। वे यह भूल गए कि वे अकेले ही प्रतिपक्ष नहीं हैं। संसदीय जांच की मांग को लेकर राहुल गांधी यदि दिल्ली के रामलीला मैदान पर गांधी के सत्याग्रह को आंशिक तौर पर ही अमल में ले आते और अनशन पर बैठ जाते, पुलिस की एक लाठी भी खा लेते और जेल चले तो देश भर के कांग्रेस कार्यकता आंदोलित हो जाते। दूसरे विपक्षी दलों को भी चाहे-अनचाहे उनका साथ देना पड़ता। सरकार के बचाव में खड़ा मीडिया भी उनकी इस लड़ाई को अनदेखा नहीं कर पाता। ऐसा होने पर सरकार पर दबाव बन सकता था और लड़ाई को तार्किक परिणति तक पहुंचाया जा सकता था। राहुल को अब याद आ रहा है कि सब चुप थे और वे अकेले ही बोल रहे थे कि ‘चौकीदार चोर है।’ उनका यह कहना सही नहीं है। सच तो यह है कि कि उनके साथ जनता भी बोल-समझने लगी थी और इसीलिए मोदी ने घबराकर अपने समर्थकों से उनके नाम के आगे ‘मैं भी चौकीदार’ का टैग लगवाया था। जीतने वाले के सर हजार होते हैं लेकिन हारने वाले के कोई खेवनहार नहीं होते हैं। इसीलिए ‘चौकीदार चोर है’ के जुमले को आज कांग्रेस की हार का कारण बताया जा रहा है। मोदी के साथ भाजपा के २७२ सांसदों के साथ सबल गठबंधन था। राहुल गांधी के पास ४४ सासंद थे पर गठबंधन नदारत था। यही नहीं वे सिर्फ टीवी और रोड शो करते रहे। वे भूल गए कि वे प्रतिपक्ष है। देश की धरती पर उन्हें उतरना है, गली गांव से जुड़ना है। उसके लिए टीवी साधन है, साध्य नहीं है। सत्ता के लिए अपना काम अंतिम आदमी तक पहुंचाना और प्रतिपक्ष के लिए उसके दर्द और तकलीफ से रूबरू होना है। सरकार अंतिम आदमी तक कितनी पहुंची, नहीं पहुंची यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन कांग्रेस और प्रतिपक्ष अंतिम आदमी तक नहीं पंहुचा उस पर किसी बहस की गुंजाइश नहीं है। लोकतंत्र का वोट से लड़ा गया यह चुनावी युद्ध राम और रावण का नहीं है। यह कृष्ण और वंâस का, पांडव-कौरव का भी नहीं है। यही नहीं यह विदेशी अंग्रेज और देशी भारत का भी नहीं है। यह भारत की ही दो एक जैसी सूरतों का है, जिसे एक दूसरे से ज्यादा अच्छी या कम अच्छी कह सकते हैं। या एक दूसरे ये ज्यादा या कम बुरा कह सकते हैं। इसे यह भी कह सकते हैं कि हर जीतने वाला सही और हारने वाला गलत हो यह जरूरी नहीं है। इसे हम यह भी कह सकते हैं कि जो जीता वही सिकंदर...!