मार्च 2019

सीबीआई की तोतागीरी और कोलकाता का सबक

रविवार डेस्क

करीब एक दशक पुराने शारदा चिट फंड घोटाले की जांच को लेकर कोलकाता के पुलिस कमिश्नर को गिरफ्तार करने के लिए सीबीआई की भारी -भरकम टीम जिस तरह वहां पहुंची, उससे एक बार फिर यही साबित हुआ कि केंद्र सरकार की इस जांच एजेंसी का 'हुक्मरानों के हरम की बांदी' के रूप में प्रचलित अपनी कलंकित छवि से छुटकाना पाने का अभी भी कोई इरादा नहीं है।

आखिरकार एक बार फिर साबित हुआ कि देश की सबसे बडी जांच एजेंसी सीबीआई यानी केंद्रीय जांच ब्यूरो का खुद सुधरने और अपनी बदनाम छवि से छुटकारा पाने का कोई इरादा नहीं है। केंद्र सरकार भी ऐसा कुछ नहीं करना चाहती, जिससे आम लोगों में इस एजेंसी के प्रति भरोसा पैदा हो। इसीलिए पिछले महीने बजरिए सीबीआई केंद्र सरकार और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच दो दिन तक चला टकराव भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ही खत्म हो सका। सीबीआई जहां बहुचर्चित शारदा चिट फंड घोटाले की जांच के सिलसिले में पूछताछ के लिए कोलकाता के पुलिस कमिश्नर को गिरफ्तार करने पर अड़ी हुई थी, वहीं पश्चिम बंगाल सरकार उसे ऐसा करने से रोकने में जुटी थी। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की याचिका पर फैसला दिया कि सीबीआई कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार से पूछताछ तो कर सकती है, लेकिन वह उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकेगी। सुप्रीम कोर्ट से इसी तरह का फैसला अपेक्षित था। दोनों पक्षों ने इस फैसले को अपनी-अपनी जीत बताया, वह भी स्वाभाविक ही था। गौरतलब है कि 3 फरवरी की रात में सीबीआई का 40 सदस्यीय दल बिना किसी वॉरंट या अदालती आदेश के कोलकाता के पुलिस कमिश्नर को गिरफ्तार करने के मकसद से उनके घर और कार्यालय पर पहुंचा था। लेकिन पश्चिम बंगाल पुलिस ने सीबीआई के दल को ऐसा करने से न सिर्फ रोका, बल्कि हिरासत में भी ले लिया। यही नहीं, सीबीआई के रात के अंधेरे में इस प्रयास को राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य सरकार को अपमानित करने वाली कार्रवाई बताते हुए केंद्र सरकार और भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। वे कोलकाता में धरने पर बैठ गई थीं। दूसरी तरफ अपने मकसद में नाकाम सीबीआई ने पश्चिम बंगाल सरकार पर अपने काम में रुकावट डालने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई। उसने अपनी याचिका में कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार पर चिट फंड घोटाले की जांच से संबंधित कुछ अहम दस्तावेजों को नष्ट करने का भी आरोप लगाया। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से इस आरोप के समर्थन में सबूत देने को कहा, लेकिन जब सीबीआई अपने आरोप को साबित नहीं कर सकी तो सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि सीबीआई कोलकाता के पुलिस कमिश्नर से पश्चिम बंगाल या दिल्ली से बाहर कहीं भी पूछताछ तो कर सकती है, लेकिन वह उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकेगी। कोर्ट ने सीबीआई की यह अपील भी ठुकरा दी कि पश्चिम बंगाल सरकार के खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला दर्ज किया जाए। जाहिर है कि सीबीआई और प्रकारांतर से केंद्र सरकार को मुंह की खानी पड़ी है। इसीलिए ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अपनी नैतिक जीत बता रही हैं। बहरहाल, वह संकट भले ही टल गया हो जिस पर पूरे देश की निगाहें लगी थीं, लेकिन दो दिन तक कोलकाता से लेकर दिल्ली तक जो कुछ हुआ, वह अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया है। 'कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना' वाले अंदाज में जो कुछ होता रहा, उसे आगामी चुनाव से जोडकर न देखा जाए, ऐसा तो हो नहीं सकता। इसलिए यह मानना भी आसान नहीं है कि वहां जो हो रहा था, वह महज संवैधानिक संकट था। दरअसल, यह सिर्फ केंद्र और राज्य की दो एजेंसियों के बीच टकराव का मामला नहीं था। यह साफतौर पर केंद्र और राज्य सरकार के बीच राजनीतिक टकराव का अभूतपूर्व मामला था, जिसमें फौरी तौर पर यही लगता है कि केंद्र ने देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी को अपने मोहरे के तौर पर इस्तेमाल किया। अगर यह भी मान लिया जाए कि इसमें केंद्र के राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका नहीं रही होगी, तब भी यह तो माना ही जा सकता है कि सीबीआई के बिदा हो रहे विवादित रिकॉर्ड वाले कामचलाऊ मुखिया ने अतिरिक्त वफादारी दिखाने के लिए अपने स्तर पर ही इस तरह की कार्रवाई के निर्देश दिए हों। जो भी हो, हकीकत यही है कि केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच इस राजनीतिक टकराव की बुनियाद उसी दिन तैयार हो गई थी, जब कुछ दिनों पहले ममता बनर्जी ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के सुर में सुर मिलाते हुए यह ऐलान कर दिया था कि वे भविष्य में सीबीआई को अपने राज्य में प्रवेश की अनुमति नहीं देंगी। ऐसा ही फैसला बाद में छत्तीसगढ़ में बनी कांग्रेस सरकार ने भी किया। गौरतलब है कि सीबीआई का गठन दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान अधिनियम-1946 के तहत हुआ है, जिसकी धारा-5 के तहत सीबीआई को पूरे देश में जांच का अधिकार दिया गया है। लेकिन धारा-6 में साफ कहा गया है कि राज्य सरकार की अनुमति के बिना सीबीआई उसके अधिकार क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकती। सीबीआई को अपने कार्यक्षेत्र में न घुसने देने का इन राज्य सरकारों का फैसला केंद्र द्वारा उसके राजनीतिक इस्तेमाल के आरोप से जुड़ा है। जिस वक्त ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू ने अपने फैसले का ऐलान किया था, उस दौरान सीबीआई के दो शीर्ष अधिकारियों- निदेशक आलोक कुमार और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगा कर पहले से बदनाम इस जांच एजेंसी की बची-खुची साख को चौपट कर रहे थे। उनके विवाद में हस्तक्षेप करते हुए केंद्र सरकार ने आधी रात को आलोक कुमार को उनके पद से हटाकर एक अन्य विवादास्पद अधिकारी को अस्थायी तौर पर सीबीआई का निदेशक बना दिया था। उसी दरमियान सीबीआई के एक वरिष्ठ जांच अधिकारी ने अपने तबादला आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल पर अपने काम में दखलंदाजी करने का आरोप लगाया था। उन्होंने राकेश अस्थाना और बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी पर भी आरोप लगाया था कि इन दोनों ने ही पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव को रेलवे की जमीन से संबंधित एक कथित घोटाले में फंसाने के लिए दबाव डाला था। बहरहाल, करीब एक दशक पुराने शारदा चिट फंड घोटाले की जांच को लेकर कोलकाता के पुलिस कमिश्नर को गिरफ्तार करने के लिए सीबीआई की भारी-भरकम टीम जिस तरह वहां पहुंची, उससे फिर यही साबित हुआ कि केंद्र सरकार की इस जांच एजेंसी का 'हुक्मरानों के हरम की बांदी' के रूप में प्रचलित अपनी कलंकित छवि से छुटकाना पाने का अभी भी कोई इरादा नहीं है। उसकी यह छवि कोई हाल के वर्षों में नहीं बनी है, बल्कि यह चार दशक से भी ज्यादा समय से बनी हुई है। केंद्र में चाहे इस रंग की सरकार रही हो या उस रंग की, सभी ने इस एजेंसी का इस्तेमाल अपने विरोधियों की बांहें मरोड़ने और अपने चहेते लोगों को बचाने में ही किया है। चूंकि यह खेल तीन-चार सालों से कुछ ज्यादा ही खेला जा रहा है, इसीलिए इस संस्था के शीर्ष अधिकारियों की एक-दूसरे को निपटाने की 'सत्य कथाएं' और 'नूतन कहानियां' भी पिछले दिनों जोरशोर से उजागर हुईं। इसीलिए देश ने यह भी देखा है कि अगर इस एजेंसी का मुखिया सरकार की मर्जी के मुताबिक काम नहीं करता है तो उसे किस तरह आधी रात को हटा दिया जाता है। अभी-अभी तो यह भी देखा गया कि लंदन में इलाज करा रहा देश का वित्त मंत्री और सत्तारुढ़ दल का ताकतवर नेता किस तरह अरबों रुपए के घपले की आरोपी एक जानी-मानी बैंकर और एक बदनाम उद्योगपति के बचाव में उतर आता है और वहीं से बैठे-बैठे मामले की जांच कर रहे सीबीआई के अधिकारियों को हड़काता है। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि शारदा चिट फंड घोटाले की जांच हर हाल में अपने अंजाम तक पहुंचनी चाहिए, ताकि लाखों निवेशकों के करीब 40,000 करोड़ रुपए हड़प जाने वाले बेईमानों को सजा मिल सके। वैसे चिट फंड घोटाले का यह अकेला मामला नहीं है। देश में करीब 350 चिट फंड कंपनियां दस करोड़ से भी ज्यादा लोगों को लूट का शिकार बना चुकी हैं। इनमें से कई कंपनियों के संचालकों के खिलाफ उच्च और सर्वोच्च अदालत के आदेशों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। लुटे-पिटे निवेशक मारे-मारे फिर रहे हैं। इस सिलसिले में सबसे बड़ी मिसाल के तौर पर पर्ल एग्रोटेक कॉरपोरेशन लिमिटेड का नाम लिया जा सकता है। इस कंपनी ने निवेशकों से करीब 50,000 करोड़ रुपए ठगे हैं। यह भारत की सबसे बड़ी चिट फंड लूट है। सुप्रीम कोर्ट तीन साल पहले इस कंपनी की संपत्तियों को नीलाम कर निवेशकों को पैसा लौटाने का आदेश दे चुका है, लेकिन उसका आज तक पालन नहीं हुआ है। लूट का शिकार हुए निवेशकों ने हजारों की संख्या में बीती दो फरवरी को ही दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया, जिसकी खबर एकाध टीवी चैनल और कुछेक अखबारों में ही जगह पा सकी। बहरहाल, सारदा चिट फंड घोटाले को लेकर कुछ सवाल हैं, जो मामले की जांच कर रही सीबीआई और केंद्र सरकार की नीयत को संदिग्ध बनाते हैं। इस घोटाले की जांच का मामला सीबीआई के हाथ में कोई कल-परसों नहीं आया है। उसके पास यह मामला पांच साल पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश से आया था। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि सीबीआई अभी तक क्या करती रही और अभी ही उसने यह 'सर्जिकल स्ट्राइक' क्यों की? इस घोटाले के तार असम तथा कुछ अन्य राज्यों से भी जुड़े हैं। घोटाले से जुड़े तृणमूल कांग्रेस के कुछ नेता गिरफ्तार भी किए जा चुके हैं। घोटाले के एक मुख्य आरोपी तृणमूल कांग्रेस के पूर्व नेता मुकुल रॉय भी हैं, जो करीब डेढ़ साल पहले भाजपा में शामिल हो चुके हैं। एक आरोपी बाबुल सुप्रियो केंद्र सरकार में मंत्री हैं। असम के पूर्व कांग्रेसी नेता और अब वहां की भाजपा सरकार में मंत्री हेमंतो बिस्बसरमा का नाम भी आरोपियों में शामिल है। सवाल है कि क्या सीबीआई ने आज तक मुकुल रॉय, बाबुल सुप्रियो और हेमंतो बिस्बसरमा से कोई पूछताछ की है या वे जांच के दायरे से बाहर हो चुके हैं? सवाल यह भी है कि अगर कोलकाता के पुलिस कमिश्नर पूछताछ के लिए उपलब्ध नहीं हो रहे थे तो क्या सीबीआई ने राज्य के पुलिस महानिदेशक या मुख्य सचिव से इस बारे में बात की थी? दरअसल, यही वे सारे सवाल हैं, जिनसे ममता बनर्जी को ताकत मिली। जिस जांच से उन्हें और उनकी पार्टी के नेताओं को डरना या दबना चाहिए था, उसके खिलाफ वह अपने स्वभाव के मुताबिक तनकर खड़ी हो गईं। उन्होंने यह समझने में न तो देरी की और न कोई गफलत कि सीबीआई के जरिए केंद्र सरकार का यह हमला भ्रष्टाचार पर नहीं, बल्कि उनकी राजनीति पर है और इसके जरिये भाजपा पश्चिम बंगाल में अपने लिए राजनीतिक जमीन तैयार करना चाहती है। वे अपने धरने के जरिये यह संदेश देने में काफी हद तक कामयाब रहीं। इसलिए उन्हें देश भर के तमाम विपक्षी दलों का समर्थन मिलने में भी कोई देरी या मुश्किल नहीं हुई। सरकार और भाजपा के नेतृत्व को भी ममता को घेरने का अपना दांव उलटा पड़ने का जल्द ही अंदाजा हो गया था, लिहाजा उसे इस मामले में सीबीआई का बचाव करने के लिए अपने कई मंत्री और वरिष्ठ नेताओं को मैदान में उतारना पड़ा। लेकिन उनमें से एक भी तार्किक रूप से सीबीआई की हड़बड़ी भरी कार्रवाई के औचित्य को साबित करने में नाकाम रहा। यहां तक कि गृह मंत्री राजनाथ सिंह को भी संसद में अपनी सरकार और सीबीआई का बचाव करने के लिए हास्यास्पद गलत बयानी का सहारा लेना पड़ा। उन्होंने कहा कि देश के इतिहास में पहली बार सीबीआई की टीम को अपना काम करने से किसी राज्य सरकार ने इस तरह न सिर्फ रोका, बल्कि राज्य की पुलिस ने उसे हिरासत में भी ले लिया। राजनाथ सिंह यह बताते वक्त भूल गए या इस तथ्य को छिपा गए कि 2011 में छत्तीसगढ़ में आदिवासी उत्पीड़न की एक लोमहर्षक घटना की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गई सीबीआई की टीम पर राज्य की तत्कालीन भाजपा सरकार द्वारा नियुक्त विशेष पुलिस अधिकारियों ने बंधक बना लिया था और फिर उस पर जानलेवा हमला भी किया था। अंत में सीबीआई की टीम को बचाने के लिए केंद्र सरकार को सीआरपीएफ की टुकड़ी भेजनी पड़ी थी। बहरहाल, ताजा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश के जरिये दोनों पक्षों के भ्रम दूर कर दिए हैं। अब सीबीआई के समक्ष चुनौती है कि उसने एकाएक जो तेजी शारदा चिट फंड घोटाले की जांच के सिलसिले में दिखाई, उसकी निरंतरता को बनाए रखते हुए वह जांच को अंजाम तक तथा घोटाले के सभी असल आरोपियों को कानून के कठघरे तक पहुंचाए। सवाल यही है कि क्या वह ऐसा कर पाएगी या केंद्र के हुक्मरान उसे ऐसा करने देंगे?